शनिवार, 6 जुलाई 2019

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मंगलवार, 5 मार्च 2019

हिन्दू धर्म और राष्ट्रीयता – शंकर शरण



हिन्दू धर्म और राष्ट्रीयता – शंकर शरण द्वारा एक व्याख्यान
जनवरी 8, 2018 भारतीय इतिहास का पुनर्लेखन

https://indictales.com/hi

समय बदल गया है, समय की मांग बदल गयी है,और जो नयी पीढ़ी आती है वह स्वयं सबकुछ तय नहीं करती; बहुत सी चीजे उसको बनी-बनायीं मिलती है | यह जो कैरियर ओरिएंटेडनेस का आज कासमय है, उसमेपढ़ना-लिखनाएक तरह से कम हो गया है|सबकुछ रेडीमेड, जल्दी, गूगल से मिल जाये, नेट से मिल जाये,उससे कम चल जाये – यह परंपरा बन गयी है और उसी में जो लोग सिद्धहस्त है,उनको ही सफलमाना जाता है |लेकिन जिस तरह के राष्ट्रवादी वातावरण में आपका संस्थानमुझे दिखाई पढ़ता है, और जिस तरह के परम्पराएं इस संस्थान ने बनाई हुई है,उसमे मुझे लगता है की आपको थोड़ी अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए | क्यूंकि भारत एक अनूठा देश है | अपने सभ्यता की दृष्टि से भी अनूठा है,और विश्व में आज भारत का जो स्थान है,अच्छा भी और कठिन भी – वह दोनों ही दृष्टिसेपहले आपको समझ के रखना चाहिए |

आजआप युवा है,काल आप प्रोफेशन में जायेंगे, काम करेंगे, तो आपको यह चेतना होनी चाहिए की इस पुरे एक्सिस्टेंस में विश्व के परिदृश्य में आप, आपका देश, आपका समाज, आपका कर्त्तव्य कहाँ है | और इसीलिए मुझे यह शुरुयाद करने में कठिनाई हो रही है की इतना जनरल विषय – इसमें कौन सी बातेंमैं आपके साथ शेयर करूँ, क्यूंकि आपकी बैकग्राउंड क्या है, आपने अबतक कितना जाना है,उससे मुझे परिचय नहीं है | और यह कठिनाई होती है शिक्षक को – खास करके उच्चशिक्षा में –की जबतक वह विद्यार्थी की बैकग्राउंड जानकारी की उसको – जानकारी नहीं है,तो वह अगली चीज़ को कैसे कनेक्ट करे | इसीलिए मैं अंदाजे से कुछ बातेंआप के सामने रखने की कोशिश कर रहा हूँ,और मुझे आशा है की आप इस परस्वयं विचार करेंगे, स्वयं समझने की कोशिश करेंगे | हमारे देश में – जैसा मैंने आप को कहाँ की भारत एक अनूठी स्थिति में है | सभ्यता के दृष्टि से भारत एक ऐसी अनूठी सभ्यता है जैसी दुनिया में कोई और नहीं | कहने के लिए भी अगर तुलना हो तो सिर्फ एक चीन है या मिशर है जिससे तुलना होती है,जो विद्वान् लोग करते है, एक अर्थ में शयेद वह तुलना भी बिलकुल सठिक नहीं है, क्यूंकि कोई ऐसी सभ्यता नहीं है आज विश्व में जिसका सातत्य, continuity, इतनी unbroken हो जितनी भारत की है | कोई सभ्यता नहीं है ऐसी |

यह विश्व का एकमात्र देश है जहाँ पर आज भी वह साहित्य पढ़ा जाता है जो ढाई हज़ार साल पहले पढ़ा जाता था | आज भी वह भाषायें वह शब्द इस्तेमाल किये जाते है जो ढाई हज़ार साल पहले, तीन हज़ार साल पहले किये जाते थे | आज भी कला की वह रूप, वह शब्द, वह गान उपलब्ध है जो ढाई हज़ार – तीन हज़ार – चार हज़ार साल पहले तक, पहले भी इसी धरती पर गाये जाते थे या पढ़े जाते थे | ऐसी विश्व में कोई सभ्यता नहीं है | और यह continuity इसके बावजूद की पिछले एक हज़ार वर्ष से भारत एक तरह से विदेशियों का गुलाम रहा है | ठीक है, इसपर विवाद होता है की मुघलों के समय में या सुल्तानों के समय में पूरा भारत गुलाम नहीं हुआ; कुछ लोग यहाँ तक कहते है कोई गुलाम ही नहीं था, वह तो स्वदेशी शासन था,और सिर्फ हम विदेशी शासन में– सिर्फ अंग्रेजों के समय से आये; यह विवाद अपनी जगह है, लेकिन एक जनरल consensus है की भारत, भारत के लोग अपनी समझ से, अपने इच्छा से, अपने संस्कार से यहाँ का शासन कम से कम पिछले एक हज़ार सालों से नहीं चला है; कुछ लोग यहाँ तक कहते है की वह अभी तक नहीं हुआ है | और यह बात सिर्फ rhetoric नहीं है, सिर्फ लफाज़ी नहीं है | यह बात सच है की हम लोग पिछले सत्तर सालों से राजनैतिक रूप से स्वतंत्र है |

लेकिन यह भी उतना ही सच है की अभी तक हम लोग सांस्कृतिक रूप से, बौद्धिक रूप से मानसिक रूप से स्वतंत्र नहीं हुए है | और उसका सबसे सुन्दर और प्रत्यक्ष प्रमाण – हमारी भाषा और शिक्षा है | हमारी शिक्षा आज भी वही है जो अंग्रेजों ने बनाई थी – जो डिज़ाइन की थी | हमारी भाषा आज भी वही है – शासकीय, नीतिगत – अंग्रेजों ने बनाई थी | यहाँ तक की हमारा राजनीतिक तंत्र– कानून – वही है जो अंग्रेजों ने बनाया था | और यह आप आसानी से समझ सकते है की अंग्रेज यहाँ शासन करने ही नहीं आये थे, शोषण करने भी आये थे | वह अपने देश के हित में काम करते थे, इंग्लैंड के हित में काम करते थे | और इन्होंने जो यहाँ का तंत्र बनाया था – राजनीतिक तंत्र – वह बिलकुल अलग था | आप देखते होंगे बीबीसी में या सीएनएन में इंग्लैंड का – इउके का प्राइम मिनिस्टर १० जनप – सॉरी – १० डाउनिंग स्ट्रीट से निकलता है तो वह बिलकुल एक सड़क पर एक बिल्डिंग है, बिल्डिंग में दरवाज़ा खुलता है और वह प्रधान मंत्री बाहर आ जाता है | उसके – उसके पचास मीटर सौ मीटर दूर में बस स्टॉप है | तो इंग्लैंड का – भाई इउके का प्राइम मिनिस्टर ऐसी जगा में रहता है जहाँ पर निकलते ही वह सड़क आती है – एक कामकाजी जैसी जगह है | और भारत में उसी – उन्ही अंग्रेजों ने – वाइसराय का घर तो छोड़ दीजिये, एकजिले के कलेक्टर के लिए कम से कम पचास पचास बीघे का उन्होंने बंगला बनवाया | एक पूरी – एक पूरा ऐसा आडंबर खड़ा किया जिसमे शासन के प्रति लोगों में एक सम्मान का, रौब का, दबदबे का भाव पैदा हो |

ब्रिटेन में वह नौकरशाही नहीं है जो उन्होंने यहाँ बनया है | कहने का मतलब के हम आज भी उसी तंत्र को चला रहे है तो यह महसूस करना चाहिए की हम आज भी स्वतंत्र नहीं हुए है, हमने अपना तंत्र नहीं बनाया है | यह हमारी एक कठिनाई है | हम अपनी भाषा में आज भी लिख पढ़ नहीं रहे है, नियम कानून नहीं बना रहे है | हमारी कोर्ट, हमारी पार्लामेंट, हमारे कानून मंत्रालय, हमारेसारे महत्वपूर्ण दस्ताबेज पहले अंग्रेजी में बनते है, फिर उसका जैसे तैसे अनुवाद वगेरह होता है | दुनिया में ऐसा कोई महत्वपूर्ण देश नहीं है जहाँ पर उसका सर्वोच्च व्यक्ति और सबसे निचला व्यक्ति एक भाषा में नहीं काम करता | और इससे जो कठिनाइयाँ होती है आप कभी उस पर सोचने की कोशिश कीजिये, उससे बहुत बड़ा अंतर पैदा होता है | बहुत बड़ा अंतर | रूस में या जापान में या चीन में, अमेरिका में वह राष्ट्रपति हो या फिल्म स्टार या पालिसी मेकर या यूनिवर्सिटी का वाईस चांसलर जो भी बोलता है वह उसी भाषा में बोलता है जो उस समाज का सबसे अंतिम आदमी सीधे सुनता है, सीधे समझता है | यहाँ पर बिलकुल ऐसा नहीं है और यह सिर्फ एकमात्र ऐसा देश है – महत्वपूर्ण देश | छोटे छोटे अफ़्रीकी देश बहुत है जिनको अंग्रेजो ने और फ्रांसीसियों ने इउरोपियों ने उन्होंने गुलाम बनाया, उनकी भाषाएँ पूरी तरह मिट गयी है | वहाँ या तो फ्रांसीसी बोली जाती है या अंग्रेजी बोली जाती है, या पूरे लैटिन अमेरिका में स्पेनिश बोली जाती है | लेकिन उनकी पुराणी भाषा, पुराणी संस्कृति, पुराने लोग, पुराना साहित्य सबकुछ मिट गया | भारत एक ऐसा अनूठा देश है की इसमें वह continuity है जो ऋग्वेद के समय से आज तक आपको मिलेगी| आप ऋग्वेद उलट कर के पढ़े, उपनिषद् उलट कर के पढ़े, ध्यान से थोड़ी देर, और आप को दिखाई पड़ेगा की उसमे ऐसे दृश्य है जो आप को आज भी दिखाई पड़ते है |

उसमे ऐसे शब्द ऐसे मुहावरेहै जो आप आज भी इस्तेमाल करते है | तो ऋग्वेद से लेकर आज तक एकcontinuity, और दूसरी ओर पूरी की पूरी राजनीतिक प्रणाली, पूरी की पूरी शैक्षिक प्रणाली अभी भी उस कोलोनियल माइंडसेट में है जिसका उद्देश्य यहाँ का शोषण करना था, यहाँ के लोगों को क्लर्क और यहाँ के लोगों को अधीन बना के रखना था, यहाँ के लोगों में हीनता भरने की जिस की एक – एक उद्देश्य था – मैं यह नहीं कहूँगा की उनका सारा उद्देश्य यही था – ऐसी स्थिति की जो शिक्षा थी, ऐसी स्थिति की जो राजनीती थी , ऐसी स्थिति का जो कानून था, वह हम आज तक चला रहे है | तो एक अर्थ में हम स्वतंत्र भी है, दूसरी ओर हम परतंत्र भी है और इस परतंत्रता से हमारी मुक्ति अभी नहीं हुई है, इसका सबसे सामान्य उदहारण यह भाषा है | और इस भाषा से भारत जैसे देश में एक दूसरी मुश्किल हुई है | और वह – उस पर आप को ध्यान देना चाहिए –पत्रकार के रूप में विशेष कर , क्यूंकि पत्रकारों को किसी भी चीज़ की सूचना देनी होती है, और सूचना देने से पहले आप को स्वयं समझना होता है की असली बात क्या है | यानि आप अन्वेषण भी करते है, आप चीज़ों को समझते है, फिर आप दूसरों तक पहुचाते है | अब आप देखिये की यहाँ भाषा से कितनी बड़ी समस्याएं  खड़ा हुई है |

पुरे जिन जिन शब्दों का हम इस्तेमाल करते है, यानि आप को कहा है की अफ्रीका में या लैटिन अमेरिका में, अमेरिका में भी – उत्तरी अमेरिका में भी – पुरे अमेरिका में भी, जोवहा मूलनिवासीथे, मूल भाषा थी, मूल परव – त्यौहारथे वह सब ख़तम हो गये| भारत ऐसा है की एक हज़ार वर्ष की गुलामी के बावजूद इसका कुछ भी पूरी तरह ख़तम नहीं हुआ | ऐसे लोग भी आये जिनका पूरा उद्देश्य था की यहाँ की पूरी की पूरी संस्कृति, धर्म, समाज, भाषा को हमें ख़तम कर देना है | इनको कन्वर्ट कर लेना है | किसी को सफलता नहीं मिली | लेकिन इससे हमारे जीवन में एक विकृति भी आई है की हम बहुत सी चीज़े – हम जो बोलते है, जिन शब्दों का हम प्रयोग करते है, उसके अर्थ बदले हुए है | एक तिब्बती विद्वान् है, प्रोफेसर रिन्पोचे , उन्होंने एक बड़ी सुन्दर उपमा दी थी,मैं उसका प्रयोग करके आप को बताना चाहता हूँ की यह भाषाई समस्या हमें कहाँ तक परेशां करती है | उन्होंने कहा था की जैसे शब्दों का हम – जिनजिनशब्दों का – अपने शब्दों का इस्तेमाल करते है उसका वह जो मूल अर्थ हमारी सभ्यता ने दिया है, हमारे समाज ने दिया है वह अर्थ च्युत हो गए है | उसपे हमने यूरोपीय और अंग्रेजी अर्थ भर दिया है | और उसका मूल अर्थ खो गया है | तो वह उपमा देते है की जैसे किसी लोटे में दूध रखा हुआ था, तो किसी – कोई तेल ले कर आया, उसने कहा की आप यह तेल रख लीजिये तो उन्हें कोई और बर्तन नहीं मिला, तो उसने दूध को फेक दिया और उसमे तेल ले लिया | तो वह इस –यह शब्दों की उपमा दे रहे थे, की हमने बहुत सारे शब्दों का, वह उसका मूल अर्थ फेक दिया, और उसमे अंग्रेजी वाला, यूरोपीय वाला या अमेरिका वाला अर्थ रख लिया है |

अब यही लीजिये – धर्म-संस्कृति | हमारे यहाँ संस्कृति अलग से नहीं बोनी जाती, आम तौर पर आप देखिएगा धर्म-संस्कृति, खान-पान, रहन-सहन, बोलचाल – तो संस्कृति हमारीयहाँ धर्म से अलग नहीं रही है | बल्कि धर्म से अलग यहाँ कुछ भी नहीं रहा | तो अब यही धर्म शब्द लीजिये, जो उन्होंने कहा – उदहारण दिया था रिन्पोचे ने | हमारे यहाँ अधिकांश बच्चे, मुझे लगता है की दस में नौ नहीं, सौ में पंचानवे बच्चे, धर्म का अर्थ रिलिजन, रिलिजन का अर्थ धर्म समझते है | जबकि अकेडमिक रूप से भी, theoretically भी, व्यवहारिक रूप से भी – यह दोनों बिलकुल भिन्न धारणा है | धर्म में, हमारे धर्म में विश्वास या पूजा पाठ इसका कोई अर्थ नहीं रहा है | धर्म का मतलब भारत मेंरहा है कर्त्तव्य | सत्कर्म | अबरावण को अधर्मी कहते है लेकिन रावण तो शिवभक्त था | यह महाभारत को धर्मयुद्ध कहते है | मतलब एक पक्ष धर्म का था, दूसरा पक्ष अधर्म का था | तो दोनों तो सारे एक ही देवी देवतायों को पूजने वाले थे, एक ही परिवार के थे, एक ही विश्वास के थे, दोनों के गुरु एक थे, माता – वह पूरा वंश एक था | तो यह धर्मयुद्ध हम क्यूँ कहते है?उसी तरह हमारे यहाँ शब्द है पुत्रधर्म, राजधर्म, मात्रधर्म, गुरु का धर्म,विद्यार्थी धर्म, आप देखिये के रिलिजन से यह सब स्पष्ट नहीं होता | रिलिजन का मतलब है faith| rather उसके लिए,उनके लिए anotherword ही है – faith| आप का faith क्या है?you are मुस्लिम, jew, क्रिस्चियन –तो रिलिजन है faith | और धर्म है – faith आप का कुछ भी हो – आप का आचरण | आचरण से धर्म तय होता है और विश्वास से रिलिजन तय होता है |

यह हार्वर्ड के प्रोफेसर भी जानते है | जो भी, जिन लोगों ने भी indology पर या धर्म पर काम किया वह जानते है की धर्म बिलकुल अलग धारणा है, रिलिजन बिलकुल अलग धारणा है | लेकिन हमारे देश में रिलिजन और धर्म को एक शब्द समझने वाले, एक चीज़ समझने वाले आप को सभी विद्यार्थी मिलेंगे | जो सचेत नहीं है,जिनकी – जिनमे यह अभीप्सा नहीं है की हमें कुछ जानना है या अधिक समझना है, ठीक से समझना है वह दोनों को पर्यायवाचीके रूप में लेते है – डिक्शनरी में वह मिलता है | और यह एक शब्द नहीं है, मैंने सिर्फ उदाहरण के लिया दिया – की धर्म रिलिजन नहीं है और रिलिजन धर्म नहीं है – सिर्फ एक शब्द है | हमारे बहुत सारे ऐसे शब्द है,जैसे संस्कृति भी उनमे एक शब्द है | या लीला, पर्व, तीर्थ सम्पराय, ऋत–इन सबके लिए अंग्रेजी में कोई शब्द नहीं है | इसका यह मतलब नहीं है की अंग्रेजी कोई दुर्बल भाषा है, और हम उससे अधिक सबल है – दोनों सबल भाषा है | कहने का मतलब यह है की जो इस समाज, एक खास समाज, एक – उसका जो एक विशेष इतिहास है, उसकी जो विशेष परंपरा है उसके शब्द उसको व्यक्त करते है | और किसी दुसरे समाज का जो इतिहास है,उसकी जो संस्कृति है, उसका जो अनुभव है वह उसके शब्दों में व्यक्त होता है |

इसलिएहमारे भी बहुत सी – हमारे भी बहुत सी धर्नाये है जिसके लिए अंग्रेजी में शब्द नहीं है या रशियन में शब्द नहीं है, उनकी भी बहुत सारी धारणाये है जिसके लिए हमारे पास शब्द नहीं है | लेकिन क्यूंकि हमारे देश में पूरी शिक्षा मूलतः अंग्रेजी में चल रही है, नीति निर्माण मूलतः अंग्रेजी में चल रहा है इसलिए हमें यह कठिनाई होती है की हम अपने बहुत सारे शब्दों को, अपने बहुतसारे समस्यायों को, अपने बहुत सारे स्थितियों को क्यूंकिअंग्रेजी के माध्यम से जानने की कोशिश करते है इसलिए पूरा का पूरा गडमड हो जाता है | न तो हम उसका वह यूरोपीय, अमेरिकी या रशियन या जर्मन इतिहास हम ठीक से समझ पाते है जिससे उन शब्दों की उत्पत्ति हुई, और न हम अपने इतिहास अपनी संस्कृति अपनी समझ को समझ पाते है क्यूंकि हम अंग्रेजी के कारण हमारा एक व्यवधान खड़ा हो जाता है | तो यह सिर्फ एक उदहारण है की हम जिन समस्यायों इस तरह की सभ्यतागत और दार्शनिक समस्यायों की जब हम चर्चा करते है तो यह भाषा का व्यवधान किस तरह एक हमें मुसीबत में डाल देता है जो आप के जैसे – अलावा – मतलब भारतीयों के अलावा यह समस्या किसी देश में विद्यार्थियों को या उच्चशिक्षार्थियों को नहीं होती | क्यूंकि अपनी भाषा अपनी संस्कृति ख़तम भी नहीं हुई – जैसेमैंने कहा की कुछ देशों में बिलकुल ख़तम हो गयी – ख़तम हो गयी तो ठीक है | एक बार आप रों लीजिये – ख़तम हो गयी – आस्ट्रेलिया में ख़तम हो गयी | लेकिन अब उनके पास नयी भाषा, नयी संस्कृति, नये – नयी शब्दावली, नयीअवधारणायेपूरी तरह – पूरा समाज उसी में जीता है | हमारेयहाँ ऐसा नहीं है | हमारे यहाँ अभी भी बृहत् समाज – बहु संख्यक समाज – बहुत बड़ी संख्या में समाज अपने ही धारणायों में जीता है |  लेकिन उसके ऊपर जो शिक्षा, जो नीति निर्माण, जो हायर स्टडीज़, रिसर्च, मीडिया यह सब आता है वह विदेशी माध्यम के भाषा के माध्यम से आता है, और विदेशी प्रत्यय इस्तेमाल करता है |

इससे कठिनाई यह होती है की हम ठीक ठीक किसी चीज़ को नहीं जानते | अगर हमारेविद्यार्थी, हमारे पत्रकार, हमारे विद्वान् – मैं तो कहूँगा हमारे प्रोफेसर अगर सचेत नहीं है तो वह बोलते कुछ है, उसका अर्थ कुछ और होता है | औरफिर जब वह कम्यूनिकेट होता है विद्यार्थियों तक या पाठकों तक तो उसका अर्थ कुछ और हो जाता है | तो इस भाषाई गड़बड़ी के कारण जो इस तरह की चीज़ें है जिसका ठीक ठीक विमर्श नहीं हो पाता | मैंने सिर्फ उदाहरण के कहा की धर्म और रिलिजन एक नहीं है | फिर हिन्दू धर्म| हिन्दू धर्म – जैसा मैंने कहा की रिलिजन नहीं है – रिलिजन faith होता है | हिन्दू धर्म में आप को – आप को कुछ भी मानने की छुट है | faith इसमें कुछ है ही नहीं | और इसी अर्थ में कुछ जो ऑर्थोडॉक्स मिशनरीज़ होते है, ऑर्थोडॉक्स इस्लामिस्ट्स होते है वह लोग कहते है की यह लोग तो रिलिजन विहीन लोग है | यह हिन्दू लोग – इनमे कोई faith नहीं है | क्यूंकि न इनकी कोई एक किताब है, न इनका कोई एक God है, न कोई इनका कोई चर्च है, या न कोई इनका कोई प्रिस्ट क्लास है जो इनको आर्डर दे कर के बताये की क्या पूजा करनी है क्या नहीं करनी है – यह तो बिलकुल फ्री फ्लोटिंग समाज है, इनमे कुछ भी निश्चित नहीं है , इसलिए यह लोग irreligious है – नॉन-रिलीजियस है |

