गुरुवार, 21 सितंबर 2017

राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ और स्वयंसेवक


विश्व के सबसे बडे स्वंयसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वंयसेवक संघ की भारत में संघ की आवश्यता क्यों हुई और उसका स्वंयसेवक कौन है । इन प्रश्नों का संझिप्त उत्तर यह शब्द हैं।











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दृष्टी और दर्शन
दिनांक: 04-Jun-2017
प्राचीन काल से चलते आए अपने राष्ट्रजीवन पर यदि हम एक सरसरी नजर डालें तो हमें यह बोध होगा कि अपने समाज के धर्मप्रधान जीवन के कुछ संस्कार अनेक प्रकार की आपत्तियों के उपरांत भी अभी तक दिखार्इ देते हैं। यहाँ धर्म-परिपालन करनेवाले, प्रत्यक्ष अपने जीवन में उसका आचरण करनेवाले तपस्वी, त्यागी एवं ज्ञानी व्यक्ति एक अखंड परंपरा के रूप में उत्पन्न होते आए हैं। उन्हीं के कारण अपने राष्ट्र की वास्तविक रक्षा हुर्इ है और उन्हीं की प्रेरणा से राज्य-निर्माता भी उत्पन्न हुए हैं।

उस परंपरा को युगानुकूल बनाएँ
अत: हम लोगों को समझना चाहिए कि लौकिक दृष्टि से समाज को समर्थ, सुप्रतिष्ठित, सद्धर्माघिष्ठित बनाने में तभी सफल हो सकेंगे, जब उस प्राचीन परंपरा को हम लोग युगानुकूल बना, फिर से पुनरुज्जीवित कर पाएँगे। युगानुकूल कहने का यह कारण है कि प्रत्येक युग में वह परंपरा उचित रूप धारण करके खड़ी हुर्इ है। कभी केवल गिरि-कंदराओं में, अरण्यों में रहनेवाले तपस्वी हुए तो कभी योगी निकले, कभी यज्ञ-यागादि के द्वारा और कभी भगवद्-भजन करनेवाले भक्तों और संतों के द्वारा यह परंपरा अपने यहाँ चली है।

युगानुकूल सद्य: स्वरूप
आज के इस युग में जिस परिस्थिति में हम रहते हैं, ऐसे एक-एक, दो-दो, इधर-उधर बिखरे, पुनीत जीवन का आदर्श रखनेवाले उत्पन्न होकर  उनके द्वारा धर्म का ज्ञान, धर्म की प्रेरणा वितरित होने मात्र से काम नहीं होगा। आज के युग में तो राष्ट्र की रक्षा और पुन:स्थापना करने के लिए यह आवश्यक है कि धर्म के सभी प्रकार के सिद्धांतों को अंत:करण में सुव्यवस्थित ढंग से ग्रहण करते हुए अपना ऐहिक जीवन पुनीत बनाकर  चलनेवाले, और समाज को अपनी छत्र-छाया में लेकर चलने की क्षमता रखनेवाले असंख्य लोगों का सुव्यवस्थित और सुदृढ़ जीवन एक सच्चरित्र, पुनीत, धर्मश्रद्धा से परिपूरित शक्ति के रूप में प्रकट हो और वह शक्ति समाज में सर्वव्यापी बनकर खड़ी हो। यह आज के युग की आवश्यकता है।

कौन पूर्ण करेंगे
इस आवश्यकता को पूरा करनेवाला जो स्वयंस्फूर्त व्यक्ति होता है वही स्वयंसेवक होता है और ऐसे स्वयंसेवकों की संगठित शक्ति ही इस आवश्यकता को पूर्ण करेगी ऐसा संघ का विश्वास है।

स्वयंसेवक
दिनांक: 04-Jun-2017

स्वयंसेवक होने से बढ़कर गर्व और सम्मान की दूसरी बात हमारे लिए कोर्इ नहीं है। जब हम कहते हैं कि मैं एक साधारण स्वयंसेवक हूँ, तब इस दायित्व का बोध हमें अपने हदय में रखना चाहिए कि यह दायित्व बहुत बड़ा है। समाज भी हमारी ओर देख रहा है और समाज हमें एक स्वयंसेवक के रूप में देखता है। समाज की हमसे बड़ी-बड़ी अपेक्षाएँ रहें और उन अपेक्षाओं को पूर्ण करते हुए हम उनसे भी अधिक अच्छे प्रमाणित हों।
शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें
संघ-शाखा के विषय में ध्यान रखें कि हमारी शाखा निम्नलिखित अपेक्षाओं को पूर्ण करनेवाली हो
* शाखा नित्य लगनी चाहिए।
* वह निश्चित समय पर लगनी चाहिए।
* शाखा में भिन्न-भिन्न प्रकार के कार्यक्रम होने चाहिए।
* सब स्वयंसेवकों में परस्पर मेलजोल, स्नेह, प्रेम और शुद्धता का वातावरण हो।
* आपस में विचार-विनिमय, चर्चा आदि कर अपने अंत:करण में ध्येय  साक्षात्कार नित्य अधिकाधिक सुस्पष्ट और बलवान करते रहने की हमारे अंदर प्रेरणा व इच्छा रहे।
* सामूहिक रूप से नित्य अपनी प्रार्थना का उच्चारण गंभीरता, श्रद्धा तथा उसका भाव समझकर करें।
* हमारे परम पवित्र प्रतीक के रूप में जो अपना भगवा ध्वज है, उसे मिलकर नम्रतापूर्वक प्रणाम करें।
* ‘‘शाखा विकिर’ के अनंतर बैठकर आपस में बातचीत करें। कौन आया, कौन नहीं आया, इसकी पूछताछ करें।
ऐसी अपनी दैनिक शाखा के विषय में नित्य करणीय बातें हैं।
नित्य न्यूनतम कार्य
* यदि शाखा नियमित एवं समय पर प्रारंभ करनी है तो शाखा के निर्धारित समय से पर्याप्त पूर्व अपने निवास से निकलें और शाखा के समय से कम से कम दो मिनट पूर्व संघस्थान पर उपस्थित रहें।
* कोर्इ हमें बुलाने आएगा तब जाएँगे, ऐसी प्रतीक्षा करना आवश्यक नहीं है। बुलाने वाला अपना कर्तव्य करेगा, पर उसे कर्तव्य करने का अवसर देने के लिए घर पर ही बैठे रहें, यह उचित नहीं, इसका ध्यान रखें।
* विचार करें कि मैं संगठन करनेवाला मनुष्य हूँ, अकेलाराम नहीं। तब शाखा के लिए कुछ पहले निकलकर आसपास जो स्वयंसेवक रहते हों, उन्हें पुकारकर अपने साथ ले जाएँ। इसमें दायित्व का प्रश्‍न नहीं उठता। गटनायक अथवा गणशिक्षक बनने पर ही करने का काम नहीं है। सामान्य बात है कि जब भी हम किसी अच्छे काम के लिए जाते हैं, तो अपने साथ अपने मित्रों को बुलाकर ले जाते हैं। यह हमारे लिये स्वाभाविक कार्य होना चाहिए।
* संघस्थान पर सभी कार्यक्रम मन लगाकर, अनुशासनपूर्वक, नियमानुसार करें। उसमें कष्ट हो तो रुष्ट न हों। अपने कार्यक्रम कष्टकर होते हैं। कष्ट करने का अभ्यास कर बड़े-बड़े काम सहज करने की शक्ति बढ़ानी चाहिए। इसलिए उन्हें प्रयत्नपूर्वक करें। ये कार्यक्रम अंत:करण में निर्भयता, आत्मविश्‍वास, पराक्रम के भाव उत्पन्न कर सबको एक अनुशासन में गूँथकर, हम सब एक महती शक्ति के अंग हैं, इस अनुभूति को निरंतर जागृत रखने के लिए हैं। इसलिए उन कार्यक्रमों का उत्तम अभ्यास करें।
* विकिर होने पर तुरत-फुरत घर भागने की इच्छा नहीं होनी चाहिए। घर जाने अथवा और कहीं घूमने जाने की इच्छा होने का अभिप्राय होगा कि हम शाखा में अनिच्छा से बलात् आए थे। विकिर होते ही इस बला से मुक्त होने का अनुभव करते हैं। हम किसी के दबाव में शाखा नहीं आते। आना भी नहीं चाहिए। अत: बैठकर दो काम करें
        पहला यह कि शाखा में आनेवाले स्वयंसेवक बंधुओं में से कौन आए, कौन नहीं आए, इसकी जानकारी कर लें और जो नहीं आया हो, उसकी चिंता करें। वे क्यों नहीं आए इसका पता लगाने छोटी-छोटी टोलियों में सबके यहाँ जाएँ। कोर्इ कठिनार्इ हो तो उसका निवारण करने का प्रयास करें। कठिनार्इ न हो, तो अकारण शाखा से अनुपस्थित रहना ठीक नहीं यह बात उसे भली-भाँति समझाएँ।
      दूसरा यह कि नित्य अपने ध्येय का स्मरण करें। हिमालय से लेकर दक्षिणी महासागर के तट तक असंख्य पवित्र स्थान बिखरे हैं, उनका स्मरण करें। अनेक ऐतिहासिक स्थल हैं, प्रत्येक स्थल से किसी महापराक्रमी पुरुष की कुछ न कुछ विशेषता जुड़ी हुर्इ है, उसका स्मरण करें। उस महापुरुष की विशेषता में से जो गुण प्रकट होते हैं, उनका सब मिलकर स्मरण करें और उन्हें अपने में उतारने के प्रयास का निश्‍चय करें।
यह है हमारा नित्य का न्यूनतम कार्य। ‘‘साधारण स्वयंसेवक’ के रूप में इतना हमें करना ही चाहिए। इसके अतिरिक्त भी हमारे लिए कुछ कर्तव्य हैं।

पड़ोसी धर्म
अपना कुछ पड़ोस धर्म भी है। उस धर्म के अनुसार हमें यह जानकारी करनी चाहिए कि इन पड़ोसियों का जीवनयापन कैसे चलता है? उनकी कठिनाइयाँ, दु:ख क्या हैं? उनकी सहायता में तत्पर रहना पड़ोसी का धर्म है। पड़ोस में कोर्इ गड़बड़ हुर्इ, तो अपना दरवाजा अंदर से बंदकर बैठना पड़ोस-धर्म नहीं है। पड़ोस में कोर्इ अस्वस्थ हुआ तो अपने भाग्य से हुआ होगा, वह जिए चाहे मरे, ऐसा सोचकर उसकी अनदेखी करना पड़ोसी का धर्म नहीं है। इसमें पड़ोस-धर्म तो दूर की बात रही, मनुष्यता भी नहीं है। अत: पड़ोस-धर्म का पालन करने हेतु घर-घर में जाना, सबसे मिलना, बोलना, सबसे अत्यंत स्नेह और आत्मीयता के संबंध रखने का प्रयास करना और इस बात का भी कि सबके हृदय में हमारे बारे में ऐसी धारणा बने कि यह व्यक्ति विश्‍वास करने योग्य है, इसमें अपने प्रति निष्कपट, नि:स्वार्थ प्रेम है। यह अपना सच्चा मित्र है, अपने को कोर्इ कष्ट नहीं होने देगा, नित्य अपना साथ देगा और जरूरत पड़ने पर सहायता के लिए दौड़ा आएगा। इस विश्‍वास के बल पर सब पड़ोसी मानो एक बड़ा परिवार बने हैं, ऐसा हम प्रयास करें।


बुधवार, 20 सितंबर 2017

नरेंद्र मोदी की आज भारत को जरूरत है : रतन टाटा






आज भारत को है नरेंद्र मोदी की जरूरत: रतन टाटा

News18Hindi
Updated: September 20, 2017, 6:59

टाटा संस के चेयरमैन एमिरेटस रतन टाटा ने नेटवर्क 18 समूह के बिजनेस चैनल सीएनबीसी टीवी18 के साथ एक खास इंटरव्‍यू में कहा कि आज भारत को नरेंद्र मोदी की जरूरत है. मोदी ने न्यू इंडिया के लिए एक विजन क्रिएट किया है और नए भारत के निर्माण के लिए वे सभी तरह के इनोवेटिव कदम उठा रहे हैं. टाटा ने कहा कि लोगों को राजनीतिक पूर्वाग्रह से ऊपर उठकर देश के निर्माण के लिए काम करना चाहिए.

देश निर्माण में युवा दें सहयोग
टाटा ने कहा कि लोग भले ही मोदी से असहमत हो सकते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अगर भारत को इस समय किसी चीज की जरूरत है तो वह है- नरेंद्र मोदी. नए भारत के निर्माण के लिए सभी को मोदी के विजन के साथ होना चाहिए. उन्होंने उम्मीद जताई कि देश के युवा नए भारत के निर्माण में उनकी मदद करेंगे.

समूह की अधिकांश कमाई परोपकार से जुड़े कार्यों पर खर्च होती है. उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जमकर तारीफ की. उन्होंने कहा कि मैं नरेंद्र मोदी को गुजरात के मुख्यमंत्री के समय से जानता हूं. पश्चिम बंगाल के सिंगुर से फैक्ट्री को गुजरात ले जाने के क्रम में उन्होंने हमारी जिस तरह से मदद की, वह मैं नहीं भूल सकता हूं. मोदी ने हमें गुजरात बुलाया और महज तीन दिनों में वादा के अनुसार फैक्ट्री के लिए जरूरी जमीन दे दी. सरकारी स्तर पर इस तरह का निर्णय भारत में नहीं लिया जाता है.

आने वाले 10 साल में होंगे बड़े बदलाव
रतन टाटा ने कहा कि टाटा ग्रुप चंद्रा के रूप में बेहद योग्य हाथों में है. वैसे बिजनेस में उतार-चढ़ाव आते रहते हैं. ग्रुप ने घाटे में चल रही कई कंपनियों को खरीदा और आगे भी हम ऐसा करते रहेंगे. आने वाले 10 साल में शायद यह ग्रुप कुछ अलग दिखेगा. हम नए बिजनेस में उतरेंगे, नई कंपनियां बनाएंगे, हालांकि अपने मूल्यों से कभी समझौता नहीं करेंगे.

नैतिक मूल्यों से बची है कंपनी
टाटा ने कहा कि कंपनी 150 साल पूरे करने जा रही है. ऐसा नैतिक मूल्यों के कारण ही संभव हुआ है. अक्सर इतने लंबे समय में कंपनियां बिखर जाती है. टाटा ग्रुप को बचाने और आगे बढ़ाने के लिए हम कुछ भी करेंगे. अगले 30-50 साल में कुछ बदलाव आ सकते हैं. नैतिक मूल्य हमेशा बरकरार रहने की उम्मीद है. ग्रुप की ज्यादातर कमाई परोपकार पर खर्च होती है. संस्थापकों और नेताओं की जेब में नहीं कुछ नहीं जाता. ऐसा करना बेहद संतोषजनक है.

सिंगुर में हुआ था भारी विरोध
गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल के सिंगुर में टाटा की नैनो फैक्ट्री के विरोध में ममता बनर्जी की पार्टी की अगुवाई में हुए हिंसात्मक आंदोलन के बाद कंपनी को अपनी फैक्टरी के लिए जल्‍द कोई जमीन चाहिए थी.

नए भारत का निर्माण कर रहे हैं मोदी
टाटा ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नए भारत का निर्माण कर रहे हैं. इसके लिए उनमें जरूरी योग्यता और प्रतिबद्धता है और वे देश को नया स्वरूप देने के लिए इनोवेटिव पहल कर रहे हैं. हमें उनका सहयोग करना चाहिए. टाटा ने कहा कि उन्हें मोदी के नेतृत्व में पूरी आस्‍था है.

तेजी से फैसला लेते हैं मोदी
टाटा ने दिल खोलकर चैनल के साथ बातचीत की. उन्होंने टाटा ग्रुप, इकोनॉमी और राजनीति से जुड़े सभी मुद्दों पर अपने मन की बात रखी. इंटरव्यू में प्रधानमंत्री मोदी की जमकर तारीफ की और कहा कि उन्हें मोदी से बहुत उम्मीदें हैं. मोदी तेजी से फैसला लेना जानते हैं.

