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मई, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

अफजल गुरु - फ़ांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदलने की साजिस हे

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अफजल गुरु की दया याचिका को जिस तरह से लंबित रखा जा रहा हे उसकी पीछे कांग्रेस की अत्यंत निंदनीय कूटनीति काम कर रही हे , ये लोग अफजल को फाँसी देने से डर रहे हें और किसी तरह  से उसे आजीवन कारावास में बदलना चाहते हें , खासखबर . कॉम पर ३१-०५-२०१० की तारीख में एक खबर हे , अफजल गुरू की फांसी टालने की साजिश तो नहीं , इसका शरांस हे की - इस तरह  के कुछ मामले सुप्रीम कोर्ट द्वारा फाँसी से आजीवन कारावास में बदलने के निर्णय दिए गये हें , उनमें न्यायलय  का तर्क था की फ़ांसी देने में  की गई अत्यधिक देरी फ़ांसी  की सजा को उम्र केद में बदलने का पर्याप्त आधर हे , प . बंगाल के रोड्र्ग्स की फ़ांसी को उम्र केद में बदला था , इसी तरह से उ प्र की एक निचली अदालत ने तीन व्यक्तियों की हत्या के आरोपी को फ़ांसी की सजा दी थी मगर इलाहवाद हाई कोर्ट ने  उसे बरी कर दिया था मामला सुप्रीम कोर्ट पहुचा सजा को सही मानते हुए अधिक समय गुजरने से उसे उम्र केद में तब्दील कर दिया गया . बताया जाता हे की १९८३ तक नियम था की फासी की सजा के २ वर्ष में मर्तुदंड नही दिया जाता तो सजा स्वत ही आजीवन कारावास में बदल जाती थी , फिर  इसमें कु

डॉ केतन देसाई,उच्च स्तरीय राजनीती और प्रशासन,चोर-चोर मोसेरे भाई

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क्या अपने सुना हे की १८०१.५करोड़ रुपया और १.५ टन   स्वर्ण आभूषण किसी पर पकडे गये हें , हाँ, यह अकूत धन दोलत विश्व मेडिकल एसोसिएसन के १८ मई २०१० को बनाने वाले अध्यक्ष डॉ केतन देसाई से पकड़ी गई हे , यही असली चेहरा भारत के उच्च स्तरीय राजनीती और प्रशासन का हे , इतनी कमाई बिना सत्ता को खुश रखे हो ही नही सकती , और पकडे भी इस लिए गये की , कोई न कोई आप से चिड गया था . अब ये तिहाड़ जेल में हें , इनका बड़ा भरी धन बिल्डर के रूप में भी इन्वेस्ट हे ,       यूरोलोजिस्ट   डॉ केतन देसाई के पिता जी मुम्बई में साधारण   शिक्षक थे . देसी ने जो कुछ भी किया वह कांग्रेस में अच्छी पकड़ के द्वारा  ही किया ,  इसमें उनके शातिर दिमाग ने भी बहुत साथ दिया , केतन अपने कॉलेज  के दिनों में युवक कांग्रेस में  बड़े  सक्रिय थे व तत्कालीन मुख्य मंत्री चिमनभाई पटेल के ख़ासम खास थे , वे कब अहमदावाद मेडिकल कोलेज में रेजिडेंस ही थे तब १९८९ में मेडिकल कौंसिल ऑफ़ इंडिया के सदस्य बन गये थे , और कार्यकारी समिति का चुनाव भी लड़ा था , तब से राजनेतिक सहयोग से जो मेडिकल लाइन की की-पोस्ट पर कब्ज़ा किया  तो लगातार एक क्षत्र राज बनाये रखा

