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भारत का प्रथम जलियांवाला हत्याकाण्ड : मानगढ़.राजस्थान

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  भारत का प्रथम जलियांवाला मानगढ़ हत्याकाण्ड Saturday 14 Nov] 2009 08:01 PM Dr. Deepak Acharya :: Spiritual path With regard to the quest for spirituality, it can be said that there are various spiritual paths which can be followed, and therefore no objective truth or absolute by which to decide which path is better. Because every person is different, the choice can be left to the individual's own sensitivity and understanding  देश की जनजातियों में राजस्थान, मध्यप्रदेश और गुजरात में बसने वाली भील एक प्रमुख जनजाति है। इतिहास में सदा-सदा याद किया जाता रहेगा दक्षिण राजस्थान गुजरात व मध्यप्रदेश के भीलों का योगदान। 19 वी शताब्दी के उत्रार्द्ध में एक ऎसा चमत्कारी अवतारी पुरूष जन्मा जिसने जनजातियों में समाज सुधार का प्रचण्ड आंदोलन छेडकर लाखों भीलों को भगत बनाकर सामाजिक जनजाग्रति एवं भक्ति आंदोलन के जरिये आजादी की अलख जगाई। साथ ही भीलों के सामाजिक सुधार के अनेक कार्य किये। पर वस्तुतः यह अंगे्रजी शासन के खिलाफ स्वाधीनता का आंदोलन था। जन साधारण में असाधारण आंदोलन की नींव रखने

भारत की दुनिया को देन

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भारत की दुनिया को देन तहलका 1. अलबर्ट आइन्स्टीन - हम भारत के बहुत ऋणी हैं, जिसने हमें गिनती सिखाई, जिसके बिना कोई भी सार्थक वैज्ञानिक खोज संभव नहीं हो पाती। 2. रोमां रोलां (फ्रांस) - मानव ने आदिकाल से जो सपने देखने शुरू किये, उनके साकार होने का इस धरती पर कोई स्थान है, तो वो है भारत। 3. हू शिह (अमेरिका में चीन राजदूत)- सीमा पर एक भी सैनिक न भेजते हुए भारत ने बीस सदियों तक सांस्कृतिक धरातल पर चीन को जीता और उसे प्रभावित भी क िया। ... 4. मैक्स मुलर- यदि मुझसे कोई पूछे की किस आकाश के तले मानव मन अपने अनमोल उपहारों समेत पूर्णतया विकसित हुआ है, जहां जीवन की जटिल समस्याओं का गहन विश्लेषण हुआ और समाधान भी प्रस्तुत किया गया, जो उसके भी प्रसंशा का पात्र हुआ जिन्होंने प्लेटो और कांट का अध्ययन किया, तो मैं भारत का नाम लूँगा। 5. मार्क ट्वेन- मनुष्य के इतिहास में जो भी मूल्यवान और सृजनशील सामग्री है, उसका भंडार अकेले भारत में है। 6. आर्थर शोपेन्हावर - विश्व भर में ऐसा कोई अध्ययन नहीं है जो उपनिषदों जितना उपकारी और उद्दत हो। यही मेरे जीवन को शांति देता रहा है, और वही मृत्यु में भी शांति देगा।

थाईलैंड में भी है एक अयोध्या

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साभार - विश्व गुरु भारत (Vishv Guru Bharat) facebook से थाईलैंड में भी है एक अयोध्या थाईलैंड में सदियों पुराना भारतीय प्रभाव है। एक अजीब विशेषता है। धर्म तो बौद्ध स्वीकार किया परन्तु संस्कृति हिन्दू अपनाई है। प्रत्येक राजा को ‘राम’ कहा जाता है। आधुनिक राजा ‘राम-8’ कहा जाता है। लगभग 450 वर्ष पूर... ्व इस वंश का प्रथम राजा ‘राम-1’ के नाम से विख्यात हुआ। सन् 1448 तक त्रैलोक नाम के राजा ने राज किया। उसने प्रशासन में उल्लेखनीय सुधार किए। चौदहवीं सदी में थाईलैंड में अयोध्या की स्थापना हुई थी। वहीं थाईलैंड की राजधानी रही। इस वंश के 36 राजाओं ने 416 वर्षों तक राज किया। आधुनिक राजा के आठवें पूर्व वंशज ने राम नाम जोडऩा शुरू किया जो आज तक चल रहा है। अयोध्या को देवताओं की भूमि कहा जाता है। अद्वितीय इन्द्र देवता की नगरी। इन्द्र ने यह नगर स्थापित किया और विष्णुकरन ने इसका निर्माण किया था। इस राज्य की स्थापना राजा यूथोंग ने चायो फराया नदी के पास की थी। इसे स्याम नाम से भी जाना जाता था। 1782 में बर्मा के आक्रमण के बाद थाईलैंड की राजधानी बैंकाक में बनाई गई। अयोध्या आज भी इस देश की पुरानी सांस्कृति

Papaya for Uric Acid Problem !!!

