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राष्ट्रपति के भाषण की राजनीति : प्रमोद जोशी

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राष्ट्रपति के भाषण की राजनीति Jan 28 2014  ।। प्रमोद जोशी ।। वरिष्ठ पत्रकार http://www.prabhatkhabar. लालबत्ती संस्कृति और सामाजिक संपदा की अराजक लूट का आरोप भी इसी राजनीति पर है. ‘अराजकता और जन-अभियान’ की बहस अभी और तेज होगी. राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के संदेश ने इस बहस का विषय प्रवर्तन मात्र किया है. हमारे राष्ट्रपतियों के भाषण अकसर बौद्धिक जिज्ञासा के विषय होते हैं. माना जाता है कि भारत का राष्ट्रपति देश की ‘राजनीतिक सरकार’ के वक्तव्यों को पढ़ने का काम करता है. एक सीमा तक ऐसा है भी, पर ऐसे भी राष्ट्रपति हुए हैं जिन्होंने सामयिक हस्तक्षेप किये हैं और सरकार की राजनीति के बाहर जाकर भी कुछ कहा है. गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के राष्ट्र के नाम संबोधन को राजनीति मानें या राजनीति एवं संवैधानिक मर्यादाओं को लेकर उनके मन में उठ रहे प्रश्नों की अभिव्यक्ति? यह सवाल इसलिए उठा, क्योंकि गणतंत्र दिवस के ठीक पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी का धरना चल रहा था. देश भर में इस बात को लेकर चरचा थी कि क्या ऐसे मौके पर यह धरना उचित है? क्या अराजकता का नाम लोकतंत्