पोस्ट

मार्च 5, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सावधान - सावधान : योजनापूर्वक झूठ फैलाया जा रहा !!

कांग्रेस और साम्यवादी दलों का सफाया देश की जनता ने कर दिया , ऐतिहासिक हार से तिलमिलाये ये दल राष्ट्रभक्त नरेंद्र मोदी सरकार को काम नहीं करने दो, के एजेंडे पर रोज रोज षडयंत्रों के द्वारा बाधा  उत्पन्न कर रहे हैं ! JNU का कन्हैया कुमार कैसे करता है झूठ और मक्कारी की बातें 4th March 2016 सावधान सावधान New Delhi: कल दिल्ली की जवाहरलाल नेहरु यूनिवर्सिटी का छात्र संघ का अध्यक्ष कन्हैया कुमार 14 दिन की न्यायिक हिरासत के बाद तिहाड़ जेल से रिहा हो गया। रिहाई के बाद कन्हैया कुमार ने शाम को सभी JNU छात्रों को इकठ्ठा करके लम्बा चौड़ा भाषण दिया लेकिन भाषण के दौरान उसने प्रधानमंत्री मोदी को जमकर निशाना बनाया। उसने केवल दो  साल पुरानी सरकार को देश की सभी समस्याओं के लिए जिम्मेदार बताकर JNU के एंटी मोदी अजेंडे को खुद ही एक्सपोज्ड कर दिया। खासतौर से छात्रों से राजनीतिक बयानबाजी की अपेक्षा नहीं की जाती लेकिन कन्हैया कुमार ने देश को भ्रमित करने वाली बयानबाजी करने के साथ साथ झूठ और मक्कारी का भी सहारा लिया और मोदी सरकार को पांच वर्ष में उखाड़ फेंकने की कसम खायी। कन्हैया कुमार ने फिर से अपने पिछले

आत्मगौरव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष

चित्र
आइये अपने पर गर्व करें, नव विक्रमी संवत की शुभकामनाएं दें यह नव संवत् ही मेरा नववर्ष ! आपका नववर्ष !! प्रत्येक भारतीय का नववर्ष !!! साकेन्द्र प्रताप वर्मा http://www.vicharvimarsh.com सोचिए 1 जनवरी तो अंग्रेजों का नववर्ष अथवा उनका नववर्ष जो अंग्रेजियत में जी रहे हैं. जिन्हें न गुलामी का दंश पता है, न स्वतंत्रता की कीमत, जिन्हें गीता और रामायण का ध्यान  नहीं है, जिन्हें न तो हस्तिनापुर याद है, न ही दुष्यंत पुत्र भरत याद है, जिन्हें राम, कृष्ण, शिवाजी, राणाप्रताप, चन्द्रगुप्त, बुद्ध, महावीर याद नहीं तथा जिन्हें गुरू गोविन्द सिंह, शेखर, सुभाष, भगत सिंह और रानी लक्ष्मीबाई की बलिदानी परम्परा याद नहीं. उनको ही भारत याद नहीं-अपना नववर्श याद नहीं. याद है केवल इण्डिया और उसका न्यू ईयर. न्यू ईयर का अर्थ है जश्न, नृत्य, शराब से मनाया जाने वाला रात्रिकालीन हुड़दंग. आत्मगौ रव का प्रतीक भारतीय नव वर्ष भारतीय नव वर्ष जैसा दुनिया के किसी नव वर्ष का आनन्दोत्सव न तो देखा गया न ही सुना गया, परन्तु अंग्रेजों की गुलामी से पनपी आत्मविस्मृति के कारण हम अनुभव ही नहीं करते कि यह आनन्द का पर्व