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जुलाई, 2020 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

सोमनाथ- हिन्दू स्वाभिमान का प्रतीक

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जय सोमनाथ हिन्दू स्वाभिमान की पुनप्र्रतिष्ठा का अमर प्रतीक - आलोक गोस्वामी भारत के पश्चिमी सागर तट पर स्थित है भगवान सोमनाथ का विशाल मंदिर। मंदिर के चारों ओर जो क्षेत्र है उसे प्रभास पाटण अथवा पट्टण कहते हैं। पट्टण का अर्थ है सागर के निकट का स्थान। गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र में जूनागढ़ जिले का अंग प्रभास पाटण सोमनाथ मंदिर के कारण भारत का एक प्रमुख तीर्थ बन गया है। पूर्व में सोमनाथ मंदिर पर मुगल आक्रांताओं ने बार-बार आक्रमण करके उसे ध्वस्त किया और लूटा था। इस पर सबसे पहला आक्रमण मोहम्मद गनजी ने 1026 ईसवी में किया था। सोमनाथ पर अंतिम आक्रमण औरंगजेब के अधीन गुजरात के मुगल सूबेदार मोहम्मद आजम ने 1701 ईसवी में किया था। मन्दिर न्यास का स्वरूप 18 अक्तूबर, 1949 में सर्वप्रथम सोमनाथ मन्दिर न्यास का गठन किया गया, जिसके सदस्य थे- श्री दिग्विजय सिंह (जामसाहब, नवानगर), श्री सामलदास गांधी, श्री एन.वी. गाडगिल, श्री डी.वी. रेगे (प्रांतीय आयुक्त, सौराष्ट्र), श्री बृजमोहन बिरला व डा.क.मा. मुंशी। तत्पश्चात् 15 मार्च, 1950 को श्री सोमनाथ न्यास के अनुबंध-पत्र की प्रस्तुति की गई।

रामलला : 27 साल 3 महीने 18 दिन तंबू में किसके कारण ?

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रामलला : 27 साल 3 महीने 18 दिन  तंबू  में किसके कारण ?                                         6 दिसंबर 1992 से 25 मार्च 2020 - टाट के नीचे हैं रामलला https://aajtak.intoday.in/video/ramlala-shift-to-temporary-bullet-proof-structure-in-uttar-pradesh-1-1174604.html अयोध्या: 27 साल 3 महीने 18 दिन बाद तंबू से बाहर निकलेंगे रामलला, तारीख तय विवादित ढांचा विध्वंस के बाद से रामलला मानस भवन के पास टाट के नीचे रखे गए थे। अब 27 साल बाद उन्हें यहां से शिफ्ट करके फाइबर के मंदिर में 24 मार्च को स्थापित कर दिया जाएगा। इस दिशा में काफी जोर-शोर से तैयारियां चल रही हैं वी.एन. दास |नवभारत टाइम्स | Updated: 07 Mar 2020 हाइलाइट्स अयोध्या में 27 साल बाद तंबू से बाहर रामलला को किया जाएगा शिफ्ट बुलेटप्रूफ फाइबर मंदिर में 24 मार्च को रामलला की होगी शिफ्टिंग राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्र्स्ट के महासचिव चंपत राय ने दिया बयान 6 दिसंबर 1992 से एक तंबू के नीचे रखी गई है रामलला की मूर्ति 6 दिसंबर 1992 से टाट के नीचे हैं रामलला अयोध्या अयोध्या में राम मंदिर निर्माण को लेकर सरगर्मियां त