इसलिए रिलिजन देने का काम हमें करना है | यह जो सिरियस मिशनरीज़ है बड़े बड़े – कैथोलिक चर्च के – उनकेआप डाक्यूमेंट्स अगर आप देखे इन्टरनेट पर, वेबसाइट पर बड़े आराम से मिल जाते है | अब देखिये की उनमे यह गहरी भावना है की हमें पुरे भारत को क्रिस्चियन बनाना है | क्यूँ? क्यूंकि यह तो अन्धकार में डूबे हुए है | इन तक क्राइस्ट नहीं पंहुचा है, इनको बुक अभी तक नहीं मिली, इनकोGod का मेसेज नहीं मिला, इनके पास कोई मैसेंजर नहीं है, तो और यह ऐसा सोचने वाले कोई पागल लोग नहीं है , वह लुनाटिक फ्रिंज नहीं है, और वह कोई फनाटिक भी नहीं है, वह बड़े सज्जन, शिष्ट, विद्वान् लोग है, जो अपने ह्रदय में यह महसूस करते है और उसके हिसाब से पुरे भारत के लिए – जिले जिले गाँव गाँव तक के लिए उन्होंने योजना बनायीं है की कैसे उनको हम क्रिस्चियन बनाएं | और यह पूरी परियोजना खुले आम चल रही है – आज से नहीं, दो सौ साल से चल रही है, चारसौ साल से चल रही है | लेकिन आज भी वह बहुत सीरियसली इस कम में लगे हुए है | उनको कितनी सफलता मिली है या नहीं मिली है यह दूसरी बात है, हमारे प्रसंग में सिर्फ यह है की किस तरह से वह हमको irreligious या नॉन-रिलीजियस मानते है | या हमें अन्धकार में डूबा हुआ मानते है | इसीलिए क्यूंकि उनकी जो रिलिजन की धारणा है,और हमारी धर्म की धारणा है वह बिलकुल अलग है | हमारे यहाँ अगर कोई बिलकुल जीवनभर पूजापाठ न करे तो भी उसके मातापिता उसका परिवार उसको अपने धर्म या अपने समाज से बहर नहीं मानता | कोई इन संस्कारों में पड़ता है या नहीं पड़ता है उससे उसकोकोई फरक नहीं पड़ता |

उसका आचरण कैसा है उसपर लोगकहते है की यह अधर्मी है, यह पापी है – उसकेकर्म से उसको कहा जाता है | तो ऐसे – ऐसेहिन्दू धर्म की जो स्थिति है विश्व में वह आपको ध्यान से समझनी चाहिए | वह इसलिए की आनेवाले समय में और अभी भी यह संघर्ष बहुत ही विकट हो सकता है | हम क्यूंकि एक बड़े देश के नागरिक है, और बड़े समृद्ध देश के नागरिक है, समृद्ध देश इस अर्थ में की प्रकृति से असलीसमृद्धिप्राकृतिक ही होती है | प्रकृति ने आप को क्या दिया है उसी से समृद्धि होती है और दूसरी समृद्धि फिर human resources है की लोग कितने चतुर है, कितने इंटेलीजेंट है, कितने मेहनती है इससे फिर दूसरी संपत्ति पैदा होती है लेकिन मूल संपत्ति प्राकृतिक संसाधन है | रशिया को देखिये, अमेरिका को देखिये, यह सब, यह दोनों देश मूलतः प्राकृतिक रूप से समृद्ध है | उसके बाद उनका human resources उसमे मिल कर के इन्हें दुनिया का सबसे धनी और सबसे प्रभावी देश बनाता है | भारत भी वैसा ही एक देश है | यह सिर्फ विदेशी शासनों के कारण हम उनसे पिछड़े हुए हो गए, काफी – काफी चीज़ों में– फिरभी आप देखेंगे की सिर्फ सत्तर साल की स्वतंत्रता ने भारत को कहाँ से कहाँ पंहुचा दिया है| १९४७ में जब भारत स्वतंत्र हुआ था तो दुनिया के देश – जो विकशित देश थे वह बिलकुल निराश थे के यह लोग तो लड़ मर कर ख़तम हो जायेंगे | यह बचने वाले नहीं है, यह बिलकुल गए गुजरे है | लेकिन इसके बावजूद की हमारे राजनीतीमें इतनी समस्या है, इसके बावजूद की इतना भ्रष्टाचार है, इतनी अकर्मण्यता है, इतना – सो, सारी बुराइया है जो हमारे नेतायों के लिए आप लोग – सब – हम सब लोग कहते है |

इसके बावजूद सत्तर सैलून में भारत की जो उन्नति हुई है वह सिर्फ इसलिए हुई है की विदेशी शासन हट गया | इतनी इस देश में क्षमता है, रिसोर्सेज है, लोग है – उद्यमी है,व्यापारी है,और ऐसे देश में रहते हुए हम लोगोको यह पता नहीं चलता है की हम लोग कैसे किस तरह की एक अपवाद किस्म के देश है | औरयहाँ पर धर्म और संस्कृति की बात आती है जिस को आप को मै एक सन्दर्भ देना चाह रहा था | वह यह – कीआप दुनिया में अकेले ऐसे देश है जो रिलिजन की अंतर्राष्ट्रीय परिभाषा से बिलकुल बाहर है | सरल शब्दों में कहे तो भारत दुनिया का एकमात्र हिन्दू देश भारत है | नेपाल था, अब उनको भी वह सेक्युलर बनारहे है और कन्वर्ट कर रहे है | ऐसे भी वह छोटा देह है,एक तरह से – ऐतिहासिक रूप से देखा जाये तो वह भारतीय सभ्यता का ही हिस्सा है | तो यह एकमात्र देश होना यह भी सुनिश्चित करता है की हमारे बारे में दूसरों को कितनी गलतफहमिया रहती है | मै आप को उदाहरण देता हूँ पत्रकारिता का –और शयेद आप लोगों ने भी नोट किया होगा –आप अगर सीएनएन, बीबीसी नियमित देखते हो,या अमेरिकी पत्रिकाए है जो अंतर्राष्ट्रीय प्रसिद्द – टाइम्स या न्यूज़वीक – अगर आप रेगुलर देखते हो तो आप नेपाया होगा की उसमे भारत के बारे में कभी भी सकारात्मक समाचार नहीं आते | हमेशा कोई न कोई नकारात्मक – कोई विचित्र चीज़ , कुछ जुगुप्सा पैदा करने वाली, या हेरत पैदा करने वाली – मानो यह जो देश है यह कुछ विचित्र किस्म का है, अनोखा किस्म का है, दैवीय किस्म का है, गड़बड़ किस्म का है – जहा से कोई पॉजिटिव समाचार आ ही नहीं सकता | या वहा के बारे में कोई पॉजिटिव आउटलुक बना ही नहीं सकते है| मैंआप को इस पर ध्यान दिलाना चाहता हूँ की कुछ लोग कहते है की वह लोग दुष्ट है,भारत से जलते है,या भारत के शत्रु है, हमेशा ऐसा नहीं है |

इसके पीछे एक कठिनाई भी है की भारत हिन्दू देश होने के कारण यहाँ की बहुत सी चीज़ों को वह नहीं समझते है|यहाँ की बहुत सी चीज़ों को वह समस्या मानते है जो यहाँ की सिर्फ विशेषता है | जैसे यह डाइवर्सिटी, या यह जो रिलिजन वाली बात है,की हमारे पास कोई faith नाम की चीज़ नहीं है, हम दूसरों को कन्वर्ट नहीं कराते, हम को इससे कोई दिक्कत नहीं होती है की लोग – दुसरे लोग भी यहाँ आये रहे – वह इसको नहीं समझ पाते है | उनकी संस्कृति ने, उनकी सभ्यता ने, उनकेधर्म ने उनको सिखाया है एक खास तरह से देखना | और इसीलिए भारत के बारे में उनके पढ़े लिखे लोग, अच्छे समझदार लोग, नीतिकार लोग भी वह ठीक सही समझ नहीं बना पाते | और इसीलिए आप नोट – आप देखियेगा की वह हमेशा भारत के बारे में एक नकारात्मक छवि लिए हुए है | यह हमारी एक कठिनाई है जिस पर मैं आप को ध्यान दिलाना चाहता हूँ | की आप को दुनिया में – जिसको कहते है की fair consideration – आप को नहीं मिलेगा | उसके पीछे गहरे दुराग्रह है | वह हमें अपने से कम समझते है | अपने से नीचा समझते है | अपने से इतना भिन्न समझते है जिसके साथ कोई सांस्कृतिक सामंजस नहीं हो सकता|इसका दूसरा पक्ष भी है | जो उनके enlightened लोग है,जो सीकर किस्म के लोग है,खोंजी किस्म के लोग है,जो सच्चे विद्वान् किस्म के लोग है,उनमे ठीक उल्टा है | वह एक तरह से भारत के भक्त हो जाते है | वह भारत के प्रति उनमे एक श्रद्धा पैदा हो जाती है | और वह फिर वही हमारी संस्कृति और धर्म से जुड़ता है |

आपने एक छोटा सा उदाहरण है जो बिलकुल आप सामने देख सकते है | भारत के लोग पैसा कमाने के लिए, कैरियर बनानेके लिए अमेरिका जाते है, यूरोप जाते है | आप ने कभी नहीं सुना होगा की कितने भी हम गए गुजरे हो, कितने भी हमारे समस्याएं हो,कोई enlightenment के लिए, seeking के लिए या रिलिजन के लिए याspiritualism के लिए कोईकही जाता हो?कोई भारतीय नहीं जाता | ठीक इसका उल्टा है,पूरी दुनिया से जिनको भी कुछ सिखने की इच्छा होती है जिसकोmaterialism से अधिक, इस – जिसको कहते है कैरियर से अधिक – पैसा, technology इनसे अधिक अगर किसी को भी कुछ चाहिए, सब के सब भारत आते है | वह चाहे बीटल्स वाले लोग हो, या वह apple के संस्थापक हो,या हॉलीवुड की जूलिया रोबर्ट्स हो,या वह यह कौन है वहसात फीट वाला हीरो – माने दर्जनों लोग – स्पोर्ट्स के, संस्कृति के, कल्चर के, फिल्म के,हर तरह के लोग – एक दो नहीं, सैकड़ों हजारों की संख्या में बारहो महीने भारत में आप को मिलेंगे | और एक दो नहीं – मैं श्री अरविन्द आश्रम, और यह विवेकानंद आश्रम, रमण महर्षि का आश्रम,शिवानन्दआश्रम, चिन्मय आश्रम – यह जो, जिसको कहते है की टॉप लीग है,मैं इसको छोड़ देता हूँ,सबसे छोटे छोटे जो बाबा साधू संत है,आप उनके पास देखिये की दर्जनों की संख्या में उनके पास में से विदेशी आते है | वह किस लिए आते है? क्याखोंजने आते है?यह वाही चीज़ है, जिसके प्रति स्वयं हमारे लोग अभी तक सचेत नहीं हुए है | और, जो सचेत होना चाहते है, या हो रहे है, उनको कम्युनल कह कर के cow down किया जाता है |

उनको नीचा ठहराने की कोशिश की जाती है | जबकि यह प्रत्यक्ष प्रमाण आप देखिये –बहुत कम लोग जानते है की even अरब से – मुस्लिम देशों से लोग आते है | शिवानन्द आश्रम में, चिन्मयआश्रम में, विवेकानंद आश्रम में,औरमहीनों रहते है | कुछ तो उनको मिलता है | विज्ञापन का युग है, consumerism का युग है,तो आप उस परिभाषा में – उस भाषा में भी देख सकते है –की यह सिर्फ propaganda नहीं होसकता | यह ठीक है की नकली साधू भी है, नकलीबाबा भी है,but then वह तुलसीदास के समय में भी थे | आप रामचरितमानस पढ़िए, आप को उसमे भी मिलेगा की किस तरह से छली, छद्म, कपटी साधू लोग किस तरह से लोगों को बेवकूफ बनाते है और उनके – उनकेअंधविश्वास का शोषण करते है, वह अपनी जगह है | लेकिन genuine, सच्चे गुरु,सच्चे विद्वान्, सच्चे मनीषी – वह आज भी है, और पूरी दुनिया से लोग यही आते है | तो यह भारत का एक अनूठापन है | की हम, और दुर्भाग्य यह है की हमारी शिक्षा ने हमें ठीक उन चीज़ों से अलग कर दिया है | मैंने आप को कहा की अगर आप वेड को पढ़िए, ऋग्वेद को पढ़िए – ऐसे भी पढ़ सकते है –दुनिया की पहली किताब मानी जाती है, सबसे पुरानी existing किताब का उसको यूनाइटेड नेशंस ने भी दर्जा दिया हुआ है की जो उपलब्ध सबसे पुरानी पुस्तक मानवता के पास है वह ऋग्वेद है | आप उसको पढ़िए आप को आज की चीज़ दिखाई पढेगी | अगर आप महाभारत पढ़िए तो आप को लगेगा की आप आज के हरियाणामें या पाटलिपुत्र में घूम रहे है | आप को यह दोनों जीवन मिलता जुलता दिखाई पड़ेगा | रवीन्द्रनाथ टैगोर ने इसपर लिखा है | तो यह जो – यह जो continuity है,और यह जो हमारी दार्शनिक परंपरा है,हमारी जो अध्यात्मिक समृद्धि है,वह इतनी अखंड है की विदेशी लोग आते है और हम से सिख कर के जाते है, लेकिन यह हमारी एक कठिनाई भी हो जाती है की हम स्वयं अपने आप को दुनिया के सिस्टम के बीच में अभी तक फिट नहीं कर पा रहे है |

राजनीतिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है, आर्थिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है,even सांस्कृतिक रूप से फिट नहीं कर पा रहे है | क्यूंकि हमारी शिक्षा दीक्षा ऐसी होती है की जो ठीक हमारी सबसे अमूल्य निधि है,हमारी संस्कृति की,वाही हमारे शिक्षा से बाहर है |हमारे – हमारे स्कॉलर, हमारे सबसे अच्छे विद्यार्थी जो टॉप करते है, गोल्ड मेडलिस्ट है,सोशियोलॉजी में है, उनको यह पता नहीं है की दुनिया की सबसे पहली सोशियोलॉजी की बुक – technically – वह भारतीय है | और वह कौन सी किताब है उसकावह नाम तक नहीं जानते है|जिस उपनिषद् की चर्चा आज से नहीं, ग्रीक थिन्केर्स के समय से – प्लेटो-अरिस्तु की समय से आप को उपनिषद् शब्द, और उपनिषद् की बातेंcontinuous – मुझे लगता है की इंटरनेटकी कृपा से सबकुछ उपलब्ध होता है – आप उसमे कभी आप चेक कर के देखे – indophile – indophile – एक शब्द है,मतलब इण्डिया से प्रेम करने वाले – इण्डिया से प्रेम रखने वाले और उसमे उसने – किसी ने जमा करके सारे उदाहरण दिए है, दुनियाके बड़े बड़े दार्शनिकों, विद्वानों के – और उनमे सब एक से एक विद्वान् है|Voltaire, शोपेन्हौयेर, प्लेटो,अरिस्तु,यह रूसो – मतलब, उसकी गिनती नहीं है, मुझे लगता है कम से कम पचास ऐसे बड़े थिंकर पिछले ढाई हजार साल से दुनिया के, उनके आप को उसमे नाम मिल जायेंगे की उन्होंने भारतीय सभ्यता या भारतीय ज्ञान परंपरा के बारे में क्या कहा है |

तो कुछ लोग कहते है की वह लोग indophile है मतलब  इतनी उनको – इतना उनको भारत से प्रेम है की वह हर चीज़ भारत में देखते है | लेकिनइसको अगर आप तटस्थ दृष्टि से भी देखिये, journalistic दृष्टि से या अभीप्सु की दृष्टि से –अन्वेषक की दृष्टि से तोआप देखेंगे की इतनी बड़ी जो ज्ञान परंपरा  का स्रोत है, ठीक उससे हमारी शिक्षा कटी हुई है | हम एबीसी से शुरू करते है, यह स्थिति अंग्रेजोंके समय में तक नहीं थी, अंग्रेजों के समय ऐसा था की लोग अपनी भाषा में शिक्षा शुरू करते थे और बाद में अंग्रेजी भी उनकी शिक्षा में जुड़ जाती थी | और उनमे जो एक बड़े बड़े विद्वान् हुए थे वह अपनी भाषा को भी उतनी गहरे से जानते थे अंग्रेजी को भी जानते थे – अंग्रेजीसाहित्य को जानते थे | यह स्वतंत्र भारत में ही उल्टा हुआ की हम अपनी भाषा, अपनी साहित्य से कट गए है | हिंदी प्रदेश के आप को – कथित हिंदी प्रदेश जिसको कहते है,उसमे बच्चे आप को ऐसे मिलेंगे जो अज्ञेय का नाम नहीं जानते | जो दिनकर का नाम नहीं जानते, जजों बच्चन का नाम नहीं जानते| और यह स्थिति चालीस साल पहले तक यहाँ नहीं थी | क्यूँ? क्यूंकि हमारी शिक्षा मूलतःअपनी भाषा में होती थी,अंग्रेजी बाद में – छठे क्लास से या आठवे क्लास से, चौथे क्लास से – जैसा स्कुल और जैसा स्टार और जैसा वह परिवेश था उससे जुडती थी |

अब आज बिलकुल बचपन से एबीसीडी की पढाई शुरू हो गयी है और यह गायों गायों तकपहुंच गयी है |इसका जो हानिकारक पक्ष है वह यह – की ठीक वह चीज़ जिससे भारतीय सभ्यता बनी है,ठीक वह चीज़ जिससे आज भी भारत का मूल्य है, ठीक वह चीज़ जो सिखने के लिए लोग आज भी भारत आते है,हम अपने ही बच्चों को उससे परिचय तक नहीं करा रहे है, वह नाम तक नहीं जानते है, उसकोपढ़ना तो दूर रहा |JNU – JNU में एक विद्यार्थी पढ़ रहा है, topperहै, वह उनसे एक दिन भेंट हुई,उनसे मैंने पूछा – कोई बहस हो रही थी तो उपनिषद् शब्द आया – तो उसके मुह पर मैंने देखा की कुछ व्यंग का भाव आया | मैंने कहा क्यूँ,तुमने उपनिषद् पढ़ा है क्या? बोला, नहीं – पढने की ज़रूरत क्या है?उसमेक्या होगा?मैंने कहा की क्यूँ,बोला वह तो ऐसे रिलीजियस बुक्स है | मैंने कहा तुमने उलट के देखा है?उसने कहा नहीं | मैंने कहा तुमको यह आईडिया है की वह कोई हजार पन्ने की किताब है या दस पन्ने की किताब है?बोला नहीं!तो, और यह मै उसकी बात कर रहा हूँ जो सचमुच एक genuineस्टूडेंट है | topper है | बढ़िया पेपर लिखता है | बढ़िया भाषण देता है | उसने उपनिषद् को देखा तक नहीं है | और उसको वह रूचि भी नहीं है | जैसे उसको कोई कहे रहा है की भाई तुम्हे जानना चाहिए तुम सोशियोलॉजी के विद्यार्थी हो,तुम्हे मालूम होना चाहिए की उसमे क्या है | पूरा सोशल description है | बोला, अच्छा?मुझे तो पता थाकी वह तो रिलीजियस बुक है |

तो इस स्थिति में हमने अपने देश को लाया हुआ है की हमारे नयी पीढ़ी बिलकुल एक अर्थ में अज्ञानी बन रही है | तो ऐसी स्थिति में आप को इन सब टर्म्स को समझना है | सधर्म, संस्कृति, राष्ट्रवाद| और इसीलिए मैंने कहा की यह एक कठिनाई है, क्यूंकि बैकग्राउंड जानकारी हमारे पास न यूरोप की है,न अपनी है | यह हमारी एक विचित्र स्थिति यूरोप का विद्यार्थी अपनी संस्कृति, अपनीभाषा, अपने साहित्य से उतना कटा हुआ नहीं है जितना एक भारतीय विद्यार्थी है | वह यहाँ के विद्यार्थी – प्रोफ़ेसर है वह अंग्रेजी के – अपने JNU से रिटायर्ड हुए बहुत बड़े विद्वान् – जो भी हो – वहकहे रहे थे की हमारे विद्यार्थी जब वहा जाते है तो वहा से फ़ोन कोरके पूछते है – की सर इसमें क्या है उसमे क्या है – क्यूंकि यहाँ तो उन्होंने पढ़ा नहीं, यहाँ पर तो वाही मार्क्स, फूकोपढ़कर जाते है, तो जो की उनकी अपनी चीज़ है | वहा वाले जानना चाहते है की आप मनुस्मृति के बारे में क्या जानते है, नारद स्मृति के बारे में क्या जानते है | और हमारे बच्चे जानते ही नहीं है | जब वहा जाते है तब उनको पता चलता है की इन सब चीज़ों की, जो हम लोग उपेक्षा किये वह खुद उपेक्षा नहीं करते है | वह उसको अध्ययन करते है | और हमारे यहाँ मनुस्मृति जलाई जाती है | जिसका स्थान वेदों के समकक्ष है | तो इस कठिनाई में इन टर्म्स को समझना, इन समस्यायों को समझनाएक कठिन काम हो जाता है | क्यूंकि हर चीज़ ऐसी नहीं है की जो कैप्सूल के रूप में या सूत्र के रूप में जल्दी जल्दी दी जा सकती है |

