पोस्ट

जुलाई 9, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

गंगा अवतरण

चित्र
गंगावतरण श्रावण मास भगवान भोले शंकर का प्रिय महीना युधिष्ठिर ने लोमश ऋषि से पूछा, "हे मुनिवर! राजा भगीरथ गंगा को किस प्रकार पृथ्वी पर ले आये? कृपया इस प्रसंग को भी सुनायें।" लोमश ऋषि ने कहा, "धर्मराज! इक्ष्वाकु वंश में सगर नामक एक बहुत ही प्रतापी राजा हुये। उनके वैदर्भी और शैव्या नामक दो रानियाँ थीं। राजा सगर ने कैलाश पर्वत पर दोनों रानियों के साथ जाकर शंकर भगवान की घोर आराधना की। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शंकर ने उनसे कहा कि हे राजन्! तुमने पुत्र प्राप्ति की कामना से मेरी आराधना की है। अतएव मैं वरदान देता हूँ कि तुम्हारी एक रानी के साठ हजार पुत्र होंगे किन्तु दूसरी रानी से तुम्हारा वंश चलाने वाला एक ही सन्तान होगा। इतना कहकर शंकर भगवान अन्तर्ध्यान हो गये। "समय बीतने पर शैव्या ने असमंज नामक एक अत्यन्त रूपवान पुत्र को जन्म दिया और वैदर्भी के गर्भ से एक तुम्बी उत्पन्न हुई जिसे फोड़ने पर साठ हजार पुत्र निकले। कालचक्र बीतता गया और असमंज का अंशुमान नामक पुत्र उत्पन्न हुआ। असमंज अत्यन्त दुष्ट प्रकृति का था इसलिये राजा सगर ने उसे अपने देश से निष्कासित कर दि

सावन मास में भगवान शिवशंकर के सोमवार व्रत

चित्र
बड़े ही फलदायक हैं श्रावण में  भगवान शिवशंकर के सोमवार व्रत पं. केवल आनंद जोशी Tuesday July 03, 2012 http://blogs.navbharattimes.indiatimes.com श्रावण मास में भगवान त्रिलोकीनाथ, डमरुधर भगवान शिवशंकर की पूजा अर्चना का बहुत अधिक महत्व है। भगवान भोलेनाथ को प्रसन्न करने के लिए श्रावण मास में भक्त लोग उनका अनेकों प्रकार से पूजन अभिषेक करते हैं। भगवान भोलेनाथ जल्दी प्रसन्न होने वाले देव हैं। वह प्रसन्न होकर भक्तों की इच्छा पूर्ण करते हैं। 13 जुलाई 2014 : सावन मास का पहला दिन, 14 जुलाई: पहला सावन (श्रावण) सोमवार व्रत, 21 अगस्त: दूसरा सावन (श्रावण) सोमवार व्रत, 04 अगस्त: तीसरा सावन (श्रावण) सोमवार व्रत, 10 अगस्त: चौथा और आखिरी सावन (श्रावण) सोमवार व्रत, 16 अगस्त: सावन (श्रावण ) मास 2014  का आखिरी दिन           श्रावण मास के इन समस्त सोमवारों के दिन व्रत लेने से पूरे साल भर के सोमवार व्रत का पुण्य मिलता है। सोमवार के व्रत के दिन प्रातः काल ही स्नान ध्यान के उपरांत मंदिर देवालय या घर पर श्री गणेश जी की पूजा के साथ शिव पार्वती और नंदी बैल की पूजा की जाती है। इस दिन प्रसाद के रू

देवकीनन्दन खत्री : 'चन्द्रकान्ता' अमर उपन्यास

चित्र
बाबू    देवकीनन्दन ख त्री - प्रतिबिम्ब बड़थ्वाल (जन्म- 29 जून, 1861 - मृत्यु- 1 अगस्त, 1913) हिन्दी के प्रथम तिलिस्मी लेखक थे। देवकीनन्दन खत्री जी का जन्म पूसा, मुजफ्फ़रपुर, बिहार में हुआ था। उनके पिता का नाम 'लाला ईश्वरदास' था। उनके पूर्वज पंजाब के निवासी थे और मुग़लों के राज्यकाल में ऊँचे पदों पर कार्य करते थे। महाराज रणजीत सिंह के पुत्र शेरसिंह के शासनकाल में लाला ईश्वरदास काशी आकर बस गये। देवकीनन्दन खत्री जी की प्रारम्भिक शिक्षा उर्दू - फ़ारसी में हुई थी। बाद में उन्होंने हिन्दी, संस्कृत एवं अंग्रेज़ी का भी अध्ययन किया। मुजफ्फरपुर देवकीनन्दन खत्री के नाना नानी का निवास स्थान था। आपके पिता 'लाला ईश्वरदास' अपनी युवावस्था में लाहौर से काशी आए थे और यहीं रहने लगे थे। देवकीनन्दन खत्री का विवाह मुजफ्फरपुर में हुआ था, और गया ज़िले के टिकारी राज्य में अच्छा व्यवसाय था। कुछ दिनों बाद उन्होंने महाराज बनारस से चकिया और नौगढ़ के जंगलों का ठेका ले लिया था। इस कारण से देवकीनंदन की युवावस्था अधिकतर उक्त जंगलों में ही बीती थी। इन्हीं जगंलों और उनके खंडहरों से देवकीनन्दन ख