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गुरुपूर्णिमा और संघ : भगवा ध्वज है गुरु हमारा

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गुरुपूर्णिमा और संघ:भगवा ध्वज है गुरु हमारा तारीख: 18 Jul 2015 - भागैय्या  ( लेखक रा.स्व.संघ के सह सरकार्यवाह हैं। ) अपने राष्ट्र और समाज जीवन में गुरुपूर्णिमा-आषाढ़ पूर्णिमा अत्यंत महत्वपूर्ण उत्सव है। व्यास महर्षि आदिगुरु हैं। उन्होंने मानव जीवन को गुणों पर निर्धारित करते हुए उन महान आदर्शों को व्यवस्थित रूप में समाज के सामने रखा। विचार तथा आचार का समन्वय करते हुए, भारतवर्ष के साथ उन्होंने सम्पूर्ण मानव जाति का मार्गदर्शन किया। इसलिए भगवान वेदव्यास जगत् गुरु हैं। इसीलिए कहा है- 'व्यासो नारायणम् स्वयं'- इस दृष्टि से गुरुपूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा गया है। गुरु की कल्पना अखंड मंडलाकारं व्याप्तं येन् चराचरं,  तत्पदं दर्शितंयेनं तस्मै श्री गुरुवे नम: यह सृष्टि अखंड मंडलाकार है। बिन्दु से लेकर सारी सृष्टि को चलाने वाली अनंत शक्ति का, जो परमेश्वर तत्व है, वहां तक सहज सम्बंध है। यानी वह जो मनुष्य से लेकर समाज, प्रकृति और परमेश्वर शक्ति के बीच में जो सम्बंध है। इस सम्बंध को जिनके चरणों में बैठकर समझने की अनुभूति पाने का प्रयास करते हैं, वही गुरु है। संपूर्ण सृष्टि

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास:जस्टिस मार्कंडेय काट्जू

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संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, संपूर्ण लेख यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। जिस विश्वविद्याल ने ऐसे ऐसे विद्वानों को पैदा किया है, जिनकी ख्याति दुनियाभर में रही है, उस विश्वविद्यालय में अभिभाषण देने के लिए बुलाया जाना मेरे लिए सम्मान की बात है। वाराणसी, जो हजारों सालों से भारतीय संस्कृति की महान भूमि रही है, उस शहर में बुलाया जाना भी मेरे लिए सम्मान की बात है। आज मैंने जिस विषय को चुना है वो है- “संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास।” मैंने ये विषय इसलिए चुना है कि ये विज्ञान का युग है और इसमें विकास करने के लिए हमारी जनता में वैज्ञानिक सोच जागृत करना आवश्यक है। आज, भारत बड़ी-बडी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृति समस्याओं का सामना कर रहा है। मेरे विचार में इन समस्या का समाधान सिर्फ विज्ञान के जरिए ही किया जा सकता है। हमें देश के हर भाग में वैज्ञानिक सोच जागृत करना होगा। विज्ञान से मेरा मतलब, सिर्फ भौति

भारत में वैज्ञानिक विकास : जस्टिस मार्कंडेय काट्जू

संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास, संपूर्ण लेख यह लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस परिषद के अध्यक्ष जस्टिस मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण का अनुवाद है, जो उन्होंने 27 नवंबर 2011को काशी हिंदी विश्वविद्यालय, वाराणसी में दिया था। जिस विश्वविद्याल ने ऐसे ऐसे विद्वानों को पैदा किया है, जिनकी ख्याति दुनियाभर में रही है, उस विश्वविद्यालय में अभिभाषण देने के लिए बुलाया जाना मेरे लिए सम्मान की बात है। वाराणसी, जो हजारों सालों से भारतीय संस्कृति की महान भूमि रही है, उस शहर में बुलाया जाना भी मेरे लिए सम्मान की बात है। आज मैंने जिस विषय को चुना है वो है- “संस्कृत भाषा और भारत में वैज्ञानिक विकास।” मैंने ये विषय इसलिए चुना है कि ये विज्ञान का युग है और इसमें विकास करने के लिए हमारी जनता में वैज्ञानिक सोच जागृत करना आवश्यक है। आज, भारत बड़ी-बडी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृति समस्याओं का सामना कर रहा है। मेरे विचार में इन समस्या का समाधान सिर्फ विज्ञान के जरिए ही किया जा सकता है। हमें देश के हर भाग में वैज्ञानिक सोच जागृत करना होगा। विज्ञान से मेरा मतलब, सिर्फ भौतिक

धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं,पूरक हैं : श्रीराम शर्मा आचार्य

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धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं,पूरक हैं श्रीराम शर्मा आचार्य धर्म और विज्ञान दोनों ही मानव जाति की अपने-अपने स्तर की आवश्यकता है। दोनों एक-दूसरे को अधिक उपयोगी बनाने में भारी योगदान दे सकते हैं। जितना सहयोग एवं आदान-प्रदान संभव हो उसके लिए द्वार खुला रखा जाए, किंतु साथ ही यह भी ध्यान रखा जाए कि दोनों का स्वरुप और कार्य-क्षेत्र एक-दूसरे से भिन्न हैं। इसलिए वे एक-दूसरे पर अवलंबित नहीं रह सकते और न ही ऐसा हो सकता है कि एक का समर्थन पाए बिना दूसरा अपनी उपयोगिता में कमी अनुभव करे। शरीर भौतिक है, उसके सुविधा-साधन भौतिक विज्ञान के सहारे जुटाए जा सकते हैं, आत्मा चेतन है, उसकी आवश्यकता धर्म के सहारे उपलब्ध हो सकेगी। यह एक तथ्य और ध्यान रखने योग्य है कि परिष्कृत धर्म का नाम आध्यात्म भी है और आत्मा के विज्ञान-अध्यात्म का उल्लेख अनेक स्थानों पर धर्म के रूप में भी होता रहा है, अस्तु उन्हें पर्यायवाचक भी माना जा सकता है। पिछले दिनों भ्रांतियों का दौर रहा और उसमें कुछ ऐसे भी प्रसंग आए हैं, जिनमें मित्र को शत्रु और शत्रु को मित्र मान लिया गया है। धर्म और विज्ञान के परस्पर विरोधी होने का विव