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

प्रधानमंत्री श्री मोदी के नेतृत्व में : पॉलिटिक्स ऑफ़ परफॉरमेंस के एक नए युग की शुरुआत - अमित शाह 


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह द्वारा रांची, झारखंड में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय का लोकार्पण और प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में दिए गए उद्बोधन के मुख्य बिंदु

शुक्रवार, 15 सितम्बर 2017


भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह द्वारा रांची, झारखंड में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय का लोकार्पण और प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन में दिए गए उद्बोधन के मुख्य बिंदु
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमने रिफॉर्म्स से भी दो कदम आगे बढ़ कर ट्रांसफॉर्मेशन अर्थात सम्पूर्ण परिवर्तन की दिशा में देश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है ***********
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने देश से परिवारवाद, जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति को ख़त्म करके पॉलिटिक्स ऑफ़ परफॉरमेंस के एक नए युग की शुरुआत की है *********** 13वें वित्त आयोग में कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने झारखंड को शेयर इन सेन्ट्रल टैक्स में 42,847 करोड़ रुपये राशि आवंटित की जबकि 14वें वित्त आयोग में मोदी सरकार ने झारखंड के 1,24,408 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है जो 13वें वित्त आयोग के मुकाबले लगभग तीन गुनी अधिक है ***********
शेयर इन सेन्ट्रल टैक्स, ग्रांट-इन ऐड, लोकल बॉडीज ग्रांट और स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड आदि के फंड को मिला दिया जाए तो मोदी सरकार ने कांग्रेस की यूपीए सरकार के 55,253 करोड़ की तुलना में झारखंड को 1,43,345 करोड़ रुपये दिया है ***********
रघुबर दास जी के नेतृत्व में झारखंड की भाजपा सरकार राज्य के विकास के लिए अहर्निश काम कर रही है ***********
झारखंड के विकास की गति पूरी दुनिया देख रही है। भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में स्थिरता एवं पारदर्शिता के साथ-साथ एक निर्णायक सरकार देने का काम किया है ***********
गरीबी उन्मूलन, जीडीपी ग्रोथ, स्वास्थ्य, साक्षरता, ग्रामीण विकास, कृषि विकास, बिजली उत्पादन एवं वितरण और बच्चों एवं माताओं की मृत्यु दर में कमी - इन सभी क्षेत्रों में भाजपा की सरकारें पहले स्थान पर हैं ***********
देश के जिन-जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां विकास तेज गति से आगे बढ़ा है। हमने विकास को विकास की पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया है ***********
भारतीय जनता पार्टी में नेता अपनी निष्ठा, देश के लिए काम करने की लगन, परिश्रम, मेधा और परफॉरमेंस के आधार पर बनते हैं, यही कारण है कि यहाँ एक बूथ कार्यकर्ता भी पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है और एक गरीब का बेटा व पार्टी का एक छोटा सा कार्यकर्ता देश का प्रधानमंत्री ***********
आज देश में लगभग 1650 छोटी-बड़ी पार्टियों में से सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके अंदर आतंरिक लोकतंत्र बचा हुआ है ***********
भारतीय जनता पार्टी की स्थापना सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से हुई थी, भारत को फिर से विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित कर देश के खोये हुए गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए हुई थी ***********
भारतीय जनता पार्टी ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता दिलाने के लिए कटिबद्ध है, कुछ ही समय में हम इस विधेयक को राज्य सभा से पारित करा कर ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने का कार्य पूरा कर लेंगे ***********
दुनिया में विरले ही ऐसे होते हैं जो देश एवं समाज के लिए अनवरत काम करते रहने के वाबजूद किसी प्रकार के यश की कामना नहीं रखते और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे *********** भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते मेरे सम्पूर्ण जीवन और आने वाले जीवन में भी सबसे बड़े गौरव की बात यह है कि मैं उस पार्टी का अध्यक्ष हूँ जिस पार्टी के अध्यक्ष कभी पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे ***********
पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय देश की राजनीति को आगे ले जाने और राजनीति को निर्मल रखने में एक बहुत बड़ा साधन सिद्ध होने वाला है ***********
भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने आज रिप्स ऑडिटोरियम, रांची (झारखंड) में पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय का लोकार्पण किया. उन्होंने इस अवसर पर आयोजित प्रबुद्ध वर्ग सम्मेलन को भी संबोधित किया और भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा, सिद्धांतों और कार्यपद्धति पर विस्तार से चर्चा की। विदित हो कि श्री शाह देश के सभी राज्यों में कुल 110 दिनों के अपने विस्तृत प्रवास कार्यक्रम के तहत तीन दिवसीय दौरे पर अभी झारखंड में हैं। इससे पहले रांची पहुँचने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष जी का भव्य स्वागत किया गया। तत्पपश्चात् श्री शाह ने बिरसा चौक पर मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अंग्रेजों से लोहा लेने वाले शौर्य और पराक्रम के परिचायक "भगवान बिरसा मुंडा जी" को श्रद्धांजलि अर्पित की। इसके पश्चात् उन्होंने 15 सिंतबर से 02 अक्टूबर तक चलने वाले "स्वच्छता पखवाड़ा" अभियान का शुभारंभ किया और वहां उपस्थित लोगों के साथ स्वच्छता की शपथ भी ली। उन्होंने प्रदेश भाजपा कार्यालय, राँची में परम श्रद्धेय डॉ.श्यामा प्रसाद मुखर्जी जी की प्रतिमा पर माल्यार्पण कर उन्हें पुष्पांजलि अर्पित की। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि दुनिया में विरले ही ऐसे होते हैं जो देश एवं समाज के लिए अनवरत काम करते रहने के वाबजूद किसी प्रकार के यश की कामना नहीं रखते और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में रहते हुए अपने लिए कुछ भी किये बगैर पंडित दीनदयाल जी ने हमेशा देश के लिए सोचा। उन्होंने कहा कि भारतीय चिंतन के आधार पर देश की राजनीति कैसे चल सकती है, लोकतंत्र को हमारे मूल विचारों के साथ कैसे समाहित किया जा सकता है, एक राजनीतिक दल को राष्ट्र के उत्थान का माध्यम कैसे बनाया जा सकता है और संगठन के आधार पर एक राजनीतिक दल को कैसे चलाया जा सकता है - इसे अल्प समय में ही पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने चरितार्थ करके दिखाया। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष के नाते मेरे सम्पूर्ण जीवन और आने वाले जीवन में भी सबसे बड़े गौरव की बात यह है कि मैं उस पार्टी का अध्यक्ष हूँ जिस पार्टी के अध्यक्ष कभी पंडित दीनदयाल उपाध्याय थे। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार और देश की 18 राज्य सरकारों ने सरकार के स्तर पर और भारतीय जनता पार्टी ने संगठन स्तर पर इस वर्ष को पंडित दीनदयाल उपाध्याय जन्म शताब्दी वर्ष के रूप में मनाने का निर्णय लिया है, केंद्र सरकार इस जन्मशताब्दी वर्ष को गरीब कल्याण वर्ष के रूप में मना रही है। उन्होंने कहा कि यह हम सबका दायित्व है कि आने वाले अनेक पीढ़ियों तक हमारी राजनीति सुदृढ़ रहे, इसके लिए न केवल भारतीय जनता पार्टी बल्कि सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले हर व्यक्ति को पंडित दीनदयाल उपाध्याय का स्मरण करना चाहिए। उन्होंने कहा कि पंडित दीनदयाल उपाध्याय सम्पूर्ण वांड्मय देश की राजनीति को आगे ले जाने और राजनीति को निर्मल रखने में एक बहुत बड़ा साधन सिद्ध होने वाला है। उन्होंने इस वांड्मय को लोगों तक पहुंचाने के लिए श्री महेश चन्द्र शर्मा एवं उनकी पूरी टीम को ह्रदय से साधुवाद दिया। श्री शाह ने कहा कि बहुपक्षीय लोकतांत्रिक संसदीय प्रणाली में किसी भी पार्टी का मूल्यांकन तीन विषयों के आधार पर हो सकता है - पार्टी का आंतरिक लोकतंत्र, पार्टी का सिद्धांत और सत्ता में आने पर सरकार की कार्यपद्धति। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है कि देश की जनता को इन आधारभूत मापदंडों पर राजनीतिक पार्टियों का तुलनात्मक अध्ययन करना चाहिए। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि आज देश में लगभग 1650 छोटी-बड़ी पार्टियों में से सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी ही एकमात्र ऐसी पार्टी है जिसके अंदर आतंरिक लोकतंत्र बचा हुआ है। उन्होंने कहा कि यदि पार्टी के अंदर ही लोकतंत्र नहीं है तो वह देश का भला नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि देश की अधिकतर पार्टियों में सबको पता है कि उसका अगला अध्यक्ष कौन होगा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस का अगला अध्यक्ष कौन होगा, जेएमएम का अगला अध्यक्ष कौन होगा, यह सबको पता है लेकिन भारतीय जनता पार्टी का अगला लक्ष्य कौन होगा, यह किसी को मालूम नहीं है क्योंकि भारतीय जनता पार्टी में अध्यक्ष वंश, जाति अथवा धर्म के आधार पर नहीं बल्कि योग्यता के आधार पर तय होते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी में नेता अपनी निष्ठा, देश के लिए काम करने की लगन, परिश्रम, मेधा और परफॉरमेंस के आधार पर बनते हैं, यही कारण है कि यहाँ एक बूथ कार्यकर्ता भी पार्टी का अध्यक्ष बन सकता है और एक गरीब का बेटा व पार्टी का एक छोटा सा कार्यकर्ता देश का प्रधानमंत्री। उन्होंने कहा कि देश में कई सारी पार्टियाँ हैं जो परिवारवाद और जातिवाद के आधार पर ही चल रही हैं। उन्होंने कहा कि मैं देश की जनता का भी आह्वान करना चाहूँगा कि वे भी ऐसे दलों को चुनें जहां आंतरिक लोकतंत्र हो। श्री शाह ने कहा कि पार्टी के मूल्यांकन का दूसरा महत्वपूर्ण मापदंड है - पार्टी का सिद्धांत। उन्होंने कहा कि जो पार्टियां सिद्धांतों के आधार पर नहीं चलती हैं, वे देश का भला नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि भारतीय जन संघ की स्थापना ही सिद्धांतों के आधार पर देश को एक वैकल्पिक नीति देने के लिए हुई थी। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि नेहरू जी के नेतृत्व में जब देश की विकास नीति, कृषि नीति, विदेश नीति, अर्थ नीति, रक्षा नीति और शिक्षा नीति का निर्माण हो रहा था तब डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी सहित कई राष्ट्र मनीषियों को लगा कि नेहरू सरकार देश के लिए जो नीतियाँ बना रही है, उन नीतियों के रास्ते पर यदि यह देश चलता रहा तो पीछे मुड़ने का भी रास्ता नहीं मिलेगा, तब उन लोगों ने एक ऐसी वैकल्पिक नीति को राष्ट्र के सामने रखने का साहस किया जिसमें देश की मिट्टी की सुगंध हो, उससे पाश्चात्य विचारों की बू न आती हो और जो नीतियाँ देश को विकास के पथ पर गतिशील करने में सहायक हो। उन्होंने कहा कि ने कहा कि 1950 से 2017 की जन संघ से भारतीय जनता पार्टी की यात्रा अंत्योदय, एकात्म मानववाद और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की यात्रा रही है और यही हमारे मूल सिद्धांत हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की स्थापना सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं बल्कि राष्ट्र के भविष्य को सुरक्षित रखने के उद्देश्य से हुई थी, भारत को फिर से विश्वगुरु के पद पर प्रतिष्ठित कर देश के खोये हुए गौरव को पुनर्स्थापित करने के लिए हुई थी। श्री शाह ने कहा कि कांग्रेस पार्टी के क्या सिद्धांत हैं, कोई नहीं बता सकता क्योंकि कांग्रेस पार्टी की स्थापना सिद्धांत के लिए हुई ही नहीं थी, आजादी प्राप्त करने के लिए हुई थी और इसमें सभी विचारधाराओं के लोग शामिल थे। उन्होंने कहा कि कांग्रेस और भारतीय जन संघ की विचारधारा में एक बड़ा मूल अंतर यह था कि कांग्रेस देश का नवनिर्माण करना चाहती थी जबकि भारतीय जन संघ देश की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत और गौरवशाली वैभव के आधार पर देश का पुनर्निर्माण करना चाहती थी। उन्होंने कहा कि जिस पार्टी का कोई सिद्धांत नहीं है, वह देश का विकास नहीं कर सकती। उन्होंने कहा कि स्थापना से लेकर आज तक हमारे नेतृत्व के जीवन का क्षण-क्षण और शरीर का कण-कण राष्ट्र-सेवा के प्रति समर्पित रहा है। उन्होंने कहा कि स्थापना से लेकर आज तक हमने जितने भी कार्यक्रम हाथ में लिए है, वे देश की समस्याओं के समाधान के लिए हैं चाहे वह कश्मीर आन्दोलन हो, कच्छ का सत्याग्रह हो, गोवा मुक्ति संग्राम हो, राम जन्मभूमि आंदोलन हो, भ्रष्टाचार के खिलाफ देश की यात्रा हो या फिर गौ-हत्या को बंद करने का आंदोलन हो। उन्होंने कहा कि आज भी हमारे पास हजारों ऐसे कार्यकर्ता हैं जो निस्वार्थ भाव से पार्टी और देश की सेवा में लगे हुए हैं। राष्ट्रीय अध्यक्ष ने कहा कि यदि हम सरकारों का मूल्यांकन करें तो यह पता चलता है कि देश में जब-जब भारतीय जनता पार्टी की सरकार आती है तो देश का विकास होता है। उन्होंने कहा कि देश ने कांग्रेस की सरकारें भी देखी, कम्युनिस्ट पार्टियों की सरकारें भी देखी, क्षेत्रीय दलों की सरकारें भी देखी और भारतीय जनता पार्टी की केंद्र और राज्य सरकारों को भी देखा, अब वक्त आ गया है कि इन सरकारों के विकास के आंकड़ों का तुलनात्मक अध्ययन किया जाए। उन्होंने कहा कि गरीबी उन्मूलन, जीडीपी ग्रोथ, स्वास्थ्य, साक्षरता, ग्रामीण विकास, कृषि विकास, बिजली उत्पादन एवं वितरण और बच्चों एवं माताओं की मृत्यु दर में कमी - इन सभी क्षेत्रों में भाजपा की सरकारें पहले स्थान पर हैं। उन्होंने कहा कि देश के जिन-जिन राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की सरकारें हैं, वहां विकास तेज गति से आगे बढ़ा है। श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमने देश को कांग्रेस के 12 लाख करोड़ रुपये के घपले-घोटाले और भ्रष्टाचार वाली सरकार की जगह एक भ्रष्टाचार-मुक्त, पारदर्शी और निर्णायक सरकार देने का काम किया है। उन्होंने कहा कि आंतरिक लोकतंत्र, पार्टी के सिद्धांत और सत्ता में आने पर सरकार की कार्यपद्धति - इन तीनों मापदंडों पर भारतीय जनता पार्टी जन-अपेक्षाओं पर खड़ी उतरी है। उन्होंने कहा कि आज पूरी दुनिया यह मानने लगी है कि भारत विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में आगे चल पड़ा है। श्री शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत दुनिया की सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्थाओं में से एक अर्थव्यवस्था बनी है। उन्होंने कहा कि साढ़े चार करोड़ से अधिक शौचालय का निर्माण कर महिलाओं को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया गया है और लगभग 29 करोड़ लोगों के बैंक अकाउंट खोल कर उन्हें देश के अर्थतंत्र की मुख्यधारा में जोड़ा गया है। उन्होंने कहा कि डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर के कारण लाभार्थियों को मिलने वाली आर्थिक सहायता सीधे उनके बैंक अकाउंट में जाती है, इससे लगभग 59,000 करोड़ रुपये की सब्सिडी का भ्रष्टाचार कम हुआ है। उन्होंने कहा कि मुद्रा बैंक योजना के माध्यम से देश के करोड़ों गरीब युवाओं को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराये गए हैं। उन्होंने कहा कि जीएसटी के रूप में ‘एक राष्ट्र, एक कर’ का स्वप्न साकार हुआ है। उन्होंने कहा कि आजादी के 70 साल बाद भी बिजली से वंचित देश के 18 हजार से अधिक गाँवों में से 13 हजार से अधिक गाँवों में बिजली पहुंचाने का काम पूरा कर लिया गया है। उन्होंने कहा कि 2018 तक हर गाँव में और 2022 तक देश के हर घर में बिजली पहुंचाने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा कि आजादी से लेकर केंद्र की यूपीए सरकार तक देश में लगभग 12.5 करोड़ गैस सिलिंडर ही बांटे गए थे जिसमें से 11.80 करोड़ कनेक्शन शहरी क्षेत्रों में बांटे गए थे। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने तीन सालों में देश के पांच करोड़ गरीब महिलाओं को गैस कनेक्शन देने का निर्णय लिया है जिसमें से देश के 2.80 करोड़ गरीब महिलाओं के घर में गैस सिलिंडर पहुंचाया जा चुका है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र की भारतीय जनता पार्टी सरकार ने देश के सोचने के स्केल को बदलने का काम किया है। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि उन्होंने कहा कि 104 उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपित कर भारत अंतरिक्ष के अंदर दुनिया की एक प्रमुख ताकत के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि 40 वर्षों से लंबित भूतपूर्व सैनिकों की ‘वन रैंक, वन पेंशन’ की मांग को एक ही साल में पूरा करके मोदी सरकार ने पूर्व सैनिकों को सम्मान के साथ जीने का अधिकार दिया है। उन्होंने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक से दुनिया का देश को देखने के नजरिये में बदलाव आया है। उन्होंने कहा कि पहले राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं थी, इसलिए दुश्मनों को उसी की भाषा में जवाब देने के फैसले नहीं लिए जाते थे। उन्होंने कहा कि सर्जिकल स्ट्राइक करके अमेरिका के बाद ऐसा साहस दिखाने का काम हिन्दुस्तान ने करके दिखाया। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने तीन सालों में देश की अर्थव्यवस्था में से काले धन के दुष्प्रभाव को काफी हद तक दूर करने में सफलता प्राप्त की है। उन्होंने कहा कि नोटबंदी, राजनीतिक चंदे में कैश के रूप में मिलने वाली रकम को 2,000 रुपये तक सीमित करने की नीति, दो लाख शेल कंपनियों के रजिस्ट्रेशन को ख़त्म करने की कार्रवाई, बेनामी संपत्ति पर नकेल और मॉरीशस-साइप्रस-सिंगापुर रूट को बंद करके मोदी सरकार ने काले धन पर कठोर प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री फसल बीमा, स्वायल हेल्थ कार्ड, नीम कोटेड यूरिया, सिंचाई योजना, ई-मंडी जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों की आय को 2022 तक दुगुना करने के लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में तेज गति से काम हो रहा है। उन्होंने कहा कि ‘भीम' एप से डिजिटल ट्रांजेक्शन को बढ़ावा दिया गया है। उन्होंने कहा कि जेनरिक दवाई, स्टैंट एवं कृत्रिम घुटनों के प्रत्यारोपण मूल्य में भारी कमी से देश के गरीब एवं मध्यम वर्ग के लोगों को फायदा पहुंचा है। श्री शाह ने कहा कि 1955 से लंबित ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने की मांग को पूरा करने का प्रयास भारतीय जनता पार्टी की मोदी सरकार ने किया है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के दोहरे रवैये के कारण ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने का विधेयक राज्य सभा से पास नहीं हो पाया। उन्होंने देश की जनता को विश्वास दिलाते हुए कहा कि भारतीय जनता पार्टी पिछड़े वर्ग को यह सम्मान दिलाने के लिए कटिबद्ध है, कुछ ही समय में हम इस विधेयक को राज्य सभा से पारित करा कर ओबीसी कमीशन को संवैधानिक मान्यता देने का कार्य पूरा कर लेंगे। उन्होंने कहा कि निष्ठा और लगन के साथ अनवरत रूप से जब देश के विकास के लिए योजनाओं को इम्प्लीमेंट किया जाता है तब जाकर तीन साल में इतने काम होते हैं। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी ने देश से परिवारवाद, जातिवाद और तुष्टीकरण की राजनीति को ख़त्म करके पॉलिटिक्स ऑफ़ परफॉरमेंस के एक नए युग की शुरुआत की है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में हमने रिफॉर्म्स से भी दो कदम आगे बढ़ कर ट्रांसफॉर्मेशन अर्थात सम्पूर्ण परिवर्तन की दिशा में देश को आगे बढ़ाने का प्रयास किया है। भाजपा अध्यक्ष ने कहा कि मोदी सरकार ने झारखंड के विकास के लिए कई कदम उठाये हैं। उन्होंने कहा कि 13वें वित्त आयोग में कांग्रेस-नीत यूपीए सरकार ने झारखंड को शेयर इन सेन्ट्रल टैक्स में 42,847 करोड़ रुपये राशि आवंटित की जबकि 14वें वित्त आयोग में मोदी सरकार ने झारखंड के 1,24,408 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की है जो 13वें वित्त आयोग के मुकाबले लगभग तीन गुनी अधिक है। उन्होंने कहा कि ग्रांट-इन ऐड को भी 6087 से बढ़ा कर 9469 करोड़ कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि 13वें वित्त आयोग में कांग्रेस सरकार ने 2014-15 में लोकल बॉडीज ग्रांट में जहां महज 1891 करोड़ रुपये दिए थे जबकि 14वें वित्त आयोग में मोदी सरकार ने केवल दो वर्षों (2015-16 aur 2016-17) में झारखंड को 7961 करोड़ रुपये आवंटित किये हैं। उन्होंने कहा कि स्टेट डिजास्टर रिस्पांस फंड को भी 1075 करोड़ से बढ़ाकर 1507 करोड़ रुपये कर दिया गया है। उन्होंने कहा कि मोदी सरकार ने इन सभी क्षेत्रों में कुल मिलाकर पिछली कांग्रेस की यूपीए सरकार के 55,253 करोड़ की तुलना में झारखंड को 1,43,345 करोड़ रुपये दिया है, इसके अतिरिक्त राज्य में 13,937 करोड़ रुपये का निवेश आया है, खदानों की नीलामी से झारखंड को 1,17,000 करोड़ रुपये अधिक आय होगी एवं उदय डिस्कॉम योजना के अंतर्गत भी झारखंड को लगभग 53,00 करोड़ रुपये की राशि आवंटित की गई है। श्री शाह ने कहा कि झारखंड में रघुबर दास जी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी सरकार राज्य के विकास के लिए अहर्निश काम कर रही है। उन्होंने कहा कि झारखंड के विकास की गति पूरी दुनिया देख रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने झारखंड में स्थिरता एवं पारदर्शिता के साथ-साथ एक निर्णायक सरकार देने का काम किया है।
 (महेंद्र पांडेय) कार्यालय सचिव

