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एक शिक्षक की दृष्टि में गुरुपूर्णिमा : डॉ. संतोष कुमार तिवारी

बूंद का सागर हो जाना श्री श्री रविशंकर तारीख: 18 Jul 2015 11:55:49  गुरु रु, आत्मा और ईश्वर में कोई अंतर नहीं है। ये तीनों एक ही हैं- आपकी आत्मा, गुरु तत्व और ईश्वर। और ये तीनों ही शरीर नहीं हैं। उनका रूप कैसा है? आकाश जैसा है। व्योमवाद व्याप्त देहाय (व्योम=आकाश, देह=शरीर, व्याप्त=समाना) आप शरीर नहीं हैं, आप आत्मा हैं, और आत्मा का स्वरुप आकाश जैसा है। यह गुरु के लिए भी समान है। गुरु को एक सीमित शरीर के रूप में मत देखिए। गुरु एक तरंग है, एक ऊर्जा है, जो सर्वव्यापी है, आत्मा की तरह। और गुरु का सम्मान करना अर्थात अपनी आत्मा का सम्मान करना। इसलिए हम जब समर्पण करते हैं तो वह गुरु को करें, ईश्वर को करें या अपनी आत्मा को करें, एक ही बात है। समर्पण कुछ खोना नहीं है, रूपान्तरण है। वह वैसा ही है कि एक बूंद का महासागर में मिल जाना। बूंद फिर बूंद नहीं रहती, महासागर हो जाती है। समर्पण के बिना न हम गुरु को महसूस कर पाते हैं, न ईश्वर को और न अपनी आत्मा को। समर्पण से गांठ खुलती है... बाधाएं हटती हैं... रास्ता बनता है... नाता जुड़ता है। और तुम वही हो जाते हो, जो मूल स्वरूप में तुम हो। यदि तुम