नक्सलवाद - य़ूपीए की मनमोहन सरकार त्यागपत्र दे

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मनमोहन सिंह जी य़ू भी कमजोर और छाया प्रधान मंत्री ही कहलाते हें .अब यह बात और ज्यादा प्रमाणित हो रही हे . की वे नाकाबिल हें उनमें कोई क्षमता नही हे , हर मामला इसका गवाह हे .   नक्सलवाद के उग्र तेवरों ने एक बार फिर, अपने निर्मम तेवर दिखाते ही  ज्ञानेश्वरी एक्सप्रेस को उड़ा दिया ,६५ यात्री मरे और २५० से ज्यादा घायल हुए यह संख्या और ज्यादा  हो जाएगी . सवाल यही हे की गत एक माह में , नक्सलियों ने एक के वाद एक चुनोती दी और केंद्र सरकार असाह हे , कारण  की वे बहुत मजबूत हो चुके हें , वे यह भी जानते हें की गुडों की गुलामी आप की  विशेसता हे , राजीव के हत्यारों के साथ आप सरकार चला रहे हें , जिस  करुणानिधि को आप ने राजीव हत्या के लिए तमिलनाडू  सरकार से बर्खास्त किया था और उसके साथ मिल कर चल  रही गुजराल की सरकार को गिराया था , अब आप उसके साथ सरकार चला रहे हें ,कांग्रेस के लिए राजीव से बड़ी केंद्र सरकार हे , यह तो साबित होही गया हे ,  चन्द्र बाबु नायडू की आंध्र प्रदेश सरकार के खिलाफ  आप ने इनसे ही हाथ मिलाया था , वे आप की नस नस जानते हें , वे आप से नही डरते , आप उनका कुछ भी नही बिगाड सकते , इसलि

नाकाम राजनेता , नोकरशाह और उधोगपति के चुगुल से खेल संगठन मुक्त हो

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खेल संघों के अध्यक्षों व सचिवों के पदों के कार्यकाल को लेकर खेल मंत्रालय ने १९७५ के नियम के हवाले से संसोधन किये हें . जो देश के शीर्स ३६ फेड्रेसनों और एसोसियेसनो पर लागु होगा , इसके पीछे कारण  यह हे की , लगभग १८-२० संगठनो  पर राजनेता , नोकरशाह और उधोगपति काबिज हें और एक प्रकार से यह संगठन उनकी जागीर हो गए हें , सबसे बड़ा सच यह हे की इन लोगों को इन खेलों से कोई लेनादेना नही हे . इसे लोकतंत्र का मजाक ही कहा जायेगा , अब सरकार ने उच्चतम सीमा लागु की हे , नये नियमो के तहत कोई एक व्यक्ति १२ साल से ज्यादा फेडरेशन का अध्यक्ष एवं ८ साल से अधिक सचिव पद पर नही रह सकेगा , मुझे लगता हे की यह कदम खेल हित में न होकर इन गेर बाजिव कविज राजनेता , नोकरशाह और उधोगपति को संरक्षण देने का ही रास्ता हे . स्वतन्त्रता के वाद १६ ओलंपिक खेलो में भारत ने भाग लिया हे , जिनमें २००८ में मात्र ३ पदक १९५२ में २ पदक और १९४८, १९५६, १९६०, १९६४, १९६८, १९७२ ,१९८०,१९९६, २०००, २००४ में सिर्फ १-१ पदक ही मिल पाए थे,   की बार ० पदक भी रहा हे . ओलम्पिक के ११३ वर्षो के इतिहास में भारत के नाम कुल २० पदक हाथ लगे , जिनमे ११ सकेले ह