शुक्रवार, 1 सितंबर 2017

श्रीकृष्ण जलवा पूजन : डोल ग्यारस






डोल ग्यारस : श्रीकृष्ण की मूर्ति विराजेंगी 'डोल' में
श्रीकृष्ण जन्म के 18 वें दिन माता यशोदा ने उनका जलवा पूजन किया था। इसी दिन को 'डोल ग्यारस' के रूप में मनाया जाता है। जलवा पूजन के बाद ही संस्कारों की शुरुआत होती है। जलवा पूजन को कुआं पूजन भी कहा जाता है। इस ग्यारस को परिवर्तिनी एकादशी, जयझूलनी एकादशी, वामन एकादशी आदि के नाम से भी जाना जाता है।
'डोल ग्यारस' के अवसर पर कृष्ण मंदिरों में पूजा-अर्चना होती है। भगवान कृष्ण की मूर्ति को 'डोल' में विराजमान कर उनकी शोभायात्रा निकाली जाती है।
इस अवसर पर कई शहरों में मेले, चल समारोह और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन भी होता है। इसके साथ ही डोल ग्यारस पर भगवान राधा-कृष्ण के एक से बढ़कर एक नयनाभिराम विद्युत सज्जित डोल निकाले जाते हैं। इसमें साथ चल रहे अखाड़ों के उस्ताद व खलीफा तथा कलाकार अपने हैरतअंगेज प्रदर्शन से भक्तों को रोमांचित करते हैं।
ग्यारस का महत्व : शुक्ल-कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को चंद्रमा की ग्यारह कलाओं का प्रभाव जीवों पर पड़ता है। फलत: शरीर की अस्वस्थता और मन की चंचलता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है। इसी कारण उपवास द्वारा शरीर को संभालना और इष्टपूजन द्वारा मन को नियंत्रण में रखना एकादशी व्रत विधान का मुख्य रहस्य है।
इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको परिवर्तिनी एकादशी भी कहते हैं। इस दिन व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है। जो मनुष्य भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं।
एकादशी तिथि (ग्यारस) का वैसे भी सनातन धर्म में बहुत महत्‍व माना गया है। ऐसी मान्‍यता है, कि डोल ग्‍यारस का व्रत रखे बगैर जन्‍माष्‍टमी का व्रत पूर्ण नहीं होता। एकादशी तिथि में भी शुक्ल पक्ष की एकादशी को श्रेष्ठ माना गया है। शुक्ल पक्षों में भी पद्मीनी एकादशी का पुराणों में बहुत महत्व बताया गया है।
एकादशी के दिन व्रत रखकर भगवान कृष्ण की भक्ति करने का विधान है। इस व्रत में पवित्रता का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस व्रत को करने से सभी तरह की कामना पूर्ण होती है तथा रोग और शोक मिट जाते हैं।

डोल ग्यारस

डोल ग्यारस हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहा जाता है। इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं, इसीलिए यह 'परिवर्तनी एकादशी' भी कही जाती है। इसके अतिरिक्त यह एकादशी 'पद्मा एकादशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से भी जानी जाती है। इस तिथि को व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।

महत्त्व
इस तिथि पर भगवान विष्णु के वामन अवतार कि पूजा की जाती है। इस व्रत को करने से व्यक्ति के सुख, सौभाग्य में बढोतरी होती है। डोल ग्यारस के विषय में एक मान्यता है कि इस दिन माता यशोदा ने भगवान श्रीकृष्ण के वस्त्र धोये थे। इसी कारण से इस एकादशी को 'जलझूलनी एकादशी' भी कहा जाता है। मंदिरों में इस दिन भगवान विष्णु को पालकी में बिठाकर शोभा यात्रा निकाली जाती है। भगवान विष्णु की प्रतिमा को स्नान कराया जाता है। इस अवसर पर भगवान के दर्शन करने के लिये लोग सैलाब की तरह उमड़ पड़ते हैं। इस एकादशी के दिन व्रत कर भगवान विष्णु की पूजा की जाती है।

लाभ

इस तिथि को व्रत करने से वाजपेय यज्ञ के समान फल प्राप्त होता है। पापियों के पाप नाश के लिए इससे बढ़कर कोई उपाय नहीं है। जो मनुष्य इस एकादशी को भगवान विष्णु के वामन रूप की पूजा करता है, उससे तीनों लोक पूज्य होते हैं। इस व्रत के बारे में भगवान श्रीकृष्ण ने स्वयं युधिष्ठिर से कहा है कि- "जो इस दिन कमल नयन भगवान का कमल से पूजन करते हैं, वे अवश्य भगवान के समीप जाते हैं। जिसने भाद्रपद के शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत और पूजन किया, उसने ब्रह्मा, विष्णु सहित तीनों लोकों का पूजन किया। अत: हरिवासर अर्थात एकादशी का व्रत अवश्य करना चाहिए।" इस दिन भगवान करवट लेते हैं, इसलिए इसको 'परिवर्तिनी एकादशी' भी कहा जाता है।

मेले का आयोजन

'डोल ग्यारस' को राजस्थान में 'जलझूलनी एकादशी' कहा जाता है। इस अवसर पर यहाँ परगणपति पूजा, गौरी स्थापना की जाती है। इस शुभ तिथि पर यहाँ पर कई मेलों का आयोजन भी किया जाता है। मेले में ढोलक और मंजीरों का एक साथ बजना समां बांध देता है। इस अवसर पर देवी-देवताओं को नदी-तालाब के किनारे ले जाकर इनकी पूजा की जाती है। सांय काल में इन मूर्तियों को वापस ले आया जाता है। अलग-अलग शोभा यात्राएँ निकाली जाती है, जिसमें भक्तजन भजन, कीर्तन, गीत गाते हुए प्रसन्न मुद्रा में खुशी मनाते है।
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डोल ग्यारस हिन्दू धार्मिक ग्रंथों और मान्यताओं के अनुसार भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को मनाया जाता है। इस दिन भगवान विष्णु करवट बदलते हैं। इसीलिए यह 'परिवर्तनी एकादशी' भी कही जाती है। इसके अतिरिक्त यह एकादशी 'पद्मा एकादशी' और 'जलझूलनी एकादशी' के नाम से भी जानी जाती है। इस दिन को व्रत करने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है।  

भारत नव निर्माण ‘संकल्प से सिद्धि’ - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी



भारत नव निर्माण
2017 से 2022 तक, ये 5 वर्ष ‘संकल्प से सिद्धि’ के वर्ष हैं: लोकसभा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
August 09, 2017

* हमारी आजादी न केवल हमारे देश के लिए थी बल्कि इससे विश्व के अन्य भागों में भी उपनिवेशवाद का अंत करने की प्रेरणा मिली: पीएम मोदी
* भ्रष्टाचार रुपी दीमक ने हमारे देश की विकास यात्रा पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है: प्रधानमंत्री मोदी
* गरीबी, अशिक्षा और कुपोषण आज हमारे देश के सामने बड़ी चुनौतियां, हमें इसमें सकारात्मक बदलाव लाने की आवश्यकता: पीएम मोदी
* 1942 में गाँधी जी का आह्वान था - ‘करेंगे या मरेंगे’ और आज की जरुरत है - ‘करेंगे और कर के रहेंगे’: प्रधानमंत्री मोदी
* 2017 से 2022 तक, ये 5 वर्ष ‘संकल्प से सिद्धि’ के वर्ष हैं: प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी


आदरणीय अध्यक्ष महोदया, मैं आपका और सदन के सभी आदरणीय सदस्‍यों का आभार भी व्‍यक्‍त करता हूं और हम सब आज गौरव भी महसूस कर रहे हैं कि अगस्त क्रांति का, उन्‍हें स्मरण करने का, इस सदन के पवित्र स्थान पर हम लोगों को सौभाग्य मिला है। हम में से बहुत लोग हैं जिन्हें शायद अगस्त क्रांति, 9 अगस्‍त, उन घटनाओं का स्मरण होगा। लेकिन उसके बाद भी हम लोगों के लिए भी पुन: स्मरण प्रेरणा का कारण बनता है और तमाम जीवन में ऐसी महत्वपूर्ण घटनाओं का बार-बार स्मरण, जीवन की भी अच्छी घटनाओं का बार-बार स्मरण जीवन को एक नई ताकत देता है; राष्ट्र-जीवन को भी नई ताकत देता है। उसी प्रकार से हमारी जो नई पीढ़ी है, उन तक भी ये बात पहुंचाना हम लोगों का कर्तव्य रहता है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इतिहास के एक स्‍वर्णिम पृष्ठों को, उस समय के माहौल को, उस समय के हमारे महापुरुषों के बलिदान को, कर्तव्य को, सामर्थ्य को, आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाने का भी हर पीढ़ी का दायित्व रहता है।

जब अगस्त क्रांति के 25 साल हुए, 50 साल हुए, देश के सभी लोगों ने उन घटनाओं का स्मरण किया था। आज 75 साल हो रहे हैं, और मैं इसे बड़ा महत्वपूर्ण मानता हूं। और इसलिए मैं अध्यक्ष महोदया जी का आभारी हूं कि आज हमें ये अवसर मिला है।

देश के स्वतंत्रता आंदोलन में 9 अगस्त एक ऐसी अवस्था में है, इतना व्यापक, इतना तीव्र आंदोलन, अंग्रेजों ने भी कल्पना नहीं की थी।

महात्मा गांधी, वरिष्ठ नेता, सब जेल चले गए। और वही पल था कि अनेक नए नेतृत्व ने जन्म लिया। लाल बहादुर शास्त्री, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, कई अनेक youth युवा उस समय उस जो खाली जगह थी उसको भरा और आंदोलन को आगे बढ़ाया। इतिहास की ये घटनाएं हम लोगों के लिए एक नई प्रेरणा, नया सामर्थ्य, नया संकल्प, नया कृतत्व जगाने के लिए किस प्रकार से अवसर बने, ये हम लोगों का निरंतर प्रयास रहना चाहिए।

1947 में देश आजाद हुआ। एक प्रकार से 1857 से ले करके 1947 तक, आजादी के आंदोलन के अलग-अलग पड़ाव आए, अलग-अलग पराक्रम हुए, अलग-अलग बलिदान हुए; उतार-चढ़ाव भी आए। अलग-अलग मोड़ पर से ये आंदोलन गुजरा, लेकिन सैं‍तालिस की आजादी के पहले बयालिस की घटना एक प्रकार से अंतिम व्यापक आंदोलन था, अंतिम व्यापक जन-संघर्ष था और उस जन-संघर्ष ने आजादी के लिए देशवासियों को सिर्फ समय का ही इंतजार था, वो स्थिति पैदा कर दी थी। और जब हम आजादी के इस आंदोलन की ओर देखते हैं, तो nineteen forty two (1942) एक ऐसी पीठिका तैयार हुई थी, 1857 का स्वतंत्रता संग्राम, एक साथ देश के हर कोने में आजादी का बिगुल बजा था। और उसके बाद महात्मा गांधी का विदेश से लौटना, लोकमान्य तिलक का पूर्ण स्वराज्य और ‘’स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है’’ उस भाव को प्रकट करना, 1930 में महात्मा गांधी की डांडी मार्च, नेताजी सुभाष बोस द्वारा आजाद हिंद फौज की स्थापना, अनेक youth वीर भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू, चंद्रशेखर आजाद, चाफेकर बंधु, अनगिनत अपने-अपने समय पर बलिदान देते रहे। ये सारा ने एक पीठिका तैयार की और उस पीठिका का परिणाम था कि बयालिस में देश को एक उस छोर पर लाकर रख दिया कि अब नहीं तो कभी नहीं। आज नहीं होगा तो फिर कभी नहीं होगा, ये मिजाज देशवासियों का बन गया था। और इसके कारण उस आंदोलन में इस देश का छोटा-मोटा हर व्यक्ति जुड़ गया था। कभी लगता था राजाजी का आंदोलन elite class के द्वारा चल रहा है, लेकिन बयालिस की घटना, देश का कोई कोना ऐसा नहीं था, देश का कोई वर्ग ऐसा नहीं था, देश की कोई सामाजिक अवस्था ऐसी नहीं थी, कि जिसे इसे अपना न माना हो। और गांधी के शब्दों को ले करके वो चल पड़े थे। यही तो आंदोलन था, जब अंतिम स्वर में बात आई भारत छोड़ो। और सबसे बड़ी बात है महात्मा गांधी के पूरे आंदोलन में जो भाव कभी प्रकट नहीं हो सकता था, पूरे गांधी के चिंतन-मनन और विचार और आचार को देखें, उससे हट करके घटना घटी। इस महापुरुष ने कहा, करेंगे या मरेंगे। गांधी के मुंह से करेंगे या मरेंगे, शब्द देश के लिए अजूबा था। और इसलिए गांधी को भी उस समय कहना पड़ा था, और उन्होंने शब्‍द कहा था, ‘’आज से आप में हर एक को स्वयं को एक स्वतंत्र महिला या पुरुष समझना चाहिए और इस प्रकार काम करना चाहिए, मानों आप स्वतंत्र हैं। मैं पूर्ण स्वतंत्रता से कम किसी भी चीज पर संतुष्‍ट होने वाला नहीं हूं। ‘हम करेंगे या मरेंगे।’ ये बापू के शब्‍द थे और बापू ने स्पष्ट भी किया था कि मैंने मेरे अहिंसा के मार्ग को छोड़ा नहीं है। लेकिन आज स्थिति ऐसी और वो समय जन- सामान्य का दबाव ऐसा था कि बापू के लिए भी उसका नेतृत्व संभालते हुए उन जन-भावनाओं के अनुकूल इन शब्द प्रयोगों को करना हुआ था।