अभी यह राष्ट्रवाद ही ले लीजिये , जैसे मैंने कहा – धर्म रिलिजन नहीं है,उसी तरह हमारे यहाँ राष्ट्रवाद – यह राष्ट्रवाद nationalism का सिर्फ हिंदी ट्रांसलेशन, हिंदी प्रतिशब्द है |और सच पूछिए तो nationalism, nation, nation-makingयह स्वयं यूरोप के लिए दो सौ ढाई सौ साल पुराना है | अब यह ऐसे – देखिये कैसी विडम्बना है –यह एक ऐसी सभ्यता है जो चार हज़ार वर्षों से अक्षुण चल रही है | उसको एक ऐसी विदेशी टर्म से हम समझने की कोशिश करते है जो स्वयं यूरोप के लिए ढाई सौ साल पुराना है | इतना ही नहीं,स्वयं यूरोप में nationalism के अर्थ पर कोई सहमति नहीं है | एक विद्वान् ने – बल्कि कई विद्वानों ने जो nationalism पर अध्ययन किया है,उन्होंने पाया है,की nation और nationalismकी कोई एक परिभाषा होती ही नहीं है | रशियन लोग उसका एक अर्थ करेंगे, सर्बियन लोग उसका एक अर्थ करेंगे, चेचेन लोग अलग करेंगे, क्रोट्सअलग करेंगे,इउके को ही देख लीजिये तो स्कॉट् लोग एक बात बोलेंगे, इंग्लिश लोग दूसरी बात बोलेंगे,वेल्श तीसरी बात बोलेंगे उनमे कोई सहमति नहीं है | तो एक ऐसी धारणा, जो जिसके यूरोप में भी कोई निश्चित अर्थ नहीं है,उस धारणा से हम अपने देश की समस्यायों, अपनी देश की अभीप्सा, अपने देश की – जिसको कहे जनभावना –उसको जब हम अभिव्यक्त करने की कोशिश करते है,तो यह बड़ी बेढंग स्थिति हो जाती है | सच पूछिए तो राष्ट्रवाद या nationalismभारतीय सच्चाई को, भारतीय स्थिति को, हमारी समस्यायों को, हमारी विशेषतायों को अभिव्यक्तकरने के लिए पर्याप्त शब्द नहीं है|जैसे मैंने कहा की वहा भी इसके बारे में कोई स्पष्टता नहीं है | एक ही अर्थ प्रमाणिक है,के अगर कोई एक खास समूह – वह छोटा हो या बड़ाहो –अगर वह अपने आप को एक मानता है,तो वह एक है |

अगर वह नहीं मानता है, तो आप तर्क करके आप उनको कुछ नहीं समझा सकते | उदाहरण के लिए चेचेन– चेचेन है रशिया का पार्ट –लेकिन अगर आप टॉलस्टॉय का उपन्यास पढ़िए, जिन्होंने डेढ़ सौ साल – पौने दो सौ साल पहले लिखा था, उसमेभीदेखिएगा की चेचेन लोग और जो मूल रशियन लोग है,उन लोगों में झगड़ा होता था और भयंकरझगड़ा होता था | युद्ध होता था | आज भी चेचेनिया उनका पार्ट है | तो आप को लगता है की कोई राष्ट्रवाद की ऐसी परिभाषा है जिसको रशियन और चेचेन दोनों मानते हो?वाही हल इउके का है | स्कॉटलैंड, इंग्लैंड और यह तीसरा आयरलैंड – तीनों का इतिहास एक दुसरे से झगडे का युद्ध का भी है | तो ऐसा भी होता है की एक व्यक्ति जो आइरिश लोगों के लिए हीरो है,इंग्लिश लोगों के लिए विलन है | कौनसा राष्ट्रवाद? राष्ट्रवाद की परिभाषा वहा ही निश्चित नहीं है | और यहाँ? जो एक पूरी की पूरी सभ्यता है,जहा पर उनकी जो परिभाषाएं है,उस परिभाषा में देखिये तो कह सकते है, जैसा कम्युनिस्ट लोग कहते थे, मार्क्सिस्ट लोग कहते थे,की यह भारत तो एक कंट्री है ही नहीं –एक नेशन है ही नहीं |

यह तो बहुत सारी nationalities का समूह है जिसको अंग्रेजों ने ज़बरदस्ती इकट्ठा रखा था | और इसीलिए १९४७ से पहेले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने उसराष्ट्रिय्तायों के आत्मनिर्णय का अधिकार करके एक थीसिस दी थी, जिसमे उन्होंने कहा था की भारत में तो १७ राष्ट्रियातायें है,इसलिए इस देश का १७ टुकड़े होने चाहिए, दोही क्यूँ हो रहे है?लीजिये! अगर आप को जिन्नाह की राष्ट्र की परिभाषा पढ़िए तो उन्होंने कहा था की हिन्दू और मुस्लिम दो अलग अलग राष्ट्र है,और उन्होंने पुरे डिटेल में कहा था की क्यूँ मुसलमान एक राष्ट्र है,क्यूँ? क्यूँकी उनको अपना पाकिस्तान आन्दोलन के लिए एक बौद्धिक construct वह बना रहे थे | तो उन्होंने कहा की हिन्दू एक राष्ट्र है, मुस्लिम एक राष्ट्र है | गांधीजी की परिभाषा कुछ और थी | मार्क्सिस्टों की परिभाषा कुछ और थी,आर्य समाज की परिभाषा कुछ और थी \ तो यह जो हमारी सभ्यता है,इस – इसको सच पूछिए तो आप सभ्यता ही कह सकते है | इसको nationalism में और एक विदेशी टर्म के अन्दर डालना – इसमें पचास समस्याएं खड़ी होती है |

यहाँ तो इतनी विविधताएँ है, और इतने तरह के इतनी भाषाएँ है,इतनी भिन्नताएं है, की अगर आप वह यूरोपीय परिभाषा डालने की कोशिश कीजियेगा तो उसमे से आप को लगेगा की यहाँ तो एक-आध हजार देश बन्ने चाहिए, एक-आध हजार नेशन है | लेकिन, इसके विपरीत यह भी एक तथ्य है, की यह देश , यह सभ्यता,वैदिक काल से आज तक कुछ चीज़ों को एक आत्मसात किये हुए है, पता नहीं चलता है की उसकी – उसमे वह एकता का सूत्र कहा है,लेकिन वह एकता का सूत्र है | और इसीलिए जब आप देखिये की उदाहरण के लिए यह जो वन्देमातरम पर जब भी विवाद होता है,और यह विवाद आज से नहीं है,वन्देमातरम पर विवाद स्वाधीनता से पूर्व है | शयेद आप को मालूम होगा अगर आप में से किसी ने उसका अध्ययन किया हो तो १९४७ से पूर्व कम से कम पिछलेचालीस साल से यह वन्देमातरम ही हमारा राष्ट्रीय गीत था | और यह इतना decided था , fixed था की इसमे कोई असहमति की गुंजाईश नहीं थी | यह एक विडम्बना हुई की यह राष्ट्रगीत नहीं बना, लेकिन यह वन्देमातरम में भाव क्या है?यह गीत एक उपन्यास से लिया गया है,बंकिमचंद्र के आनंदमठ का – अगर आप आनंदमठ को पढ़िए – तो, और यह बंगला में है – मजे की बात यह भी है की यह हिंदी का गान नहीं है – वन्देमातरम–वैसेजन गण मन भी हिंदी का नहीं है,दोनों बंगला के है | लेकिन क्यूंकि देवनागरीमें लिखी होती है तो हमें लगता है की यह हिंदी है |

यह हमारी भाषाई विविधता और भाषाई एकता – दोनों का इसमें सूत्र मिलता है | के अगर आप देवनागरी में लिख दे तो भारत की कम से कम एक दर्जन भाषाएँ हैजो आप को हिंदी ही लगेंगी | लेकिन वह अलग लिपि में लिखी जाती है इसलिए पता नहीं चलता है| तो हमारी विविधता और हमारी एकता  एक दुसरे से अभिन्न है – और यह जीवन के हर क्षेत्र में दिखाई पढ़ती है | जो मुहावरे, जो कहानियां, जो पुराण हम उत्तर भारत में जम्मू-कश्मीर तक सुनते है वह आपको केरल तक दिखाई पड़ती है | तो निर्मल वर्मा हमारे हिंदी के बड़े लेखक हुए थे, उन्होंने कहा था की हमलोग कहते है की हमारी दो महाकाव्य है|रामायण और महाभारत | वहकहते थे की एक तीसरा महाकाव्य भी है | वह यह भारतीय समाज है, जो अदृश्य रूप से उसमे एक ऐसी भावना है जो… तो होती है, लेकिन उसे कोई concretize नहीं कर सकता आप कोई उसको नाम नहीं दे सकते|तो रामायण और महाभारत के भी पात्रऔर उसकी कहानिया पुरे देश के कोने कोने में अपने अपने तरह सेन केवल मौजूद है, बल्किआज भी जीवंत है |हिमाचल –यह – उत्तराखंड में कहते है की महाभारत के जितने पात्र है,सब के एरिया बटे हुए है |लोग मानते है की हम उन्हीके वन्ग्श्जहै और यह उन्ही की जगह है |  और उसको आज भीजीवंतरूप में उनका मेला लगता है | यहाँ तक की लोग यह कहते है की उनपर वह आते है – किसी परभीम आते है, किसी पर युधिष्ठिर आते है | और आपको इस तरह की परंपरा आप को कर्णाटक तक दिखाई पड़ेगी| तो यह जो चीज़ है, जो इस पुरे देश को जोड़ती है वह क्या है? धर्म और संस्कृति का यह अर्थ जो भारत के लोगों को एक दुसरे से जोड़ता है और उनमे हजार तरह की विविधताएँ है, अलगाव भी है और यह अलगाव भी दिखाई पड़ते है – राजनीती में, भाषा में, व्यवहार में – बहुत चीज़ों में अलगाव भी दिखाई पड़ता है, लेकिन कुछ लोग अलगाव को अधिक महत्वा देते है और एकता को कम कर देते है |लेकिन उसमे जो एकता का तत्त्व है,शयेद वह इसलिए महत्वपूर्ण है की उसने प्रमाणित किया हुआ है की यह हजारों वर्षों से वह चीज़ है जो भारत के लोगों को एक करती है | और वन्देमातरम एक सूत्र है सिर्फ – एक उदाहरण है, की जब भी इस पर controversy होती है तो आप ने शयेद नोट किया होगा या आप करेंगे क्यूंकि यह ख़तम नहीं हुआ है , आप देखेंगे की पुरे भारत से उसके प्रति एक रेस्पोंसे आता है |

मतलब लोग indifferent नहीं रहते है | यह शयेद ९७ या ९८ में वह आया था – ए आर रहमान का गीत – वन्दे – माँ तुझे सलाम – उसमे भी वन्देमातरम है | और उस समय भी फतवे आये थे और बहुत विवाद हुआ था और उस समय भी उसके प्रति उसी तरह से पुरे देशव्यापी प्रतिक्रिया हुई थी | मतलब पॉजिटिव प्रतिक्रिया – इन favour ऑफ़ वन्देमातरम | तो यह जो भावना है की भारत हमारी धरती है आसेतुहिमालय– हिमालय से ले कर के यह सेतुबंध रामेश्वरम तक – यह पूरा भारत एक है, इसको आप राष्ट्रवाद की जो पश्चिमी परिभाषाएं है या जो अकेडमिक terminologies है उनसे आप नहीं समझ सकते | दुर्भाग्य वही है की क्यूंकि हम लोग अपने शास्त्रों से कटगए है – शास्त्रों नहीं, अपनी ज्ञान-परंपरा से कट गए है – अन्यथा यह कठिनाई नहीं होती | जिन बातों को हमें मेहनत कर के अकेडमिक भाषा में समझण और समझाना पड़ता है वह स्वतः स्पष्ट हो जाता | लेकिन क्यूंकि ऐसा नहीं है इसलिए हमें यह कहने की ज़रूरत पड़ती है की भारत की जो  स्थितियां है उसको – उसकेलिए nationalismसही शब्द नहीं है | civilisation या civilisational स्टेट यह शयेद कुछ हद तक ठीक हो सकता है | एक चीन के विद्वान् है झांग व्हेइव्हेइ उन्होंने पांच साल पहले एक किताब लिखी थी “द चाइना वेव” |

उसमे वह तर्क करते है की – वह चाइना के लिए तर्क करते है की चीन को एक कंट्री या एक नेशन नहीं कहना चाहिए, यह एक civilaisationहै| हालाकीउन्होंने उसमे भारत की भी चर्चा की है, लेकिन नेगेटिव रूप में | उनका कहना है की नहीं भारत civilisation नहीं है, हम है | चाइना civilisation है | लेकिन अगर जो तर्क उन्होंने चीन के सभ्यता होने के लिए दिए है,सच पूछिए तो वह भारत पर अधिक लागु होते है | भारत को civilisational स्टेट या civilisation कहना चाहिए | और यह था भी, जैसा मैंने आप को कहा की अगर आप वह उस पर indophile वाला सर्च करे तो आप को ग्रीक थिंकर के समय से, प्लेटो के समय से आज तक आप को दुनिया के टॉप विद्वान् मिलेंगे जिनका यह सुनिश्चित मत है और इन्होंने तर्कपूर्ण ढंग से कहा है कीहमारे पास सारेज्ञान का स्रोत हमें इस गंगा के किनारे से मिला है | पूरा दर्शन, पूरा ज्ञान, पूरा – पूरी संस्कृति, पूरी समझ, philology, भाषा यह सब इसकी सब भारत से ही पूरी दुनिया में गयी है ऐसा कहने वाले सीरियस विद्वान्, topmost विद्वान् एक नहीं, अनंत हुए है | इस थ्रेड को, इस सूत्र को समझना सबसे अधिक हमारी जिम्मेदारी थी लेकिन हम इससे अलग हो गए | और इसलिए मैं आप को कहना चाहता हूँ की राष्ट्रवाद को हमें अपने ही सन्दर्भ में समझने की कोशिश करनी चाहिए की हमारी अपनी परंपरा से यह जो अर्थ हमें मिला है,और उसका सबसे यह एक व्यवहारिक सूत्र है की यह हमारी मातृभूमि है, रामायण में भी है – राम कहते है कीभाई सब कुछ तो ठीकहै लेकिन “जननी जन्मभूमिश्च…”|

तो यह जो हमारी मातृभूमि है और यह जो हमारा जो भूगोल है – हिमालय से लेके समुद्र तक – इसके प्रति सम्पूर्ण भारतवर्ष में  एक अव्यक्त किस्म की श्रद्धा या व्यक्त किस्म की श्रद्धा रही है और इसके बहुत सारे उदाहरण है | तो इस राष्ट्रवाद को हमें इस अपने terminology में या अपने परंपरा में अगर हम समझने की कोशिश करे,तभी शयेद इसके समस्यायों को भी ठीक से समझ सकेंगे | अन्यथा हम लोग एक – मैं कहूँगा की गलत सिद्धांतों या गलत मुहावरों के चक्कर में फंस जाते है, फिर उसमे उलझते चले जाते है | हम कोशिश करते है – एकउसके पीछे एक हीन भावनाभी है हमारे बहुत सारे लोगों की जो पिछले  डेढ़ सौसालों से चल रही है जब से अंग्रेजी शिक्षा ने हमें अपने जड़ों से काटना शुरू किया, हमारे लोगों में एक हीन भावना भरने लगी | की जब तक कोई चीज़ विदेशों से सर्टिफाइड हो के न आ जाये तब तक हम उसको लो ग्रेड का मानते है | जैसे योग | योगा योगाआजसारी दुनिया में है लेकिन बहुत कम लोग सिर्फ सत्तर अस्सी साल पहले इसको कोई नहीं जानता था,यद्यपि विवेकानंद ने इसको पूरी दुनिया में  सौ साल पहले एक  झलक उसकी दिखला दी थी, लेकिन फिर वह डूब गया | हम उस समय परतंत्र थे, और विवेकानंद जल्द चले गए, उनका काम रुक गया, फिर दुसरे किस्म के लीडर आये और दुसरे तरह के लोग आ गए और वह काम रुक गया| लेकिन योग के प्रतिइसको मैंने नेहरु जी के जीवनी में यह पढ़ा, नेहरु जी योग करते थे, और वहा उसके जीवनीकार लिखता है, की यह कुछ मोर्निंग में उठ कर के एक्रोबेटिक्स करते है |

तो योग को उसके नाम से भी नहीं पुकारा जाता था | लेकिन पिछले पचास सालों में जो उसका विकास हुआहै आज योग दिवस भी है और पूरी दुनिया योग जानती है, और यह योग हमारे पूरी ज्ञान परंपरा का एक छोटा सा अंश है | खास कर के यह जो प्रैक्टिकल योग – योगाभ्यास जिसको – उसी परउन्होंने सीमित कर दिया है,जब की वह नहीं है , वह एक पूरा योग दृष्टि है समझने की, विश्लेषण पद्धति है, पतंजलि योगसूत्र एक प्योर साइंस है | और यह अभ्यास तो उसका सिर्फ एक प्रारंभिक अंग है | लेकिन इस प्राम्भिक अंग ने ही दुनिया को इतना चमत्कृत किया, तो आप यह कल्पना कर सकते है की जिन फिलोसोफेर्स ने यह कहा है की पूरी हमारे सोचने समझने की जो टर्मिनोलॉजी है,conceptual कॉन्सेप्ट्स है,वह सब हमें यह भारतीय ज्ञान परंपरा से मिले है | और इस परंपरा को, इस पूरी इतिहास को हम इन जो विदेशी मुहावरों में, विदेशीphrase में विदेशी construct में फिट करने की कोशिश करते है,तो वास्तव में हमें सफलता नहीं मिलती है | और इसीलिए हमारी समस्याएं भी कुछ दुसरे किस्म की है | जैसा मैंने आप को शुरू में एक संकेत करने की कोशिश की थी,की क्यूंकि भारत दुनिया का एकमात्र हिन्दू देश है, इसीलिए इसके प्रति दूसरों को समझने में कठिनाई होती है | और हमें स्वयं भी उनको समझाने में कठिनाई होती है | बहुत लोग कहते है की भारत इतनी शानदार सभ्यता थी, इतनी सशक्त सभ्यता थी, इतनीधनी सभ्यता थी, और वीरता में भी पीछे नहीं थी तो ऐसा क्या हुआ की इनको छोटे छोटे गिरों आ कर के इनको जित लेते थे और इन पर शासन करते थे – तो कुछ हद तक इन लोगों को लगता है की बड़ा जटिल सवाल है |

सच पूछिए तो मेरे पास भी या किसी के पास भी इसका कोई प्रमाणिक उत्तर नहीं है, लेकिन उसका एक उत्तर है | और वह भी कुछ लोगों ने देखा है कीक्यूंकि हमारी दृष्टि मानवता को देखने की, हमारीउपनिषदिक दृष्टि यह झगडे की दृष्टि नहीं है, dominance की दृष्टि नहीं है, सामंजस की दृष्टि है, प्रकृति के साथ, प्राणिमात्र के प्रति सद्भाव की दृष्टि है | इसीलिए हम बाहर से आने वाले वैसे आक्रमणकारियों,जो संगठित होते थे और ideologically हमें कन्वर्टऔरनष्ट करना चाहते थे, इस दृष्टि के लोगों को हम समय रहते पहचान तक नहीं सके और यह स्थिति आज भी है | आज भी आप देखिये की जो डोमिनेंट डिस्कशन है मिडिया में, मिशनरीज के बारे में जब भी होता है तो आप देखेंगे की एक उसमे खास एंटी-हिन्दू slant होता है | जैसे ही कोई लोग कहेंगे की नहीं नहीं यह धर्मान्तरण का धंदा है, यह मिशनरीज यह कन्वर्शन हो रहा है तो कहंगे नहीं नहीं नहीं नहीं यह माइनॉरिटीज को सताया जा रहा है यह communalism है | अब देखिये की आज भी इस बात को हमारा पढ़ा लिखा समझदार वर्ग – ठीक है उसमे कुछ लोग है जो धूर्त है, जो पोलिटिकल है, जो जानबूझ के यह सब करते है, लेकिन अधिकांश ऐसे है जो सचमुच इस बात को नहीं समझते है | सचमुच मिशनरियों की जो योजना है भारत को कन्वर्ट करने की और उनका जो स्ट्रक्चर है उसको नोटिस तक नहीं लेते | क्यूँ नहीं लेते ? क्युन्किवः इस बात से अपरिचित है की दुनिया में ऐसे रिलिजन भी है जो दुसरे का अस्तित्व स्वीकार ही नहीं करते | और हम अपनी ओर से मान लेते है की सर्वधर्म समभाव, सभी धर्म समान है, सभी धर्म अच्छे है, सभी धर्म भगवान के ओर ले जाते है |

यह बात उपनिषद् की दृष्टि से और हमारे अपनी ज्ञान परंपरा की दृष्टि से बिलकुल ठीक है, लेकिन क्या जिसे हम धरम कहते है क्या रिलिजन वही धर्म है?क्या इस्लाम वही धर्म है? क्या क्रिश्चियनिटी वही धर्म है?क्या उसमे वही मूल्य मान्यताएं है जिन मान्यतायों को हम मानते है? तब हम जब ऐसा कहते है की सभी धर्म में एक ही बात है,सभी धर्म एक ही दिशा में ले जाते है, और सब ठीक है, कोई फरक नहीं है,अगर कन्वर्ट भी कर ले रहा है तो क्या प्रॉब्लम है आप को? आप ही तो कहते है –ऐसा बच्चे तर्क देते है | के अगर कोई कन्वर्ट हो रहा है या कन्वर्ट कराया जा रहा है तो तर्क देते है – की आप ही ने तो कहा था की सभी धर्म एक है तो क्या फरक पद गया वह मुस्लमान बन गया क्रिस्चियन बन गया –अब देखिये | तो यह जो अज्ञान है,वह दो तरफ़ा है | दुनिया के लोग भी भारतीय सभ्यता, भारतीय संस्कृति, भारतीय धर्म को ठीक से नहीं जानते और इसीलिए इसके प्रति एक नकारात्मक और विचित्र, जैसे यह गोपूजा – कार्ल मार्क्स ने लिखा था की यह कैसे इतने गए गुजरे कौनलोग हो सकते है जो गे और बन्दर की पूजा करते है?माने यह उनके लिए कार्ल मार्क्स जैसे विद्वान् के लिए यह प्रमाण था की जो गे को पूजता है उससे गया गुजरा और बिलकुल पशुवत कम्युनिटी और हो ही कौन सकती है?अब जहा इतना बड़ा अंतर है,चेतना में,की वह हमारी गोपूजा को, हमारी वृक्ष पूजा को वह नहीं समझ पाते, उसी तरह हमारे लिए भी समस्या है की हम भी जो उनके जो कन्वर्शन प्रोजेक्ट है,हम उसको नहीं समझ पाते | उनके जो, उनके जो प्लान है भारत के बारे में, और जो सफल हुए है,आज भारत वाही नहीं है जो सौ साल पहले था – सौ साल पहले का छोड़िये अस्सी साल पहले भारत का आप नक्शा देखिये– और आज के भारत का आप नक्शा देखिये, उसके बाद उसकी डेमोग्राफी देखिये – जो बचा हुआ भारत है उसकी डेमोग्राफी भी देखिये, वह सिकुड़ रही है | तो यह कहना एक अर्थ में ठीक है की हम इतने समय से रहे है तो आगे भी रहेंगे लेकिन यह कोई गारंटी नहीं है |