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जनहित में ........... Facebook - Pudji Hardjono Papaya for Uric Acid Problem !!!  Just try it if you've got uric acid after all no harm done. This is a really effective, just mix green papaya cubes to the ordinary green tea, my cousin-brother tried and found it very effective.  I have also shared with a friend with gout to try this (his "toe joints" started to deform), after a week of drinking this formula there is significant improvement, and after two weeks the toe joints heal and revert to normal state. It is almost three years now, the joint pain is gone, but he maintains the intake between 1-3 times monthly to avoid relapse. Other friends suffering from years of gout problem have also recovered.  It is good for all, even those without gout. Good formula! Do share with the people in need! An improved sequence by Professor Lai from the China School of Pharmacy : Cut green papaya into small cubes, place into the water, bring to boil, then add tea leav

श्रृद्धांजली:मुकेश: दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां...

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श्रृद्धांजली दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां................ प्रसिद्ध गायक मुकेश ( मुकेशचन्द्र माथुर, दिल्ली ) हमारे बीच से वर्षों पहले ( 27 अगस्त 1976) से जा चुके हैं। मगर ऐसा लगता है जैसे कल की तो बात है। उनकी पुण्यतिथि 27 अगस् त होती है। यह दिन उनको चाहने वालों के लिये खास होता है। उने गाये गीत होंगें और उनकी मीठी मीठी यादें होंगीं...उनका एक गीत “ओ जाने वाले हो सके तो लौटके आना...“ एवं दुनिया से जाने वाले जाने चले जाते हैं कहां, तथा सब कुछ सीखा हमनें न सीखी होशयारी, सच है दुनिया वालों कि हम हैं अनाडी, सारे दिन बजेगें। उनके गम भरे नगमों ने तो झाूम मचा दी थी। राजकपूर और मुकेश की आवाज एक दूसरे की पर्याय थी। पुण्यतिथि पर उन्हे शत शत नमन..!!! इक दिन बिक जाएगा, माटी के मोल जग में रह जाएंगे, प्यारे तेरे बोल दूजे के होंठों को, देकर अपने गीत कोई निशानी छोड़, फिर दुनिया से डोल इक दिन बिक जायेगा ... अनहोनी पग में काँटें लाख बिछाए होनी तो फिर भी बिछड़ा यार मिलाए  ये बिरहा ये दूरी, दो पल की मजबूरी फिर कोई दिलवाला काहे को घबराये, तरम्पम, धारा, तो बहती है, बहक

सुभाष चन्द्र बोस धर्मपत्नी एमिली स्चेंक्ल

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सुभाष चन्द्र बोस जी उनकी धर्मपत्नी श्री एमिली स्चेंक्ल के साथ एक दुर्लभ फोटो ..उनकी पत्नी काफी समय तक उनकी सेकेट्री रही थी जब सुभाष जी रशिया में थे वही उन होने उनके साथ सन 1937 में शादी की उनकी पुत्री अनीता बोस जी का जन्म सन 1942 में विएन्ना में हुआ ,विएअन...ऑस्ट्रिया की राजधानी हैं http://nazehindsubhash.blogspot.in/2010/06/12.html ब्लॉग   नाज़-ए-हिन्द सुभाष से   जयदीप शेखर नाज़-ए-हिन्द सुभाष 1.2: ‘विश्वयुद्ध’ की पटकथा और 1.2 (क) एमिली शेंकेल प्रसंग पिताजी का मन रखने के लिए 1920 में आई.सी.एस. (आज का आई.ए.एस.) अधिकारी बने नेताजी 1921 में ही नौकरी छोड़कर राजनीति में उतरते हैं। ग्यारह बार गिरफ्तार करने के बाद ब्रिटिश सरकार उन्हें 1933 में ‘देश निकाला’ ही दे देती है। यूरोप में निर्वासन बिताते हुए वे अपनी यकृत की थैली की शल्य-चिकित्सा भी कराते हैं। 1934 में पिताजी की मृत्यु पर तथा 1936 में काँग्रेस के (लखनऊ) अधिवेशन में भाग लेने के लिए वे दो बार भारत आते हैं, मगर दोनों ही बार ब्रिटिश सरकार उन्हें गिरफ्तार कर वापस देश से बाहर भेज देती है।1933 से ’38 तक यूरोप में रहते