मैं समझता हूं कि उस समय समाज के जब सभी वर्ग जुड़ गए, गांव हो, किसान हो, मजदूर हो, टीचर हो, स्‍टूडेंट हो हर कोई इस आंदोलन के साथ जुड़ गए और करेंगे या मरेंगे और बापू तो यहां तक कहते थे कि अंग्रेजों की हिंसा के कारण कोई भी शहीद होता है तो उसके शरीर पर एक पट्टी लिखनी चाहिए करेंगे या मरेंगे और वो इस आजादी का आंदोलन का शहीद है। इस प्रकार की ऊंचाई तक इस आंदोलन को बापू ने ले जाने का प्रयास किया था और उसी का परिणाम था कि भारत गुलामी की जंजीरो से मुक्त हुआ। देश उस मुक्ति के लिए छटपटा रहा था नेता हो या नागरिक किसी की इस भावना की तीव्रता में कसु भर भी अंतर नहीं था और मैं समझता हूं देश जब उठ खड़ा होता है सामूहिकता की जब शक्ति पैदा होती है, लक्ष्य निर्धारित होता है और निर्धारित लक्ष्य  पर चलने के लिए लोग कृतसंगत होकर के चल पड़ते हैं तो 42 से 47 पांच साल के भीतर-भीतर बेडि़या चुर-चुर हो जाती हैं और मां भारती आजाद हो जाती है और इसलिए और उस समय रामवृक्ष बेनीपुरी उन्होंने एक किताब लिखी है जंजीरें और दीवारें और उस प्रस्तुति का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है “एक अद्भुत वातावरण पूरे देश में बन गया। हर व्यक्ति नेता बन गया और देश का प्रत्येक चौराहा करो या मरो आंदोलन का दफ्तर बन गया। देश ने स्वयं को क्रांति के हवन कुंड में झोंक दिया। क्रांति की ज्वाला देश भर में धू-धू कर जल रही थी। बम्बई ने रास्ता दिखा दिया। आवागमन के सारे साधन ठप हो चुके थे। कचहरियां विरान हो चली थीं। भारत के लोगों की वीरता और ब्रिटिश सरकार की नृशंसता की खबरें पहुंच रही थी। जनता ने करो या मरो के गांधीवादी मंत्र को अच्छी तरह से दिल में बैठा लिया था”।

उस समय का ये वर्णन उस किताब जब ये पढ़ते है तो चलता है कि किस प्रकार का माहौल होगा और एक वो समय था कि ये घटना ने ये बात सही है कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद जो था इसका आरंभ हिन्दुस्तान में हुआ और इस घटना के बाद उसका अंत भी हिन्दुस्तान से हुआ था।  भारत आजाद होना सिर्फ भारत की आजादी नहीं थी 1942 के बाद विश्व के जिन-जिन भू-भाग में अफ्रीका में एशिया में इस उपनिवेशवाद के खिलाफ एक ज्वाला भड़की उसकी प्रेरणा केंद्र भारत बन गया था। और इसलिए भारत सिर्फ भारत की आजादी नहीं एक आजादी की ललक विश्व के कई भागों में फैलाने में भारत के जनसामान्य का संकल्प और कतृत्वय कारण बन गया था और कोई भी भारतीय इस बात के लिए गर्व कर सकता है और उसको हमने देखा कि एक बार भारत आजाद हुआ उसके बाद एक के बाद एक उपनिवेशवाद के सारे लोगों के झंडे ढ़हते गए और आजादी सब युग तक पहुंचने लगी। कुछ ही वर्षों में दुनिया के सारे देशों में आजादी प्राप्त हो गर्इ और ये काम बताता है कि ये भारत की इच्छाशक्ति का प्रबल इच्छाशक्ति का एक उत्तमोत्तम परिणाम था, हमारे लिए सबक यही है कि जब हम एक मन करके संकल्प लेकर के पूरे सामर्थ्य के साथ निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जुड़ जाते हैं तो ये देश की ताकत है कि हम देश को संकटों से बाहर निकाल देते हैं, देश को गुलामी की जंजीरों से बाहर निकाल सकते हैं, देश को नए लक्ष्य की प्राप्ति के लिए तैयार कर सकते हैं, ये इतिहास ने बताया है और इसलिए उस समय इस पूरे आंदोलन को और पूज्य बापू के व्यक्तित्व को लगते हुए राष्ट्र कवि सोहन लाल द्विवेदी की जो कविता है बापू का सामर्थ्य क्‍या है उसको प्रकट करती है। कविता में उन्होंने कहा था

चल पड़े जिधर दो डग, मग में
चल पड़े कोटि पग उसी ओर
गड़ गई जिधर भी एक दृष्टि
गड़ गए कोटि दृग उसी ओर

जिस तरफ गांधी के दो कदम चले थे उस तरफ अपने-आप करोड़ो लोग चल पड़ते थे, जिधर गांधी जी की दृष्टि टिक जाती थी उधर करोड़ो करोड़ आंखें देखने लग जाती थी और इसलिए इस महान व्यक्तित्व ने लेकिन आज जब हम 2017 में हैं हम इस बात से इंकार नहीं कर सकते कि आज हमारे पास गांधी नहीं है आज हमारे पास उस समय जो ऊंचाई वाला नेतृत्व था वो आज हमारे पास नहीं है लेकिन सवा सौ करोड़ देशवासियों के विश्वास के साथ बैठे हुए हम सब लोग मिलकर के उन सपनों को पूरा करने का प्रयास करें तो मैं मानता हूं कि गांधी के सपनों को उन स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों को पूरा करना मुश्किल काम नहीं है और आज आज का ये अवसर किसी बात के लिए हमें उस समय भी जो वैश्विक हालात थे 1942 में भारत की आजादी के लिए बहुत अनुकूल माहौल थे जो भी इतिहास से परिचित है उसे मालूम है मैं समझता हूं आज फिर से एक बार 2017 में जबकि Quit India Movement हम 75 साल मना रहे है उस समय विश्व में वो अनुकूलता है जो भारत के लिए बहुत सहानुकूल है और अनुकूल व्यवस्था का फायदा हम जितना जल्दी उठा दें जैसे उस समय विश्व के कई देशों के लिए हम प्रेरणा का कारण बने थे अगर आज हम मौका ले लें तो आज फिर से एक बार हम विश्व के कई देशों के लिए उपयोगी हो सकते हैं प्रेरणा का कारण बन सकते हैं, ऐसे मोड़ पर आज हम खड़े हैं 1942 & 2017 इस दोनों में वैश्विक परिवेश में भारत का महात्मय, भारत के लिए अवसर समान रूप से खड़ें हैं और उस समय हम इस बात को कैसे लें, हम उसकी जिम्मेवारी कैसे लें मैं मानता हूं इतिहास के इन प्रकरणों से सामर्थ्य से प्रेरणा लेकर के हमारे लिए दल से बड़ा देश होता है राजनीति से ऊपर राष्ट्नीति होती है मेरे अपने ऊपर सवा सौ करोड़ देशवासी होते हैं अगर उस भाव को लेकर के हम उड़ चले हम सब मिलकर के आगे बढ़ें तो हम इन समस्याओं के खिलाफ सफलतापूर्वक आगे बढ़ सकते हैं हम इस बात से इंकार कैसे कर सकते हैं कि भ्रष्‍टाचार रूपी दीमक ने देश को कैसे तबाह करके रखा हुआ है। राजनीतिक भ्रष्टाचार हो, सामाजिक भ्रष्टाचार हो या व्यक्तिगत भ्रष्टाचार हो कल क्या हुआ कब किसने किया उसके लिए विवाद के लिए समय बहुत होते हैं लेकिन आज पवित्र पल हम आगे तो ईमानदारी का उत्सव मना सकते हैं ईमानदारी का संकल्प लेकर के देश का नेतृत्व कर सकते हैं क्या देश को ले जा सकते हैं ये समय की मांग है देश के सामान्य मानवीकी की मांग है, गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा ये हमारे सामने चुनौतियां हैं इन चुनौतियों को हम सरकार की चुनौतियां न माने वो चुनौतिया देश की है देश की गरीब  के सामने संकट भरे सवाल खड़े हैं और इसलिए देश के लिए जीने मरने वाले देश के लिए संकल्प करने वाले हम सब लोगों का दायित्व बनता है इसको पूरा करने के लिए हम कुछ मुद्दों पर 1942 में भी अलग-अलग धारा के लोग थे। हिंसा में विश्वास करने वाले भी लोग थे नेता जी सुभाष बाबू की सोच अलग थी लेकिन 1942 में सबने एक स्वर से कह दिया था आपको गांधी के नेतृत्व में Quit India यही हमारा मार्ग है। हमारे भी लालन-पालन विचारधारा अलग-अलग रही होगी। लेकिन ये समय की मांग है कि हम कुछ बिंदुओं से देश को मुक्त कराने के लिए संकल्प का अवसर लेकर के चले चाहे गरीबी हो, भूखमरी हो, अशिक्षा हो अंत स्‍वत: हो। महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज का सपना कितना पीछे छूट गया क्या कारण है कि गांव लोग छोड़ छोड़ कर के शहरो की ओर बस रहे है। गांव की उस चिंता को गांधी के मन में जो गांव था क्या हम हमारे भीतर उसको पुर्नजीवित कर सकते हैं क्या गांव गरीब किसान दलित पीढ़ी शोषित वंचित उसके जीवन के लिए अगर हम कुछ कर सकते हैं मिलकर के करना हैं ये सवाल मेरा और तेरा नहीं है ये सवाल इस पार और उस पार का नहीं है ये हम सबका है सवा सौ करोड़़ देशवासियों का है। सवा सौ करोड़़ देशवासी के जन‍प्रतिनिधि का है और यही तो समय होता है जब वो प्रेरणा हम लोगों को कुछ कर लेने की शक्ति देती है और उसको लेकर के हम आगे चल सकते हैं हम ये भी जानते हैं देश में जाने अनजाने में अधिकार भाव प्रबल होता चला गया, कर्तव्य भाव लुप्त होता गया। राष्ट्रजीवन के अंदर, समाज जीवन के अंदर अधिकार भाव का महात्म्य उतना ही रहते हुए भी अगर कर्तव्य भाव को थोड़ा सा भी हम कम आंकने लगेगे तो समाज जीवन में कितनी बड़ी मुसीबते होती हैं और दुर्भाग्य से हम लोगों का way of life हमारे चरित्र में कुछ चीजें घुस गई हैं जिसमें हमें बुराई नहीं लगता है मैं गलत कर रहा हूं अगर मैं चौराहे पर red light cross करके निकल जाता हूं तो मुझे लगता ही नहीं कि मैं कानून तोड़ रहा हूं मैं कहीं पर थूक देता हूं गंदगी करता हूं हमें लगता ही नहीं कि मैं गलत कर रहा हूं हम अपने कर्तव्य भाव से एक प्रकार से हमारे जहन में हमारे way of life में इस प्रकार के नियमों को तोड़ना कानूनों को तोड़ना ये स्वभाव बनता चला गया। छोटी-छोटी घटनाएं हिंसा की ओर ले जा रही हैं अस्पताल में किसी डाक्टर के द्वारा कुछ पेशेन्ट का कुछ हुआ डाक्टर दोषी है नहीं है, अस्पताल दोषी हैं नहीं हैं, रिश्तेदार जाते हैं अस्पताल को आग लगा देते हैं। डाक्टर को मारते हैं पीटते हैं हर छोटी-मोटी घटना अगर एक्सीडेन्ट हो गया हम कार को जला देते हैं ड्राइवर को मार देते हैं। ये जो चला है ये हम law of abiding citizen  के नाते हमारा कर्तव्य होना चाहिए हम मानने लगे हैं कि हमारे से कुछ छूट गया है। हमारी way of life में कुछ ऐसी चीजें घुस गई हैं जैसे हमें लगता ही नहीं है कि हम कानून तोड़ रहे हैं और इसलिए ये leadership की जिम्मेवारी होती है कि समाज के अंदर हम सबकी जिम्मेवारी होती है कि हम समाज के अंदर इन दोषों से मुक्ति दिलाकर के समाज के अंदर कर्तव्य भाव को जगाए!

शौचालय स्वच्छता ये विषय मजाक के नहीं हैं उन मां बहनों की परेशानी समझो तब पता चलता है कि जब शौचालय नहीं होता तो रात के अंधेरे का इंतजार का समय दिन कैसे बिताना पड़ता है और इसलिए शौचालय बनाना एक काम है लेकिन समाज की मानसिकता बदल कर के शौचालय का उपयोग करना ये जनसामान्य की शिक्षा के लिए आवश्यक है इस बात को हमें जगाना होगा और ये भाव कानूनों से नहीं होता है, कानून बनाने से नहीं होता है कानून सिर्फ मदद कर सकता है लेकिन कर्तव्य भाव जगाने से ज्यादा हो सकता है और इसलिए हम लोगों को करना होगा। हमारे देश की माताएं बहनें देश के अंदर कम से कम देश पर जो उनका बोझ है।

देश को कम से कम जिनका बोझ सहना पडता है, वो अगर कोई वर्ग है तो इस देश की माताएं, बहनें हैं, महिलाएं हैं। उनका सामर्थ्य हमें कितनी ताकत दे सकता है, उनकी भागीदारी हमारे विकास के अंदर हमें कितना बल दे सकती है। पूरे आजादी के आंदोलन में देखिए महात्मा गांधी के साथ आंदोलन ये जहां-जहां हुआ, अनेक ऐसी माताएं-बहनें उस आंदोनल का नेतृत्व करती थीं और देश को आजादी दिलाने में भी हमारी माताओं-बहनों का उस युग में भी उतना ही योगदान था। आज भी राष्ट्र के जीवन में उनका उतना ही योगदान है। उसको आगे बढ़ाने की दिशा में हम लोगों ने कर्तव्य से आगे बढ़ना चाहिए।

ये बात सही है कि 1857 से 1942, हमने देखा कि आजादी का आंदोलन अलग-अलग पड़ाव से गुजरा, उतार-चढ़ाव आए, अलग-अलग मोड़ आए, नेतृत्व नए-नए आते गए, कभी क्रांति का पक्ष ऊपर हो गया तो कभी अहिंसा का पक्ष ऊपर हो गया। कभी दोनों धाराओं के बीच टकराव का भी माहौल रहा, कभी दोनों धाराएं एक-दूसरे को पूरक भी हुईं। लेकिन हमने देखा है, लेकिन ये सारा 1857 से 1942 का कालखंड हम देखें, एक प्रकार से incremental था। धीरे-धीरे बढ़ रहा था, धीरे-धीरे फैल रहा था, धीरे-धीरे लोग जुड़ रहे थे। लेकिन Nineteen Forty Two to Nineteen Forty Seven, वो incremental change नहीं था। एक disruption का environment था और उसने सारे समीकरणों को खत्म करके आजादी देने के लिए अंग्रेजों को मजबूर कर दिया, जाने के लिए मजबूर कर दिया। 1857 से 1942, धीरे-धीरे कुछ होता रहता था, चलता रहता था, लेकिन Forty Two से Forty Seven, वो स्थिति नहीं थी।

हम भी देखें, समाज जीवन में हम पिछले 100, 200 साल का इतिहास देखें तो विकास की यात्रा एक incremental रही थी। धीरे-धीरे दुनिया आगे बढ़ रही थी, धीरे-धीरे दुनिया अपने-आपको बदल रही थी। लेकिन पिछले 30-40 साल में दुनिया में अचानक बदलाव आया, जीवन में अचानक बदलाव आया और technology ने बहुत बड़ा roll play किया। कोई कल्पना नहीं कर सकता जो इस 30-40 साल में दुनिया में जो बदलाव आया है, व्यक्ति के जीवन में, मानव-जीवन में, सोच में जो बदलाव आया है; 30-40 साल पहले हमें नजर भी नहीं आता था। एक disruption वाला एक positive change हम अनुभव करते हैं।

जिस प्रकार से Incremental से बाहर निकल करके एकदम से एक high jump की तरफ चले गए, मैं समझता हूं 2017 - 2022, Quit India के 75 साल और आजादी के 75 साल के बीच का पांच साल, Forty Two to Forty Seven का जो मिजाज था, वही मिजाज अगर हम दोबारा देश में पैदा करें Two Thousand Seventeen to Two Thousand Twenty Two, आजादी के 75 साल मनाएंगे तब, तब हम देश के, हमारे आजादी के वीरों की जो कामनाएं थीं, उन सपनों को पूरा करने के लिए हम अपने-आपको खपाएंगे। हम अपने संकल्प को ले करके आगे चलेंगे। मुझे विश्वास है न सिर्फ हमारे देश का ही भला होगा, लेकिन जैसे Forty two to Forty seven की सफलता के कारण दुनिया के अनेक देशों को लाभ मिला, आजादी की ललक पैदा हुई, ताकत मिली, भारत को आज दुनिया के कई देश, एक भाग ऐसा है जो भारत को उस रूप में देख रहा है। अगर हम भारत को Two thousand Seventeen to Two thousand Twenty Two, जो कि हम लोगों की जिम्‍मेवारी का कालखंड है, अगर हम विश्व के सामने भारत को उस ऊंचाई पर लेके जाते हैं तो विश्व का एक बहुत बड़ा समुदाय है, जो कि नेतृत्व की तलाश में, मदद की तलाश में है, किसी के प्रयोगों से सीखना चाहता है; भारत उस पूर्ति के लिए सामर्थ्यवान है; अगर उसको करने के लिए हम कोशिश करें, मैं समझता हूं देश की बहुत बड़ी सेवा होगी। और इसलिए एक सामूहिक इच्छा-शक्ति जगाना, देश को संकल्पबद्ध करना, देश के लोगों को साथ जोड़ करके चलना और इन पांच वर्ष के महत्व को हम अगर आगे बढ़ाएंगे तो मुझे विश्वास है कि हम कुछ मुद्दों पर सहमति बना करके बहुत बड़ा काम कर सकते हैं।