अगर आप अपने राष्ट्र, आप उसको नेशन कह लीजिये, सभ्यता कह लीजिये, भारतवर्ष कह लीजिये, भारतमाता कह लीजिये– अगर आप इसके रक्षा के प्रति सचेत नहीं हुए तो जो आज तक नहीं हुआ है वह आगे भी नहीं होगा– सो असंभव –  यह नहीं सोचना चाहिए |जैसा मैंने कहा की निर्मल जी – निर्मल वर्मा या जितने भी बड़े साहित्यकार थे – तीन पीढ़ी,दोपीढ़ी एक पीढ़ीपहले तक– वह कहते थे,जिन्होंनेब्रिटिश समय भी देखा था वह कहते थे की ब्रिटिश शासन में भारतीय भाषा और संस्कृति और चेतना पर इतना बड़ा खतरा नहीं था जितना स्वतंत्र भारत में हो गया| क्यूंकि हम अपनी भाषा से ही कट रहे है – ख़तम हो रही है हमारी भाषा | और भाषा में ही सारी संस्कृति निवास करती है | भाषा से अलग संस्कृति नहीं होती | अगर आप किसी ऐसे दिन की कल्पना करे, बल्कि कल्पना करने की जरुरत नहीं है, आप लैटिन अमेरिका चले जाये, ऑस्ट्रेलिया चले जाये – जहा पूरी की पूरी भाषा एक विदेशी भाषा हो गयी – वहा की पूरी पुराणी संस्कृति भी ख़तम हो गयी | और यह भारत में भी यह खतरा है |

इसीलिए जब हम कहते है की – जब मैं कहता हु की भारत की समस्यायों को nationalism के टर्मिनोलॉजी में पूरी पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता,तो इसे उसी प्रसंग में समझने की कोशिश करनी चाहिए , की हमारी बहुत सी समस्याएं ऐसी है जो दुसरे किसी देश को नहीं है | भारत, जैसा मैंने कहा भारत एकमात्र हिन्दू देश है,इसीलिए दोनों जो दुनिया की सबसे बड़े रिलिजन है,जिनका कन्वर्शन एक ऑफिसियल एजेंडा है,जो वह कहते भी है,यहाँ सुप्रीम कोर्ट में उन्होंने कहा है,२००३ में ओडिशा का कोई केस था कन्वर्शन का, तो उसमे सुप्रीम कोर्ट ने जो क्रिस्चियन पार्टी थी उसने यह तर्क दिया की भाई आप कन्वर्ट नहीं कराते हैयह आप की प्रॉब्लम है | हिन्दुलोग कन्वर्ट नहीं कराते है यह आप की प्रॉब्लम है | हम उसको क्यूँ माने?हमारे रिलिजन का पार्ट है कन्वर्ट कराना | इसलिएby hook by crook by any way अगर हम कन्वर्ट कराते है,थिस इस पार्ट ऑफ़ आवर फंडामेंटल राईट | उसने भारतीय संविधान का हवाला दे कर के हिंदुयों को कन्वर्ट कर के क्रिस्चियन बनाने का कोइस यह कहके defend किया की यह हमारे रिलिजन का पार्ट है | के हम दूसरों को कन्वर्ट करा के क्रिस्चियन बनाये | अब एक कॉमन भारतीय के लिए, एक कॉमन हिन्दू के लिए जो उतना सचेत नहीं है,उसके लिए यह समझना कठिन है |

उसको कहिये तो इसा मसीह की भी एक मूर्ति यहाँ लगा देगा | उसको कोई दिक्कत नहीं है, भारतीय को | लेकिन उलटी तरफ यह नहीं है | तो कहने का मतलब यह है के हमारी बहुत सारे समस्याएं ऐसी है – कन्वर्शन सिर्फ एक issue है –यह जिस तरह से दलितों को या विभिन्न समूहों को  अलग करने की कोशिश की जाती है, सबको या तो रिजर्वेशन के नाम पर या ऑपरेशन के नाम पर, मैन्युफैक्चर्ड जिसको कहते है की यह atrocity literature – वास्तविक प्रोग्रेस जो हुई है पिछले सौ साल में वह न दिखा कर के सिर्फ जो बुराइया है उसको दिखाना, और उसके हिसाब से भारत के लोगों को अलग अलग हिस्सों में काटना, तोड़ना,उनको अलग दिखाना , उनको हिन्दू धर्म से, संप्रदाय से अलग करना , सिखों को दूर करना , बौद्धों को दूर करना – और इनमे जो ऐतिहासिक परंपरा है उसको पूरी तरह उसपर चादर डाल देना, जैसे यह कुछ नहीं था | तो यह सब जैसीसमस्याएंहम अगर राष्ट्रवाद के टर्मिनोलॉजी में रखने की कोशिश करेंगे तो वह फोर्मुलाते ही नहीं होंगी | यह जो प्रोब्लेम्स मैं आप को बता रहा हूँ,वह आप भी जानते है, आप इसको नेशनल nationalism के टर्म में आप नहीं रख सकते | जिस तरह से dravidistan – अब वह ठंडा पद गया – लेकिन एक ज़माने में उस द्रविड़ आइडियोलॉजी को बहुत मजबूती से खड़ा किया गया था और अभी तक है |

वह जो दोनों डोमिनेंट पार्टियाँ है तमिलनाडु में,दोनों द्रविड़ है | DMK और AIADMK| अब वह वह भाषा नहीं बोलती | लेकिन जो द्रविड़ फिलोसोफी या थ्योरी दी गयी,यह मिशनरीयों ने दी थी | एक भी उसमे तमिल नहीं है जिसने यह theorization किया था | की यह द्रविड़ जो है वह अलग है | और यह आर्य है यह अलग है | और आर्य ने इन पर कब्ज़ा कर लिया था | अब इनको मुक्त हो जाना चाहिए | यही स्थिति नार्थ ईस्ट में है और बहुत जगहों में है | तो इस तरह के समस्यायों को आप इस nationalism के टर्मिनोलॉजी में समझ भी नहीं सकते है इसका समाधान करना तो दूर का| इसीलिए मुझे लगता है की इन चीज़ों को आप अगर आप रिपोर्टिंग करे या आप लिखे या आप इसपर सोचे तो आप को कुछ न कुछ मूल में जाने की कोशिश करनी चाहिए | ऐसे भी रिपोर्टर का पहला काम है फैक्ट ढूँढना | और उस फैक्ट को फिर ट्रांसमिट करना | फिर उसको एक्सप्लेन करना |तो यह फैक्ट क्या है?हमारे देश का फैक्ट – कास्ट ले लीजिये | क्या कारण है? की हर तरह के लोग, जो otherwise हमारे शत्रु रहे है, और यह कोई छुपी हुई बात नहीं है – सब के सब कास्ट और कास्टिस्म के खिलाफ खड़े होते है | क्या कास्टिस्म और कास्ट एक चीज़ है?क्या कास्ट और वर्ण व्यवस्था एक ही चीज़ है? क्या वर्ना का वह अर्थ जो अकादमी में या यूनिवर्सिटी में पढाया जाता है या मीडिया में आता है वाही है जो मनुस्मृति में है?मनुस्मृति में शूद्रों के बारे में जो कहा जाता है,कहा गया है,ऑथेंटिक लिखा हुआ है,और जो वास्तव में आज विमर्श में आता है क्या एक ही चीज़ है?आप देखेंगे की बहुत बड़ा भेद है | तो सबसे पहले अगर जिन चीज़ों इस तरह के टर्म्स जब आते है तो आप को कुछ न कुछ ओरिजिनल स्वयं पढने की कोशिश करनी चाहिए | औरspecialization की बात होती है, मैं कहूँगा specializationword सही नहीं है |

किसी न किसी चीज़ का आप को स्वयं गहरा अध्ययन करने की कोशिश करनी चाहिए और गहरा अध्ययन का यह मतलब नहीं है की कोई आप को सौ पचास किताबे पढनी है | मैं कहता हूँ कभी कभी सिर्फ एक छोटी सी किताब पढ़नी भी – गंभीरता से –काफी होती है उस चीज़ को समझने के लिए | जैसे आज का जो विषय है – राष्ट्रवाद| विवेकानंद, रबीन्द्रनाथ टैगोर , श्री अरविंद, दयानंद, श्रद्धानंद, इस तरह के लोगों की जो अपनी रचनाएँ है,उनके बारे में नहीं, जो किसी प्रोफेसर ने बुकलेट या पेपर लिख दिया है या even ऑक्सफ़ोर्ड से भी क्यूँ न छपी हो,पेंगुइन से भी क्यूँ न छपी हो,उसको आप सेकेंडरी माने | मूल पढ़े | विवेकानंद का जो वह भाषण है – भाषण संग्रह – जब वह अमेरिका और यूरोप में तीन चार बरस काम कर के आये थे उसके बाद उनका एक उन्होंने कोलोंबो आये थे सबसे पहले – कोलोंबो से अल्मोड़ा तक | उनके जो भाषणों का संग्रह है शयेद १५ -१६ भाषण है आप उसको पढ़िए | आप देखिये भाषण की मैंने भाषण का रिफरेन्स इसलिए दिया के भाषण कम्युनिकेबल होते है | वह अकेडमिक वर्क नहीं है |

वह आम लोगों को दिए जाते है | और वह विवेकानंद ने सौ साल से भी पहले दिए थे | १८९७ में शयेद आये थे वह और १८९७ से १९०१ तक –तीन चार वर्ष के बीच के वह उनके महत्वपूर्ण भाषण है | आप उसको पढ़िए | आप को उसमे राष्ट्र , संस्कृति, भाषा, राजनीती, उपनिषद्, वेदांत,और अपने देश की समस्यायों का मूल – और उसके समाधान की दिशा – सब आप को उसमे स्पष्ट मिलेगी | क्लियर कट | अगर आप उसको सेंसिब्ली पढ़ रहे है,ध्यान से पढ़ रहे है की यह कहना क्या चाह रहे है |  और आप को कठिनाई नहीं होगी,क्यूंकि मैंने आप को कहा की वह भाषण है| विवेकानंद भाषण दे रहे थे , जैसे मैं दे रहा हूँ | तो मैं कोशिश कर रहा हूँ की आप तक बात पहुंचे | तो आप यह इमेजिन कीजिये की विवेकानंद ने भी उसी भाषा में वह कहा है | आप उसको मूल में पढ़िए | आप को यह दिखाई पढ़ेगा की हम जिन समस्यायों की आज चर्चा करते है,उन्ही समस्यायों की उन्होंने भी चर्चा की है | ऐसा नहीं है की वह चीज़ें arcane पुराणी हो गयी या पांच पीढ़ी पहले की बात है सौ साल पहले की बात है, आज दुनिया बहुत बदल गयी –कुछ भी नहीं बदला |

दुनिया में रोज परिवर्तन होते है | और दुनिया रोज वैसी की वैसी ही रहती है | यह दोनों चीज़ें है | तो हमारी बहुत सी समस्याएं – भाषा, संस्कृति, राष्ट्र, dominance,स्वतंत्रता, धर्म से जुडी हुई बहुत सारी समस्याएं हमारे पास आज हुबहू उसी शब्द में आप देखेंगे – अगर आप अज्ञेय को पढ़े, निराला को पढ़े,टैगोर को पढ़े, श्रद्धानंद को पढ़े – आप को दिखाई पढ़ेगा की वह हुबहू उन्ही समस्यायों से उलझ रहे है | तो technology बदलती है , आर्थिक सम्बन्ध, आर्थिक वातावरण बदलता है कपडे लट्टे कुछ और चीज़ें बदलती है लेकिनबहुत सी चीज़ें मूलतः वाही की वाही रहती है | इसीलिए मेरा आप से अनुरोध है,की आप, इनमे से जो आप को सूट करे, यह भी नहीं है की कोई prescriptive है,मैंने आप को कहा की भारत एक मात्रा दुनिया में ऐसी सभ्यता है जिसकीशास्त्र परंपरा ज्ञान परंपरा इतने समृद्ध है और इतनी तरह से वह कही गयी है की आप इस तरह के जितने भी महा ज्ञानी हुए है, या ऐसी जो महत्वपूर्ण क्क्लासिक पुस्तकें है,उसमे जो आप को रुचिकर लगे,आप को विवेकानंद रुचिकर लगे विवेकानंद को पढ़िए,आप को श्री अरविंद रुचिकर लगे वह पढ़िए |

टैगोर को कवी के रूप में प्रसिद्धि मिली है जो बिलकुल सही है,लेकिन टैगोर ने जो लेख लिखे है,सामाजिक लेख, उनकी संख्या सैकड़ों में है | जो शैक्षिक लेख लिखे है, वह असंख्य है | आप को मालूम है उन्होंने स्कूल खोला था बाद में वह विश्वविद्यालय बना,उसके लिए उन्होंने वर्णमाला से ले कर के, बच्चों की पुस्तक तक उन्होंने बहुत सी चीज़ें लिखी है | तो उन्होंने सामाजिक समस्यायों पर भी लिखा है | वह आप पढ़िए | किसी भी चीज़ को आप मूल में पढ़िए, मैं आप को दावे के साथ कहता हूँ,के आज अभी जो आप की इंटेलेक्चुअल कैपेसिटी है,अभी जो आप की भाषाई कैपेसिटी है,लैंग्वेज,वह आप की अपने आप बहुत ऊँची हो जाएगी | बहुत अच्छी हो जाएगी | और पत्रकारिता में , खास कर के भाषा का बहुत महत्व है | आप अंग्रेजी में काम करे या हिंदी में काम करे – आप कोशिश करे की इन भाषायों के मूल में जो सबसे क्लासिक और सबसे महत्वपूर्ण – सबसे अच्छे लेखकों और कवियों के जो ग्रन्थ है या किताबें है – छोटी छोटी भी – आप उसको अपनी रूचि से आप थोडा बहुत पढ़ते रहे |

आप को यह सब समस्यायों इन सब स्थितियों की आप की अपनी समझ बननी शुरू हो जाएँगी | और जब आप की अपनी समझ बननी शुरू हो जाएँगी , तब आप इस चीज़ को realise कर सकेंगे की किसी बात पर वह रामचंद्र गुह जो बोल रहे है वह सही है या राम माधव जो बोल रहे है वह सही है | या दोनों की बातों में कमी कहा है |  और वाही आप का ऑब्जेक्ट होना चाहिए | आप देखिये की विवेकानंद ने, श्री अरविंद ने , टैगोरने – आप मार्क कीजिये की उस समय भारत आज की तुलना में , भारत के लोग आज की तुलना में पचास गुना अधिक गरीब थे | आज की तुलना में अधिक दीन अवस्था में थे | लेकिन आप नोट कीजिये – और वह सभी लोग सारी दुनिया को जानते थे | उन्होंने कभी गरीबी की चर्चा नहीं की | उन्होंने कभी आर्थिक परिवर्तन की चर्चा नहीं की | उन्होंने कभी यह डाटा और जीडीपी और रोजगार की चर्चा नहीं की | इसका मतलब क्या है? इसका मतलब यह है की वह इन सब समस्यायों को जानते थे | recognize करते थे | लेकिन इसके बावजूद यह भी जानते थे की इसका समाधान सिर्फ वह ही नहीं है | वह इसके समाधान के लिए एक सीडी ऊपर से वह काम करना चाहते थे | वह हमारी चेतना, हमारी समझ,हमारी स्वतंत्रता,हमारा आत्मविश्वास,- उसके स्रोत तक हमें पहुँचाना चाहते थे | जैसा उपनिषद् में कहा गया है की वह कौन सी चीज़ है जिसको जानने के बाद आप सबकुछ को जन जाओगे|  वही विवेकानंद का, कहना चाहिए स्टाइल था | या उनका कंसर्न था | वही टैगोर का या श्री अरविंद का या श्रद्धानन्द का या दयानंद का कंसर्न था | के आप को, हमारे देश के लोगों को वह चीज़ मिलनी चाहिए, वह शक्ति मिलनी चाहिए जिससे वह बाकि सब चीज़ों को स्वयं समझना और सुलझाना शुरू कर दे सकते है | इसीलिए उन्होंने आजकी भाषा का इस्तेमाल नहीं किया था |

विकास, डेवलपमेंट, पूल, बिजली, सड़क, रोजगार, बेरोज़गारी,इसकी चर्चा वह लोग नहीं करते थे, जब यह समस्याएं आज से कई गुना ज्यादा थी उस समय|वह इसकी चर्चा करते है की हम मानसिक रूप से, बौद्धिक रूप से स्वतंत्र हो | हम इस पूरी अस्तित्व को – हमारे सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक, अध्यात्मिकसभी चीज़ों को दुनिया के सन्दर्भ में – दुनिया में हम कहा खड़े है और हम स्वयं अपने जीवन में कहा खड़े है – इसको हम समझने योग्य बने | जब हम इन चीज़ों को समझने योग्य हो जाते है,तो आप निश्चित रूप से फिर जब आप चाहे वह दैनिक रिपोर्टिंग कर रहे है या एनालिसिस कर रहे है,या रिसर्च कर रहे है,उसमे आप का काम तुलनात्मक रूप से थोडा आसान हो जायेगा | इसी लिए मैं आप से यही आग्रह करता हूँ की इस तरह की चीज़ों के प्रति आप यह भाव न रखे की यह हमारे काम की चीज़े नहीं है | आप भारत की जो क्लासिक ज्ञान परंपरा है – उपनिषद् से ले कर के लेटेस्ट – मैं तो कहूँगा सद्गुरु जग्गी वासुदेव तक आप देखेंगे की सब लोग उन्ही कुछ सत्यों को नयी नयी भाषा में हमारे सामने रखने की कोशिश करते रहे है और यह प्रैक्टिकल चीज़ें है |

यह थ्योरेटिकल नहीं है, कुछ लोग लोग कहते है यह सब फिलोसोफी है | अगर यह फिलोसोफी होती, अगर यह हमारी जीवन से जुडी हुई नहीं होती,अगर यह हमें आज भी सलूशन नहीं दे रही होती तो यह टिकी नहीं होती | आप देखिये जिन चीज़ों की उपयोगिता ख़तम हो जाती है,वह बिलकुल बाहर हो जाते है | आप उसका प्रचल – जैसे आज आप कितना भी प्रचार करे कोई टाइपराइटर नहीं खरीदेगा | यह उसी तरह की चीज़ है | इसका converse भी सही है | की आप कितना भी  दुष्ट विचार करें, मनुस्मृति या उपनिषद् की महत्व  ख़तम नहीं होगी| क्यूँ? क्यूंकि उससे रियल सलूशन्स मिलते है | और इसीलिए मेरा आप से यह आग्रह है की जिस भी भाषा में आप पत्रकारिता करें,आप कुछ न कुछ स्वाध्याय करने की एक आदत डालें | मैं यह नहीं कहता हूँ के आप मोटे मोटे ग्रन्थ पड़े, लेकिन जो पड़े ओरिजिनल पड़े | बेस्ट पड़े, क्लासिक पड़े | और थोडा थोडा पड़े |

अगर आप की रूचि है तो, नहीं रूचि है तो वह भी कोई चिंता की बात नहीं है – तब इस तरह के कैप्सूल और विडियो वगैरह आते रहते है उससे आप का कम चल जायेगा | लेकिन जिनको पढने में रूचि है,वह कुछ न कुछ हमारे जोमहापुरुष हुए है, जोज्ञानी हुए है, मैंनेजिनका नाम लिया उन तक लिमिट मत कीजियेगा – मैंने उनका नाम इसलिए लिया है के मैंने उनको पढ़ा है और मैंने यह पाया है की वह बिलकुल उपयोगी है, परफेक्ट है | और वह आप को यह सब सलूशन की दिशा में ले जाने के लिए सक्षम है | इसलिए मैंने उनका नाम लिया | दक्षिण भारत के बहुत सारे ज्ञानियों का हम नाम भी नहीं जानते क्यूंकि अंग्रेजी के कारण हम फसें रह जाते है और अपने ही देश के शास्त्र, अपने ही देश के ज्ञानियों का नाम तक हम नहीं जानते | लेकिन अगर यह एक आदत आप अपने में डालें,तो मुझे लगता है के आप को अपने कैरियर में, अपने जीवन में और अपनी समझ में हर जगह आप को लाभ होगा | मुझे लगता है मेरा समय से कुछ ज्यादा ही हो गया औरमुझे यह भी नहीं पता है की जो विषय देने वालों का मंतव्य था वह कितना पूरा हुआ लेकिन फ़िलहाल…