गरीव कि परिभाषा और उसकी गणना पर पहले संसद में बहस होनी चाहिए

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कांग्रेस सरकार देश के साथ कितने झूठ बोल सकती हे वह उतने से भी ज्यादा झूठ बोलती हे . इसका सबसे जोरदार नमूना गरीवों की गणना में देखने को मिल सकता हे . योजना आयोग ने गरीव लागों की गड़ना के नियम इस तरह के बनाये की ज्यादातर उससे बहार  ही रह गये क्यों की वह विश्व  को समर्द्ध और विकसित देश दिखाना चाहता था . उसने इस तरह का गणना प्रारूप बनाया की गरीवी काम दिखे . सो हुआ भी यही की उनके अनुसार की गी गणना सिर्फ २७.५ प्रतिसत ही रही . देश के लगभग सभी राज्य इस गणना से अस्न्तुस्ट थे , मगर योजना योग की दादागिरी को कोंन रोक सकता हे . बाद में अर्जुन सेनगुप्ता समिति ने जब यह घोषणा की कि देश कि ७७ प्रतिशत आबादी गरीब हे तो यह चर्चित विषय बन गया , संसद में बात बात में यह उदाहरन आने लगा कि ७७ प्रतिशत लोग २० रूपये से भी काम में प्रतिदिन गुजर बसर करते हें . यह एक क्ररुर सच भी हे. भारत कि शांति प्रिय  जनता कि सहन शक्ति कि कटिन परीक्षा भी थी . योजना अयोग़ के पूर्व सदस्य एन सी सक्सेना के नेत्रत्व वाली एक एनी समिति का भी आकलन हे कि देश में ५० फीसदी लग गरीव हें . एक और समिति गठित हुई नाम सुरेश तेंदुलकर समिति , क्

एक ही उपलब्धी - तरसती जनता और तरसता गरीव

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अब जोर से नारा लगाओ , सी बी आई  हमारी  हे हमको वोट दिलाती हे . सी बी आई  जिन्दावाद कांग्रेस पार्टी जिदावाद . य़ू पी ए कई सरकार कई दूसरी पारी का एक साल बीत गया हे . २१ मई २०१० को उसकी वर्षगांठ  थी इस एक साल क़ी सबसे चर्चित उपलब्धी यही हे क़ी कांग्रेस के हाथ एक येशा मन्त्र लगा हे क़ी उसकी अल्पमत सरकार पूरे ५ साल चलेगी , क्यों क़ी भगबान क़ी दया से ज्यादातर प्रदेश स्तरीय दल और उनके नेता जी भ्रस्ट हें . सब पर आय से अधिक धन या सम्पत्ति हे . सबके  सब सी बी आई के दायरे में हें . सो हमारी सम्पत्ति हमें दो हमारा धन हमें दो और हमसे समर्थन ले लो , फायदा तो यह हे क़ी अब कांग्रेस को बिना मंत्री पद क़ी इक्षा  के भी वोट मिल रहे हें . खेर गत सरकार को नोटों से बचाने वाली कांग्रेस को यह तो फायदा ही हे क़ी अब बिना पैसा सरकार चलेगी . - इस सरकार क़ी सबसे बड़ी कामयाबी यह हे क़ी सीना ठोक कर मन्हगाई बड़ी , सरकार रोज रोज मंहगाई बड़ ने से खुश हुई . उन्हें शर्म्म नही आई . सरकार के मंत्रियों ने बयाँ दे कर इसका स्वागत किया . जायज बताया . और भी बदने क़ी कामना क़ी . जेसे क़ी इन मंत्रियों को मन्हगाई में से कमीसन

राजीव गाधी को , कांग्रेस की श्रधान्जली झूठी.....

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राजीव गाधी की दुखद हत्या २१ मई १९९१ में हुई थी . तब यह सामने आया था की हत्या के लिए एल टी टी ई जिम्मेवार  हे उसकी सुबह चिन्तक ड़ी एम् के की करुनानिधि सरकार को १९९१ में बर्खास्त कर दिया गया था, तब कांग्रेस की १ नम्वर दुश्मन करुनानिधि की पार्टी थी . केंद्र में गुजराल सरकार का हिस्स भी ड़ी एम् के थी और जेन आयोग  ने भी इस की भूमिका को संदिग्ध ठहराते हुए टिप्पणी की थी . तब कांग्रेस ने गुजराल सरकार से समर्थन वापिस  ले लिया था . और सरकार को गिरा दिया था .तब तक कांग्रेस को और सोनिया जी को राजीव बड़े थे , दुश्मन दुश्मन था . मगर सत्ता का सुख बहुत बुरा होता हे सब कुछ भुला देता हे . आज जब भारत सरकार कांग्रेस चला रही हे तब कुराना निधि को गले लगाया जा चूका हे . कांग्रेस और करुणानिधि आब एक हें . कुछ साल पहले शत्रु थे , स्वार्थ की दोस्ती हे , राजीव की जाँच कर रहे, जेन  आयोग ने हत्या के लिए करुणानिधि के सामने ऊँगली उठाई थी . मगर सत्ता की लिए सब भूल गये .  . प्रश्न यह हे की सोनिया के होते हुए भी जब स्वर्थ बड़ा हे तो फिर राजीव क्या हें . उनके तो वे पति थे और की बात छोडो मगर उन्हें तो यह नही कर्ण चाहिए

