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परमपूज्य डॉ. हेडगेवार : अखण्ड राष्ट्र-साधना

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अखण्ड राष्ट्र-साधना : डॉ. मनमोहन वैद्य वर्ष 2011 में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की वेबसाइट में एक खण्ड जोड़ा गया- 'जॉइन आऱ एस़ एस़ '। इसका उद्देश्य था उन लोगों को संघ से जुड़ने का अवसर प्रदान करना, जिन लोगों तक संघ अभी पहुंच नहीं पाया था या जो लोग अभी संघ से दूर थे। इसका परिणाम बड़ा चौंकाने वाला आया। बड़ी संख्या में लोग, विशेषकर युवा, संघ से जुड़ने लगे। संघ से जुड़ने वालों की संख्या कितनी थी, इसका अंदाजा इन आंकड़ों में मिलता है। 2012 में प्रतिमास 1000 लोग संघ से जुड़े। यह संख्या 2013 में 2500 और 2014 में 9000 थी। इनसे ही संघ के बढ़ते फैलाव का अनुमान लगाया जा सकता है। यह संघ की बढ़ती विश्वसनीयता और प्रभाव को दर्शाता है। संघ ने यह विश्वसनीयता और प्रभाव निरन्तर निष्काम भाव से काम करने के बाद प्राप्त किया है। संघ का प्रभाव तात्कालिक न होकर विचार की ताकत का परिणाम है। तभी तो दुष्प्रचार के बीच भी बड़ी संख्या में लोग संघ से स्वयं जुड़ रहे हैं। इस विचारधारा को मूर्त रूप देते समय संघ के संस्थापक परम पूज्य डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की कल्पना समय और सन्दर्भ की सीमाओं से ऊपर थी। य

पूजनीय डाक्टर हेडगेवार : कोटि चरण बढ़ रहे निरंतर मातृ भूमि की सेवा में

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                                   कोटि चरण बढ़ रहे निरंतर मातृ भूमि की सेवा में                                                                                        :  रंगाहरि सन् 1889 में वर्ष प्रतिपदा के शुभ दिन संघ संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार का जन्म हुआ था। 36 वर्ष की आयु में संघ की स्थापना करने के बाद दूसरी पीढ़ी का नेतृत्व उभरने के साथ ही 1940 में वे असमय  कालकवलित हुए। आज उनके जाने के 75 साल के बाद वह रा. स्वयंसेवक संघ भारत में  आसेतुहिमाचल सक्रिय, बहुआयामी निरन्तर बढ़ते हुए विशद् आन्दोलन का रूप ले चुका है। उसका प्रतिस्पंदन देश की सीमा पार भी अनुभूत है। इस परिप्रेक्ष्य में, अर्थात उस आंदोलन के स्रोत-पुरुष के नाते, डॉ. हेडगेवार के जीवन, उनके मूल्यों पर हम सबको गंभीरता से चिंतन करके उसका नवनीत अपने में आत्मसात करना चाहिए।  अर्वाचीन इतिहास की दृष्टि से कहा जा सकता है कि 19वीं सदी का उत्तरार्ध और 20वीं सदी का पूर्वार्ध भारत का संगठनात्मक क्रिया युग रहा है। इस जाग्रत कालखंड में अपने देश में अनेक सामाजिक, शैक्षणिक, राजनीतिक,जातीय, भाषायी, पंचीय, आध्यात्मिक, सुध

वर्ष प्रतिपदा : संघ वटवृक्ष के बीज, परमपूज्य डॉक्टर हेडगेवार जी की जयन्ती

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संघ वटवृक्ष के बीज –  परमपूज्य  डॉक्टर हेडगेवार जी की जयन्ती पर नमन -  डॉ. मनमोहन वैद्य (अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का नाम आज सर्वत्र चर्चा में है. संघ कार्य का बढ़ता व्याप देख कर संघ विचार के विरोधक चिंतित होकर संघ का नाम बार-बार उछाल रहे हैं. अपनी सारी शक्ति और युक्ति लगाकर संघ विचार का विरोध करने के बावजूद यह राष्ट्रीय शक्ति क्षीण होने के बजाय बढ़ रही है, यह उनकी चिंता और उद्वेग का कारण है. दूसरी ओर राष्ट्रहित में सोचने वाली सज्जन शक्ति संघ का बढ़ता प्रभाव एवं व्याप देख कर भारत के भविष्य के बारे में अधिक आश्वस्त होकर संघ के साथ या उसके सहयोग से किसी ना किसी सामाजिक कार्य में सक्रिय होने के लिए उत्सुक हैं, यह देखने में आ रहा है. संघ की वेबसाइट पर ही संघ से जुड़ने की उत्सुकता जताने वाले युवकों की संख्या 2012 में प्रतिमास 1000 थी. यही संख्या प्रतिमास 2013 में 2500 और 2014 में 9000 थी. इस से ही संघ के बढ़ते समर्थन का अंदाज लगाया जा सकता है. संघ की इस बढती शक्ति का कारण शाश्वत सत्य पर आधारित संघ का शुद्ध राष्ट्रीय विचार एवं इसके लिए त

भारतीय नव वर्ष : आत्मगौरव का प्रतीक

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आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष यह नव संवत् ही मेरा नववर्ष ! आपका नववर्ष !! प्रत्येक भारतीय का नववर्ष !!! सोचिए 1 जनवरी तो अंग्रेजों का नववर्ष अथवा उनका नववर्ष जो अंग्रेजियत में जी रहे हैं. जिन्हें न गुलामी का दंश पता है, न स्वतंत्रता की कीमत, जिन्हें गीता और रामायण का ध्यान  नहीं है, जिन्हें न तो हस्तिनापुर याद है, न ही दुष्यंत पुत्र भरत याद है, जिन्हें राम, कृष्ण, शिवाजी, राणाप्रताप, चन्द्रगुप्त, बुद्ध, महावीर याद नहीं तथा जिन्हें गुरू गोविन्द सिंह, चंद्र शेखर, सुभाष, भगत सिंह और रानी लक्ष्मीबाई की बलिदानी परम्परा याद नहीं. उनको ही भारत याद नहीं-अपना नववर्ष याद नहीं. याद है केवल इण्डिया और उसका न्यू ईयर. न्यू ईयर का अर्थ है जश्न, नृत्य, शराब से मनाया जाने वाला रात्रिकालीन हुड़दंग. आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष भारतीय नव वर्ष जैसा दुनिया के किसी नव वर्ष का आनन्दोत्सव न तो देखा गया न ही सुना गया, परन्तु अंग्रेजों की गुलामी से पनपी आत्मविस्मृति के कारण हम अनुभव ही नहीं करते कि यह आनन्द का पर्व हमारे नव वर्ष का शुभा