हमने अभी-अभी देखा जीएसटी, और ये मैं बार-बार कहता हूं ये मेरा सिर्फ राजनीतिक statement नहीं है, ये मेरा conviction है। जीएसटी की सफलता किसी सरकार की सफलता नहीं है, जीएसटी की सफलता किसी दल की सफलता नहीं है। जीएसटी की सफलता इस सदन में बैठे हुए लोगों की इच्छाशक्ति का परिणाम है। चाहे यहां बैठे हों, चाहे वहां बैठे हों, ये सबको जाता है, राज्यों को जाता है, देश के सामान्य व्यापारी को जाता है; और उसी के कारण ये संभव हुआ है। जो देश के राजनीतिक नेतृत्व  अपनी प्रतिबद्धता के कारण इतना बड़ा काम कर लेती है, दुनिया के लिए अजूबा है। जीएसटी विश्व के लिए बहुत बड़ा अजूबा है, उसके Scale को देख करके हुए, अगर ये देश ये कर सकता है, तो और भी सारे निर्णय ये देख मिल-बैठ करके कर सकता है। और सवा सौ करोड़ देशवासियों के प्रतिनिधि के रूप में, सवा सौ करोड़ देशवासियों को साथ ले करके 2022 को संकल्प ले करके अगर हम चलेंगे, मुझे विश्वास है कि जो परिणाम हमें लाना है, और वो परिणाम हम लाके रहेंगे।

महात्मा गांधी ने नारा दिया था करो या मरो, उस समय का सूत्र था, करेंगे या मरेंगे। आज 2017 में 2022 को भारत कैसे हो, ये संकल्प ले करके अगर चलना है, तो हम लोगों को भी हम सब मिल करके देश से भ्रष्टाचार दूर करेंगे और करके रहेंगे। हम सभी मिलकर गरीबों को उनका अधिकार दिलाएंगे, और दिलाकर रहेंगे। हम सभी मिलकर नौजवानों को स्वरोजगार के और अवसर देंगे और देकर रहेंगे। हम सभी मिलकर देश से कुपोषण की समस्या को खत्म करेंगे और करके रहेंगे। हम सभी मिलकर महिलाओं को आगे बढ़ने से रोकने वाली बेड़ियों को खत्म करेंगे और करके रहेंगे। हम सभी मिलकर देश से अशिक्षा खत्म करेंगे और करके रहेंगे। और कोई भी बहुत विषय हो सकते हैं, लेकिन अगर उस समय का मंत्र था करेंगे या मरेंगे, तो आजाद हिन्दुस्तान में 75 साल बाद आजादी का पर्व मनाने की ओर आगे बढ़ रहे हैं तब करेंगे और करके रहेंगे, इस संकल्प को ले करके हम आगे बढ़ेंगे। ये संकल्प किसी दल का नहीं, ये संकल्प किसी सरकार का नहीं, ये संकल्प सवा सौ करोड़ देशवासी, सवा सौ करोड़ देशवासियों के जन-प्रतिनिधि, इन सबका मिल करके जब संकल्प बनेगा तो मुझे विश्वास है संकल्प से सिद्धि के ये पांच साल, 2017 से 2022, आजादी के 75 साल, आजादी के दीवानों को सपना पूरा करने का सामर्थ्यवान समय, इसको हम प्रेरणा का कारण बनाएं। आज अगस्त क्रांति दिवस पर उन महापुरुषों का स्मरण करते हुए, उनके त्याग, तपस्या, बलिदान का स्मरण करते हुए, उस पुण्य  स्मरण से आशीर्वाद मांगते हुए, हम सब मिल करके, कुछ बातों पर सहमति बना करके देश का नेतृत्व दें, देश को समस्याओं से मुक्त करें। सपने, सामर्थ्य, शक्ति और लक्ष्य की पूर्ति के लिए आगे बढ़ें, इसी एक अपेक्षा के साथ मैं फिर एक बार अध्यक्ष महोदया जी, मैं आपका आभार व्यक्त करता हूं और आजादी के दीवानों को नमन करता हूं।

मंगलवार, 22 अगस्त 2017

तीन तलाक की प्रथा खारिज : सुप्रीम कोर्ट

तीन तलाक: 5 धर्मों के हैं फैसला सुनाने वाले जज, पढ़ें उनकी खासियत अौर जजमेंट, national news in hindi, national news


तीन तलाक के खिलाफ पहली जंग छेड़ने वाली शायरा बानो को तलाकनाम टेलीग्राम से भेजा गया था।

नई दिल्ली. पहले 1985 और अब 2017। 32 साल में दो बार ऐसे मौके आए जब तीन तलाक की विक्टिम महिलाओं के फेवर में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया। मुस्लिमों में तीन तलाक एक ऐसी प्रथा है जिसके तहत कोई भी शख्स पत्नी को तीन बार तलाक बोलकर उसे छोड़ सकता है। इस प्रथा के खिलाफ ताजा मामले में 38 साल की शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। शायरा को उनके पति ने टेलीग्राम से तलाकनामा भेजा था। उनके दो बच्चे हैं, लेकिन वे एक साल से उन्हें देखने को तरस रही हैं। शायरा की पिटीशन पर मंगलवार को फैसला आया। बेंच ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इससे पहले 1985 में सुप्रीम कोर्ट ने शाहबानो के फेवर में फैसला सुनाया था।


दोनों केस में क्या फर्क?    शाहबानो                               शायरा बानो केस
किसे चैलेंज       तीन तलाक के बाद कम गुजारा भत्ता तलाक-ए-बिद्दत
SC में कब पहुंचा केस 1981                                     2016
कब आया फैसला         1985                                             2017
क्या आया फैसला तीन तलाक में भी महिला गुजारे भत्ते की हकदार तीन तलाक असंवैधानिक
केंद्र सरकार का रोल कानून बनाकर फैसला पलटा नया कानून बनाना है
क्या था शाहबानो केस?
- लॉ एक्सपर्ट संदीप शर्मा ने DainikBhaskar.com को बताया- ''इंदौर की रहने वाली शाहबानो 62 साल की थीं जब उनके तीन तलाक का मामला नेशनल डिबेट बना था। शाहबानो के 5 बच्चे थे। उनके पति ने 1978 में उन्हें तलाक दिया था। पति से गुजारा भत्ता पाने का मामला 1981 में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। पति का कहना था कि वह शाहबानो को गुजारा भत्ता देने के लिए बाध्य नहीं है।'' 
- ''सुप्रीम कोर्ट ने 1985 में सीआरपीसी की धारा-125 पर फैसला दिया। यह धारा तलाक के केस में गुजारा भत्ता तय करने से जुड़ी है। सुप्रीम कोर्ट ने सीआरपीसी की धारा 125 के तहत शाहबानो को बढ़ा हुआ गुजारा भत्ता देने के मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।'' 
- ''जब देश में इसका विरोध हुआ तो उस वक्त की राजीव गांधी सरकार ने 1986 में एक कानून बनाया। यह कानून द मुस्लिम वुमन प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स एक्ट 1986 कहलाया। इसने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को डाइल्यूट कर दिया। कानून के तहत महिलाओं को सिर्फ इद्दत (सेपरेशन के वक्त) के दौरान ही गुजारा भत्ता मांगने की इजाजत मिली। यह कानून सीआरपीसी की धारा-125 के खिलाफ था।''
32 साल बाद शायरा बानो के केस से आया बदलाव
- फरवरी 2016 में उत्तराखंड के काशीपुर की रहने वाली शायरा बानो (38) पहली महिला बनीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह (polygamy) और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की।
- शायरा ने DainikBhaskar.com को बताया, ''जजमेंट का स्वागत और समर्थन करती हूं। मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत ऐतिहासिक दिन है। कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को बेहतर दिशा दे दी है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। समाज आसानी से इसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी लड़ाई बाकी है। इस फैसले से मुस्लिम समाज की महिलाओं को प्रताड़ना, शोषण और दुखों से आजादी मिलेगी। पुरुषों को महिलाओं के हालात को देखते हुए इसे स्वीकार करना चाहिए।''
- शायरा की शादी 2002 में इलाहाबाद के एक प्रॉपर्टी डीलर से हुई थी। उनके साथ जल्द की परेशानी शुरू हो गई। ससुराल वाले उनसे फोर व्हीलर की मांग करने लगे। वे उनसे चार-पांच लाख रुपए कैश चाहते थे। उनकी माली हालत ऐसी नहीं थी कि मांग पूरी कर सकें। उनकी और भी बहनें थीं।
- शायरा के दो बच्चे हैं। 13 साल का बेटा और 11 साल की बेटी। शायरा का आरोप है कि शादी के बाद उन्हें हर दिन पीटा जाता था। पति हर दिन छोटी-छोटी बातों पर झगड़ा करता था। बहुत ज्यादा बहस करना और झगड़ना उसकी आदत में शामिल था।
- शायरा बानो ने सुप्रीम कोर्ट में निकाह हलाला की रिवाज को भी चैलेंज किया। इसके तहत मुस्लिम महिलाओं को अपने पहले पति के साथ रहने के लिए दूसरे शख्स से दोबारा शादी करनी होती है। वे मुस्लिमों में बहुविवाह को भी गैर-कानूनी बनाने की मांग कर रही हैं।
छह बार करवाया अबॉर्शन
- आरोप है कि रिजवान से शादी के बाद शायरा को गर्भनिरोधक (contraceptives) लेने को कहा गया, जिसकी वजह से वे काफी बीमार हो गईं। यह भी आरोप है कि पति ने उनका छह बार अबॉर्शन करवाया। पिछले साल अप्रैल में वे अपने पैरेंट्स के घर लौट गईं। अक्टूबर में उन्हें टेलीग्राम के जरिए तलाकनामा भेजा गया। वे एक मुफ्ती के पास गईं तो उन्होंने कहा कि टेलीग्राम से भेजा गया तलाक जायज है।
- शायरा के बच्चे रिजवान के साथ रहे हैं। वे उन्हें देखने के लिए एक साल से तरस रही हैं। शायरा का कहना है कि उन्हें बच्चों से फोन पर भी बात नहीं करने दी जाती।
- शायरा का कहना है कि वे इस जंग में पीछे हटने वाली नहीं हैं। उनका यह कदम दूसरी महिलाअों के लिए मददगार होगा।
हक की लड़ाई लड़ने वाली महिलाएं और भी हैं
1) अाफरीन रहमान
- जयपुर की रहने वाली 28 साल की अाफरीन रहमान एमबीए-ग्रेजुएट हैं। मेट्रीमोनियल वेबसाइट की मदद से 2014 में उनकी शादी इंदौर के वकील से हुई। 
- अाफरीन के मुताबिक, उनकी चार बहनें हैं और उनकी शादी के लिए भाई ने 25 लाख का लोन लिया था।
- आफरीन का आरोप है कि शादी के बाद उन्हें दहेज के लिए ससुराल में पीटा जाता था। उन्होंने इन जुल्मों के बारे में अपने मायके वालों को नहीं बताया, क्योंकि उन पर पहले से ही बैंक का कर्ज था। इससे वे और तनाव में आ जाते।
ज्वाइन किया भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन
- आफरीन को अगस्त 2015 में पति ने घर से निकाल दिया। मायके वालों की गुजारिश पर नौ दिन बाद वापस ले गया, लेकिन अगले ही महीने फिर वापस भेज दिया। 
- अक्टूबर में आफरीन की मां की बस एक्सीडेंट में मौत हो गई तो उनका पति हमदर्दी जताने के लिए कुछ दिन आया, फिर बातचीत बंद कर दी। फोन और सोशल मीडिया पर भी कोई बात नहीं करता। जनवरी में उनके पास स्पीड पोस्ट से एक लिफाफा आया। खोला तो देखकर दंग रह गई। यह तलाकनामा था। इसमें तलाक की वजह भी नहीं बताई गई थी। 
- इसके बाद आफरीन भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन से जुड़ीं। शायरा और दूसरी सताई हुई महिलाओं से इंस्पायर होकर उन्होंने भी कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
2) जकिया रहमान और नूरजहां सैफिया नियाज
- ये दोनों "भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन" की फाउंडर हैं। 2007 में बनाए गए इस एनजीओ से अब तक 15 राज्यों की 30 हजार महिलाएं जुड़ चुकी हैं। 
- यह संगठन मस्जिदों और मुंबई की हाजी अली दरगाह में मुस्लिम महिलाओं की एंट्री की मांग करके चर्चा में आया। 
- इस एनजीओ ने पिछले साल देश का पहला मुस्लिम महिलाओं का सर्वे करवाया, जिसमें दावा किया गया कि देश की 92% मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक पर रोक चाहती हैं। 
- एनजीओ ने अपने इस कैम्पेन के पक्ष में चलाई गई ऑनलाइन पिटीशन पर 50 हजार लोगों ने दस्तखत किए थे। इनमें महिला और पुरुष दोनों शामिल थे। 
- इस आंदोलन के तहत "शरिया अदालतों" या शरिया पर आधारित अनौपचारिक (informal) अदालतों का आयोजन भी किया जाता है। इनमें मुस्लिम महिलाएं अपनी घरेलू दिक्कतें पुरुष काजियों (इस्लामिक जजों) के सामने रखती हैं।
3) इशरत जहां
- 30 साल की इशरत जहां वेस्ट बंगाल के हावड़ा की रहने वाली हैं। उन्होंने कोर्ट में कहा है कि उनकी शादी 2001 में हुई थी। उनके बच्चे भी हैं, जिन्हें पति ने जबर्दस्त अपने पास रखा है।
- उन्होंने अपनी पिटीशन में बच्चों को वापस दिलाने और उसे पुलिस सुरक्षा दिलाने की मांग की। इशरत ने कहा है कि उसके पति ने दूसरी शादी कर ली है। यह भी कहा कि ट्रिपल तलाक गैरकानूनी है और मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन है।
4) गुलशन परवीन, अतिया साबरी
- गुलशन परवीन उत्तर प्रदेश के रामपुर की और अतिया साबरी उत्तर प्रदेश के ही सहारनपुर की रहने वाली हैं। इन्होंने भी तीन तलाक को कोर्ट में चैलेंज किया है। बता दें कि अतिया इस मामले में आखिरी पिटीशनर हैं।



शाहबानो से शायरा बानो तक तीन तलाक के खिलाफ 32 साल से जारी है लड़ाई, national news in hindi, national news



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तीन तलाक: 5 धर्मों के हैं फैसला सुनाने वाले जज, पढ़ें उनकी खासियत अौर जजमेंट

DainikBhaskar.com | - Aug 22, 2017

1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा को खारिज कर देने का फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के जज अलग-अलग धर्मों के हैं।