भारत संचार निगम - मुझे बचाव मुझे बचाव

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भारत संचार निगम कुछ समय में घाटे में आकर डूब जायेगा और फिर इस बीमार सार्वजनिक उपक्रम कहलाने लगेगा , क्यों की गठबधन सरकार की सोदे बाज़ी में,.यह मॉल कमाऊ विभाग DMK  दल पर हे . यह दल is  विभाग से खूब पैसा बना रहा हे . इसमें सरकार की भी रजामंदी हे . क्यों की उन्हें सरकार चलानी हे .समर्थन चाहिए . में खुद भी एक संसद सदस्य के निकट रहा हु और टी ए सी का भी सदस्य रहा हूँ . मेरा अनुभव  हे की जानबुझ कर भारत संचार निगम को  डुबोया जा रहा हे . इस निगम को बचने के लिए इसके कर्मचारियों ने प्रदर्सन किये हें . उन्होंने बहुत साफ साफ आरोप भी लगाये हें की भारत सरकार, प्राईवेट टेलिकॉम कंपनियों को लाभ पहुचने के लिए यह कर  रही हे यह सच हे की भारत संचार निगम के लिए जितने उपकरण चाहिए उसे खरीदने की अनुमति नही मिल रही हे . उसे मंत्रालय जानबुझ  कर vilnmv  दर विलम करता जा रहा हे ताकि प्रिवेट कंपनियों को लाभ हो जाये और बी एस एन  एल की गुणवत्ता खराब हो जाये . यह कृत्य लंबे सालों  से चल  रहा हे , anekon bar prsn snsad ke sadnon men uth chuke hen .  प्रधान मंत्री को जानकारी में हे . गठ बंधन  की कीमत हे . केंद्र सरकार न

अफजल गुरु जेसे आतंकवादी कांग्रेस के घरजमाई

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न्यू देहली , संसद भवन पर १३ दिसम्बर २००१ को हमला हुआ था , उस का मास्टर माईंड अफजल गुरु को स्थानीय अदालत २००२ में , उच्च न्यायलय २००३ में और सर्वोच्च न्यायाके २००५ में फांशी की सजा सुना चूका हे , अब किस बात का इंतजार हो रहा हे । संसद पर हमला देश के मष्तिष्क पर हमला था , सिपाहियों की सूझ बुझ से सांसद बच गये तो आप खामोश ही हो गये । यह मामला और अन्य मामले भिन्न हें , यह मामला देश की सम्प्रभुता की गिरेवान पर हाथ डालना हे। इस तरह के मामले में , कोई क्रम बाध्यता नही देखि जाती । इंदिरा जी के हत्यारों ने भी बचाव का यह रास्ता चुना था मगर उसका निव्टारा तुरंत कर दिया गया था । कोई कानून नही हे क्रम का । जब तय हे की दया याचिका का कोई महत्व ही नही हे तो विल्म्वित करने का क्या ओचित्य हे । सामान्य प्रकरणों में दया याचिका का पश्न हे । मगर देश के साथ युद्ध जेसे विषयों पर जब यह तय हे की माफ़ी होही नही सकती तो लम्बित करने का मतलब क्या हे . कांग्रेस के प्रवक्ता कह रहे हें की अभी तक राजीव गाँधी के हत्यारों को फंशी नही दी गई हे . बुरा न मने विदेशों में तो राजीव जी की हत्या के लिए कुँत्रोची को जिम्मेवार