शनिवार, 10 नवंबर 2018

नोट बंदी की 101 उपलब्धियां

नोट बंदी की 101 उपलब्धियां 


नोट बंदी देश का पुर्नउद्धार है, इसके बाद जमाखोरी लगभग खत्म हुई है। गरीबों के कल्याण की योजनाओं के लिये पैसा आया है। मंहगाई पर नियंत्रण हुआ है। बिना हिसाब किताब का पैसा बाजार से खत्म हुआ है। टैक्स वास्तविक रूप में मिलने लगा हे। टैक्स चोरी खत्म हुई है। उत्तरप्रदेश में प्रचण्ड बहूमत नोट बंदी के बाद ही भाजपा को मिला था।
01- नोटबंदी के बाद 16.6 खरब नोट सिस्टम में वापस आ गए। 16 हजार करोड़ रुपये को छोड़कर सभी कैश बैंक में जमा हो जाने से बिना हिसाब वाले पैसों का पता चला।
02- अधिकतर कैश के बैंकिंग सिस्टम आने से इस पैसे को कानूनी दर्जा मिला और नोटबंदी अवैध धन रखने वालों के खिलाफ एक्शन लेने का एक जरिया बना है।
03- कासा यानी चालू खाता, बचत खाता जमाओं में कम से कम 2.50-3.00 प्रतिशत की वृद्धि हुई।
04- मुद्रा बाजार की ब्याज दरों में गिरावट हुई और म्युचुअल फंडों के साथ बीमा क्षेत्र में धन का प्रवाह बढ़ा।
05- आयकर विभाग ने संदिग्ध लेन-देन को लेकर 517 नोटिस जारी किए थे, जिसके बाद 1833 करोड़ रुपये की 541 संपत्तियां जब्त की गई।
06- नोटबंदी के बाद 17.73 लाख संदिग्‍ध मामलों की पहचान की गई, जिनमें 3.68 लाख करोड़ रुपये की हेरा-फेरी हुई है।
07- आयकर विभाग द्वारा 9 नवंबर 2016 से लेकर मार्च 2017 के बीच चलाए गए करीब 900 सर्च अभियान में 900 करोड़ रुपये की संपत्ति सीज की गई।
08- नोटबंदी के बाद पता लगा कि 1 लाख 48,165 लोगों ने ही लगभग 4 लाख 92,207 करोड़ रुपये जमा किए। यानी भारत की 0.00011% जनसंख्या ने ही देश में उपलब्ध कुल कैश का लगभग 33 प्रतिशत जमा किया।
09- नोटबंदी के बाद 961 करोड़ रुपये की ऐसी प्रॉपर्टी का पता चला है जिसका कभी खुलासा ही नहीं किया गया था।
10- नोटबंदी के बाद तीन लाख से अधिक शेल यानी मुखौटा कंपनियों का पता लगाया जा सका है, जिनपर कार्रवाई की जा रही है।
11- सरकार ने 2.24 लाख कंपनियों को बंद कर दिया। ये कंपनिया सरकार की अनुमति के बिना अपने ऐसेट्स को बेच या ट्रांसफर नहीं कर सकती हैं।
12- नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना (पीएमजीकेवाई) के तहत 21,000 लोगों ने 4,900 करोड़ रुपये मूल्य के कालेधन की घोषणा की।
13- नोटबंदी के दौरान 35 हजार संदिग्ध फर्जी कंपनियों ने 17 हजार करोड़ डिपॉजिट किए, जो सरकार की नजर में आ गए।
14- बैंकों ने 35 हजार कंपनियों और 58 हजार बैंक खातों की जानकारी वित्त मंत्रालय को दी, जिसके बाद इन पर एक्शन लिया गया।
15- नोटबंदी के बाद एक कंपनी के 2,134 बैंक खातों के बारे में पता चला। इन कंपनियों के खातों में 10,200 करोड़ रुपये जमा किए गए थे, जो पकड़े गए।
16- नोटबंदी के बाद तीन से चार खरब डॉलर के ट्रांजैक्शन्स संदिग्ध लग रहे हैं, इसके लिए 1.8 लाख नोटिस भेजे गए हैं और इन पर कार्रवाई होने ही वाली है।
17- नोटबंदी के बाद फर्जी कंपनियों के डायरेक्टर्स का भी पता लगा। इसके तहत पिछले तीन वित्तीय वर्षों से वित्तीय विवरण न भरने वाले 3.09 लाख कंपनी बोर्ड डायरेक्टर्स को अयोग्य घोषित कर दिया गया।
18- नोटबंदी के बाद पता लगा कि 3000 डायरेक्टर्स 20 से ज्यादा कंपनियों के बोर्ड डायरेक्टर थे, जो कानूनी सीमा से ज्यादा है।
19- नोटबंदी के बाद कैश डीलिंग से लोग बच रहे हैं और लेन-देन में पारदर्शिता आई है।
20- नोटबंदी के बाद तीन लाख करोड़ से अधिक रकम बैंकों में जमा कराई गई।
21- नोटबंदी के बाद 23.22 लाख बैंक खातों में लगभग 3.68 लाख करोड़ रुपये के संदिग्ध कैश जमा हुए, जिसका पता सरकार को लग गया।
22- 17.73 लाख संदिग्ध पैन कार्ड धारकों का पता चला।
23- बैंकों और वित्तीय संस्थानों ने 4.7 लाख से अधिक संदिग्ध लेन-देन की जानकारी इकट्ठा की।
24- जांच, जब्ती और छापों में 29,213 करोड़ रुपये की अघोषित आय का पता चला।
25- नोटबंदी के बाद 813 करोड़ रुपये से अधिक की बेनामी संपत्ति जब्त कर ली गई है।
26– नोटबंदी के बाद 400 से अधिक बेनामी लेन-देन की पहचान हुई और 29 हजार 200 करोड़ से अधिक अघोषित आय का पता चला।
27- नोटबंदी के बाद से सोने की स्मगलिंग में बड़ी गिरावट आई, क्योंकि मार्केट में कम पूंजी थी और निगरानी सख्त हुई।
28- नोटबंदी के बाद भारत एक लेस कैश सोसाइटी की दिशा में डिजिटल ट्रांजेक्शन्स 300 प्रतिशत तक बढ़े।
29- कैशलेस लेन-देन लोगों के जीवन को आसान बनाने के साथ-साथ हर लेन-देन से काले धन को हटाते हुए क्लीन इकोनॉमी बनाने में भी मददगार साबित हुआ है।
30- चलन में रहने वाली नकदी में भारी गिरावट हुई और कैश 17.77 लाख करोड़ रुपये से कम होकर 4 अगस्त 2017 को 14.75 लाख करोड़ पर आ गया। यानी अब महज 83 प्रतिशत ही प्रभावी नकदी है।
31- लेस कैश व्यवस्था से वस्तु एवं सेवाएं तो सस्ती हुई ही, साथ ही साथ आवास, शिक्षा, चिकित्सा उपचार आदि की लागत भी कम हुई है।
32– नोटबंदी के बाद डिजिटल लेन-देन काफी तेजी से बढ़ा है। अगस्त 2016 में 87 करोड़ डिजिटल लेन-देन हुए थे, जबकि 2017 में यह संख्या 138 करोड़ हो गई यानी 58 प्रतिशत की वृद्धि।
33- वर्ष 2017-18 में डिजिटल लेनदेन में 80 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यह रकम कुल मिलाकर 1800 करोड़ रुपये तक पहुंचने का अनुमान है।
34- अक्टूबर 2016 में 15.11 लाख की तुलना में अगस्त 2017 में कार्ड उपयोग वाली पीओएस मशीनों की संख्या बढ़कर 28.82 लाख हो गई।
35- नोटबंदी से पहले भारत में पहले कुल 15.11 लाख पीओएस मशीनें थीं, लेकिन पिछले 1 वर्ष में 13 लाख से अधिक पीओएस मशीनें जोड़ी गई हैं।
36- पीओएस मशीनों पर डेबिट कार्ड ट्रांजेक्शन्स की संख्या अगस्त 2016 के 13.05 करोड़ से बढ़कर अगस्त 2017 में 26.55 करोड़ हो गई।
37– पीओएस मशीनों पर डेबिट कार्ड के द्वारा अगस्त 2016 में 18,370 करोड़ रुपये के ट्रांजैक्शन्स हुए थे, जबकि अगस्त 2017 में यह 35,413 करोड़ रुपये हो गए।
38- अगस्त 2016 में 26,849 करोड़ रुपये के आईएमपीएस ट्रांजैक्शन्स हुए थे, जो अगस्त 2017 में बढ़कर 65,149 करोड़ रुपये हो गए।
39- मोबाइल वॉलेट के द्वारा ट्रांजेक्शन्स अगस्त 2016 में 7.07 करोड़ से 3 गुना बढ़कर अगस्त 2017 में 22.54 करोड़ हो गए।
40- मोबाइल वॉलेट के द्वारा अगस्त 2016 में 3,074 करोड़ रुपये के ट्रांजेक्शन्स हुए थे, जबकि अगस्त 2017 में 7,262 करोड़ रुपये के ट्रांजेक्शन्स हुए।
41- मोबाइल वॉलेट से लेन-देन की संख्या में हर साल 94 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, जो 2022 तक 126 प्रतिशत सलाना दर से बढ़ते हुए 32,000 अरब रुपये पर पहुंच जाएगा।
42- नोटबंदी के बाद यूनीफाइड पेमेंट इंटरफेस (UPI) और सरकार की तरफ से लाए गए BHIM मोबाइल ऐप का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ा है। UPI-BHIM से नवंबर 2016 में 0.1 लाख, अक्टूबर 2017 तक 23.36 लाख रुपये रोजाना लेन-देन होता है।
43- ई-टोल पेमेंट में बड़ा उछाल। जनवरी 2016 में यह आंकड़ा 88 करोड़ से बढ़कर अगस्त 2017 में यह आंकड़ा 275 करोड़ रुपये हो गया।
44- नोटबंदी के बाद क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल में भी 40 प्रतिशत से अधिक की बढ़त हुई है।
45- ऑनलाइन इनकम टैक्स रिटर्न भरने में 2016-17 के लिए इनकम टैक्स रिटर्न की ई-फाइलिंग में करीब 23 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
46- ई-कॉमर्स के लिए Rupay का इस्तेमाल बढ़ा है। इसके साथ ही ई-कॉमर्स पर किए जाने वाला खर्च भी दोगुना से अधिक बढ़ा है।
47- नोटबंदी के चलते आतंकवादियों और नक्सलवादियों की कमर टूट गई।
48- पत्थरबाजों को पैसे देने के लिए अलगाववादियों के पास धन की कमी हो गई।
49- पत्थरबाजी की घटनाएं पिछले वर्ष की तुलना में घटकर मात्र एक-चौथाई रह गईं।
50- पत्थरबाजी की घटनाएं (नवंबर 2015 – अक्टूबर 2016) 2683 से घटकर (नवंबर 2016- जुलाई 2017) महज 639 ही रह गईं।
51- पत्थरबाजी में पहले 500 से 600 लोग होते थे, अब 20-25 की संख्या भी नहीं होती है।
52- नोटबंदी के बाद नक्सली घटनाओं में 20% से ज्यादा की कमी आई।
53- अक्टूबर 2015 से नवंबर 2016 में 1071 नक्सली घटनाएं हुईं। वहीं 2016 के अक्टूबर से अब तक मात्र 831 रह गई।
54- नोटबंदी के बाद पता लगा कि पांच सौ के हर 10 लाख नोट में औसत 7 और 1000 के हर 10 लाख नोटों में औसत 19 नोट नकली थे।
55- 2016-17 में कुल 762 हजार जाली नोट पकड़े गए।
56- जाली नोट पकड़े जाने में पिछले वित्त वर्ष की तुलना में 20% की वृद्धि हुई।
57- नोटबंदी के बाद टैक्स बेस बढ़ने से टैक्सेशन न्यायसंगत हो रहा है।
58- सरकार गरीबी उन्मूलन और घरों, सड़क, रेलवे, आदि जैसे इन्फ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए और अधिक संसाधनों का इस्तेमाल कर पा रही है।
59- टैक्सपेयर्स की संख्या में 26.6 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। 2015-16 में 66.53 लाख थी, जो 2016-17 में बढ़कर 84.21 लाख हो गई।
60- ई-रिटर्न की संख्या में बड़ी वृद्धि हुई है। 2016-17 में 2.35 करोड़ से बढ़कर 2017-18 में 3.01 करोड़ हो गई।
61- नोटबंदी के बाद 4 लाख 73 हजार से अधिक संदिग्ध लेन-देन का पता चला।
62- नोटबंदी के बाद 56 लाख से अधिक नए करदाता जुड़े।
63- पर्सनल इनकम टैक्स के एडवांस्‍ड टैक्स कलेक्शन में पिछले साल के मुकाबले 41.79 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
64- निजी आयकर का अग्रिम संग्रह पिछले वर्ष की तुलना में 41.79 % बढ़ा।
65- नोटबंदी के बाद पूर्वोत्तर के राज्यों में आयकर संग्रह में रिकॉर्ड वृद्धि हुई है। वित्त वर्ष 2016-17 में नागालैंड में आयकर संग्रह में करीब 300 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
66- 04 अगस्त तक लोगों के पास 14,75,400 करोड़ रुपये की करेंसी सर्कुलेशन में थे। जो वार्षिक आधार पर 1,89,200 करोड़ रुपये की कमी दिखाती है।
67- 6 लाख करोड़ रुपये के हाई वैल्यू नोट्स प्रभावी रूप से कम हुए, जो इस समय सर्कुलेशन में आए नोटों का 50 प्रतिशत है।
68- नोटबंदी के कारण ‘कैश बब्बल’ यानी नकदी के ढेर से भारत बच गया।
69– नोटबंदी के निर्णय ने भारत को अमेरिका की 2008 जैसी महामंदी से बचाया।
70- चलनिधि यानी Liquidity की कमी से उत्पन्न हुई समस्या से मुक्ति मिली।
71- जीडीपी औसत नकदी में पिछले वर्ष नवंबर से पहले 11.3 प्रतिशत की तुलना में 9.7 प्रतिशत हो गया है।
72- तीन से चार खरब डॉलर के ट्रांजैक्शन्स संदिग्ध लग रहे हैं, इसके लिए 1.8 लाख नोटिस भेजे गए हैं।
73- नोटबंदी के बाद अधिक से अधिक क्षेत्रों को संगठित किया जाना संभव हुआ।
74- संगठित किए जाने की वजह से गरीबों के लिए नौकरी के ज्यादा अवसर पैदा हुए। फॉर्मल जॉब्स की संख्या बढ़ी।
75- नौकरियों के संगठित होने से देश ने स्वच्छ अर्थव्यवस्था की तरफ कदम बढ़ाया।
76- नोटबंदी के बाद मजदूरों के सारे अधिकार मिलने लगे हैं, सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएं भी मिलनी शुरू हो गई है।
77- एक करोड़ से अधिक कर्मचारियों का अब EPFO एवं ESIC में नामांकन हो चुका है।
78- सामाजिक सुरक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं दिलाने के लिए 1.3 करोड़ कर्मचारियों को ESIC में पंजीकरण किया गया है।
79- श्रमिकों को अधिकार और सामाजिक सुरक्षा के साथ-साथ स्वास्थ्य सुविधाएं भी मिलनी शुरू हो गई हैं।
80- नोटबंदी से बिचौलियों का अंत हुआ और श्रमिकों को सीधा भुगतान होने लगा।
81- भुगतान सुनिश्चित करने के लिए वेतन भुगतान कानून (पेमेंट ऑफ वेजेज एक्ट) में ऐतिहासिक संशोधन किया गया।
82- वेतन सीधे बैंक खाते में डालने के लिए श्रमिकों के 50 लाख नए बैंक खाते खोले गए।
83- टैक्स कंप्लायंस में भारी वृद्धि हुई जिससे देश की जनकल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करने की क्षमता में बढ़ोतरी हुई।
84- सरकार का राजस्व बढ़ा और जन कल्याण एवं इन्फ्रास्ट्रक्चर पर अधिक से अधिक खर्च किया जा रहा है।
85- सागरमाला और भारतमाला जैसी परियोजनाओं को नोटबंदी के बाद अधिक धन मुहैया कराया जा सका है।
86- नोटबंदी के बाद सीमावर्ती क्षेत्रों में सामरिक क्षमताओं के विकास में तेजी आ पायी है।
87- नोटबंदी के वक्त सेंसेक्स करीब 25 हजार के आस-पास था। अब मुंबई स्टॉक एक्सचेंज का शेयर सूचकांक करीब 33 हजार के इर्द-गिर्द है।
88- नोटबंदी के वक्त निफ्टी करीब आठ हजार अंकों के करीब थी, जो अब 10,500 के इर्द गिर्द है।
89- नोटबंदी के बाद निवेशकों का भरोसा बढ़ा है और बिकवाली घटी है। यानी भारतीय अर्थव्यवस्था में एक स्थायित्व का भाव है।
90- नोटबंदी से EMI दरों में कमी से लेकर किफायती आवास तक, वित्तीय साधनों में बचत बढ़ने से लेकर शहरी निकायों के राजस्व में वृद्धि हुई।
91– ऋण दरों में लगभग 100 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आई है।
92- ऋण चुकाने पर लगने वाला ब्याज घटा है और EMI कम हुई है।
93- नोटबंदी के बाद रियल एस्टेट की कीमतें घटी। प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत ब्याज पर छूट मिली और रेट-कटस् के परिणामस्वरूप EMI भी घटी।
94– नोटबंदी के बाद देश भर के शहरी स्थानीय निकायों का राजस्व लगभग 3 गुना बढ़ा है।
95- उत्तर प्रदेश में शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के राजस्व में 4 गुना वृद्धि हुई है।
96- मध्य प्रदेश और गुजरात के शहरी स्थानीय निकायों (यूएलबी) के राजस्व में लगभग 5 गुना वृद्धि हुई है।
97- लोगों की कुल वित्तीय बचत यानी ग्रॉस फाइनेंसियल सेविंग्स जो 5 वर्षों से GNDI के लगभग 10% पर अटकी हुई थी, नोटबंदी के बाद 11.8% तक पहुंच गई है।
98- 2016-17 में GNDI के डिपॉजिट्स, शेयर एंड डिबेंचर्स, बीमा फंड एवं पेंशन और प्रोविडेंट फंड की कुल वित्तीय बचत 9% से बढ़कर 13.3% हो गई।
99– विकसित अर्थव्यवस्थाओं के हिसाब से ये पॉजिटिव ट्रेंड है, जिनमें फाइनेंसियल एसेट्स में निवेश का हिस्सा ज्यादा है।
100- नोटबंदी के बाद लोगों के निवेश रेगुलेटेड मार्केट में आ रहे हैं, जहां स्थिरता भी है और अच्छे रिटर्न की गारंटी भी है।
101– ऐसे एसेट्स जिनका प्रबंधन म्यूचुअल फंड द्वारा किया जाता है, वे सितंबर 2017 के अंत तक 20.4 ट्रिलियन पर पहुंच गए हैं, जो अब तक का उच्चतम स्तर है।
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शनिवार, 8 सितंबर 2018

रानी लक्ष्मीबाई के परिजन इंदौर में




इंदौर में रहते थे रानी लक्ष्मीबाई के बेटे, हर पल रहती थी अंग्रेजों की नजरदामोदर के बारे में कहा जाता है कि इंदौर के ब्राह्मण परिवार ने उनका लालन-पालन किया था।
ग्वालियर/इंदौर। 18 जून को झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की पुण्यतिथि है। dainikbhaskar.com उनके खास व्यक्ति‍त्व, गौरवशाली इति‍हास और अन्‍य पहलुओं से आपको रूबरू करा रहा है। इतिहास की ताकतवर महिलाओं में शुमार रानी लक्ष्मी बाई के बेटे का जिक्र इतिहास में भी बहुत कम हुआ है। यही वजह है कि यह असलियत लोगों के सामने नहीं आ पाई। रानी के शहीद होने के बाद अंग्रेजों ने उन्हें इंदौर भेज दिया था। उन्होंने बेहद गरीबी में अपना जीवन बिताया। अंग्रेजों की उनपर हर पल नजर रहती थीं। दामोदर के बारे में कहा जाता है कि इंदौर के ब्राह्मण परिवार ने उनका लालन-पालन किया था।

इतिहास में जब भी पहले स्वतंत्रता संग्राम की बात होती है तो झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का जिक्र सबसे पहले होता है। रानी लक्ष्मीबाई के परिजन आज भी गुमनामी का जीवन जी रहे हैं। 18  जून 1858 में ग्वालियर में रानी शहीद हो गई थी। रानी के शहीद होते ही वह राजकुमार गुमनामी के अंधेरे में खो गया जिसको पीठ बांधकर उन्होंने अंग्रेजो से युद्ध लड़ा था। इतिहासकार कहते हैं कि रानी लक्ष्मीबाई का परिवार आज भी गुमनामी की जिंदगी जी रहा है। दामोदर राव का असली नाम आनंद राव था। इसे भी बहुत कम लोग जानते हैं। उनका जन्म झांसी के राजा गंगाधर राव के खानदान में ही हुआ था।

500 पठान थे अंगरक्षक

दामोदर राव जब भी अपनी मां झांसी की रानी के साथ महालक्ष्मी मंदिर जाते थे, तो 500 पठान अंगरक्षक उनके साथ होते थे। रानी के शहीद होने के बाद राजकुमार दामोदर को मेजर प्लीक ने इंदौर भेज दिया था। पांच मई 1860 को इंदौर के रेजिडेंट रिचमंड शेक्सपियर ने दामोदर राव का लालन-पालन मीर मुंशी पंडित धर्मनारायण कश्मीरी को सौंप दिया। दामोदर राव को सिर्फ 150  रुपए महीने पेंशन दी जाती थी।
28  मई 1906 को इंदौर में हुआ था दामोदर का निधन
लोगों का यह भी कहना है कि दामोदर राव कभी 25 लाख रुपए की सालाना आय वाली रियासत के मालिक थे, जबकि दामोदर के असली पिता वासुदेव राव नेवालकर के पास खुद चार से पांच लाख रुपए सालाना आमदनी की जागीर थी। बेहद संघर्षों में जिंदगी जीने वाली दामोदर राव 1848 में पैदा हुए थे। उनका निधन 28 मई 1906 को इंदौर में बताया जाता है।

इंदौर में हुआ था दामोदर राव का विवाह
रानी लक्ष्मीबाई के बेटे के निधन के बाद 19 नवंबर 1853 को पांच वर्षीय दामोदर राव को गोद लिया गया था। दामोदर के पिता वासुदेव थे। वह बाद में जब इंदौर रहने लगे तो वहां पर ही उनका विवाह हो गया दामोदर राव के बेटे का नाम लक्ष्मण राव था। लक्ष्मण राव के बेटे कृष्ण राव और चंद्रकांत राव हुए। कृष्ण राव के दो पुत्र मनोहर राव, अरूण राव तथा चंद्रकांत के तीन पुत्र अक्षय चंद्रकांत राव, अतुल चंद्रकांत राव और शांति प्रमोद चंद्रकांत राव हुए।

