पोस्ट

मई 14, 2014 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

देवर्षि नारद: मीडिया के पथप्रदर्शक - अनिल सौमित्र

इमेज
देवर्षि नारद: मीडिया के पथप्रदर्शक अनिल सौमित्र लाल मिर्च ब्लॉग से साभार http://lalmirchi-anilsaumitra.blogspot.in/2009_05_19_archive.html  सामान्यतः नारद को भारतीय संदर्भों में जानना समझना ही उपयुक्त और समीचीन होगा। इसलिए नारद की जयन्ती भारतीय कालगणना के अनुसार ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को है। आंग्ल कालगणना के अनुसार तारीख और मास भले ही बदल जाये लेकिन भारतीय अथवा हिन्दू गणना के अनुसार प्रत्येक वर्ष की ज्येष्ठ मास की कृष्णपक्ष द्वितीया को ही उनकी जयंती होती है। आज यह सवाल सर्वथा समीचीन है कि नारद को हम क्यों स्मरण कर रहे हैं। क्या इस लिए लिए वे भारत की ऋषि, महर्षि और देवर्षि की परंपरा के वाहक थे। या इसलिए कि उन्होंने अपने कर्तृत्व के द्वारा लोक कल्याण को धारण किया। महर्षि नारद के बारे में आम धारणा यह है कि वे देवलोक और भू-लोक के बीच संवादवाहक के रूप में काम करते थे। देवलोक में भी वे देवताओं के बीच संदेशों का प्रसारण करते रहे। लेकिन नारद मुनि के बारे में भू-लोक वासियों के मन में अच्छी छवि नहीं दिखती है। यही कारण है कि जो लोग अपनी संतान को एक अच्छा पत्रकार बनाना चा

देवर्षि नारद के सुशासन मंत्र -प्रो. बृजकिशोर कुठियाला

इमेज
देवर्षि नारद के सवालों में हैं सुशासन के मंत्र by प्रो. बृजकिशोर कुठियाला नारद जयंती (16  मई ) पर विशेष प्रवक्ता डॉट कॉम से साभार http://www.pravakta.com/narada-devarsi-spells-of-good-governance-in-the-questions-are आज की राजनीति की प्रेरणा बन सकता है यह संवाद -प्रो.बृज किशोर कुठियाला महाराजा युधिष्ठिर की अद्वितीय सभा में देवर्षि नारद धरमराज की जय-जयकार करते हुए पधारे। उचित स्वागत व सम्मान करके धर्मराज युधिष्ठिर ने नारद को आसन ग्रहण करवाया। प्रसन्न मन से नारद ने युधिष्ठिर को धर्म-अर्थ-काम का उपदेश दिया। यह उपदेश प्रश्नों के रूप में है और किसी भी राजा या शासक के कर्तव्यों की एक विस्तृत सूची है। नारद ने कुल 123 प्रश्न किये, जो अपने आप में एक पूर्ण व समृद्ध प्रशासनिक आचार संहिता है। यह प्रश्न जितने प्रासांगिक महाभारत काल में थे उतने या उससे भी अधिक आज भी हैं। महात्मा गांधी ने जिस रामराज्य की कल्पना की थी उसका व्यवहारिक प्रारूप इन प्रश्नों से स्पष्ट झलकता है। स्वभाविक है कि महाभारत और रामायणकाल की उत्कृष्ठ भारतीय संस्कृति में हर व्यक्ति के कर्तव्यों का दिशा बोध हो। यह कर्तव्य