शेखावत - एक जीवन परिचय

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राजस्थान का एक ही सिंह, भेंरोसिंह..... , भेंरो सिंह..... , यह नारा बहुत सालों से गूजता रहा , अब यह नारा नही लगेगा , क्यों की शेखावत साहव नही रहे । १६ मई २०१० को उनकी अंतिम यात्रा निकली जिसमें जयपुर सहित राजस्थान से भारी संखया में लोग पहुचे । देश की जानी मानी हस्तिय आं समिलित हुई । यात्रा मार्ग में रह रह कर बार बार गूजता रहा ...... जब तक सूरज चाँद रहेगा , शेखावत तेरा नाम रहेगा। वे सचमुच राजस्थान की शान थे । उनका जन्म धनतेरस, २३ अक्तूबर १९२३ को हुआ था । पिता देवी सिंह अध्यापक और माता बन्ने कंवर , मध्यम वर्गीय राजपूत परिवार था । शेखावत सूर्यवंशी कछवाह राजपूत होते हें । उनके तीन भाई विशन सिंह , गोर्धन सिंह, लक्ष्मण सिंह । शिक्षाफर्स्ट इयर , विवाह १९४१ में सूरज कंवर से विवाह कर दिया गया .इसी वर्ष पिता जी का देहांत हो गया । सो उन्हें पुलिस की नोकरी करनी पड़ी मगर १९४८ में पुलिस छोड़ दी। तब राजस्थान की गठन प्रक्रिया चल रही थी । वे जनसंघ के संस्थापक काल से ही जुड़ गये और जनता पार्टी तथा भा ज पा की स्थापना में भी सक्रिय रहे । १९५२ में वे १० रूपये उधर ले कर दाता रामगढ से दीपक चुनाव चिन्ह

शेखावत - एक जन नेता का जाना

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१५ मई २०१० को उप राष्ट्रपति रहे भैरो सिंह शेखावत का निधन हो गया । पूरी आयु पा कर वे गए । काफी दिन से केंसर के बीमार थे । उनकी मुक्ति पर शोक का कोई कारन नही हे । वे महान नेता थे । बहुत लम्बे राजनेतिक जीवन में उन पर कभी कोई लांछन नही लगा । नही कभी ओछी राजनीती का आरोप आया । राष्र्टवादी राजनीती के शीर्ष पुरुष थे । अटल जी और अडवानी जी के समान उनका नाम भी , गेर कांग्रेसी दिग्गजों में सुमार होता हे । यु तो बहत सी बातें हें जिन्हें गिनाया जा सकता हे । मगर एक बात ही सबसे बड़ी हे की ,१९७७ तक आम तोर पर सरकार जनता पर बड़ी धन राशी खर्च नही करती थी । अन्त्योदय योजना के द्वारा उन्हों ने सबसे पहले गरीव आदमी को , पिछड़े आदमी को धन उपलध करवा कर , उसके जीवन स्तर को ऊँचा उतने का काम प्रारंभ किया था । उही की योजनाओं के कारन आज , बहुतसी योजनायें गरीबों के पक्ष में बनी और लागु हुई । उन्हें ही ओ बी सी वर्ग को सब से पहले राजस्थान में अरकक्ष्ण देने का s hrey जाता हे। वे एक आम आदमी के नेतृत्व करता थे । उन्होंने हमेसा एक आम आदमी की हिमाकत की । इतिहाश में उनकी राजनेतिक शेली पर लम्बे समय तक शोध होते रहेंगे । अरव