रामसेतु (एडम ब्रिज) 17.5 लाख वर्ष पूर्व

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हिन्दुत्व करोडों वर्ष पूर्व से है: नासा ने कहा है रामसेतु (एडम ब्रिज) 17.5 लाख वर्ष पूर्व का है। राम सेतु नहीं, नल सेतु कहो... अनिरुद्ध जोशी   भारत के दक्षिण में धनुषकोटि तथा श्रीलंका के उत्तर पश्चिम में पम्बन के मध्य समुद्र में 48 किमी चौड़ी पट्टी के रूप में उभरे एक भू-भाग के उपग्रह से खींचे गए चित्रों को अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (नासा) ने जब 1993 में दुनिया भर में जारी किया तो भारत में इसे लेकर राजनीतिक वाद-विवाद का जन्म हो गया था। एडम ब्रिज नहीं, नल सेतु कहो : इस पुल जैसे भू-भाग को राम का पुल या रामसेतु कहा जाने लगा। सबसे पहले श्रीलंका के मुसलमानों ने इसे आदम पुल कहना शुरू किया था। फिर ईसाई या पश्चिमी लोग इसे एडम ब्रिज कहने लगे। वे मानते हैं कि आदम इस पुल से होकर गुजरे थे। रामसेतु का चित्र नासा ने 14 दिसम्बर 1966 को जेमिनी-11 से अंतरिक्ष से प्राप्त किया था। इसके 22 साल बाद आई.एस.एस 1 ए ने तमिलनाडु तट पर स्थित रामेश्वरम और जाफना द्वीपों के बीच समुद्र के भीतर भूमि-भाग का पता लगाया और उसका चित्र लिया। इससे अमेरिकी उपग्रह के चित्र की पुष्टि हुई। भारत के

श्रीराम जनम भूमि रथ यात्रा : लालकृष्ण आडवाणी

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श्रीराम जनम भूमि रथ यात्रा लालकृष्ण आडवाणी अयोध्यानामा : जब सोमनाथ से आयोध्या तक लालकृष्ण आडवाणी ने निकाली थी रथयात्रा लाइव हिन्दुस्तान टीम, नई दिल्ली। | Published By: Shivendra Last updated: Fri, 08 Nov 2019 1949 से 1986 तक, करीब 37 वर्षों में राम जन्मभूमि का मामला जो जस का तस था, वह केवल तीन सालों में शिलान्यास तक पहुंच गया। आंदोलन की कमान संभाल रहे संघ परिवार के संगठन विहिप का आत्मविश्वास पूरे उफान पर था। संघ परिवार को लगने लगा था कि राम मंदिर निर्माण का स्वप्न निकट भविष्य में साकार हो सकता है। अब तो जनता ने भी इसे एक महत्वपूर्ण मुद्दे के रूप में स्वीकार कर लिया था। लिहाजा तैयारियां और जोर पकड़ने लगीं। साधु-संतों के साथ मिलकर विहिप ने कई कार्यक्रमों की घोषणा कर दी। शास्त्रीय संगीत के अच्छे जानकार विहिप के अशोक सिंहल ने इस पूरे मामले में हिंदुओं के सम्मान का सुर मिला दिया था। राम जन्मभूमि मुद्दे पर पूछे गए एक सवाल कि अयोध्या में अगर एक मंदिर नहीं बनेगा, तो क्या हो जाएगा? - पर अशोक सिंहल का स्पष्ट जवाब था- अगर अयोध्या में जन्मभूमि पर राम का मंदिर नहीं बनेगा, तो

विस्तारवाद का युग समाप्त हुआ - मोदी

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लेह में बोले PM मोदी- हम बांसुरीधारी और सुदर्शनधारी कृष्ण की पूजा करने वाले लोग; पढ़ें 10 खास बातें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को लेह में चीन का बिना जिक्र किए उसपर निशाना साधा। वहीं, पीएम मोदी ने कहा कि हम वो लोग हैं, जो बांसुरीधारी और सुदर्शन चक्रधारी श्रीकृष्ण भगवान की पूजा करते हैं। लेह में पीएम मोदी ने जवानों से कहा कि आपका यह हौसला, शौर्य और मां भारती के मान-सम्मान की रक्षा के लिए आपका समर्पण अतुलनीय है। आपकी जीवटता भी जीवन में किसी से कम नहीं है। जिन कठिन परिस्थितियों में जिस ऊंचाई पर आप मां भारती की ढाल बनकर उसकी रक्षा, उसकी सेवा करते हैं,उसका मुकाबला पूरे विश्व में कोई नहीं कर सकता है। पढ़ें. पीएम मोदी के संबोधन की 10 खास बातें: 1- आप उसी धरती के वीर हैं, जिसने हजारों वर्षों से आक्रांताओं के हमलों और अत्याचारों का मुंहतोड़ जवाब दिया। हम वो लोग हैं, जो बांसुरी धारी कृष्ण की पूजा करते हैं तो हम वो ही लोग हैं, जो सुदर्शनधारी कृष्ण को भी आदर्श मानकर चलते हैं। इसी प्रेरणा से हर आक्रमण के बाद भारत और सशक्त होकर उभरा है। 2- राष्ट्र, दुनिया और मानवता की प्रगति के

