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भारतीय डाक्टर्स डे - अरविन्द सिसौदिया , कोटा 9414180151

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                    भारतीय डाक्टर्स डे - अरविन्द सिसौदिया , कोटा 9414180151 कोरोना संक्रमण से लडाई जिन योद्धाओं ने लडी, सम्पूर्ण विश्व में उनमें अव्बल भारतीय चिकित्सक ही थे। दोनों लहरों को जिस तेजी से काबू किया और मृत्यु दर को लगभग रोक कर रखा तथा नागरिकों का जीवन बचाते हुये, हजारों चिकित्सक एवं चिकित्सा कर्मी एवं अन्य शहीद भी हो गये। हम उनका जीवन तो वापस नहीं ला सकते किन्तु उनके प्रति हमारी अनंत कोटी कृतज्ञता ही व्यक्त कर सकते हैं। उन्हे याद कर सकते है। ईश्वर उन्हे अपने धाम में स्थान दें। यह भारत की उस गौरवशाली परम्परा से ही संभव हुआ जिसमें चिकित्सक को ईश्वर माना जाता है। उनकीे ईश्वरतुल्य समाजसेवा के लिये भारत कोटि कोटि आभार ज्ञापित करता है। भारत में यूं तो हम कीरोडों वर्षों से दिन विशेष मनाते रहे है। पर्व त्यौहार भी इसी निमित्त मनाये जाते है। यूं भी पहला चिकित्सक ईश्वर ही है। उसने हमारे शरीर में स्वचलित स्वास्थय लाभ एवं स्वास्थ्य की क्षतीपूर्ती की व्यवस्था की है और वही हमें जन्म देती है, जीवन करे जिन्दा रखती है। समय समय पर जब शरीा संकट में पढता है जो वह उससे उवारती है। घाव को भरने वाल

डाक्टर्स डे : भारत में चिकित्सा शास्त्र का प्रारंभ..

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           आरोग्य के देव भगवान धनवन्तरी (भगवान विष्णुजी के अवतार) जिनकी पूजा धेनरस के दिन दिपावली पर होती है। भारत में सबसे बडा धन निरोगी काया को माना गया है। भारतीय शल्य चिकित्सा के सबसे बडा उदाहरण अग्रपूज्य गणेश जी है। जिनका मस्तक भगवान विष्णुजी ने कट जानें के बाद पुनः स्थापित किया था । दूसरा बडा जिक्र संजीवनी बूटी के रूप में रामायण में है।  भारत में चिकित्सा एवं विज्ञान के संदर्भ में जो पुरातन अविष्कार हैं आज उनकी संझिप्त चर्चा प्रासंगिक है। - अरविन्द सिसौदिया, कोटा 9414180151  ------- आरोग्य के देव भगवान धनवन्तरी मंत्र    ॐ नमो भगवते महासुदर्शनाय वासुदेवाय धन्वंतरये अमृतकलशहस्ताय सर्वभयविनाशाय सर्वरोगनिवारणाय त्रिलोकपथाय त्रिलोकनाथाय श्रीमहाविष्णुस्वरूपाय श्रीधन्वंतरीस्वरूपाय श्रीश्रीश्री औषधचक्राय नारायणाय नमः॥ अस्त्र    शंख, चक्र, अमृत-कलश और औषधि सवारी    कमल आरोग्य के देव भगवान धनवन्तरी..... हिन्दू धर्म में एक देवता हैं। वे महान चिकित्सक थे जिन्हें देव पद प्राप्त हुआ। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार ये भगवान विष्णु के अवतार समझे जाते हैं। इनका पृथ्वी लोक में अवतरण समुद्र मंथ

याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत - अरविन्द सीसौदिया

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 26 जून: आपातकाल दिवस के अवसर पर याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत - अरविन्द सीसौदिया      मदर इण्डिया नामक फिल्म के एक गीत ने बड़ी धूम मचाई थीः दुख भरे दिन बीते रे भईया, अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया छायो रे!     सचमुच 1947 की आजादी ने भारत को लोकतंत्र का सुख दिया था। अंग्रेजों के शोषण और अपमान की यातना से मातृभूमि मुक्त हुई थी, मगर इसमें ग्रहण तब लग गया जब भारत की सबसे सशक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया, तानाशाही का शासन लागू हो गया और संविधान और कानून को खूंटी पर टांग दिया गया। इसके पीछे मुख्य कारण साम्यवादी विचारधारा की वह छाया थी जिसमें नेहरू खानदान वास्तविक तौर पर जीता था, अर्थात साम्यवाद विपक्षहीन शासन में विश्वास करता हैं, वहां कहने को मजदूरों का राज्य भले ही कहा जाये मगर वास्तविक तौर पर येन-केन प्रकारेण जो इनकी पार्टी में आगे बढ़ गया, उसी का राज होता है। भारतीय लोकतंत्र की धर्मजय     भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्ष होने को आये। इस देश ने गुलामी और आजादी तथा लोकतंत्र के सुख और तानाशाही के दुःख को बहुत करीब से देखा। 25 जून 1975 की रात्री के 11 बजकर 45 मिनिट स

देश की जनता को अपनी भाषा का मूल अधिकार मिले!