नई दिल्ली.1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा को खारिज कर देने का फैसला सुनाने वाले सुप्रीम कोर्ट के पांच जज पांच अलग-अलग धर्मों के हैं। 18 महीने पहले दायर हुई पिटीशन पर फैसला सुनाने वाली बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर (सिख), कुरियन जोसफ (इसाई), आरएफ नरीमन (पारसी), यूयू ललित (हिंदू) और अब्दुल नजीर (मुस्लिम) शामिल थे। बेंच ने फैसला 3:2 की मेजॉरिटी से सुनाया है। चीफ जस्टिस खेहर 27 अगस्त को रिटायर हो रहे हैं। वहीं, जस्टिस नरीमन ऐसे जज हैं जो सुप्रीम कोर्ट में वकालत भी कर चुके हैं। उनके टैलेंट को देखते हुए नियमों में बदलाव कर उन्हें सीनियर काउंसिल अप्वाइंट किया गया था। वहीं, जस्टिस कुरियन जोसफ वही जज हैं जिन्होंने जजों के सम्मान में दिए गए प्रधानमंत्री के डिनर में शामिल होने से इनकार कर दिया था।
1) चीफ जस्टिस
कौन जस्टिस जेएस खेहर?
जस्टिस खेहर का जन्म 28 अगस्त 1952 को चंडीगढ़ में हुआ। 1999 में वे पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के जज बने। 2009 में उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने। 2010 में उन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट का चीफ जस्टिस बनाया गया। 2011 में उन्हें सुप्रीम कोर्ट का जज बनाया गया। जनवरी 2017 में वे सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बने।
हिम्मतवाले जज
तीन तलाक पर 5 जजों की बेंच की अगुआई जस्टिस खेहर ही कर रहे थे। जस्टिस खेहर जजों की नियुक्ति के लिए नेशनल ज्युडिशियल अपॉइंटमेंट कमीशन बनाने के केंद्र के फैसले को खारिज कर चुके हैं। उन्होंने ही सहारा प्रमुख को जेल भेजने और अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन को खत्म कर कांग्रेस की सरकार बहाल करने जैसे फैसले सुनाए हैं। सहारा मामले की सुनवाई कर रही बेंच में रहे जस्टिस केएस राधाकृष्णन ने अपने रिटायरमेंट पर कहा था कि जस्टिस खेहर जैसा हिम्मतवाला जज उन्होंने नहीं देखा।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार देने के विरोध में फैसला दिया था।
- उन्होंने कहा- ‘‘तलाक-ए-बिद्दत संविधान के आर्टिकल 14, 15, 21 और 25 का वॉयलेशन नहीं करता। सरकार छह महीने में कानून बनाए। छह महीने तक मुस्लिम तीन तलाक का इस्तेमाल नहीं कर सकेंगे।’’
- दोनों जजों ने कहा- भारत में सती, देवदासी और बहुविवाह जैसी प्रथाएं बंद करने के पर्सनल लॉ से जुड़े सुधार कानूनी दखल के जरिए ही हुए हैं। जब दुनियाभर के मुस्लिम देशों ने सुधार के कदम उठा लिए हैं तो आजाद भारत को क्यों पीछे रहना चाहिए?
2) जस्टिस कुरियन जोसेफ
कौन हैं जस्टिस जोसेफ?
- 30 नवंबर 1953 में जन्मे जस्टिस कुरियन जोसेफ ने लॉ की पढ़ाई के बाद 1979 में केरल हाईकोर्ट में प्रैक्टिस शुरू की थी।
- वे दो बार केरल हाईकोर्ट के एक्टिंग चीफ जस्टिस रहे। मार्च 2013 में सुप्रीम कोर्ट के जज बने। वे नवंबर 2018 तक सुप्रीम कोर्ट के जज रहेंगे।
इन्होंने मोदी के न्योते को नकारा था
- अप्रैल 2015 में सरकार ने जजों और चीफ मिनिस्टर्स की ज्वाइंट कॉन्फ्रेंस रखी। तीन दिन की यह कॉन्फ्रेंस उस वीकेंड पर रखी गई जब गुड फ्रायडे और ईस्टर आने वाला था। जस्टिस जोसेफ ने उस वक्त चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया रहे एचएल दत्तू से इस बारे में नाराजगी जाहिर कर दी थी।
- इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी लेटर लिखकर डिनर के न्योते पर शुक्रिया अदा किया लेकिन अपनी आपत्ति जाहिर की। उन्होंने कहा कि जिन तारीखों की धार्मिक अहमियत है, उन तारीखों पर ऐसे कार्यक्रम नहीं रखे जाने चाहिए।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस जोसेफ ने अपने 26 पेज के जजमेंट में कहा- मेरे लिए माननीय चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया की इस बात पर राजी होना बहुत मुश्किल है कि तीन तलाक की प्रथा धर्म और पर्सनल लॉ से जुड़ी है। तीन तलाक में तो दरवाजा बंद हो जाता है। लिहाजा, यह कुरान-ए-पाक के बुनियादी फलसफों के खिलाफ है। यह शरीयत के खिलाफ है। तलाक किसी जायज वजह से होना चाहिए। इसके बाद पति-पत्नी के बीच सुलह की कोशिशें होनी चाहिए। अगर कोशिशें नाकाम हो जाएं तो तलाक होना चाहिए।
3) जस्टिस रोहिंटन एफ. नरीमन
कौन हैं जस्टिस नरीमन?
- जाने माने ज्यूरिस्ट फली एस नरीमन के बेटे जस्टिस रोहिंटन नरीमन का जन्म 13 अगस्त 1956 को हुआ।
इनके लिए बदले गए थे नियम
- लॉ से जुड़े मामलों में गजब की पकड़ और टैलेंट को देखते हुए उन्हें 37 की उम्र में ही सुप्रीम कोर्ट में सीनियर एडवोकेट का दर्जा दे दिया गया था। उस वक्त इस ओहदे के लिए मिनिमम एज 45 थी। लेकिन तब चीफ जस्टिस रहे एमएन वेंकटचलैया ने नियमों में बदलाव कर उन्हें यह पहचान दी।
- जस्टिस नरीमन 2014 तक सुप्रीम कोर्ट के वकील थे। उन्होंने 35 साल लॉ की प्रैक्टिस की। सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में वे ऐसे पांचवें वकील रहे जिन्हें सीधे बार से चुनकर जज बनाया गया।
- वे इस बेंच का हिस्सा रहे हैं, जिसने ऑनलाइन अपमानजनक टिप्पणियां पोस्ट करने के मामले में पुलिस को गिरफ्तारी का हक देते विवादास्पद साइबर लॉ को खारिज कर दिया था। जस्टिस नरीमन 2021 में रिटायर होंगे।
तीन तलाक पर क्या कहा?
- जस्टिस नरीमन ने जस्टिस यूयू ललित के साथ अपने फैसले में कहा, ‘"तीन तलाक संविधान के आर्टिकल 14 (बराबरी के हक) का वॉयलेशन करता है। तीन तलाक शादी के रिश्ते को बचाने के लिए पति-पत्नी के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ता। इसी वजह से यह कुरान के मुताबिक नहीं है। यह साफ है कि इस तरह का तलाक मनमौजी तरीके से दिया जाता है।''

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नई दिल्ली. 1400 साल पुरानी तीन तलाक की प्रथा पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। 5 जजों की बेंच ने 3:2 की मेजॉरिटी से कहा कि तीन तलाक वॉइड (शून्य), अनकॉन्स्टिट्यूशनल (असंवैधानिक) और इलीगल (गैरकानूनी) है। बेंच में शामिल दो जजों ने कहा कि अगर सरकार तीन तलाक को खत्म करना चाहती है तो वो इस पर 6 महीने के भीतर कानून लेकर आए। मंगलवार देर शाम सरकार ने इस पर अपना स्टैंड क्लियर कर दिया। लॉ मिनिस्टर रविशंकर प्रसाद ने कहा SC के फैसले में असंवैधानिक बताए जाने के बाद तीन तलाक के लिए कानून बनाने की जरूरत नहीं है। बता दें कि सुप्रीम कोर्ट को ये तय करना था कि तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं? यह कानूनी रूप से जायज है या नहीं और तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं? मई में इस मामले में छह दिन सुनवाई हुई थी। इसके बाद मंगलवार को फैसला आया।

1) चीफ जस्टिस खेहर ने तीन तलाक पर क्या कहा?
- चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने कहा, "तीन तलाक मुस्लिम धर्म की रवायत है, इसमें ज्यूडिशियरी को दखल नहीं देना चाहिए। अगर केंद्र तीन तलाक को खत्म करना चाहता है तो 6 महीने के भीतर इस पर कानून लेकर आए और सभी पॉलिटिकल पार्टियां इसमें केंद्र का सहयोग करें।"
- बेंच ने अपने फैसले में कहा कि जब कई इस्लामिक देशों में तीन तलाक की प्रथा खत्म हो चुकी है तो आजाद भारत इससे निजात क्यों नहीं पा सकता?
2) तीन तलाक किस वजह से असंवैधानिक?
- यह बेंच पांच जजों की थी। चीफ जस्टिस जेएस खेहर और जस्टिस अब्दुल नजीर इस पक्ष में नहीं थे कि तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया जाए। वहीं, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस कुरियन जोसेफ ने तीन तलाक को असंवैधानिक करार दिया। इन तीन जजों ने कहा कि तीन तलाक की परंपरा मर्जी से चलती दिखाई देती है, ये संविधान का उल्लंघन है। इसे खत्म होना चाहिए।
3) कानून बनाने पर केंद्र का क्या स्टैंड है?
- कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा, "फैसला पढ़ने के बाद पहली नजर में ही ये साफ हो जाता है कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच में मेजॉरिटी ने तीन तलाक को असंवैधानिक और गैरकानूनी कहा है।"
- सरकार के सीनियर ऑफिशियल ने न्यूज एजेंसी से कहा, "SC के ऑर्डर के बाद अगर कोई पति तीन तलाक देता है तो इसे वैध नहीं माना जाएगा। विवाह के लिए उसकी जिम्मेदारियां बनी रहेंगी। पत्नी को भी पूरी आजादी रहेगी कि ऐसे शख्स को वो पुलिस के हवाले कर दे और उसके खिलाफ डोमेस्टिक वायलेंस या फि हैरेसमेंट का केस करे।"
- एक टीवी चैनल पर रविशंकर प्रसाद ने कहा, "अगर चर्चा के बाद ऐसा लगता है कि कहीं कोई गैप है और कुछ छूट रहा है तो उसके लिए मंच खुला है। हम विचार करेंगे।"
4) ऐसे समझें जजों का फैसला
- तीन तलाक की विक्टिम और पिटीशनर अतिया साबरी के वकील राजेश पाठक ने DainikBhaskar.com को बताया कि बेंच ने 3:2 की मेजॉरिटी से तीन तलाक को खारिज और गैर-कानूनी करार दिया।
- वहीं, वकील सैफ महमूद के मुताबिक, चीफ जस्टिस ने कहा कि पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों को न तो कोई संवैधानिक अदालत छू सकती है और न ही उसकी संवैधानिकता को वह जांच-परख सकती है। वहीं, जस्टिस नरीमन ने कहा कि तीन तलाक 1934 के कानून का हिस्सा है। उसकी संवैधानिकता को जांचा जा सकता है। तीन तलाक असंवैधानिक है।
5) क्या है पिटीशनर्स और लॉ एक्सपर्ट्स की राय?
शायरा बानो
- फरवरी 2016 में उत्तराखंड की रहने वाली शायरा बानो (38) वो पहली महिला बनीं, जिन्होंने ट्रिपल तलाक, बहुविवाह (polygamy) और निकाह हलाला पर बैन लगाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में पिटीशन दायर की। शायरा को भी उनके पति ने तीन तलाक दिया था।
- शायरा ने DainikBhaskar.com से कहा, ''जजमेंट का स्वागत और समर्थन करती हूं। मुस्लिम महिलाओं के लिए बहुत ऐतिहासिक दिन है। कोर्ट ने मुस्लिम समुदाय को बेहतर दिशा दे दी है। अभी लड़ाई खत्म नहीं हुई है। समाज आसानी से इसे स्वीकार नहीं करेगा। अभी लड़ाई बाकी है। इस फैसले से मुस्लिम समाज की महिलाओं को प्रताड़ना, शोषण और दुखों से आजादी मिलेगी। पुरुषों को महिलाओं के हालात को देखते हुए इसे स्वीकार करना चाहिए।''
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड
- मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा- इस मसले पर कानून लाने की जरूरत नहीं है। बोर्ड अपने कानून के हिसाब से चलता है। बोर्ड अब 10 सितंबर को भोपाल में बैठक कर आगे की रणनीति तय करेगा।
- इससे पहले बोर्ड ने माना था कि वह सभी काजियों को एडवायजरी जारी करेगा कि वे तीन तलाक पर न सिर्फ महिलाओं की राय लें, बल्कि उसे निकाहनामे में शामिल भी करें।
- वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम वुमन्स पर्सनल लॉ बोर्ड की प्रेसिडेंट शाइस्ता अंबर ने तीन तलाक को गैर-कानूनी करार देते सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर खुशी जाहिर की है।
लॉ एक्सपर्ट
- लॉ एक्सपर्ट संदीप शर्मा ने DainikBhaskar.com को बताया- ''मुस्लिम पर्सनल लॉ में बदलाव की जरूरत है। शायरा बानो ने जो मुद्दा उठाया है, वह अहम है। तीन तलाक के मौजूदा प्रावधान में बदलाव होना ही चाहिए। पाकिस्तान, बांग्लादेश और यूएई जैसे देशों में तीन तलाक कानून बदल चुका है, फिर हमारे यहां क्यों नहीं? कॉमन सिविल कोड बाद की बात है, पहले पर्सनल लॉ में बदलाव तो हो। एक-एक कर बदलाव किए जा सकते हैं।''
- ''पहले हिंदुओं में भी बहुविवाह प्रथा थी। 1956 में कानून में बदलाव कर हिंदू विवाह कानून के तहत एक विवाह का नियम बनाया गया। मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी अगर बदलाव की जरूरत है तो होनी चाहिए। महिलाएं चाहें किसी भी धर्म की हों, उन्हें सुरक्षा मुहैया कराना संवैधानिक जिम्मेदारी है। संविधान समानता की बात करता है और अगर पर्सनल लॉ इसमें आड़े आता है तो उसे भी बदला जा सकता है। शादी चाहे किसी भी तरीके से हो, उसके बाद की स्थिति, तलाक और गुजारा भत्ता का मामला एक समान होना चाहिए।''
6) तलाक-ए-बिद्दत पर सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
- चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने अपने फैसला में कहा कि तलाक-ए-बिद्दत सुन्नी कम्युनिटी का हिस्सा है। यह 1000 साल से कायम है। तलाक-ए-बिद्दत संविधान के आर्टिकल 14, 15, 21 और 25 का वॉयलेशन नहीं करता।
7) क्या है तलाक-ए-बिद्दत?
- तलाक-ए-बिद्दत यानी एक ही बार में तीन बार तलाक कह देना। ऐसा तलाकनामा लिखकर किया जा सकता है या फिर फोन से या टेक्स्ट मैसेज के जरिए भी किया जा सकता है। इसके बाद अगर पुरुष को यह लगता है कि उसने जल्दबाजी में ऐसा किया, तब भी तलाक को पलटा नहीं जा सकता। तलाकशुदा जोड़ा फिर हलाला के बाद ही शादी कर सकता है।
8) क्या है तीन तलाक, निकाह हलाला और इद्दत?
- ट्रिपल तलाक यानी पति तीन बार ‘तलाक’ लफ्ज बोलकर अपनी पत्नी को छोड़ सकता है। निकाह हलाला यानी पहले शौहर के पास लौटने के लिए अपनाई जाने वाली एक प्रॉसेस। इसके तहत महिला को अपने पहले पति के पास लौटने से पहले किसी और से शादी करनी होती है और उसे तलाक देना होता है।
- सेपरेशन के वक्त को इद्दत कहते हैं। बहुविवाह यानी एक से ज्यादा पत्नियां रखना। कई मामले ऐसे भी आए, जिसमें पति ने वॉट्सऐप या मैसेज भेजकर पत्नी को तीन तलाक दे दिया।
9) सुप्रीम कोर्ट में कितनी पिटीशंस दायर हुई थीं?
- मुस्लिम महिलाओं की ओर से 7 पिटीशन्स दायर की गई थीं। इनमें अलग से दायर की गई 5 रिट-पिटीशन भी थीं। इनमें दावा किया गया कि तीन तलाक अनकॉन्स्टिट्यूशनल है।
क्या है भारत में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की स्थिति?
- देश में मुस्लिमों की आबादी 17 करोड़ है। इनमें करीब आधी यानी 8.3 करोड़ महिलाएं हैं।
- 2011 के सेंसस पर एनजीओ 'इंडियास्पेंड' के एनालिसिस के मुताबिक, भारत में अगर एक मुस्लिम तलाकशुदा पुरुष है तो तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं की संख्या 4 है। भारत में तलाकशुदा महिलाओं में 68% हिंदू और 23.3% मुस्लिम हैं।
10) मामले में पक्ष कौन-कौन थे?
केंद्र: इस मुद्दे को मुस्लिम महिलाओं के ह्यूमन राइट्स से जुड़ा मुद्दा बताता है। ट्रिपल तलाक का सख्त विरोध करता है।
पर्सनल लॉ बाेर्ड: इसे शरीयत के मुताबिक बताते हुए कहता है कि मजहबी मामलों से अदालतों को दूर रहना चाहिए।
जमीयत-ए-इस्लामी हिंद: ये भी मजहबी मामलों में सरकार और कोर्ट की दखलन्दाजी का विरोध करता है। यानी मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के साथ खड़ा है।
मुस्लिम स्कॉलर्स: इनका कहना है कि कुरान में एक बार में तीन तलाक कहने का जिक्र नहीं है।
बेंच में हर धर्म के जज थे
- बेंच में चीफ जस्टिस जेएस खेहर, जस्टिस कुरियन जोसेफ, जस्टिस आरएफ नरीमन, जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस अब्दुल नजीर शामिल थे। इस बेंच की खासियत यह थी कि इसमें हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई और पारसी धर्म को मानने वाले जज शामिल थे।

सोमवार, 17 जुलाई 2017

माँ बाण माता : सिसोदिया वंश की कुलदेवी


सिसोदिया राजवंश सिर्फ मेवाड़ तक ही नहीं है , यह महाराष्ट्र में भोंसले और नेपाल में राणा वंस के रूप में विस्तृत है !