मुलायम,मायाबती,लालू और शोरेन - गरिवों के वोट से आमिरी का आनंद

राजनीती में अपनी पोजीसन से अकूत कमाने वाले नेताओं में चर्चित मुलायम , मायाबती , लालू और शोरेन सहित बहुत से नाम हें । इनकी शिरू आती पोजीशन की भी पड़ताल होनी चाहिए । १ - मायाबती - दिल्ली के करोल बाग़ स्थित संत नगर स्लम बस्ती में एक कमरे में रहती थी। इनके पिताजी प्रभुदयाल जी गोलडाक घर में मामूली पेकर थे , ये खुद नगर निगम के प्रैमरी स्कूल में नोकरी करती थी। इनके पास कितनी सम्पत्ति हे यह इन्हें खुद ही पता नही हे । सभी अंदाजों से कही ज्यादा । २ - मुलायम - आगरा के एक स्कूल में ७० रूपये मासिक के मामूली अध्यापक थे , १५०० करोड़ की सम्पत्ति बताई जाती हे। उच्च तम न्यायलय ने जाँच के आदेस दिए थे । मजबूत मुकदमा था । जब भी कांग्रेस कहती हे ये तमाम तमासें के बाद भी वोट उशी को देते हे । ३- लालू प्रशाद - गोपाल गंज , बिहार में बहुत ही मामूली परिवार में जन्मे , जयप्रकाश जी के आन्दोलन में राजनीती में आये , पहले संसद बने, फिर विधायक और बिहार के मुख्य मंत्री , चारा घोटाले में जेल गये , पत्नी को मुख्य मंत्री बनाया , अमीरी की पो बहार हे । कोन नही जनता की यह कहाँ से आई हे । ४- शिबू शोरेन - झारखंड के आदिवासी

सीबीआई - सोनिया जी की बाई .....

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भा ज पा ने संसद में सी बी आई के चाल चलन को ले कर बहस करना चाहती थी मगर वह नही हो सकी । तब उन्होंने महामहिम से मिलने का और देश भर में १२ मई २०१० को धरना करने का कम किया । इस से जन जागरण तो हुआ हे मगर यह विषय अभी भी एक दम से समझ में नही आ रहा हे और ज्यादा आच्छे डंग से समझाना होगा । कांग्रेश ने तो आपना हित इसलिए साध लिया की लालू मुलायम माया सिबू और न जाने कितनी लम्बी कतार हे राजनीती में जिन्होनें सात सात पीढ़ी का इंतजाम कर लिया हे । पोजीसन के प्रभाव से पैसा बनाने में सभी ने कांग्रेश की नक़ल की हे । यह तो आच्छा हे की उनकी पहुच बड़ी बड़ी मछ्लीयें पर ही हे अन्यथा हजारों की संखया में छुट भेइया नेता भी फंसे होते । देश में भक्त कुछ भगबान भरोसे चल रहा हे उसमें न्याय भी हे । कांग्रेस ने सी बी आई का दूर उपयोग तो जम कर किया हे , क्वात्र्ची को बचाने में क्या कुछ नही किया , समझ से परे तो उन नमक हरामों की हे जो तनखाह तो जनता के टेक्स से लेते हें और बजाते भ्रष्ट नेताओं की हे , इससे भी शर्मनाक सिख विरोधी १९८४ के दंगों के मास्टर माइंड कांग्रेस के दिग्गज नेता जगदीश टाईटलर को अदालत से बरी करबाने में किया