लक्ष्मण राव को बाहर जाने की नहीं थी इजाजत
23 अक्टूबर वर्ष1879 में जन्मे दामोदर राव के पुत्र लक्ष्मण राव का चार मई 1959 को निधन हो गया। लक्ष्मण राव को इंदौर के बाहर जाने की इजाजत नहीं थी। इंदौर रेजिडेंसी से 200 रुपए मासिक पेंशन आती थी, लेकिन पिता दामोदर के निधन के बाद यह पेंशन 100 रुपए हो गई। वर्ष 1923 में 50 रुपए हो गई। 1951  में यूपी सरकार ने रानी के नाती यानी दामोदर राव के पुत्र को 50 रुपए मासिक सहायता आवेदन करने पर दी थी, जो बाद में 75 रुपए कर दी गई।

जंगल में भटकते रहे दामोदर राव
इतिहासकार ओम शंकर असर के अनुसार, रानी लक्ष्मीबाई दामोदर राव को पीठ से बांध कर चार अप्रैल 1858 को झांसी से कूच कर गई थीं। 18 जून 1858 को तक यह बालक सोता-जागता रहा। युद्ध के अंतिम दिनों में तेज होती लड़ाई के बीच महारानी ने अपने विश्वास पात्र सरदार रामचंद्र राव देशमुख को दामोदर राव की जिम्मेदारी सौंप दी। दो वर्षों तक वह दामोदर को अपने साथ लिए रहे। वह दामोदर राव को लेकर ललितपुर जिले के जंगलों में भटके।

पहले किया गिरफ्तार फिर भेजा इंदौर
दामोदर राव के दल के सदस्य वेश बदलकर राशन का सामान लाते थे। दामोदर के दल में कुछ उंट और घोड़े थे। इनमें से कुछ घोड़े देने की शर्त पर उन्हें शरण मिलती थी। शिवपुरी के पास जिला पाटन में एक नदी के पास छिपे दामोदर राव को अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर उन्हें मई, 1860 में अंग्रेजों ने इंदौर भेज दिया गया था। बताया जाता है कि रानी लक्ष्मीबाई के परिजन आज भी इंदौर में गुमनामी की जिंदगी जी रहे हैं। परिवार के सदस्य प्रदेश के पुलिस विभाग में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।

शुक्रवार, 11 मई 2018

हाथी को चींटी ने पछाड़ा : खबरों से खिलवाड़


हाथी को चींटी ने पछाड़ा 
आज चैनली मिडिया में कुछ चैनल इस तरह खबरों को परोस रहे हैं कि सच हाथी की तरह वजनदार हो कर भी झूठ रुपी चींटी से परास्त हो गया | इसके लिया कुछ चैनलों का  व्यवहार / लक्ष्य  -  हिंदुत्व को किसी भी तरह नीचा दिखाओ , उसे अपमानित करो , हिन्दू समाज में विभाजन करो , देश का बुरा करने वालोँ पक्ष लो , मदद करो की नीति का है | कुछ चैनलों के कारण सम्पूर्ण मिडिया के प्रति अविश्वास फैलता जा रहा हे |
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खबरों से खिलवाड़ : पांचजन्य से साभार ......
दिनांक 24-अप्रैल-2018
सत्य को न देखने के कारण यह संसार जला है, इस समय जल रहा है और जलेगा।
— अश्वघोष (सौंदरनंद 16/43)

संस्कृत की प्रख्यात उक्ति है- अति सर्वत्र वर्जयेत्।

         यानी किसी भी चीज की अधिकता बुरी है। यदि यह कसौटी खबरों पर लागू करें तो पाएंगे कि आजकल हम सूचनाओं की बमबारी से त्रस्त हैं। दिनभर जैसी कच्ची-पक्की, सच्ची-झूठी, नफरत या राजनैतिक एजेंडे में पगी खबरों की बमवर्षा होती है उसमें खबरों की छंटाई लगता है बीते दिनों की बात हो गई है। यह लापरवाही पाठक और मीडिया दोनों के स्तर पर है और इसीलिए दोहरी खतरनाक भी है। इससे व्यक्ति, सूचना-समाचारों में सही-गलत का अंतर भूलने लगता है। ध्यान रखिए, उलझा हुआ यही व्यक्ति मजहबी उन्माद या राजनैतिक हित-प्रपंचों का आसान हरकारा है।

            चिन्ता की बात यह है कि सत्य अन्वेषण के साथ ही सामाजिक सरोकार और समस्या के समाधानपरक दृष्टिकोण पत्रकारिता से दूर हो रहे हैं। पता नहीं मीडिया में इस बात को लेकर कितनी चिंता है किन्तु हिंसा, बंद, तोड़फोड़ और भड़काऊ नारे और बयानों वाले गुटों-चेहरों को प्राथमिकता देना मीडिया की इस लगातार नकारात्मक होती छवि का बड़ा कारण है। कठुआ बलात्कार कांड में क्या हुआ? अपराध विज्ञान की बारीकियों और पारिवारिक-सामाजिक सजगता की मांग करता एक मामला राजनीतिक झुकाव वाले मीडिया के हल्ले की बलि चढ़ गया। ऐसे में कुछ सवाल बनते हैं : जिस मामले में स्थानीय जम्मू पुलिस को हटा ‘कश्मीर’ के हाथों जांच की कमान सौंपी गई उस मामले में खुद मीडिया की स्थानीय रिपोर्टिंग कितनी है?
मामले को राजनीतिक तूल और रंग देने वालों की कितनी पड़ताल मीडिया द्वारा हुई है? मासूम बच्ची का चित्र छापने और उसकी पहचान उजागर करने की भूल यदि धरना-प्रदर्शन करने वालों से हुई होती तो भी क्षम्य होता किन्तु वह मीडिया, जहां चित्रों की छंटाई और प्रकाशन के स्पष्ट नियम-निर्देश हैं वहां यह आपराधिक कृत्य! इतना ही नहीं, उस बच्ची की पहचान को मामले को तूल देने वाला ‘मसाला’ बनाना और इसके इर्द-गिर्द तरह-तरह के ‘हैशटैग’ रचना क्या बताता है!

         बॉलीवुड हस्तियों के चेहरे आगे करते हुए मीडिया ने यह खंगालने की जरूरत नहीं समझी कि पोस्टर पकड़कर फोटो खिंचाते व्यक्ति की सामाजिक मुद्दों पर समझ और संवेदनशीलता की कोई पृष्ठभूमि है भी या नहीं? या फिर इस संवेदनशीलता का कोई राजनीतिक झुकाव या प्रपंच हो सकता है अथवा नहीं! भ्रामक तथ्यों से भरा और किसी के पूजा स्थल को अंतिम जांच-निष्कर्ष से पहले ही निकृष्ट रूप में चित्रित करता एक ही पोस्टर जब अलग-अलग हाथों से गुजरा तो इस पूरे अभियान के सूत्रधारों की पहचान बनती थी जो शुरुआत में तो नहीं ही हुई। बाद में वही कहानी साफ हुई ‘लुटियन दिल्ली’ के चर्चित चेहरों की वही ब्रिगेड इसके पीछे सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा सक्रिय भी थी, जिसका अतीत पहले भी ऐसी ही झूठी नफरत में पगी खबरें फैलाने का रहा है। जिसका उद्देश्य नफरत और गुस्से से भरे हैशटैग को सूचना-संदेश के बाजार में उतारना, लोगों को भड़काना और अंतत: किसी भी मामले को केन्द्र सरकार (पढ़ें, भारतीय जनता पार्टी) के विरुद्ध मोड़ देने का रहा है।

 --- जुनैद के मामले में भी यही हुआ था ना! सीट को ‘बीफ’ कहने वाला मीडिया नहीं तो कौन था?
— गौरी लंकेश को गोली लगते ही इस मामले का रुख साजिशी अंदाज में सत्तारूढ़ दल की ओर मोड़ने की कोशिश करने वाले लोग कौन थे?
— और इस मामले में क्या हुआ? पूजास्थल और समस्त हिंदू समाज को निकृष्ट रूप में इंगित करने का यह सिलसिला अलग-अलग बस्तियों में उन बैनरों पर जाकर रुका जिनमें लिखा गया था कि इन बस्तियों में भाजपा कार्यकर्ताओं का प्रवेश वर्जित है!

      ऐसे में लाख टके का सवाल यह है कि क्या दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र अपने मीडिया को राजनीतिक दुष्प्रचार का पिटठू और सामाजिक वैमनस्य का माध्यम बनने-बनाने की छूट दे सकता है? इस सवाल का उद्देश्य किसी भी तरह मीडिया की आजादी और धार को कुंद करना नहीं बल्कि उस जहर की काट ढूंढना है जो आज संचार माध्यमों के जरिए समाज में फैल रहा है। सूचनाओं की अति सहन की जा सकती है किन्तु ‘गति’ के नाम पर, तकनीक के बेजा प्रयोग से समाचारों को मारने, गलत प्रकार से उछालने या लोगों को भ्रमित करने का खेल अब बहुत हो चुका।

अति सर्वत्र वर्जयेत् की कसौटी यहां भी लागू होती है।

रविवार, 29 अप्रैल 2018

परमाणु परीक्षण : 11 मई और 13 मई 1998 को पोकरण


भारत की प्लानिंग से बौखला गया था अमेरिका, यूं किया था परमाणु परीक्षण
Posted on July 27, 2016 by vijayrampatrika.Com

जैसलमेर के पोकरण फील्ड फायरिंग रेंज में खेतोलाई गांव के पास 11 व 13 मई 1998 को भारत की ओर से किए गए परमाणु परीक्षण की अमेरिका जैसे शक्तिशाली देश को भनक तक नहीं लगी थी। इस बात का उसे आज भी मलाल है। किस दिन किस तरह परमाणु परीक्षण करना है इसकी पूरी प्लानिंग डॉ एपीजे अब्दुल कलाम ने की थी। पूरे विश्व में परमाणु संयंत्रों और सैन्य गतिविधियों पर सैटेलाइट से निगरानी करने वाला अमेरिका उस समय हैरान रह गया था, जब उसे मालूम पड़ा कि भारतीय वैज्ञानिकों ने 11 मई व 13 मई को पोकरण में परमाणु परीक्षण किया है।

Vijayrampatrika.com यहां आपको बता रहा है भारत द्वारा किए गए एटम बम के परीक्षण के बारे में। सन् 1998 में हुए इस परीक्षण में डॉ.ए पी जे अब्दुल कलाम की भूमिका अहम थी। एक साल पहले वे आज ही के दिन हिंदुस्तान को हमेशां के लिए सूना छोड़ गए थे।

ऐसे बचे अमेरिका से

1974 के बाद 11 मई 1998 को पोकरण में भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो विश्व के सारे देश भारत के खिलाफ हो गए। थे। अमेरिका सहित कई देशों ने भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए। लेकिन भारतीय सरकार पीछे नहीं हटी और 13 मई को फिर से परमाणु परीक्षण कर दिया। परीक्षण से पहले भारतीय सेना ने अपनी खुफिया गतिविधियां कश्मीर सहित दूसरे संवेदनशील केंद्रों पर बड़ा दी थी। भारतीय सेना ने दूसरी रेंज में युद्धाभ्यास भी शुरू कर दिया। जिससे अमेरिका के जासूसी उपग्रहों का ध्यान उस तरफ चला गया।

सैन्य अधिकारियों की ड्रेस में थे वैज्ञानिक
अमेरिका के जासूसी उपग्रहों की निगाह से बचने के लिए भारतीय सेना ने अपनी सैन्य गतिविधियां दूसके क्षेत्रों में बढ़ा दी थी। इधर कलाम जानते थे कि जैसे ही सैन्य गतिविधियां दूसरे क्षेत्र में संचालित होंगी अमेरिका के जासूसी उपग्रह वहां अपनी चौकसी बढ़ा देगें। जैसे ही वह अपने मकसद में कामयाब हुए रात में उन्होंने पोकरण की मिट्टी के कलर का करीब 500 मीटर का तंबू वहां लगवा दिया। इक्का दुक्का सेना के वाहनों का मूवमेंट वहां होने लगा। कलाम सहित अन्य वैज्ञानिक उन्ही सेना के खुले ट्रकों 45 डिग्री तापमान में वहां सैन्य अधिकारियों के साथ पूरे ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाया।

1. खेतोलाई गांव खाली करवा दिया: भारत द्वारा एटमिक टेस्ट के दौरान कर्इ किमी का एरिया खाली हो गया था। खेतोलाई वासियों के अनुसार, परमाणु परीक्षण से पहले उनके इलाके में सेना की गतिविधियां तेज हो गई थी। खेतोलाई निवासियों का कहना था कि परमाणु परीक्षण से कुछ घंटे पहले गांव खाली करवा दिया और दीवारों व पेड़ों की ओट में खड़े रहने की हिदायतें सेना के अधिकारियों ने दी। उस समय लोगों को पता चल गया था कि कुछ न कुछ हो रहा है। 

2. लाफिंग बुद्धा था कोड वर्ड: जानकार सूत्रों के अनुसार, सेना व रक्षा विशेषज्ञों ने 11 व 13 मई को किए गए परमाणु परीक्षा का कोड वर्ड लाफिंग बुद्धा रखा था। परीक्षण सफल होने के बाद फोन कर तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को लाफिंग बुद्धा (बुद्ध मुस्कराया) के रूप में सफलता का संकेत दिया गया। पूरा कार्यक्रम इतना गुपचुप तरीके से हुआ कि सभी अत्याधुनिक सैटेलाइट तकनीकें धरी रह गई और भारत को बहुत बड़ी कामयाबी मिली। 

3. जैसलमेर व पोकरण का रास्ता रोक दिया गया: 11 व 13 मई को हुए परमाणु परीक्षण से दो घंटे पहले तक जैसलमेर व पोखरण के बीच का रास्ता रोक दिया गया। जैसलमेर व पोकरण के बीच आने वाले गांवों व इस सड़क मार्ग पर किसी को आने जाने नहीं दिया। केवल सेना के वाहन ही आते-जाते रहे। जैसे ही परमाणु परीक्षण हुआ जैसलमेर की धरती कांपने लगी और जिन्होंने 1974 का परीक्षण देखा था वे समझ गए कि भारत ने एक बार फिर परमाणु परीक्षण किए हैं।

4. पीएम और रक्षा मंत्री ने लिया था जायजा: पोकरण में परमाणु परीक्षण के बाद जहां विश्व के कई देशों ने भारत के ऊपर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिए थे। इसके दो दिन भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और रक्षामंत्री जॉर्ज फर्नाडीस सहित सेना के आला अधिकारियों ने पोकरण का दोरा किया था।

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11 मई 1998, दोपहर 3.45 बजे जब प्रधानमंत्री बोले भारत अब परमाणु शक्ति है 
Posted By: Ankur Singh Published: Monday, May 11, 2015

नई दिल्ली। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनकी अदम्य साहस के लिए जाना जाता है। खासकर जिस तरह से दुनिया के दबाव के बावजूद भारत ने सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया उसने दुनिया में भारत का डंका बजाने का काम किया है। आज ही के दिन 11 मई 1998 को भारत ने पोखरन में सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया था।

परमाणु बम का जवाब परमाणु बम से ही दिया जा सकता है 1964 में जब पहली बार भारत ने परमाणु परीक्षण किया था तो अटल बिहारी वाजपेयी ने संसद में कहा था कि परमाणु बम का जवाब परमाणु बम से ही दिया जा सकता है किसी और चीज से नहीं। वहीं जब भारत ने सफलतापूर्वक परमाणु परीक्षण किया था तो वाजपेयी ने इस परीक्षण के तुरंत बाद मीडिया में आकर कहा था कि भारत अब परमाणु शक्ति वाला देश है, हमारे पास अब परमाणु बम है। सेना की वर्दी और रात के अंधेरे में करते थे वैज्ञानिक काम इस अभियान की सबसे बड़ी बात यह थी कि भारत पर इस परीक्षण तो नहीं करने का भारी दबाव था। जिसके चलते भारतीय वैज्ञानिक सेना की वर्दी में हमेशा काम करते थे। यही नहीं अमेरिकी सैटेलाइट्स से बचने के लिए देश के वैज्ञानिक रात में ही इस ऑपरेशन पर काम किया करते थे।

ऑपरेशन शक्ति के नाम से चल रहा था यह अभियान

भारत ने इससे पहले भी भारत ने मई के माह में 1974 में परमाणु परीक्षण किया था, जिसका नाम स्माइलिंग बुद्धा रखा गया था। जबकि 11 मई 1998 को किये गये परीक्षण का नाम ऑपरेशन शक्ति दिया गया था। भारत अब परमाणु शक्ति है इस सफल परीक्षण के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने प्रेस कांफ्रेंस करके इस परीक्षण की सबको जानकारी दी थी। उन्होंने प्रेस में आकर बयान दिया था कि मैं देश के वैज्ञिनकों को इस सफलतापूर्वक परीक्षण की बधाई देता हूं, साथ हीं उन्होंने कहा था कि आज से भारत पूरी तरह से परमाणु शक्तिशाली देश है। दुनियाभर के देशों ने की थी  भारत की आलोचना वहीं भारत के इस सफलतापूर्वक परीक्षण के बाद दुनियाभर के देशों ने भारत की तीखी आलोचना की थी। अमेरिका ने कड़ा बयान जारी करते हुए कहा था कि भारत पर प्रतिबंध जारी रहेगा। वहीं भारत के इस परीक्षण की तैयारी को अमेरिका को नहीं पता चल पाने के चलते अमेरिकी खुफिया एजेंसी को काफी शर्मिंदगी का भी सामना करना पड़ा था। भारत के इस परीक्षण के बाद कनाडा ने भी आलोचना की थी और भारत से अपने राजदूत तक को वापस बुला लिया था। जापान ने भी इस परीक्षण के खिलाफ भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगा दिया था। जापान ने भारत के साथ सभी आर्थिक समझौतों पर रोक लगा दी थी। पाकिस्तान बोला भारतीयों का इसका जवाब मिलेगा वहीं पाकिस्तान ने भारत के इस परीक्षण के खिलाफ भारत की जमकर आलोचना की थी। पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने कहा था कि पाकिस्तान भारतीयों को इसका जवाब देगा। वहीं पाकिस्तान के विदेश मंत्री ने बयान जारी करके कहा था कि पाक भी भारत की बराबरी को तैयार है और हम परमाणु परीक्षण करने की कूबत रखते हैं। कुछ देशों ने नहीं दी कोई प्रतिक्रिया वहीं एक तरफ जहां दुनिया के कई देश भारत के इस परमाणु परीक्षण की आलोचना कर रहे थे तो ब्रिटेन, फ्रांस, रूस ने इस पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते हुए भारत की कोई भी आलोचना नहीं की। वहीं इस दिन को यादगार बनाने के लिए 11 मई को आधिकारिक रूप से नेशनल टेक्नोलॉजी डे घोषित किया गया था। इस दिन विज्ञान के क्षेत्र में बेहतरी योगदान देने वालों को सम्मानित किया जाता है।


मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

डाटा चोरी की राजनैतिक चोर बाजारी

डाटा चोरी की राजनैतिक  चोर बाजारी 

विश्वास पर घात
 दिनांक ०२-अप्रैल-२०१८

कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनावों में कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं ली थीं, जबकि उसके एक कर्मचारी डैन मर्सीन ने किसी एनआरआई से कांग्रेस को ही हराने के पैसे ले लिए। गौरतलब है कि डैन मर्सीन 2012 में केन्या के नैरोबी स्थित एक होटल में मृत पाए गए थे। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु 2012 में हो गई, वह दो साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हारने की वजह कैसे बन सकता है? सवाल यह भी उठता है कि जब फेसबुक के डाटा लीक के खुलासे से पहले मीडिया कांग्रेस और कैम्ब्रिज एनालिटिका में अगले चुनाव के लिए हो रही बातचीत की खबरें छाप रहा था, तब कांग्रेस कहां सो रही थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि तब कांग्रेस को कैम्ब्रिज एनालिटिका से जुड़ने की खबरें रास आ रही थीं? उसे लग रहा था कि इससे देश में माहौल तैयार करने में मदद मिलेगी

अरविंद शरण  



फेसबुक प्लेटफॉर्म पर अवैध डाटा खुदाई और तमाम गैरकानूनी हथकंडों से अमेरिका समेत कई देशों की राजनीतिक सत्ता का स्वरूप तय करने के विश्वव्यापी गंदे खेल में भारत का नाम भी उछल गया है और निशाने पर है कांग्रेस।