कुलदेवी बाण माता


गेहलोत वंश की कुलदेवी बाण माता
भरत गेहलोत (आना,राजस्थान)
कुल के फलने और फूलने में कुलदेवता व कुलदेवी की असीम कृपा होती हैं। गेहलोत वंश की कुलदेवी श्री बाण माता, बायण माता या ब्राह्मणी माता के संक्षिप्त इतिहास से में आपको रूबरू करवा रहा हूँ हालाँकि यह इतिहास वेद् वर्णित हैं फिर भी अगर किसी भी प्रकार की त्रुटि हो तो में क्षमा प्राथी हूँ। सिसोदिया गेहलोत, गुहिल या गेहलोत वंश की कुलदेवी बाण माता का मुख्य मंदिर विश्व प्रसिद्ध दुर्ग चित्तोड़गढ़ में स्थित हैं। माताजी का पुराना स्थान गिरनार गुजरात में था पर कालान्तर में माँ बाण माता चित्तोड़ पधार गयी थी। और इसके पीछे कथा इस प्रकार हैं की वर्षो पूर्व चित्तोड़ के महाराणा ने गुजरात पर आक्रमण कर गुजरात जीत लिया।

इस पर महाराणा ने गुजरात के राजा से कहा की वह अपनी राजकुमारी का विवाह चित्तोड़ के महाराणा से करे। हालाँकि गुजरात की राजकुमारी के मन में यह इच्छा पूर्व से ही थी की वह महाराणा की रानी बने और क्योंकि राजकुमारी माँ बाण माता की भक्त थी तो माँ ने ही कुछ ऐसी लीला रचाई की राजकुमारी की शादी महाराणा से हो गयी और माँ बाण माता भी राजकुमारी के साथ चित्तौड़गढ़ पधार गयी। हालाँकि गिरनार में अभी भी माँ का मंदिर हैं। इस प्रकार यह तो हुआ की माँ किस तरह चित्तोड़ में प्रकट हुई पर अब में आपको यह बताने का भी प्रयत्न करूँगा की किस तरह माँ ने देवलोक से भूलोक पर अवतार लिया। पुराणों के अनुसार हजारों वर्षों पूर्व बाणासुर नाम का एक दैत्य ने जन्म लिया। जिसकी भारत में अनेक राजधानियाँ थी। पूर्व में सोनितपुर (वर्तमान तेजपुर, आसाम) उत्तर में बामसू (वर्तमान लमगौन्दी, उत्तराखंड) मध्यभारत में बाणपुर मध्यप्रदेश में भी बाणासुर का राज था। बाणासुर बामसू में रहता था।बाणासुर को कही कही राजा भी कहा गया है, और उसके मंदिर भी मौजूद हैं जिसको आज भी उत्तराखंड के कुछ गावों में पूजा जाता है। संभवतः प्राचीन सनातन भारत में मनुष्य जब पाप के रास्ते पर चलकर अत्यंत अत्याचारी हो जाता था तब उसे असुर की श्रेणी में रख दिया जाता था क्योंकि लोगों को यकीन हो जाता था की अब उसका काल निकट है और वह अवश्य ही प्रभु के हाथो मारा जायेगा। यही हाल रावण का भी था वह भी एक महाज्ञानी-शक्तिशाली-इश्वर भक्त राजा था, किन्तु समय के साथ वह भी अभिमानी हो गया था और उसका भी अंत एक असुर की तरह ही हुआ।

किन्तु यह भी सत्य है की रावण को आज भी बहुत से स्थानों पर पूजा जाता है। दक्षिण भारत, श्रीलंका के साथ साथ उत्तर भारत में भी उसके कई मंदिर हैं जिनमे मंदसौर(मध्यप्रदेश) में भी रावण की एक विशाल प्रतिमा है जिसकी लोग आज भी पूजा करते हैं। बाणासुर भगवान शिव का अनन्य भक्त था। शिवजी के आशीर्वाद से उसे हजारों भुजाओं की शक्ति प्राप्त थी। शिवजी ने उससे और भी कुछ मांगने को कहा तो बाणासुर ने कहा की आप मेरे किले के पहरेदार बन जाओ। यह सुन शिवजी को बडी ही ग्लानि और अपमान महसूस हुआ लेकिन उन्होंने उसको वरदान दे दिया और उसके किले के रक्षक बन गए। बाणासुर परम बलशाली होकर सम्पूर्ण भारत और पृथ्वी पर राज करने लगा और उससे सभी राजा और कुछ देवता तक भयभीत रहने लगे। बाणासुर अजेय हो चुका था, कोई उससे युद्ध करने आगे नहीं आता था। एक दिन बाणासुर को अचानक युद्ध करने की तृष्णा जागी। तब उसने स्वयं शिवजी से युद्ध करने की इच्छा की। बाणासुर के अभिमानी भाव को देख कर शिवजी ने उससे कहा की वह उससे युद्ध नहीं करना चाहते क्योंकि वह उनका शिष्य है, किन्तु शिवजी ने उससे कहा की तुम विचलित मत हो तुम्हे पराजित करने वाला व्यक्ति कृष्ण जन्म ले चुका है। यह सुन कर बाणासुर भयभीत हो गया। और उसने शिवजी की पुनः तपस्या की और अपनी हजारों भुजाओं से कई सौ मृदंग बजाये, जिससे शिवजी पुनः प्रसन्न हो गए और बाणासुर ने उनसे फिर वरदान मांग लिया की वे कृष्ण से युद्ध में उसका साथ देंगे और उसके प्राणों की रक्षा करेंगे और हमेशा की तरह उसके किले के पहरेदार बने रहेंगे। समय बीतता गया और श्री कृष्ण ने द्वारिका बसा ली थी। उधर बाणासुर के एक पुत्री थी जिसका नाम उषा था। उषा से शादी के लिए बहुत से राजा महाराजा आए किन्तु बाणासुर सबको तुच्छ समझकर उषा के विवाह के लिए मना कर देता और अभिमानपूर्वक उनका अपमान कर देता था। बाणासुर को भय था की उषा उसकी इच्छा के विपरीत किसी से विवाह न कर ले इसलिए बाणासुर ने एक शक्तिशाली महल बनवाया और उसमे उषा को कैद कर नज़रबंद कर दिया। अब इसे संयोग कहो या श्री कृष्ण की लीला, एक दिन उषा को स्वप्न में एक सुन्दर राजकुमार दिखाई दिया यह बात उषा अपनी सखी चित्रलेखा को बताई।

चित्रलेखा को सुन्दर कला-कृतियाँ बनाने का वरदान प्राप्त था, उसने अपनी माया से उषा की आँखों में देख कर उसके स्वप्न दृश्य को देख लिया और अपनी कला की शक्ति से उस राजकुमार का चित्र बना दिया। चित्र देख उषा को उससे प्रेम हो गया और उसने कहा की यदि ऐसा वर उसे मिल जाये तो ही उसे संतोष होगा। चित्रलेखा ने बताया की यह राजकुमार तो श्री कृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध का है। तब चित्रलेखा ने अपनी शक्ति से अनिरुद्ध को अदृश्य कर के उषा के सामने प्रकट कर दिया और तब दोनों ने ओखिमठ नामक स्थान(केदारनाथ के पास) विवाह किया जहाँ आज भी उषा-अनिरुद्ध नाम से एक मंदिर व्याप्त है। जब यह खबर बाणासुर को मिली तो उसे बड़ा क्रोध आया और उसने अनिरुद्ध और उषा दोनों को कैद कर लिया। जब कई दिनों तक अनिरुद्ध द्वारिका में नहीं आये तो श्रीकृष्ण और बलराम व्याकुल हो उठे और उन्होंने उसकी तलाश शुरू कर दी, अंत में जब उन्हें नारदजी द्वारा सत्य का पता चला तो उन्होंने बाणासुर पर हमला करने की ठानी। भयंकर युद्ध आरंभ हुआ जिसमे दोनों ओर के महावीरों ने शौर्य का परिचय दिया। अंत में जब बाणासुर हारने लगा तो उसने शिवजी की आराधना की। भक्त के याद करने पर शिवजी प्रकट हो गए और श्री कृष्ण से युद्ध करने लगे। युद्ध कितना विनाशक था इसका ज्ञान इसी बात से हो जाता है की शिवजी अपने सभी अवतारों और साथियों रुद्राक्ष, वीरभद्र, कूपकर्ण, कुम्भंदा सहित बाणासुर के सेनापति बने उधर दूसरी तरफ श्रीकृष्ण के साथ बलराम, प्रदुम्न, सत्याकी, गदा, संबा, सर्न,उपनंदा, भद्रा अदि कई योद्धा थे। इस भयंकर युद्ध में शिवजी ने श्रीकृष्ण की सेना के असंख्य सेनिको को मौत के घाट उतार दिया और श्री कृष्ण ने भी बाणासुर के असंख्य सैनिको का नाश कर दिया। तब अंत में शिवजी ने पशुपतास्त्र से श्री कृष्ण पर वार किया तो श्रीकृष्ण ने भी नारायणास्त्र से वार किया जिसका किसी को कोई लाभ नहीं हुआ। अंततः श्रीकृष्ण ने निन्द्रास्त्र चला कर कुछ देर के लिए शिवजी को सुला दिया। इससे बाणासुर की सेना कमजोर हो गयी। दूसरी तरफ बलराम जी ने कुम्भंदा और कूपकर्ण को घायल कर दिया।

यह देख बाणासुर अपने प्राण बचा कर भागा। श्रीकृष्ण ने उसे पकड़कर उसकी भुजाएँ काटनी शुरू कर दी जिस पर वह बहुत ही अभिमान करता था। जब बाणासुर की सारी भुजाएँ कट गयी थी और केवल चार शेष रह गयी थी तब शिवजी अचानक जाग उठे और श्रीकृष्ण द्वारा उन्हें निंद्रा में भेजने और बाणासुर की दशा जानकर बहुत ही क्रोधित हुए। शिवजी ने अंत में अपना सबसे भयानक शस्त्र ”शिवज्वर अग्नि” चलाया जिससे सारा ब्रह्माण अग्नि में जलने लगा और हर तरफ भयानक ज्वर बीमारिया फैलने लगी। यह देख श्री कृष्ण को न चाहते हुए भी अपना आखिरी शास्त्र ”नारायणज्वर शीत” चलाया। श्रीकृष्ण के शस्त्र से ज्वर का तो नाश हो गया किन्तु अग्नि और शीत का जब बराबर मात्र में विलय होता है तो सम्पूर्ण श्रृष्टि का नाश हो जाता है। इसके कारण पृथ्वी और ब्रह्माण्ड बिखरने लगे तब नारद मुनि और समस्त देवताओं, नव-ग्रहों, यक्ष और गन्धर्वों ने ब्रह्मा जी की आराधना की लेकिन ब्रह्मा जी ने दोनों को रोक पाने में असर्थता बताई। तब सबने मिलकर परमशक्ति भगवती माँ दुर्गाजी की आराधना की तब माँ ने दोनों पक्षों (कृष्ण और शिवजी) को शांत किया। श्रीकृष्ण ने कहा की वे तो केवल अपने पौत्र अनिरुद्ध की आज़ादी चाहते हैं और शिवजी ने भी कहा की वह भी केवल अपने वचन की रक्षा कर रहे हैं और बाणासुर का साथ दे रहे हैं और उनकी केवल यही इच्छा है की श्रीकृष्ण बाणासुर के प्राण न ले। तब श्रीकृष्ण कहा की आपकी इच्छा भी मेरा दिया हुआ वचन ही है, मेने पूर्वावतार में बाणासुर के पूर्वज बलि राजा के पूर्वज प्रहलाद को यह वरदान दिया था की दानव वंश के अंत में उसके परिवार का कोई भी सदस्य उनके (विष्णु)के अवतार के हाथो कभी नहीं मरेगा। माँ भगवती की कृपा से श्रीकृष्ण की बात सुनकर बाणासुर को आत्मग्लानी होने लगी और उसे अपनी गलती का एहसास होने लगा और उसकी वजह से ही दोनों देवता लड़ने को उतारू हो गए थे। बाणासुर ने श्रीकृष्ण से माफ़ी मांग ली।

बाणासुर के माफ़ी मांगते ही शिवजी का वचन सत्य हुआ की बाणासुर श्रीकृष्ण से पराजित होगा लेकिन वो उसका साथ देंगे और उसके प्राण बचायेंगे। तत्पश्चात शिवजी और श्रीकृष्ण ने भी एक दुसरे से माफ़ी मांग ली और एक दुसरे की महिमामंडन करने लगे ।माता परमशक्ति ने दोनो को आशीर्वाद दिया और दोनों इस तरह से एक दुसरे में समा गए तब नारद जी ने प्रभु की इस लीला को देखकर सभी से कहा की आज से केवल एक इश्वर हरी-हरा हो गए हैं। फिर बाणासुर ने उषा-अनिरुद्ध का विवाह कर दिया और सब सुखी-सुखी रहने लगे। तत्पश्चात बाणासुर नर्मदा नदी के पास गया और शिवजी की फिर तपस्या करने लगा। शिवजी ने प्रकट होकर कर फिर उसकी इच्छा जाननी चाही इस पर बाणासुर ने कहा की वे उसको अपने डमरू बजाने की कला का आशीर्वाद दे और उसको अपने विशेष सेवकों में जगह भी देें तब शिवजी ने कहा की हे! बाणासुर तुम्हारे द्वारा पूजे गए शिवजी के लिंगो को बाणलिंग के नाम से जाना जायेगा और उसकी भक्ति को हमेशा याद रखा जायेगा। अब आगे की कथा इस प्रकार है की जब अनिरुद्ध और उषा का विवाह हो गया और अंत में कृष्ण-शिव एक दूसरे में समां गए लेकिन फिर भी बाणासुर की आसुरी प्रवृति नहीं बदली। बाणासुर अब और भी ज्यादा क्रूर हो गया था। बाणासुर अब जान गया था की श्रीकृष्ण कभी उसके प्राण नहीं ले सकते और शिवजी उसके किले के रक्षक हैं तो वह भी ऐसा नहीं करेंगे। राजाओं के परामर्श से ऋषि-मुनियों ने यज्ञ किया। यज्ञ की अग्नि में से माँ पार्वती जी एक छोटी सी कुंवारी कन्या के रूप में प्रकट हुयीं और उन्होंने सभी क्षत्रिय राजाओं से वर मांगने को कहा। तब सभी राजाओं ने देवी माँ से बाणासुर से रक्षा की कामना करी (जिनमे विशेषकर संभवतः सिसोदिया गेहलोत वंश के पूर्वज प्राचीन सूर्यवंशी राजा भी रहे होंगे) तब माता जी ने सभी राजाओं-ऋषि मुनियों और देवताओं को आश्वस्त किया की वे सब धैर्य रखें बाणासुर का वध समय आने पर अवश्य मेरे ही हाथो होगा। यह वचन देकर माँ वहां से निकलकर भारत के दक्षिणी छोर पर जा कर तपस्या में बैठ गयीं जहा पर त्रिवेणी संगम है। (पूर्व में बंगाल की खाड़ी-पश्चिम में अरब सागर और दक्षिण में भारतीय महासागर है) बायण माता की यह लीला बाणासुर को किले से दूर लाने की थी ताकि वह शिवजी से अलग हो जाये। आज भी उस जगह पर बायणमाता को दक्षिण भारतीय लोगो द्वारा कुंवारी कन्या के नाम से पूजा जाता है और उस जगह का नाम भी कन्याकुमारी है।

जब पार्वती जी के अवतार देवी माँ थोड़े बड़े हुए तब उनकी सुन्दरता से मंत्रमुग्ध हो कर शिवजी उनसे विवाह करने कृयरत हुए जिस पर माताजी भी राजी हो गए।विवाह की तैयारिया होने लगी। किन्तु तभी नारद मुनि यह सब देख कर चिंतित हो गए की यह विवाह अनुचित है। बायण माता तो पवित्र कुंवारी देवी हैं जो पार्वती जी का अवतार होने के बावजूत उनसे भिन्न हैं, यदि उन्होंने विवाह किया तो वे बाणासुर का वध नहीं कर पाएंगी क्यूंकि बाणासुर केवल परम सात्विकदेवी के हाथो ही मृत्यु को प्राप्त हो सकता था। तब नारद जी ने एक चाल चली क्योंकि सूर्योदय से पहले पहले शादी का मुहर्त था और शिवजी रात को कैलाश से बारात लेकर निकले थे लेकिन रास्ते में नारद मुनि मुर्गे का रूप धर के जोर जोर से बोलने लगे जिससे शिवजी को लगा की सूर्योदय होने वाला है भोर हो गयी है अब विवाह की घडी निकल चुकी है अतः शिवजी विवाह स्थल से 8-10 किलोमीटर दूर ही रुक गए। देवी माँ दक्षिण में त्रिवेणी स्थान पर शिवजी का इंतज़ार करती रह गयी। जब शिवजी नहीं आये तो माताजी क्रोद्धित हो गयीं। उन्होंने जीवन पर्यन्त सात्विक रहने का प्रण ले लिया और सदैव कुंवारी रहकर तपस्या में लीन हो गयी। जहाँ शिवजी रुक गए थे वहाँ पर आज भी कन्याकुमारी के पास में शुचीन्द्रम नामक स्थान पर उनका बहुत ही भव्य मंदिर हैं। इश्वर की लीला से कुछ वर्षो बाद बाणासुर को माताजी की माया का पता चला तब वह खुद माताजी से विवाह करने को आया किन्तु देवी माँ ने माना कर दिया। जिसपर बाणासुर क्रुद्ध हुआ वह पहले से ही अति अभिमान हो कर भारत वर्ष में क्रूरता बरसा ही रहा था। तब उसने युद्ध के बल पर देवी माँ से विवाह करने की ठानी।