विदेसीकरण का बड़ता प्रभाव

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एक तरफ भारत आजाद हो रहा , दूसरी और कोमनवेल्थ की इतनी जल्दी थी की ,संविधान सभा में तक बहस नही चाहते थे , वह तो राजेन्द्र प्रशाद जी का भला हो कि उन्होंने सदस्यों को बोलने कि इजाजत दे दी । नेहरु जी ने देश को स्वभाविक रूप से स्वतंत्र नहीं होने दिया । वे विदेश में पड़े लिखे । उन्हें विदेशी विचार और चाल चलन कुछ अधिक ही पसंद थे । फिर उनका रूस प्रेम सबने देखा हे । उनका काम्नुज्म प्रेम तो इतना अधिक था कि उन्होंने चीन कि मदद करने के लिए तिब्बत पर जो भारत के अधिकार थे वे भी चीन के कारण छोड़ दिए । चीन को इक रास्ट्र का दर्जा दिया और उसके लिए संयुक्त रास्ट्र संघ में गये । चीन ने काम निकलते ही भारत को हडपने का काम शिरू कर दिया । नतीजा १९६२ का युध और इसके वाद से लगातार अघोसित युध । पाकिस्तान ने चीन की ही सह पर भारत से युद्ध लड़े और आतंकवादी लड़ाई लड़ रहा हे । बहुत सी कहानियां हें जो विदेशी प्रेम के कारण हुए नुकसान कि गवाही देती हें । मगर यह सब जान कर भी हाल ही में , विदेसी विश्व विद्यालयों के भारत में प्रवेश का रास्ता साफ कर दिया और अमेरिका के साथ परमाणु संधि का कानून बिना बहस के पास कर दिया, इतनी

माओबाद की तारीफ करता को जेल होनी ही चाहिए

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केन्द्रीय ग्रह मंत्री पी चिदम्बरम खुद तो माओबाद और नक्सलबाद के प्रति कट्टर नजर आ रहे हें । यह बात दूसरी हे की कांग्रेस और उसके कुछ साथी उनसे सहमत नही हें । कांगेस महा सचिव दिग्विजय सिंह ने कांग्रेस की अंदरूनी सच्चाई को एक लेख के जरिये भले ही उजागर कर दिया हो मगर पार्टी के रूप में कांग्रेस सिंह का समर्थन खुल कर नही कर सकती हे । लेकिन सच यही हे की कांग्रेस सत्ता के लिए अन्दर से हाथ मिलाये हुए हे । उसका साथी दल ममता जी तो खुले आम पश्चिमी बंगाल में माओबाद का साथ ले रही हें ; आन्ध्र में कांग्रेस ने साथ लिया था । कहाँ कहाँ हाथ मिले हें यह तो कांग्रेस और उसके साथी ही जाने मगर अब यह समझ जाना चाहिए की ये देश के दुश्मन हें । कहा जाता हे की भारत की पूरा संपदा को कभी की लि त्ते के जरिये ही चोरी छुपे इटली भेजा जाता था , सोनिया जी के रिश्ते की दुकान में बाद में उसी ने राजीव को मार डाला । शेतन की दोस्ती भी बुरी और दुश्मनी भी बुरी , इसलिए माओबाद और उसके हिन्दुस्तानी रूप नक्सलबाद से रास्ते तोड़ो । संसद में भले ही चिदम्बरम ने पोटा और टाडा की आवश्यकता नकार दी हो , वे विपक्ष के नेता अरुण jethali की बात

सुनो लालू जी तुम गद्दार - अनंत तुम शावास

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प्रत्येक जनगणना में यह प्रश्न उभरता हे की , कुछ मामलों में जनसंख्या अविश्वसनीय प्रक्रति से बड रही हें और इसका कारन सामन्य जन्म दर नही हे । विशेषग्य मानते हें की इसके मूल में घुसपेठ ही हे । बंगला देस की करोड़ो की आबादी हर वर्ष भारत में घुस आती हे । इन्हें बंगला देसी कहते हें । ये योजना पूर्वक भारत में घुस पेठ कर मतदाता सूचि में अपना नाम जुड़ बाते हें । रासन कार्ड सहित सारी सुबिधायें प्राप्त कर लेते हें । क्यों की हम बहुत भ्रष्ट हें । असम में इनकी संख्या हार जीत का निर्णय करती हे । पश्चिमी बंगाल और बिहार के कई जिलों पर इनका प्रभत्व हो गया हे । कई चुनाव क्षेत्र इनके समर्थन से जीते जाते हें । कुल मिला कर मुस्लिम बहुलता लेन के सभी तरीके चल रहे हें उनमें से एक घुस पेठ भी हे। यह जग जाहिर और खुले आम हे। यह भारत को मुस्लिम जनसंख्या को बढ़ा कर इस्लाम के नियन्त्रण में लेने की साजिस हे । १९४७ का १४ अगस्त इस बात का गवाह हे की जब मुस्लिम बलसाली हुआ , तब उसने कांग्रेश के ही छति पर पैर रख कर पाकिस्तान बना लिया । कश्मीर में अलगाव की यही बहुसंख्य समस्या हे । जहँ भी हिदू कम हुआ वहीं देश से अलग होने