‘व्हिसल ब्लोअर’ क्रिस्टोफर विली ने ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने दिए बयान में कहा है कि उनकी कंपनी कांग्रेस के लिए लंबे समय तक काम करती रही है। विली के इस बयान के बाद भाजपा ने कड़े लहजे में कहा कि आखिर उसके आरोप सच निकले कि कांग्रेस इस गंदे खेल में शामिल रही है। राहुल गांधी को इन सबके लिए देश से माफी मांगनी चाहिए। वहीं, अब तक कैम्ब्रिज एनालिटिका से किसी भी तरह के संबंधों से स्पष्ट इनकार करती रही कांग्रेस ने सरकार को फेसबुक और कैम्ब्रिज एनालिटिका के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर मामले की जांच कराने की चुनौती दे डाली है। ब्रिटिश कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका द्वारा फेसबुक से 5 करोड़ लोगों की निजी जानकारी गलत तरीके से हासिल कर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतने का रास्ता साफ करने के खुलासे के बाद ब्रिटेन की संसदीय समिति ने क्रिस्टोफर विली को तलब किया था। इसी समिति के सामने दिये बयान में विली ने कैम्ब्रिज एनालिटिका और इसकी मूल कंपनी स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस लैबोरेटरीज (एससीएल) की काली करतूतों का खुलासा किया। विली ने कहा कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने राज्यों के स्तर पर कांग्रेस के लिए ‘बड़े पैमाने’ पर काम किया है। कैम्ब्रिज एनालिटिका के लिए भारत क्यों महत्वपूर्ण रहा? इसके जबाव में विली ने कहा कि भारत में परस्पर विरोधी राजनीतिक विचारधाराएं काफी मजबूत हैं, इसलिए वहां ‘अस्थिरता के अवसर’ हैं। जब समिति में मौजूद एक सांसद ने पूछा कि चूंकि भारत में हमेशा चुनाव होते रहते हैं, इसलिए हो सकता है कि यह आपके कारोबार का मुख्य स्रोत भी रहा हो, तो क्या आपने राष्ट्रीय स्तर पर भी कांग्रेस के लिए काम किया? इस पर विली कांग्रेस के साथ राष्ट्रीय स्तर पर काम करने का वाकया तो याद नहीं कर पाए, लेकिन इतना जरूर कहा, ‘‘भारत इतना विशाल है कि वहां का एक राज्य भी ब्रिटेन से बड़ा हो सकता है। मुझे पता है कि कंपनी ने वहां हर तरह की योजना पर काम किया। वहां कंपनी के दफ्तर हैं, कर्मचारी हैं। मेरे पास इसके दस्तावेज मौजूद हैं और आप चाहेंगे तो मैं आपको दे सकता हूं।’’ इसके साथ ही विली ने बताया कि कैम्ब्रिज एनालिटिका की कार्यप्रणाली मुख्यत: फेसबुक डाटा पर आधारित है।


भाजपा आक्रामक, निशाने पर राहुल
विली के इस खुलासे के बाद केंद्र सरकार और भाजपा आक्रामक हो गई है। अवैध रूप से फेसबुक डाटा लीक होने की खबरों के बाद से ही कांग्रेस पर कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लेने का आरोप लगा रहे कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने आक्रामक रुख अपनाते हुए कहा कि व्हिसल ब्लोअर ने पुष्टि कर दी है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कांग्रेस के साथ काम किया। कांग्रेस और राहुल गांधी, दोनों को अब माफी मांगनी चाहिए। 
मजेदार तथ्य यह है कि अब तक कैम्ब्रिज एनालिटिका के साथ कभी काम न करने की कसमें खाने वाली कांग्रेस ने विली के बयान के बावजूद एक बार फिर कहा कि उसका कैम्ब्रिज एनालिटिका से कभी कोई संबंध नहीं रहा और सरकार फेसबुक तथा एनालिटिका के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराके मामले की जांच करा ले। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने कहा, ‘‘कैम्ब्रिज एनालिटिका की भारतीय सहयोगी ओबीआई (ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस प्रा. लि.) के एक भारतीय साझीदार अवनीश राय ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि एक अमेरिकी एनआरआई ने 2014 में कांग्रेस की सरकार को गिराने के लिए कैम्ब्रिज की सेवाएं लीं। कांग्रेस ने कभी सीए की सेवाएं नहीं लीं, भाजपा जवाब दे कि यह एनआरआई कौन था।’’ सुरजेवाला जिस ओबीआई का जिक्र कर रहे हैं, उसका दफ्तर दिल्ली से सटे गाजियाबाद में भी है और इस कंपनी ने अपनी वेबसाइट पर ग्राहकों की सूची में कई राजनीति दलों का उल्लेख कर रखा था, हालांकि फेसबुक डाटा लीक का मामला सामने आने के बाद से उसकी वेबसाइट काम नहीं कर रही। सूत्रों के मुताबिक इस कंपनी ने बड़ी संख्या में पत्रकारों को अपने नेटवर्क में जोड़ रखा है जो उनकी जरूरत के हिसाब से मीडिया में खबरें चलाते हैं। 
वरिष्ठ पत्रकार और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष रामबहादुर राय कहते हैं, ‘‘अब तो स्पष्ट है कि कांग्रेस ने कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लीं। जब  फेसबुक के पांच करोड़ लोगों के डाटा में सेंध लगने की खबर आई, तभी कांग्रेस को अंदाजा हो गया होगा कि अब बहुत जल्दी उसका सच भी उजागर हो जाएगा। इसीलिए वह और राहुल गांधी आक्रामक दिखने की कोशिश कर रहे थे। ‘व्हिसल ब्लोअर’ यह भी बताने को तैयार है कि यह सब कैसे हुआ। मुझे लगता है कि आने वाले समय में कांग्रेस इसमें उलझती चली जाएगी।’’

कांग्रेसी दावे की खुली पोल
ब्रिटेन की संसदीय समिति के सामने एक आईटी विशेषज्ञ पॉल ओलिवर डेहे भी पेश हुए, जिन्होंने दावा किया कि कैम्ब्रिज एनालिटिका में क्रिस्टोफर विली से पहले उनकी जगह डैन मर्सीन भारत में कांग्रेस के लिए काम कर रहे थे। पॉल के मुताबिक, केन्या में मृत्यु से पहले वह भारत में कांग्रेस के लिए काम कर रहे थे, लेकिन उन्होंने उसी कांग्रेस को हराने के लिए एक अमेरिकी एनआरआई से पैसे ले रखे थे और वह इसी दिशा में काम कर रहे थे। सुरजेवाला इसका उल्लेख करते हुए सवाल करते हैं कि जिस कैम्ब्रिज एनालिटिका के कर्मचारी ने कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव में हराने के लिए पैसे लिए हों, भला उसी कंपनी की सेवाएं कांग्रेस कैसे ले सकती थी? यहां दो बातें गौर करने लायक है। पहली, कांग्रेस ने 2014 के लोकसभा चुनावों में मदद के लिए कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं ली थीं और उसके एक कर्मचारी डैन मर्सीन ने किसी एनआरआई से कांग्रेस को ही हराने के लिए पैसे ले लिए। गौरतलब है कि डैन मर्सीन केन्या के नैरोबी स्थित एक होटल में 2012 में मृत पाए गए थे। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस व्यक्ति की मृत्यु 2012 में हो गई, वह भला दो साल बाद हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के हारने की वजह कैसे बन सकता है? इसलिए कांग्रेस बेशक इसे आधार बनाकर अपनी झेंप मिटाने की कोशिश कर रही हो, लेकिन सच्चाई यह है कि इसमें झोल ही झोल है। 
रामबहादुर राय कहते हैं, ‘‘यह तो जांच का विषय है कि वह एनआरआई कौन था? उसने क्या वाकई कांग्रेस को हराने के लिए पैसे दिए? अगर दिए तो कब दिए? अगर पैसे लेने वाले की 2012 में मृत्यु हो गई तो क्या फिर किसी और को भी पैसे दिए गए? अगर ऐसा भी हुआ तो उसके कांग्रेस से मनमुटाव की वजह क्या थी। कहीं कोई निजी मामला तो नहीं था?’’ वैसे तब इस तरह खबरें छपी थीं कि डैन मर्सीन की मृत्यु हृदयाघात के कारण हुई। हालांकि क्रिस्टोफर विली ने संसदीय समिति के सामने कहा कि  ‘‘संभवत: उनकी मौत जहर देने से हुई थी।’’ साथ ही विली ने जो बात कही, उससे साफ हो जाता है कि उनकी मौत बेशक संदिग्ध थी और उनकी हत्या की आशंका थी, लेकिन उसका कारण केन्या की स्थानीय राजनीति थी। विली ने कहा, ‘‘जब आप केन्या या फिर दूसरे अफ्रीकी देशों की राजनीति पर काम कर रहे होते हैं और अगर कोई सौदा गड़बड़ हो जाए तो इसका खामियाजा भी भुगतना पड़ता है।’

तब कहां थी कांग्रेस?
जिस ‘व्हिसल ब्लोअर’ के खुलासे के बाद अमेरिका-ब्रिटेन जैसे तमाम देशों की सत्ता की नींद हराम हो गई हो, यह उसी कीटाणु का असर है कि कांग्रेस किसी भी तरह कैम्ब्रिज एनालिटिका के भूत से पीछा छुड़ाना चाह रही है। बेशक, विली ने खुले शब्दों में कांग्रेस के साथ पुराने रिश्ते तार-तार कर दिए हों, पर कांग्रेस अपना दामन बचाती फिर रही है। लेकिन कल यह स्थिति नहीं थी। फेसबुक के डाटा में सेंध से पहले वह कैम्ब्रिज एनालिटिका से संबंधों में अपनी शान देखती हो या नहीं, लेकिन इतना तय है कि उसे इसमें कोई बुराई नहीं दिखती थी। इस सनसनीखेज खुलासे से पहले मीडिया में ऐसी तमाम खबरें आईं जिनमें कहा गया कि कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव के लिए कैम्ब्रिज एनालिटिका से बात कर रही है, लेकिन तब पार्टी ने कुछ नहीं कहा। उदाहरण के लिए कुछ प्रकाशनों पर गौर करना आवश्यक होगा। 12 नवंबर, 2017 के अंक में संडे गार्जियन ने लिखा है, ‘‘पार्टी उपाध्यक्ष राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस कैम्ब्रिज एनालिटिका की सेवाएं लेने के लिए बातचीत कर रही है और यह बातचीत काफी आगे बढ़ चुकी है। सूत्रों के मुताबिक, वैसे तो कांग्रेस की सारी रणनीति 2019 के लोकसभा चुनावों को लेकर है, लेकिन कैम्ब्रिज एनालिटिका से बात बन गई तो अगले साल मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में होने वाले चुनावों में भी इसकी सेवाएं ली जाएंगी। राजनीतिक दलों को चुनाव जिताने के मामले में कैम्ब्रिज एनालिटिका को महारत हासिल है। इसके अलावा, कैम्ब्रिज एनालिटिका ने पूरे ब्रेक्जिट अभियान के दौरान भी अहम भूमिका निभाई, जिसका नतीजा यह हुआ कि ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया।’’

10 अक्तूबर, 2017 को बिजनेस स्टैंडर्ड ने प्रकाशित किया, ‘‘कांग्रेस ने 2019 के लोकसभा चुनावों की तैयारी शुरू कर दी है। इस बार ऐसा लगता है कि वह बिग डाटा का इस्तेमाल करने जा रही है। कहा जा रहा है कि इसके लिए कांग्रेस बिग डाटा क्षेत्र की कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका से बातबीत कर रही है, जिसने डोनाल्ड ट्रंप को अमेरिकी राष्ट्रपति का चुनाव जीतने में मदद की। मनी कंट्रोल के मुताबिक, कंपनी ने लोगों के आॅनलाइन व्यवहार का विश्लेषण कर डाटा आधारित सोशल मीडिया रणनीति का खाका तैयार कर लिया है। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने इसके बारे में कुछ सुझाव भी दिए हैं।’’ ऐसी तमाम खबरें राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस और कैम्ब्रिज एनालिटिका के बीच बातचीत के बारे में प्रकाशित की गईं। सवाल है कि जब फेसबुक डाटा लीक के खुलासे से पहले मीडिया कांग्रेस और कैम्ब्रिज एनालिटिका में अगले चुनाव के लिए हो रही बातचीत की खबरें छाप रहा था, तब कांग्रेस कहां सो रही थी? कहीं ऐसा तो नहीं कि तब कांग्रेस को कैम्ब्रिज एनालिटिका से जुड़ने की खबरें रास आ रही थीं? उसे लग रहा था कि इससे देश में माहौल तैयार करने में मदद मिलेगी?

कई स्तरों पर सरकार सक्रिय
दुनियाभर में बढ़ते बवाल को देख कैम्ब्रिज एनालिटिका ने अपने विवादित सीईओ अलेक्जेंडर निक्स को निलंबित कर दिया है, जबकि फेसबुक ने एनालिटिका से नाता तोड़ लिया है। अमेरिका समेत कई देशों में फेसबुक के खिलाफ जांच शुरू हो गई है और भारत ने भी फेसबुक और कैम्ब्रिज एनालिटिका से जवाब तलब किया है, सख्त लहजे में चेतावनी दी है कि यहां के चुनावों को प्रभावित करने की किसी भी स्थिति के गंभीर परिणाम होंगे। सरकार इस बात की भी पड़ताल कर रही है कि कहीं फेसबुक के प्लेटफॉर्म से भारतीयों का डाटा भी तो नहीं लीक हो गया। इसके लिए फेसबुक से जवाब तलब किया गया है। इसके साथ ही सरकार ने कई स्तरों पर चुनाव को प्रभावित न होने देने के लिए जरूरी तैयारी शुरू कर दी है। सूत्रों के मुताबिक, सरकार डाटा सुरक्षा के लिए एक दीर्घकालिक नीति तैयार करने में जुटी है। सरकार चाहती है कि कानूनी प्रावधानों से देश में ऐसी व्यवस्था बने जो डाटा लीक होने की आशंकाओं को कम करती हो। जानकारी के मुताबिक चुनाव आयोग में भी इस बात पर विचार-विमर्श शुरू हो गया है कि उसे कौन से उपाय करने होंगे, जिससे चुनावों को प्रभावित करने की चालों को विफल किया जा सके।


गंदे खेल का हीरो
मामला तब और गंभीर हो जाता है जब कैम्ब्रिज एनालिटिका के निलंबित सीईओ अलेक्जेंडर निक्स की अगुआई वाली टीम यह कहते खुफिया कैमरे में कैद हो जाती है कि अपने ग्राहकों के हितों के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं, चाहे बात डाटा में सेंध लगाने की हो, उनके मनोवैज्ञानिक विश्लेषण के आधार पर किसी भौगोलिक क्षेत्र की मैपिंग की हो, जैसा कंपनी ने अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के लिए चुनाव में किया। अगर इन सबसे बात नहीं बनती है तो कंपनी अपने ग्राहकों के हितों को पूरा करने के लिए नेताओं को घूस देने से लेकर उन्हें सुंदर महिलाओं के जाल में फांसने से भी पीछे नहीं हटती।


मोबाइल डाटा भी ले लिया
जब डाटा के दुरुपयोग के कारण फेसबुक के खिलाफ दुनियाभर में चिंता और छले जाने का भाव मजबूत हो रहा था, अपनी खोई विश्वसनीयता पाने के लिए फेसबुक ने ब्रिटेन और अमेरिका में विज्ञापन देकर अपनी स्थिति सुधारने की कोशिश की। फेसबुक ने विज्ञापन में बड़े भावुक अंदाज में अपनी गलती मानते हुए कहा कि जो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म जानकारी सुरक्षित नहीं रख सकता, उसे लोगों से निजी जानकारी लेने का कोई अधिकार नहीं। साथ ही, उसने भविष्य में गलती सुधारने का वादा किया और अपनी विश्वसनीयता के खोने का दुख जताया। लेकिन, जिस दिन यह विज्ञापन आया, उसी दिन फेसबुक एक और विवाद में फंस गई। अब तक तो फेसबुक इन आरोपों का सामना कर रही थी कि उसने संभवत: जान-बूझकर अपने प्लेटफॉर्म से डाटा निकल जाने दिया, पर ताजा आरोप है कि फेसबुक वर्षों से एंड्रायड आधारित फोन का इस्तेमाल कर रहे अपने उपभोक्ताओं के कॉल रिकॉर्ड, एसएमएस आदि जमा करती जा रही थी। फिलहाल मोबाइल डाटा के दुरुपयोग की जानकारी तो नहीं आई है, पर यह खबर एक नए खतरे की ओर इशारा जरूर कर रही है।

जिम्मेदारी से बच नहीं सकती फेसबुक
डाटा चोरी का मामला सामने आया तो फेसबुक ने पहले सफाई दी कि उसने तो 2015 में ही उस एप को हटा दिया था, क्योंकि यह जरूरत से ज्यादा डाटा ले रहा था और यह कंपनी की नीतियों के विरुद्ध था। साथ ही कहा कि लोगों ने अपनी मर्जी से डाटा दिया, लिहाजा इसमें सुरक्षा संबंधी कोई चूक नहीं हुई और न ही कोई पासवर्ड ‘हैक’ हुआ। लेकिन देखते-देखते दुनियाभर में फेसबुक के खिलाफ विरोध के स्वर तेज हो गए और ट्विटर पर ‘डिलीट फेसबुक’ हैशटैग ट्रेंड करने लगा। और तो और, व्हाट्सएप के संस्थापक ब्रैन एक्टम ने भी 20 मार्च को ट्वीट कर ‘डिलीट फेसबुक’ का समर्थन कर दिया। गौरतलब है कि व्हाट्सएप को फेसबुक ने खरीद रखा है। बाद में मार्क जुकरबर्ग सामने आए और चूक की बात मानी और वादा किया कि फेसबुक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए सभी जरूरी कदम उठाएगी। साथ ही, भारत में होने वाले चुनावों को देखते हुए सुरक्षा के उपाय बेहतर करने की भी बात कही। 
फेसबुक की बातों का विरोधाभास ही उसे कठघरे में खड़ा करता है। उसने यह तो कहा कि 2005 में जब मामला खुला तो उसने कोगान द्वारा विकसित उस एप यानी ‘दिस इज योर डिजिटल लाइफ ’ को हटा दिया। लेकिन फेसबुक यह नहीं बताती कि उस समय उसने सुरक्षा बेहतर करने के लिए कोई कदम उठाए या नहीं। जाहिर है, नहीं उठाए, क्योंकि उठाए होते तो अब तक अपनी सफाई में कह चुकी होती और मामले के तूल पकड़ने के बाद उसे भारत में अपनी खिसकती जमीन को बचाने के लिए डाटा सुरक्षा के ताजा उपाय का भरोसा न देना पड़ता। इतने बड़े पैमाने पर डाटा चोरी के बाद तो सबसे पहले उसे कैम्ब्रिज एनालिटिका के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराना चाहिए था। लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और अपने वकील के जरिये चोरी के डाटा को वापस पाने के लिए मोल-तोल करती रही। हैरत की बात है कि यह कोशिश गुपचुप तरीके से अगस्त 2016 तक, यानी 11 साल चलती रही। इतनी मशक्कत के बाद कैम्ब्रिज एनालिटिका ने डाटा को हटा देने का आश्वासन दिया और फेसबुक ने मान लिया। सवाल है कि जिस कंपनी ने धोखा किया हो, उसकी बातों को आपने ऐसे ही कैसे मान लिया? विशेषज्ञों की देखरेख में डाटा हटाने का काम क्यों नहीं कराया? इस मोर्चे पर भी फेसबुक ने लापरवाही की, जिसका नतीजा यह रहा कि एनालिटिका ने चोरी का डाटा हटा देने का वादा करने के बाद भी उसे अपने पास ही रखा। सवाल यह भी उठता है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका के महज आश्वस्त कर देने भर से जुकरबर्ग इतने संतुष्ट कैसे हो गए कि उसे अपने प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करते रहने की अनुमति दे दी? 
दूसरी महत्वपूर्ण बात, जब उसे 2015 में ही डाटा लीक की बात पता चल गई, तो उसने अपने उपभोक्ताओं को अंधेरे में क्यों रखा? उसे तभी लोगों को डाटा में सेंध की जानकारी ईमानदारी से दे देनी चाहिए थी। साथ ही उन्हें उपयोगकर्ताओं को यह बताना चाहिए था कि फेसबुक पर अपने डाटा को सुरक्षित रखने के लिए क्या करना चाहिए।


कई विकास योजनाओं में साथ
फेसबुक भारत में कई विकास योजनाओं में साझीदार है। उसकी एक आॅनलाइन स्टार्ट-अप हब बनाने की योजना है, जिससे लोगों में उद्यमशीलता को बढ़ावा मिले। इसके अलावा, वह देशभर में डिजिटल प्रशिक्षण केंद्र खोलने की योजना पर भी काम कर रही है ताकि युवाओं को इसका प्रशिक्षण दिया जा सके। अगले तीन साल में इन केंद्रों से 50 लाख लोगों को प्रशिक्षित करने की योजना है। कंपनी उड़ीसा सरकार के साथ भी महिलाओं को उद्यमी बनाने की योजना में सहयोग कर रही है, तो वहीं आंध्र प्रदेश की सरकार के डिजिटल फाइबर कार्यक्रम में भी हाथ बंटा रही है। इनके अलावा, केंद्र सरकार और फेसबुक आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में साथ मिलकर काम कर रहे हैं। चुनाव आयोग कई वर्षों से फेसबुक के साथ मिलकर मतदाता जागरूकता कार्यक्रम चला रहा है। इस तरह के तमाम सहयोग बताते हैं कि भारत की सरकार और लोगों ने फेसबुक पर कितना भरोसा किया था।


2014 में लिखी गई 2017 की पटकथा
2016 में अमेरिका में हुए चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति चुने गए। उनके चुनाव प्रचार की रणनीति तय करने में कैम्ब्रिज एनालिटिका की अहम भूमिका थी। इस कंपनी के मालिकों में से एक हैं रॉबर्ट मर्सर। अरबपति व्यवसायी रॉबर्ट मर्सर रिपब्लिकन पार्टी के बड़े दानदाता हैं। इस कंपनी पर मुख्यत: दो आरोप हैं। पहला, 2016 में हुए अमेरिकी चुनाव में इसने डोनाल्ड ट्रंप के पक्ष में मतदाताओं का रुझान बनाया और इसके लिए फेसबुक से लोगों की निजी जानकारी गलत तरीके से हासिल की। दूसरा, ब्रेक्जिट में ब्रिटेन के लोगों को यूरोपीय संघ से हटने के लिए प्रेरित किया। इस गोरखधंधे का खुलासा कैम्ब्रिज एनालिटिका के पूर्व कर्मचारी क्रिस्टोफर विली ने किया और समाचारपत्र आॅब्जर्वर ने इसे छापा। 
2016 में होने वाले अमेरिकी चुनाव की तैयारी 2014 में ही शुरू हो गई थी। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में मनोविज्ञान के प्रोफेसर डॉ. अलेक्जेंडर कोगान को आठ लाख डॉलर दिए ताकि वह ऐसा एप बनाएं, जिससे फेसबुक उपभोक्ताओं के डाटा निकाले जा सकें। कोगान ने ‘दिस इज योर डिजिटल लाइफ’ एप बनाया, जिसका इस्तेमाल फेसबुक पर हुआ और लगभग 2.70 लाख लोगों ने इसे डाउनलोड किया। इस एप के जरिये न केवल 2.7 लाख लोगों के नाम, फोन नंबर, ईमेल, कहां के रहने वाले हैं जैसी जानकारी ले ली गई, बल्कि इनके दोस्तों वगैरह की भी जानकारी निकाल ली, जबकि फेसबुक अपनी निजता नीति के चाक-चौबंद होने का दावा करती है। कोगान ने यह डाटा कैम्ब्रिज एनालिटिका को दे दिया। कोगान की कंपनी ग्लोबल साइंस रिसर्च ने फेसबुक उपभोक्ताओं का डाटा निकालने का तरीका निकाला और फेसबुक के जरिये ही लोगों को पैसे देकर सर्वे आदि में भाग लेने के बहाने उनकी और जानकारी निकाली। यह डाटा भी उसने कैम्ब्रिज एनालिटिका को बेच दिया। एनालिटिका ने इन आंकड़ों से भौगोलिक आधार पर लोगों की मनोवैज्ञानिक प्रोफाइल बनाई। फिर लोगों को उन्हीं मुद्दों से जुड़े विज्ञापन दिखाए गए जो उनके सरोकार के थे। भूगोल के हिसाब से लोगों के सरोकार, चिंताएं मालूम हो जाने के बाद यह तय किया गया कि ट्रंप को किस इलाके में कैसी बात करनी है और किस तरह के मुद्दे उठाने हैं। इस तरह सीधे-सीधे पांच करोड़ लोगों को प्रेरित किया गया कि वह ट्रंप के पक्ष में वोट करें। कुल मिलाकर फेसबुक के प्लेटफॉर्म से निकली काली करतूतों की यह कहानी एक ऐसी दुनिया की ओर इशारा कर रही है, जहां एक नई तरह की गुलामी ने सिर उठाना शुरू कर दिया है। अगर इससे बचने के उपाय नहीं किए गए तो इसके खतरनाक परिणाम होंगे। यह सही है कि डाटा सुरक्षा से जुड़ी नीतियां तय करना सरकारों का काम है, लेकिन हमारी भी कोई भूमिका होती है। 
हम हर तरह के प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल करें, लेकिन यह तो तस्दीक कर लें कि आपके एक क्लिक ने आपकी कौन सी जानकारी थाली में सजाकर दे दी। सरकार को नीतियां बनाने में कुछ समय लग सकता है, लेकिन हमें यह सावधानी अपनाने में मिनट नहीं लगने वाले।     

धोखा, घूस और सुंदरियों का जाल 
चैनल-4 के स्टिंग का नतीजा आंखें खोलने वाला है। इससे पता चलता है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने न केवल फेसबुक उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी धोखे से हासिल की, बल्कि दुनियाभर में चुनावों को प्रभावित करने के लिए   घूस और महिलाओं का हथियार के तौर पर इस्तेमाल किया। मौजूदा विवाद में फेसबुक सवालों के घेरे में इसलिए है, क्योंकि उसने अपने प्लेटफॉर्म का दुरुपयोग होने दिया। सवाल है कि जब उसे मामले की जानकारी 2005 में ही मिल गई थी तो उसने अपने उपभोक्ताओं को अंधेरे में क्यों रखा?

