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हिंदी साहित्य जगत के कालजयी : डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय

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         हिंदी साहित्य जगत के कालजयी डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय का आकस्मिक निधन वरिष्ठ भाजपा  नेता, साहित्यकार, अधिवक्ता, पूर्व विधायक डॉ. दयाकृष्ण  विजयवर्गीय का आकस्मिक निधन 16 जुलाई , कोटा । भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता, वरिष्ठ साहित्यकार, वरिष्ठ अधिवक्ता लोकतंत्र रक्षा सेनानी, पूर्व विधायक डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय का शुक्रवार को आकस्मिक  निधन हो गया है। उनके पुत्र एवं भाजपा कोटा शहर के जिला अध्यक्ष रहे हेमन्तकृष्ण विजयवर्गीय ने बताया कि  डॉ दयाकृष्ण विजयवर्गीय 93 वर्ष के थे , कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे । उनकी अंतिम यात्रा शनिवार सुबह 8:30 बजे से होगी । अंतिम संस्कार किशोरपुरा मुक्तिधाम पर होगा । डॉ. दयाकृष्ण विजयवर्गीय , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक थे उन्होंने संघ में गठ नायक से लेकर कार्यवाहक तक की जिम्मेदारी संभाली थी । जनसंघ के गठन के साथ ही विजयवर्गीय  भारतीय जनसंघ के सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में जुड़ गए थे । उन्होनें  जनसंघ के कोटा नगर मंत्री , नगर अध्यक्ष, राजस्थान प्रदेश जनसंघ के सह मंत्री सहित अनेकों पदों पर कार्य  किया । जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में छबड़ा विधान

अरदास में जिनकी शहीदी को सम्मान मिला : शहीद ‘भाई तारू सिंह’

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         शहीद भाई तारू सिंह जी के जीवन प्रसंग संकलित-रविन्द्र सिंह भाटिया Shahidi Divas – Bhai Taru Singh Ji भाई तारु सिंघ जी गांव पुहले (श्री अमृतसर) के निवासी थे। भाई साहिब जी रोजाना सुबह नितनेम करने के बाद ही अन्न-जल ग्रहण करते थे। वे यहां खेती बाड़ी का काम करते थे। गांव में आने जाने वाले प्रत्येक गुरुसिक्ख के रहने की व्यवस्था करना और जंगलों में रहने वाले सिंघों के लिए लंगर तैयार कर उन तक पहुंचाने की सेवा उनकी दिनचर्या थी। भाई तारू सिंह गुरुगोविंद जी ने कहा था कि सिख की पहली पहचान उसके केश होते हैं। इसलिए सिखों को अपने केश नहीं कटवाने चाहिए। गुरुगोविंद जी की इस बात का अनुसरण लंबे समय से हर सिख करता आ रहा है। मगर, भाई तारू सिंह इतिहास के पन्नों में दर्ज वो नाम हैं जिन्होंने इस्लामिक कट्टरपंथी व सिखों पर अत्याचार करने वाले लाहौर गवर्नर जकारिया खान बहादुर के कहने पर भी अपने केश नहीं उतारे बल्कि जब दबाव बनाया गया तो केश उतरवाने की जगह पूरी खोपड़ी ही उसके हवाले कर दी और कहा, “ज्यादा खुश मत हो मैं तुझे जूतियों से मारकर पहले नरक में भेजूँगा और फिर दरगाह जाऊँगा।” आज ‘भाई तारू सिंह’ सिखों के