हिंदुत्व- कुंडलनिया जाग्रत हो गई प्रहलाद जानी की

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प्रहलाद जानी अहमदावाद के एक अस्पताल में आइसोलेसन वार्ड में रखे गये हें । जहाँ भारतीय रक्षा अनुसन्धान संस्थान विभाग उन पर निकट से निगरानी रख रहा हे । संस्थान का मानना हे कि जानी में कोई नैसर्गिक गुण हे , जिसकी मदद से वो जीवन बचा सकता हे , जानी अनेकानेक वर्षों से बिना अन्न जल के जीवित हें। उनकी उम्र ८१ वर्ष की हे और ७० वर्ष से उन्होंने अन्न जल ग्रहण नही किया हे । निगरानी कर रहे डॉक्टरों का कहना हे कि भूख और प्यास का इनके शरीर पर कोई विपरीत असर नही हे। वैज्ञानिको का कहना हे कि जानी किस तरह से भूख पर विजय पाए हुए हें यह रहस्य पता लग जाये तो आपदा , सेना और अन्तरिक्ष यात्रा में भारी मदद मिलेगी । डिफेंस इंस्टीटुट आफ फिजियोलाजी एंड एलायड साइंस के निदेसक डॉ जी इलाव घागन के साथ ३५ विशेषज्ञ कि टीम आश्चर्य में हे कि , बिना अन्न जल के ही जानी के संस्त अंग सही सही कम कर रहे हें । अन्न बिना कुक्ष भी सम्भब नही हे , एक्सज जल के बिना तो किडनी काम ही नही कर सकती , जानी के शरीर में बिना जल पिए पेसाब बन रहा हे और शरीर में ही अवशोषित हो रहा हे । किडनी सही काम कर रही हे और रक्त प्रणाली पूरी तरह सही हे

खेलसघ का पदाधिकारी खिलाडी क्यों नही

हम आज तक नही समझ सके की खिलाडी को खेल संघ का अध्यछ या पदाधिकारी बनाना अनिवार्य क्यों नही होता । नियम तो सरकार बनाती हे । अभी एक पदाधिकारी को दो वार पद पर रहने का नियम बनाना भी एक प्रकार से राजनेतिक लोगों के लिए फायदा पहुचाना हे । खेल मंत्री जगे तो सही मगर अधूरी ईमानदारी से ... , वर्तमान खेल संघों से खेल की दुर्दसा का कारन पूछा जाना चाहिए । लालू का शरद का या सी पी जोशी का क्रिकेट से क्या लेना देना । मगर पदाधिकारी ये हें । जो क्रिकेट खिलाडी हें उनकी स्थिति तो कर्मचारी जेसी हे । येसा सभी जगह हे । सभी खेल संघों में हे । सभी खेल संघों में सही पदाधिकारी नही हें । कहीं धना सेठ या कही राजनेता इन पदों पर बेठे हे । क्रिकेट में भी काफी समय तक दुर्दशा रही हे । खिलाडियों की म्हणत पर पूजीपति मजे कर रहे हें । सबाल यह हे की इनका इसमें सहयोगी योगदान भी नही रहा , आज खेल की दुर्दशा इन्ही के द्वारा हुई हे । विश्व में भारत का नाम इन्ही के कारन कलंकित हुआ हे । सच यह हे की अगर खेल संघ सही बन जाए तो देश का नाम कलंकित होना बंद हो जाय । हमारी विश्व प्रतियोगिता में नाम रोशन होनें लगे , मगर in bich के दल