काश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था

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Hariom Panwar धारा 370 के बाद हरिओम पवार की कविता 2020 - 29 Year old Poem | By Hariom Panwar अमर उजाला, काव्यडेस्क, नई दिल्ली मशहूर कवि हरिओम पंवार भारत की राष्ट्रीय अस्मिता के गायक हिन्दी कवि हैं।  मूलत: वीर रस के कवि हैं। अपनी प्रस्तुतियों के लिए जाने जाते हैं। जब अपनी कविताओं का पाठ करते हैं तो युवाओं के मन में जोश आ जाता है। कश्मीर की समस्या पर उद्वेलित होकर उन्होंने ये कविता लिखी, जिसे आज पाठकों के लिए प्रस्तुत किया जा रहा है- घाटी के दिल की धड़कन काश्मीर जो खुद सूरज के बेटे की रजधानी था डमरू वाले शिव शंकर की जो घाटी कल्याणी था काश्मीर जो इस धरती का स्वर्ग बताया जाता था जिस मिट्टी को दुनिया भर में अर्ध्य चढ़ाया जाता था काश्मीर जो भारतमाता की आँखों का तारा था काश्मीर जो लालबहादुर को प्राणों से प्यारा था काश्मीर वो डूब गया है अंधी-गहरी खाई में फूलों की खुशबू रोती है मरघट की तन्हाई में ये अग्नीगंधा मौसम की बेला है गंधों के घर बंदूकों का मेला है मैं भारत की जनता का संबोधन हूँ आँसू के अधिकारों का उदबोधन हूँ मैं अभिधा की परम्परा का चारण हूँ आ

गुरू-पूर्णिमा

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Jump to navigation Jump to  आषाढ़   मास की   पूर्णिमा   को गुरु पूर्णिमा कहते हैं। इस दिन गुरु पूजा का विधान है। गुरु पूर्णिमा वर्षा ऋतु के आरम्भ में आती है। इस दिन से चार महीने तक परिव्राजक साधु-सन्त एक ही स्थान पर रहकर ज्ञान की गंगा बहाते हैं। ये चार महीने मौसम की दृष्टि से भी सर्वश्रेष्ठ होते हैं। न अधिक गर्मी और न अधिक सर्दी। इसलिए अध्ययन के लिए उपयुक्त माने गए हैं। जैसे सूर्य के ताप से तप्त भूमि को वर्षा से शीतलता एवं फसल पैदा करने की शक्ति मिलती है, वैसे ही गुरु-चरणों में उपस्थित साधकों को ज्ञान, शान्ति, भक्ति और योग शक्ति प्राप्त करने की शक्ति मिलती है। यह दिन महाभारत के रचयिता व्यास का जन्मदिन भी है। वे संस्कृत के प्रकांड विद्वान थे और उन्होंने चारों वेदों की भी रचना की थी। इस कारण उनका एक नाम वेद व्यास भी है। उन्हें आदिगुरु कहा जाता है और उनके सम्मान में गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा नाम से भी जाना जाता है। भक्तिकाल के संत घीसादास का भी जन्म इसी दिन हुआ था वे कबीरदास के शिष्य थे। शास्त्रों में गु का अर्थ बताया गया है- अंधकार या मूल अज्ञान और रु का का अर्थ कि