जिसमे देवी माँ ने प्रचंड रूप धारण कर उसकी पूरी दैत्य सेना का नाश कर दिया और अपने चक्र से बाणासुर का सर काट के उसका वध कर दिया। मृत्यु पूर्व बाणासुर ने परा-शक्ति के प्रारूप उस देवी से अपने जीवन भर के पापों के लिए क्षमा मांगी और मोक्ष की याचना करी जिस पर देवी माता ने उसकी आत्मा को मोक्ष प्रदान कर दिया। इस प्रकार देवी माँ को बाणासुर का वध करने की वजह से बायण माता,बाण माता या ब्राह्मणी माता के नाम से भी जाना जाता है। महा-मायादेवी माँ दुर्गा की असंख्य योगिनियाँ हैं और सबकी भिन्न भिन्न निशानिया और स्वरुप होते हैं। जिनमे बायणमाता पूर्ण सात्विक और पवित्र देवी हैं जो तामसिक और कामसिक सभी तत्वों से दूर हैं। माँ पारवती जी का ही अवतार होने के बावजूद बायण माता अविवाहित देवी हैं। तथा परा-शक्ति देवी माँ दुर्गा का अंश एक योगिनी अवतारी देवी होने के बावजूद भी बायण माता तामसिक तत्वों से भी दूर हैं अर्थात इनके काली-चामुंडा माता की तरह बलिदान भी नहीं चढ़ता है। में व्यक्तिगत रूप से माँ की कृपा के कारण अपने आप को कृतघ्न मानता हूँ क्योंकि माँ सदैव मेरे आसपास ही रहती हैं।


जहाँ मेरा गांव और जन्मभूमि हैं वहा पर माँ पहले से ही सोनाणा खेतलाजी के साथ विराजित हैं। वहां पर माँ को ब्राह्मणी माँ के नाम से पूजते हैं। और जब सुदूर दक्षिण में रोजी रोटी के लिए आया हूँ तो माँ यहाँ भी पहले कन्याकुमारी रूप में विराजित हैं। वर्तमान मे भारत के दक्षिण में कन्याकुमारी ही मेरी कर्मभूमि हैं और जब मेने कन्याकुमारी का इतिहास जाना तो मुझे बहुत ही आश्चर्य हुआ। और इसी आश्चर्य ने मुझे माँ के इतिहास और अवतार के बारे में जानने के लिए प्रेरित किया। क्योंकि देवी कन्याकुमारी ने भी बाणासुर का वध किया था और माँ बाण माता ने भी बाणासुर का वध किया था और जब मेने इतिहास के पन्नों को खंगालना शुरू किया और जो भी जानकारी मुझे मिली मेने उसे आप तक पहुचाने की गुस्ताखी की हैं। इस तरह मुझे यह जानने में भी आसानी हुई की किस तरह माँ बाण माता ही दक्षिण में कन्याकुमारी के रूप में भी पूजी जाती हैं। भरत गेहलोत (आना)

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सिसोदिया राजवंश  



सन् 556 ई. में जिस 'गुहिल वंश' की स्थापना हुई, बाद में वही 'गहलौत वंश' बना और इसके बाद यह 'सिसोदिया राजवंश' के नाम से जाना गया। जिसमें कई प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने इस वंश की मानमर्यादा, इज़्ज़त और सम्मान को न केवल बढ़ाया बल्कि इतिहास के गौरवशाली अध्याय में अपना नाम जोड़ा। महाराणा महेन्द्र तक यह वंश कई उतार-चढाव और स्वर्णिम अध्याय रचते हुए आज भी अपने गौरव और श्रेष्ठ परम्परा के लिये पहचाना जाता है। मेवाड़ अपनी समृद्धि, परम्परा, अद्भुत शौर्य एवं अनूठी कलात्मक अनुदानों के कारण संसार के परिदृश्य में देदीप्यमान है। स्वाधीनता एवं भारतीय संस्कृति की अभिरक्षा के लिए इस वंश ने जो अनुपम त्याग और अपूर्व बलिदान दिये जो सदा स्मरण किये जाते रहेंगे। मेवाड़ की वीर प्रसूता धरती में रावल बप्पा, महाराणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे शूरवीर, यशस्वी, कर्मठ, राष्ट्रभक्त व स्वतंत्रता प्रेमी विभूतियों ने जन्म लेकर न केवल मेवाड़ वरन संपूर्ण भारत को गौरान्वित किया है। स्वतन्त्रता की अलख जगाने वाले महाराणा प्रताप आज भी जन-जन के हृदय में बसे हुये, सभी स्वाभिमानियों के प्रेरक बने हुए है।

इतिहास
सन 712 ई. में अरबों ने सिंध पर आधिपत्य जमा कर भारत विजय का मार्ग प्रशस्त किया। इस काल में न तो कोई केन्द्रीय सत्ता थी और न कोई सबल शासक था जो अरबों की इस चुनौती का सामना करता। फ़लतः अरबों ने आक्रमणों की बाढ ला दी और सन 725 ई. में जैसलमेर, मारवाड़, मांडलगढ और भडौच आदि इलाकों पर अपना आधिपत्य जमा लिया। ऐसे लगने लगा कि शीघ्र ही मध्य पूर्व की भांति भारत में भी इस्लाम की तूती बोलने लगेगी। ऐसे समय में दो शक्तियों का प्रादुर्भाव हुआ। एक ओर जहां नागभाट ने जैसलमेर, मारवाड, मांडलगढ से अरबों को खदेड़कर जालौर में प्रतिहार राज्य की नींव डाली, वहां दूसरी ओर बप्पा रायडे ने चित्तौड़ के प्रसिद्ध दुर्ग पर अधिकार कर सन 734 ई. में मेवाड़ में गुहिल वंश अथवा गहलौत वंश का वर्चश्व स्थापित किया और इस प्रकार अरबों के भारत विजय के मनसूबों पर पानी फ़ेर दिया।

गुहिल वंश

मेवाड़ का गुहिल वंश संसार के प्राचीनतम राज वंशों में माना जाता है। मेवाड़ राज्य की केन्द्रीय सत्ता का उद्भव स्थल सौराष्ट्र रहा है। जिसकी राजधानी बल्लभीपुर थी और जिसके शासक सूर्यवंशी क्षत्रिय कहलाते थे। यही सत्ता विस्थापन के बाद जब ईडर में स्थापित हुई तो गहलौत मान से प्रचलित हुई। ईडर से मेवाड़ स्थापित होने पर रावल गहलौत हो गई। कालान्तर में इसकी एक शाखा सिसोदे की जागीर की स्थापना करके सिसोदिया हो गई। चूँकि यह केन्द्रीय रावल गहलौत शाखा कनिष्ठ थी। इसलिये इसे राणा की उपाधि मिली। उन दिनों राजपूताना में यह परम्परा थी कि लहुरी शाखा को राणा उपाधि से सम्बोधित किया जाता था। कुछ पीढियों बाद एक युद्ध में रावल शाखा का अन्त हो गया और मेवाड़ की केन्द्रीय सत्ता पर सिसोदिया राणा का आधिपत्य हो गया। केन्द्र और उपकेन्द्र पहचान के लिए केन्द्रीय सत्ता के राणा महाराणा हो गये। गहलौत वंश का इतिहास ही सिसोदिया वंश का इतिहास है।

मान्यताएँ

मान्यता है कि सिसोदिया क्षत्रिय भगवान राम के कनिष्ठ पुत्र लव के वंशज हैं। सूर्यवंश के आदि पुरुष की 65 वीं पीढ़ी में भगवान राम हुए 195 वीं पीढ़ी में वृहदंतक हुये। 125 वीं पीढ़ी में सुमित्र हुये। 155 वीं पीढ़ी अर्थात सुमित्र की 30 वीं पीढ़ी में गुहिल हुए जो गहलोत वंश की संस्थापक पुरुष कहलाये। गुहिल से कुछ पीढ़ी पहले कनकसेन हुए जिन्होंने सौराष्ट्र में सूर्यवंश के राज्य की स्थापना की। गुहिल का समय 540 ई. था। बटवारे में लव को श्री राम द्वारा उत्तरी पश्चिमी क्षेत्र मिला जिसकी राजधानी लवकोट थी। जो वर्तमान में लाहौर है। ऐसा कहा जाता है कि कनकसेन लवकोट से ही द्वारका आये। हालांकि वो विश्वस्त प्रमाण नहीं है। टॉड मानते है कि 145 ई. में कनकसेन द्वारका आये तथा वहां अपने राज्य की परमार शासक को पराजित कर स्थापना की जिसे आज सौराष्ट्र क्षेत्र कहा जाता है। कनकसेन की चौथी पीढ़ी में पराक्रमी शासक सौराष्ट्र के विजय सेन हुए जिन्होंने विजय नगर बसाया। विजय सेन ने विदर्भ की स्थापना की थी। जिसे आज सिहोर कहते हैं। तथा राजधानी बदलकर बल्लभीपुर (वर्तमान भावनगर) बनाया। इस वंश के शासकों की सूची टॉड देते हुए कनकसेन, महामदन सेन, सदन्त सेन, विजय सेन, पद्मादित्य, सेवादित्य, हरादित्य, सूर्यादित्य, सोमादित्य और शिला दित्य बताया। 524 ई. में बल्लभी का अन्तिम शासक शिलादित्य थे। हालांकि कुछ इतिहासकार 766 ई. के बाद शिलादित्य के शासन का पतन मानते हैं। यह पतन पार्थियनों के आक्रमण से हुआ। शिलादित्य की राजधानी पुस्पावती के कोख से जन्मा पुत्र गुहादित्य की सेविका ब्रहामणी कमलावती ने लालन पालन किया। क्योंकि रानी उनके जन्म के साथ ही सती हो गई। गुहादित्य बचपन से ही होनहार था और ईडर के भील मंडालिका की हत्या करके उसके सिहांसन पर बैठ गया तथा उसके नाम से गुहिल, गिहील या गहलौत वंश चल पडा। कर्नल टॉड के अनुसार गुहादित्य की आठ पीढ़ियों ने ईडर पर शासन किया ये निम्न हैं - गुहादित्य, नागादित्य, भागादित्य, दैवादित्य, आसादित्य, कालभोज, गुहादित्य, नागादित्य।[1]

सिसोदिया गहलौत
जेम्स टॉड के अनुसार शिकार के बहाने भीलों द्वारा नागादित्य की हत्या कर दी। इस समय इसके पुत्र बप्पा की आयु मात्र तीन वर्ष की थी। बप्पा की भी एक ब्राहमणी ने संरक्षण देकर अरावली के बीहड में शरण लिया। गौरीशंकर ओझा गुहादित्य और बप्पा के बीच की वंशावली प्रस्तुत की, वह सर्वाधिक प्रमाणिक मानी गई है जो निम्न है - गुहिल, भोज, महेन्द्र, नागादित्य, शिलादित्य, अपराजित, महेन्द्र द्वितीय और कालभोज बप्पा आदि। यह एक संयोग ही है कि गुहादित्य और मेवाड राज्य में गहलोत वंश स्थापित करने वाले बप्पा का बचपन अरावली के जंगल में उन्मुक्त, स्वच्छन्द वातावरण में व्यतीत हुआ। बप्पा के एक लिंग पूजा के कारण देवी भवानी का दर्शन उन्हे मिला और बाबा गोरखनाथ का आशिर्वाद भी। बडे होने पर चित्तौड़ के राजा से मिल कर बप्पा ने अपना वंश स्थापित किया और परमार राजा ने उन्हे पूरा स्नेह दिया। इसी समय विदेशी आक्रमणकारियों के आक्रमण को बप्पा ने विफ़ल कर चित्तोड़ से उन्हे गजनी तक खदेड कर अपने प्रथम सैन्य अभिमान में ही सफ़लता प्राप्त की। बप्पा द्वारा धारित रावल उपाधि रावल रणसिंह ( कर्ण सिंह ) 1158 ई. तक निर्वाध रुप से चलती रही। रावण रण सिंह के बाद रावल गहलोत की एक शाखा और हो गई। जो सिसोदिया के जागीर पर आसीन हुई जिसके संस्थापक माहव एवं राहप दो भाई थे। सिसोदा में बसने के कारण ये लोग सिसोदिया गहलौत कहलाये।


महाराणा प्रताप
सत्ता परिवर्तन, स्थान परिवर्तन, व्यक्तिगत महत्वकांक्षा एवं राजपरिवार में संख्या वृद्धि से ही राजपूत वंशों में अनेक शाखाओं एवं उपशाखाओं ने जन्म लिया है। यह बात गहलौत वंश के साथ भी देखने को मिली है। बप्पा के शासन काल मेवाड़ राज्य के विस्तार के साथ ही उसकी प्रतिष्ठा में भी अत्यधिक वृद्धि हुई है। बप्पा के बाद गहलौत वंश की शाखाओं का निम्न विकास हुआ।

1. अहाडिया गहलौत
अहाड नामक स्थान पर बसने के कारण यह नाम हुआ।

2. असिला गहलौत
सौराष्ट्र में बप्पा के पुत्र ने असिलगढ का निर्माण अपने नाम असिल पर किया जिससे इसका नाम असिला पडा।

3. पीपरा गहलौत
बप्पा के एक पुत्र मारवाड के पीपरा पर आधिपत्य पर पीपरा गहलौत वंश चलाया।

4. मागलिक गहलौत
लोदल के शासक मंगल के नाम पर यह वंश चला।

5. नेपाल के गहलोत
रतन सिंह के भाई कुंभकरन ने नेपाल में आधिपत्य किया अतः नेपाल का राजपरिवार भी मेवाड़ की शाखा है।

6. सखनियां गहलौत
रतन सिंह के भाई श्रवण कुमार ने सौराष्ट्र में इस वंश की स्थापना की।

7. सिसौद गहलौत
कर्णसिंह के पुत्र को सिसौद की जागीर मिली और सिसौद के नाम पर सिसौदिया गहलौत कहलाया।

सिसौदिया वंश की उपशाखाएं
चन्द्रावत सिसौदिया
यह 1275 ई. में अस्तित्व में आई। चन्द्रा के नाम पर इस वंश का नाम चन्द्रावत पडा।

भोंसला सिसौदिया
इस वंश की स्थापना सज्जन सिंह ने सतारा में की थी।

चूडावत सिसौदिया
चूडा के नाम पर यह वंश चला। इसकी कुल 30 शाखाएं हैं।
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सिसोदिया वंश (गहलौत वंश) के शासक और उनका शासनकाल

शासकशासनकाल
रावल बप्पा (काल भोज)734 - 753 ई.
रावल खुमान753 - 773 ई.
मत्तट773 – 793 ई.
भर्तभट्त793 – 813 ई.
रावल सिंह813 – 828 ई.
खुमाण सिंह828 – 853 ई.
महायक853 – 878 ई.
खुमाण तृतीय878 – 903 ई.
भर्तभट्ट द्वितीय903 – 951 ई.
अल्लट951 – 971 ई.
नरवाहन971 – 973 ई.
शालिवाहन973 – 977 ई.
शक्ति कुमार977 – 993 ई.
अम्बा प्रसाद993 – 1007 ई.
शुची वरमा1007- 1021 ई.
नर वर्मा1021 – 1035 ई.
कीर्ति वर्मा1035 – 1051 ई.
योगराज1051 – 1068 ई.
वैरठ1068 – 1088 ई.
हंस पाल1088 – 1103 ई.
वैरी सिंह1103 – 1107 ई.
विजय सिंह1107 – 1127 ई.
अरि सिंह1127 – 1138 ई.
चौड सिंह1138 – 1148 ई.
विक्रम सिंह1148 – 1158 ई.
रण सिंह (कर्ण सिंह)1158 – 1168 ई.
क्षेम सिंह1168 – 1172 ई.
सामंत सिंह1172 – 1179 ई.
रतन सिंह1301-1303 ई.
राजा अजय सिंह1303 - 1326 ई.
महाराणा हमीर सिंह1326 - 1364 ई.
महाराणा क्षेत्र सिंह1364 - 1382 ई.
महाराणा लाखासिंह1382 - 1421 ई.
महाराणा मोकल1421 - 1433 ई.
महाराणा कुम्भा1433 - 1469 ई.
महाराणा उदा सिंह1468 - 1473 ई.
महाराणा रायमल1473 - 1509 ई.
महाराणा सांगा (संग्राम सिंह)1509 - 1527 ई.
महाराणा रतन सिंह1528 - 1531 ई.
महाराणा विक्रमादित्य1531 - 1534 ई.
महाराणा उदय सिंह1537 - 1572 ई.
महाराणा प्रताप1572 -1597 ई.
महाराणा अमर सिंह1597 - 1620 ई.
महाराणा कर्ण सिंह1620 - 1628 ई.
महाराणा जगत सिंह1628 - 1652 ई.
महाराणा राजसिंह1652 - 1680 ई.
महाराणा अमर सिंह द्वितीय1698 - 1710 ई.
महाराणा संग्राम सिंह1710 - 1734 ई.
महाराणा जगत सिंह द्वितीय1734 - 1751 ई.
महाराणा प्रताप सिंह द्वितीय1751 - 1754 ई.
महाराणा राजसिंह द्वितीय1754 - 1761 ई.
महाराणा हमीर सिंह द्वितीय1773 - 1778 ई.
महाराणा भीमसिंह1778 - 1828 ई.
महाराणा जवान सिंह1828 - 1838 ई.
महाराणा सरदार सिंह1838 - 1842 ई.
महाराणा स्वरुप सिंह1842 - 1861 ई.
महाराणा शंभू सिंह1861 - 1874 ई.
महाराणा सज्जन सिंह1874 - 1884 ई.
महाराणा फ़तेह सिंह1883 - 1930 ई.
महाराणा भूपाल सिंह1930 - 1955 ई.
महाराणा भगवत सिंह1955 - 1984 ई.
महाराणा महेन्द्र सिंह1984 ई.