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    देश की जनता को अपनी भाषा का मूल अधिकार मिले! अरविन्द सीसौदिया “....एक मातृभाषा को जानने वाले दो व्यक्ति अंग्रेजी में बात करें और हमारा बस चले तो उन्हे  6 महीने की जेल कर देनी चाहिए।“     - राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ” शिक्षा भारत में विदेशी पौधा नहीं है। ऐसा कोई भी देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम का इतने प्राचीन समय में प्रारम्भ हुआ हो या जिसने इतना स्थायी और शक्तिशाली प्रभाव उत्पन्न किया हो। वैदिक युग के साधारण कवियों से लेकर आधुनिक युग के बंगाली दार्शनिक काल तक शिक्षको और विद्वानों का एक निर्विघ्न क्रम रहा है।“ - एफ. डब्ल्यू. थामस     राजभाषा हिन्दी के संदर्भ में जब भी विषय संसद में आया तब तमिलनाडु के नेताओं को आगे करके कांग्रेस सरकारों ने अंग्रेजी को बनाये रखा! इसके पीछे उनके क्या निहित स्वार्थ हैं, यह तो भगवान ही अधिक जानता होगा। मगर पहली बात तमिलनाडू को हिन्दी के विरोध का क्या अधिकार था और अंग्रेजी से क्या मीठा है, यह भी समझ से परे है। क्योंकि कथित रूप से तमिलनाडू के विरोध के साथ, वहां की आम जनता हो यह समझ में नहीं आता! क्योंकि आम तमिल जनता को अंग्रेजी और हिन्दी एक बराबर

जब नेता बेईमान हो जाता है.......! (कविता....)

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 जब नेता बेईमान हो जाता है.......! (कविता....) Arvind Sisodia    जब नेता बेईमान हो जाता है.......! अरविन्द सीसौदिया, राष्ट्रवाद के प्रखर प्रवक्ता, इनके लेख अक्सर आप पढते रहते हैं, आपातकाल की स्थिति - परिस्थिति पर व्यंग्य करती हुई एक ओजस्वी कविता..... जब नेता बेईमान हो जाता है, नीति मर जाती है, न्याय मर जाता है, जिधर देखो उधर शैतान नजर आता है, विश्वास में विष, आशीर्वाद में आघात, हमदर्दी में दुखः-दर्द, मिठास में मधुमेह, पावनता में महापतन और..., ईमान में महाबेईमान घटित हो जाता है।     (1) भगवान भी जिसके भय से कांपने लगता है, राष्ट्रधर्म प्राण बचाकर भागने लगता है, सूरज भी पश्चिम से उगता है यारों, जब राजसिंहासन बेईमान हो जाता है...! लोगों, जीवन नर्क बन जाता है बातों की नकाबों में, इन शैतानों में, सम्पत्ति की होड़ - धनलूट की दौड़ , बीस साल पहले, जिस पर कोड़ी भी नहीं थी यारों, वह करोपतियों में भी सिरमौर नजर आता है।     (2) गले में महानता के उसूल टांगे, वाणी में संतों की सम्प्रभुता की बांगें, जो मिले उसे लूट लेना हैं मकशद, अपनी तो हवस मिट ही जायेगी, असल इंतजाम तो, अगली अस्सी पीढ़ी का कर जाना है या

बंकिमचंद्र चटोपाध्याय का ‘आनंदमठ’ आज़ादी के आंदोलन का प्रेरणास्रोत

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आनंदमठ: हिंदुत्व की मशाल जलाई जिसने आज़ादी के मतवालों की चहेती क़िताब, जिस पर कट्टर हिंदुत्व को बढ़ावा देने का आरोप लगा। पुस्तक सार वैराग्य देव जोशी https://navbharattimes.indiatimes.com/navbharatgold/book-talks/bankim-chandrananda-math-summary-in-hindi   https://navbharattimes.indiatimes.com/navbharatgold/book-talks/bankim-chandra-chatterjee-book-ananda-math-summary-in-hindi/story/82659442.cms         अगर इतिहास के पन्ने खंगालें, तो लगता नहीं कि बंगाल में राष्ट्रवाद और हिंदूवाद की एक धारा हमेशा ही रही है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल बंकिम चंद्र चटोपाध्याय का बांग्ला उपन्यास आनंदमठ है। यह वो नॉवेल था जिसने बंगाली राष्ट्रवाद को जन्म दिया। ‘आनंदमठ’ आज़ादी के आंदोलन का प्रेरणास्रोत भी बना। हमारा राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम्’ भी बंकिम चंद्र चटर्जी की ही देन है, जो आनंदमठ के ज़रिए मशहूर हुआ। आनंदमठ से आप आज के बंगाल में राष्ट्रवादी राजनीति की जड़ों को भी समझ सकते हैं। इसके लेखक बंकिम चंद्र चटोपाध्याय (चटर्जी) ब्रिटिश हुकूमत में डिप्टी कलेक्टर और डिप्टी मैजिस्ट्रेट रहे थे। उन्होंने आनंदमठ को पहले अ