पोस्ट

जुलाई 10, 2016 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

संघ : राष्ट्र रक्षा का शुभ संकल्प लेने का दिन गुरु पूर्णिमा

चित्र
राष्ट्र रक्षा का शुभ संकल्प लेने का दिन गुरु पूर्णिमा तरुण विजय भारतीय इतिहास गुरु-शिष्य संबंधों की गाथाओं से भरा पड़ा है. समय-समय पर गुरुओं ने जन-कल्याण के लिये मंत्र दिया, जिसे उनके शिष्यों ने दूर-दूर तक प्रसारित एवं प्रचारित किया इस संबंध की स्मृति में आषाढ़ मास की पूर्णिमा को गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व अनादिकाल से मनाया जाता रहा है. परंतु इसे महर्षि व्यास ने अधिक व्यापक बनाया. इस कारण इसे व्यास पूर्णिमा भी कहते हैं. प्राचीन काल में गुरु दीक्षा और गुरु दक्षिणा के लिये जो दिन नियत था, उसे ही गुरु पूर्णिमा के रूप में मनाया जाता था. किंतु आषाढ़ मास की शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु समाधि लेते हैं और महात्मा आ भी चातुर्मास्य व्रत करते और एक स्थान पर रहकर उसे सम्पन्न करते हैं. इसी दिन सरस्वती पूजा भी की जाती है, स कारण यह पर्व आषाढ़ मास की पूर्णिमा को मनाया जाने लगा. इसके पीछे यह भी भावना है कि पूर्णिमा को किया गया व्रत-अनुष्ठान पूर्णता एवं सर्वसिद्धि प्रदान करता है. निश्चत ही, यह वर्ष में एक बार हमें कल्याणकारी दिशा में अग्रसर होने की प्रेरणा देता है. मगध  के छिन्न-भिन्न हो र

गुरुपूर्णिमा और संघ : भगवा ध्वज है गुरु हमारा

चित्र
संघ में अत्यंत महत्वपूर्ण है "गुरू दक्षिणा उत्सव" संघ शाखा प्रारम्भ होने के बाद प्रारंभिक दो वर्षों तक तो धन की कोई आवश्यकता महसूस नहीं हुई। कार्यक्रम भी सामान्य और छोटे स्वरूप के होते थे, इसलिए खर्चा भी विशेष नहीं होता था। जो कुछ थोड़ा बहुत खर्च होता उसकी पूर्ति डॉक्टरजी ( संघ संस्थापक एवं प्रथम सरसंघचालक परमपूज्य डॉ0 केशव बलीराम हेडगेवार )  का मित्र-परिवार करता। उनके मित्रों को यह पूरा विश्वास था कि डॉक्टरजी निरपेक्ष देश सेवा का कार्य कर रहे हैं। इसलिए वर्ष भर में एक या दो बार वे बड़ी खुशी से संघ कार्य के लिए आर्थिक मदद देते थे। 1927 तक संघ के जिम्मेदार स्वयंसेवक डॉक्टरजी के इन विश्वासपात्र मित्रों के यहां जाकर धन ले आते थे। द्रुत गति से बढ़ने वाले संघ कार्य के लिए, कार्यक्रमों तथा प्रवास हेतु जब अधिक खर्च करना अपरिहार्य हो गया तब डॉक्टरजी ने इस संबंध में स्वयंसेवकों के साथ विचार-विमर्श प्रारंभ किया। आज तक तो धनराशि एकत्रित होती उसका पाई - पाई का हिसाब डॉक्टरजी स्वयं रखते थे और यही आदत उन्होंने स्वयंसेवकों में भी डाली। परिणाम  स्वरूप स्वयंसेवकों को अपने सारे कार