कैसे हुआ खेल
लोगों से कुछ सवाल पूछे गए और उनकी पसंद-नापसंद, उनके लिए चिंता के मुद्दे आदि के आधार पर उनकी मनोवैज्ञानिक रिपोर्ट तैयार की गई और इस तरह अमेरिका के विभिन्न इलाकों की प्रोफाइल बनाई गई। ट्रंप जब वहां प्रचार के लिए जाते, तो उन्हीं मुद्दों पर जोर देते।


कैसे हुआ खुलासा
समाचारपत्र आॅब्जर्वर ने करीब पांच करोड़ फेसबुक  उपभोक्ताओं  की निजी जानकारी के गलत तरीके से निकाले जाने की खबर प्रकाशित की।

सनसनी
चैनल-4 के एक स्टिंग में कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ अलेक्जेंडर निक्स यह मानते देखे गए कि डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव में उनकी कंपनी ने अंदरखाने किस तरह महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। स्टिंग में कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ समेत वरिष्ठ अधिकारी कंपनी की रणनीति पर बोलते देखे गए। इन अधिकारियों ने कहा कि वे अपने ग्राहक के हितों को साधने के लिए घूस और  महिलाओं का भी सहारा लेते थे।  

भारत पर भी आंच
चैनल-4 के स्टिंग में कैम्ब्रिज एनालिटिका के वरिष्ठ अधिकारियों ने बताया कि मूल कंपनी स्ट्रैटेजिक कम्युनिकेशंस लैबोरेटरीज (एससीएल) के साथ मिलकर उन लोगों ने अमेरिका, नाइजीरिया, केन्या, चेक रिपब्लिक, अजेंटीना और भारत समेत कई देशों में 200 से अधिक चुनावों में अपनी सेवाएं दीं।

फेसबुक पर बरतें ये सावधानियां  
बाहरी एप की गतिविधियां: बाहरी एप डाटा चोरी का सबसे बड़े स्रोत होते हैं। इन पर अंकुश के लिए सबसे पहले अपने फेसबुक प्रोफाइल में एप वाले सेक्शन में जाएं। एप-सेटिंग पर क्लिक करें। ‘एडिट सेटिंग’ में जाकर साझा की जा रही जानकारी को सीमित करें या इससे इनकार करें। 
पिछली जानकारी के लिए मशक्कत: यदि पहले आप बाहरी एप से जानकारी साझा कर चुके हैं, वह नहीं हटेगी। इन्हें हटाने के लिए आपको अलग से हर एप से संपर्क करना होगा।
बदल दें सेटिंग: ‘एप्स अदर्स यूज’ सेक्शन में जाकर यह तय कर सकते हैं कि जब फेसबुक के जरिये बाहरी एप या किसी साइट पर जा रहे हों तो कैसी और कितनी जानकारी साझा हो।
लॉग इन विद फेसबुक: अगर आप किसी भी एप या साइट पर जाने के लिए इस विकल्प का इस्तेमाल करते हैं तो समझिए कि आपने ऐसे सभी बाहरी एप और वेबसाइट को अपनी जानकारियां लेने की अनुमति दे दी। इससे बचने के लिए फेसबुक के जरिये बाहरी एप या साइट पर जाने से परहेज करें।

घेरे में किरदार
- अलेक्जेंडर निक्स
ब्रिटेन के एससीएल समूह की सहयोगी कंपनी कैम्ब्रिज एनालिटिका के सीईओ हैं। कंपनी की दशा-दिशा तय करने में इनकी अहम भूमिका रही। एससीएल समूह कई देशों में चुनाव प्रचार की रणनीति तय करने संबंधी सेवाएं देता रहा है।

रॉबर्ट मर्सर
एक पूर्व वैज्ञानिक, जो बाद में उद्योगपति बने और रिपब्लिकन पार्टी को मोटा चंदा देने वालों में से हैं। कैम्ब्रिज एनालिटिका में करीब डेढ़ करोड़ डॉलर का निवेश किया और कंपनी की नीतियां तय करने में भूमिका निभाने लगे।

अलेक्जेंडर कोगान
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में मनोविज्ञान के व्याख्याता हैं। कैम्ब्रिज एनालिटिका ने आठ लाख डॉलर में कोगान की सेवाएं लीं और इन्हें एक ऐसा एप बनाने को कहा जिसके जरिये फेसबुक उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी निकाली जा सके। इस एप का नाम था- दिज इज माई डिजिटल लाइफ।


पल्ला नहीं झाड़ सकते
फेसबुक यह कहती रही कि उसकी ओर से कोई सुरक्षा संबंधी चूक नहीं हुई। बात बढ़ने पर जुकरबर्ग सामने आए और माफी मांगी। कहा कि ऐसा दोबारा नहीं होगा और वह सुरक्षा मानदंड बेहतर करेंगे। जब फेसबुक को 2015 में ही पता चल गया था और उसने एप हटा दिया था, तो तभी सुरक्षा बेहतर क्यों नहीं की? लोगों को डाटा लीक की बात क्यों नहीं बताई?

चीन ने बनाई ‘दीवार’ 
चीन इंटरनेट की बेलगाम आजादी को खतरनाक मानता है और इसलिए उसने कई जरूरी कदम उठाए हैं, जिससे देश का डाटा बाहर जाना आसान नहीं है। चीन के इन कदमों को एक तरफा-अलोकतांत्रिक कहा जा सकता है, लेकिन इस बात से इनकार नहीं कि फेसबुक-कैम्ब्रिज एनालिटिका के खुलासे के बाद दुनियाभर के देशों को अपने लोगों के निजी आंकड़ों के इर्द-गिर्द अभेद्य दीवार बनानी होगी और भारत जैसे देश के लिए, जहां रोकथाम के कानूनी प्रावधान  कमजोर हैं, वहां सावधान तो होना पड़ेगा।  
ग्रेट फायरबॉल आॅफ चाइना: इंटरनेट की दुनिया को नियंत्रित करने के लिए कानूनी और तकनीकी तौर पर किए गए उपाय जो स्थानीय डाटा को सुरक्षित करते हैं। इस ‘दीवार’ को भेदकर चीन में ताक-झांक की अनुमति न तो गूगल, फेसबुक जैसों को है, और न ही किसी मोबाइल एप को। ये सब यहां प्रतिबंधित हैं।
आम लोगों तक इंटरनेट की पहुंच: जनवरी, 1995 में चीन ने पहली बार आम लोगों को इंटरनेट की सुविधा दी। इसके पहले यह सरकारी तंत्र को ही उपलब्ध थी।
अंकुश का पहला कदम: डेढ़ साल में ही चीन को पता चल गया कि बाहरी एजेंसियों को बेलगाम नहीं छोड़ा जा सकता और अगस्त 1996 में वॉयस आॅफ अमेरिका, अमेरिकी समाचार समूहों और मानवाधिकार समूहों पर रोक लगाई।
यू-ट्यूब का रास्ता बंद: तिब्बत में अशांति के बाद मार्च 2008 में लगाई रोक।
फेसबुक-ट्विटर पर रोक: जुलाई 2009 में सिंक्यांग में दंगा भड़कने के बाद फेसबुक और ट्विटर पर स्थायी तौर पर रोक लगाई। इसके पहले भी उन पर अस्थायी रोक लगाई गई थी।
ब्लूमबर्ग और न्यूयॉर्क टाइम्स की बारी: सत्तासीन नेताओं के संबंधियों के भ्रष्टाचार पर खबरें लिखने पर लगाई रोक।
याहू  ने मानी शर्तें: अमेरिकी कंपनी याहू  ने 1999 में चीन में प्रवेश किया। यह एकमात्र पश्चिमी कंपनी है, जिसने चीन की तमाम शर्तों को माना कि उसे क्या दिखाना है और क्या नहीं। साथ ही, याहू सारा डाटा चीन की सरकार से साझा करती रही, जिसके कारण अप्रैल 2005 में लोकतंत्र समर्थक विदेशी साइट को ईमेल भेजने के मामले में पत्रकार शी ताओ की गिरफ्तारी हुई और फिर सजा।   
साइबर कानून सख्त किया: पिछले साल जून से चीन ने साइबर सुरक्षा कानून को और सख्त कर दिया है। अब चीनी नागरिकों से जुड़ी जानकारी (चाहे वह निजी हो या फिर वेतन आदि जैसी पेशेवर) को देश से बाहर ले जाने पर रोक लगा दी गई है। ये बाध्यताएं सोशल मीडिया और इंटरनेट कंपनियों पर भी लागू हैं और उल्लंघन पर आजीवन प्रतिबंध का प्रावधान है।

कांग्रेस पर ‘व्हिसल ब्लोअर’ के खुलासे के बाद
व्हिसल ब्लोअर क्रिस्टोफर विली ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि कैम्ब्रिज एनालिटिका ने कांग्रेस के साथ काम किया। मैं तो पहले दिन से ही कहता रहा हूं कि राहुल गांधी मामले से ध्यान भटकाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल बेनकाब हो गए हैं जो अब तक इससे इनकार करते रहे थे। कांग्रेस और राहुल गांधी, दोनों को अब माफी मांगनी चाहिए। 
— रविशंकर प्रसाद
कानून एवं आईटी मंत्री, भारत

सीए (कैम्ब्रिज एनालिटिका) की भारतीय सहयोगी ओबीआई (ओवलेनो बिजनेस इंटेलिजेंस प्रा. लि.) के एक भारतीय पार्टनर अवनीश राय ने सनसनीखेज खुलासा किया है कि एक अमेरिकी एनआरआई ने 2014 में कांग्रेस की सरकार को गिराने के लिए सीए की सेवाएं लीं। कांग्रेस ने कभी सीए की सेवाएं नहीं लीं, भाजपा जवाब दे कि यह एनआरआई कौन था।
— रणदीप सुरजेवाला
कांग्रेस प्रवक्ता 

फेसबुक डाटा में सेंध के खुलासे के बाद 
क्या चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस डाटा की चोरी पर निर्भर है? राहुल गांधी की सोशल मीडिया प्रोफाइलिंग में सीए  (कैम्ब्रिज एनालिटिका) की क्या भूमिका है? देश की सुरक्षा के लिए यह एक गंभीर खतरा है और कांग्रेस को इसका जवाब देना चाहिए।
— रविशंकर प्रसाद, कानून एवं आईटी मंत्री

भाजपा की फेक न्यूज फैक्टरी ने एक और फेक न्यूज गढ़ दी है। ऐसा लगता है कि यह उनका रोज का काम हो गया है। न तो कांग्रेस और न ही राहुल गांधी ने कभी इस कंपनी (कैम्ब्रिज एनालिटिका) की सेवाएं लीं।
— रणदीप सुरजेवाला, कांग्रेस प्रवक्ता 

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हमारा डाटा देश में ही रहे 
 पवन दुग्गल
कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण ने दुनियाभर को चिंता में डाल दिया है। अगर लोगों की निजी जानकारी को गलत तरीके से हासिल करके अमेरिका या फिर दूसरे देशों के चुनाव को प्रभावित किया जा सकता है तो भारत में भी ऐसा हो सकता है। इसलिए हमारे लिए यह सावधान हो जाने का समय है। सबसे बड़ी बात यह है कि भारत में डाटा सुरक्षा, निजता और साइबर सुरक्षा को लेकर प्रभावी कानून नहीं है। इसलिए अगर हमारे यहां डाटा चोरी की कोई घटना हो गई तो प्रभावित व्यक्ति के लिए न्याय पाने का रास्ता आसान नहीं होगा। इसलिए सबसे पहले तो कानूनी प्रावधान करने होंगे जिनके अंतर्गत ठोस कार्रवाई हो सके। दूसरी बात है, हमने सेवा प्रदाता के प्रति बहुत ही ढीला रवैया अपना रखा है। अधिकतर सेवा प्रदाता यह दलील देते हैं कि हम भारत से बाहर स्थित हैं और फलां देश के कानून के अधीन हैं, आपके कानून हम पर लागू नहीं होते। हम कानूनी प्रावधानों के माध्यम से उन्हें कड़ा संदेश देने में नाकामयाब रहे हैं, तभी वे इस तरह की बातें कह पाते हैं, वरना यह तो सामान्य सी बात है कि जब आप भारत के लोगों से कमाई कर रहे हैं तो आप यहां स्थित रहें या बाहर, आपको यहां के कानूनों को मानना होगा।एक मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने यह कह रखा है कि अगर आप सेवा प्रदाता हैं तो आपके कामकाज में अदालत या सरकार ही हस्तक्षेप कर सकती है। इसलिए जब भी कोई विवाद होता है, वे कह देते हैं कि जाइए अदालत से फैसला ले आइए। सभी जानते हैं कि अदालत की प्रक्रिया अपने हिसाब से चलती है, इसमें थोड़ा वक्त लग जाता है। नतीजा यह होता है कि सेवा प्रदाता कंपनियां बेखौफ होती जा रही हैं। अगर हम अपने लोगों के डाटा की सुरक्षा चाहते हैं तो इन कंपनियों के बचने के रास्तों को बंद करना होगा। इनके कामकाज को नियंत्रित करने के लिए हमें संबद्ध कानून के साथ-साथ इनकी जिम्मेदारी भी स्पष्टता के साथ तय करनी होगी।
दूसरी बात है, ऐसा कानूनी प्रावधान करना जिससे कि लोगों का डाटा देश में ही रहे, बाहर न जाए। डाटा की सुरक्षा की दृष्टि से यह जरूरी है। एक बार ऐसा हो जाने पर कंपनियों पर सीधा अंकुश लग सकेगा और डाटा के दुरुपयोग की आशंका कम हो जाएगी।
( लेखक सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता तथा साइबर कानून विशेषज्ञ हैं)


आयोग को भी निकालने होंगे नए तरीके

एस.वाई.कुरैशी
जहां तक मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की बात है, तो इसकी कोशिश तो सभी दल करते हैं और उसमें कुछ भी गलत नहीं। तमाम कंपनियां इस तरह की सेवाएं दे रही हैं। यह एक उभरता हुआ क्षेत्र है, जिसमें वैज्ञानिक तरीके से लोगों के व्यवहार का आकलन किया जाता है और फिर लक्षित लोगों की चिंताओं, उनके सरोकारों को देखते हुए मुद्दे तय किए जाते हैं, विज्ञापन बनाए जाते हैं। दिक्कत तब खड़ी होती है जब लोगों की निजी जानकारी का इस्तेमाल बगैर उनकी अनुमति हो जाए। यह निजता का उल्लंघन है, उनके साथ धोखा है। इसलिए मोटे तौर पर ऐसा करने वाली कंपनी या लोग इसी बात के लिए दोषी ठहराए जा सकते हैं।
लेकिन लोकतंत्र के लिहाज से यह खतरनाक है कि कोई सोशल मीडिया कंपनी यह तय करने लगे कि किस देश का शासन किसके हाथ में जाए और इसके लिए गैरकानूनी हथकंडे अपनाए जाएं। फेसबुक का यह विवाद वाकई चिंताजनक है क्योंकि भारत में तो कई वर्षों से चुनाव आयोग मतदाता जागरूकता के लिए उसके साथ अभियान चला रहा है। फेसबुक-कैम्ब्रिज एनालिटिका प्रकरण से ऐसा लगता है कि इसमें सोची-समझी रणनीति के अंतर्गत डाटा की चोरी हुई। डाटा की चोरी आईटी एक्ट की एक मामूली घटना हो सकती है, लेकिन अगर इसके इस्तेमाल से किसी देश की सत्ता का भविष्य तय होने लगे तो यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा होने के नाते बड़ी घटना हो जाती है। आयोग के पास धारा 171(सी) के तहत अधिकार है कि अगर कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से चुनाव को प्रभावित करने की कोशिश करता है तो वह कार्रवाई करे। लेकिन इस तरह के मामले में कार्रवाई करना आयोग के लिए बहुत मुश्किल है, क्योंकि यह कोई तात्कालिक घटना नहीं। इस तरह की घटनाओं को प्रभावी कानूनी प्रावधानों के जरिये ही रोका जा सकता है।
वैसे, चुनाव के दौरान आयोग बहुत सारे ऐसे फैसले ले लेता है जो सीधे उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं होते। जैसे, प्रचार के दौरान घरों-दफ्तरों आदि की दीवारों पर नारे लिखना या फिर प्लास्टिक का इस्तेमाल न करना। अब जबकि लोग एक छोटा सा कानूनी उल्लंघन करके बड़ी साजिश की जमीन तैयार कर ले रहे हैं, तो निष्पक्ष चुनाव कराने का उसका बुनियादी काम प्रभावित हो रहा है। ऐसे में चुनाव आयोग को भी वक्त के साथ बदलना होगा और ऐसी स्थितियों में क्या कदम उठाए जा सकते हैं, इसपर अभी से तैयारी करनी होगी क्योंकि यहां कुछ राज्यों के चुनाव और फिर लोकसभा के चुनाव होने हैं। अगर वे डाल-डाल चलेंगे तो आपको भी पात-पात चलना सीखना होगा।
( लेखक  पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त हैं)


स्टेशनों पर मुफ्त वाई-फाई
गूगल ने भारत के 500 रेलवे स्टेशनों पर मुफ्त में वाई-फाई देने का वादा किया है। यह काम दो चरणों में होगा। गूगल केवल सेवाएं देगी और जरूरी बुनियादी ढांचा सरकार को बनाना होगा।    

फेसबुक, गूगल, ट्विटर तलब  अमेरिकी सीनेट ने फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, गूगल के सीईओ सुंदर पिचई और ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी को न्यायिक आयोग के सामने 14 अप्रैल को पेश होने को कहा है।

फेसबुक-गूगल की धाक
 पिछले साल पूरी दुनिया में डिजिटल विज्ञापन में फेसबुक और गूगल का हिस्सा 20 फीसदी रहा। दोनों 100 अरब डॉलर  की कंपनी बनने की ओर हैं। इनका काफी सारा पैसा भारत से आता है।

चीन में बायडू और 360 की धूम
चीन में गूगल जैसे सर्च इंजन काम नहीं करते। वहां आॅनलाइन सर्च में बायडू और 360 का कोई मुकाबला नहीं। करीब 84 प्रतिशत खोज  इन्हीं पर होती है।

भारत में सर्वाधिक फेसबुक उपयोगकर्ता 
 जुलाई 2017 में भारत में फेसबुक उपभोक्ता की संख्या तकरीबन 24.1 करोड़ थी, जो दुनिया में सर्वाधिक है। इसके बाद अमेरिका का नंबर आता है जहां इसी अवधि में 24 करोड़ उपभोक्ता थे।

गूगल को पल-पल की जानकारी
फेसबुक के डाटा लीक के बीच गूगल का ध्यान करें तो पाएंगे कि इस सर्च इंजन को हमारे पल-पल की जानकारी रहती है। जैसे- कब कहां गए, कब क्या खोजा। आपके कम्प्यूटर-मोबाइल से ‘हिस्ट्री’ हटा देने के बाद भी गूगल के पास वह सब सुरक्षित रहता है। सोचिए, कभी इसमें कोई घपला हुआ तो क्या होगा?