लोकदेवता बाबा रामदेव : राम शाह पीर

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रामदेवरा मेला, रामदेवरा गांव, पोखरण, जैसलमेर, बाबा रामदेव एक तंवर राजपूत थे जिन्होंने सन 1458 में समाधि ली थी। उनकी समाधि पर लगने वाले इस मेले में हिंदुओं व मुसलमानों की समान आस्था है। 1931 में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने समाधि पर मंदिर बनवा दिया था। कहा जाता है कि रामदेव की चमत्कारिक शक्तियों की चर्चा दूर-दूर तक थी। उन चर्चाओं को सुनकर मक्का से पांच पीर उन्हें परखने पहुंचे और उनसे अभिभूत होकर लौटे। उसके बाद मुसलमान उन्हें राम शाह पीर कहकर उनका मान करने लगे। मेले में आने वाले श्रद्धालु समाधि पर चावल, नारियल और चूरमे का चढ़ावा चढ़ाते हैं और लकड़ी के घोड़े समर्पित करते हैं। हर मजहब से जुड़े लोग मेले में आते हैं और पूरी रात-रात भर भजन व गीत के कार्यक्रम चलते हैं। http://www.pressnote.in/Jaisalmer-News_176534.html जगविख्यात रामदेवरा में 628 वाँ विराट मेला शुरू स्वर्णमुकुट प्रतिष्ठा व मंगला आरती से हुआ मेले का आगाज रामदेवरा | अगाध जन श्रद्घा के केन्द्र लोकदेवता बाबा रामदेव की अवतरण तिथि भाद्रपद शुक्ल द्वितीया(भादवा बीज) के उपलक्ष में बाबा की कर्मस्थली रामदेवरा में जगवि यात

स्वामी विवेकानंद जी के आध्यात्मिक गुरू :स्वामी रामकृष्ण परमहंस

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http://www.spiritquotes.com/ramakrishna-quotes-on-scriptures-holy-books.htm स्वामी विवेकानंद जी के आध्यात्मिक गुरूजी : रामकृष्ण परमहंस    http://hi.bharatdiscovery.org भारत डिस्कवरी प्रस्तुति रामकृष्ण परमहंस Ramkrishna Paramhans रामकृष्ण परमहंस ----------- रामकृष्ण परमहंस (जन्म- 18 फ़रवरी, 1836 बंगाल - मृत्यु- 15 अगस्त 1886 कोलकाता) भारत के एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर ज़ोर दिया था। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं। अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं है। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं। जीवन परिचय--------- रामकृष्ण परमहंस ने पश्चिमी बंगाल के हुगली ज़िले में कामारपुकुर नामक ग्राम के एक दीन एवं धर्मनिष्ठ परिवार में 18 फ़रवरी, सन् 1836 ई. में जन्म लिया। बाल्यावस्था में वह गदाधर के नाम से प्रसिद्ध थे। गदाधर के पिता खुदीराम चट्टोपा

कुतुब मीनार: एक भटकता इतिहास

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कुतुब मीनार-प्रेम युगल कुतुब मीनार--शिव पार्वती कुतुब मीनार--गाय ओर बछडा http://oshosatsang.org पृथ्वी राज चौहान महाभारत काल की बंसा वली में आखरी हिंदू राजा था। मोहम्‍मद गोरी ने छल से उसे सन् 1192 ई में उसे हराया। उसे से पहले वहीं मोहम्‍मद गोरी 16 बार हारा। उसे अंधा कर के अपनी राजधानी ले गया। जहां उसके भाट चंद्रबरदाई ने एक तरकीब से अंधे पृथ्‍वी राज के हाथों मोहम्‍मद गोरी को उसे शब्‍द भेदी बाण से मरवा दिया। कहते है दो का जन्‍म और मरण दिन एक ही था। क्‍योंकि उसने खुद पृथ्‍वी राज को मार कर खुद को भी मार डाला। क्‍या हो गया था इस बीच भारतीय शासन काल में जिसे मोहम्‍मद गज़नवी की हिम्‍मत नहीं हुई की दिल्‍ली की तरफ मुंह कर सके। उसे मोहम्‍मद गोरी जैसी अदना से शासक ने हरा दिया। इस की तह में कोई राज तो होगा। पहला तो छल था। दूसरा उस समय के जो 52 गढ़ थे वो सभी राजा आपस में भंयकर युद्धों में लिप्‍त थे। इनमें भी मोह बे के चार भाई आल्हा, उदूल, धॉदू और एक चचेरा भाई मल खान ने शादी जैसी परम्‍परा को मान अपमान का करण बना कर युद्ध करते रहे। आज भी बुंदेल खँड़ में बरसात के दो महीनों में

शहीद राजगुरु : जन्म 24 अगस्त

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"शहीदों की चिताओं पर, लगेंगे हर बरस मेले,   वतन पर मरने वालों का, यही नामों-निशां होगा" शहीद राजगुरु का पूरा नाम 'शिवराम हरि राजगुरु' था। राजगुरु का जन्म 24 अगस्त, 1908 को पुणे ज़िले के खेड़ा गाँव में हुआ था, जिसका नाम अब 'राजगुरु नगर' हो गया है। उनके पिता का नाम 'श्री हरि नारायण' और माता का नाम 'पार्वती बाई' था। भगत सिंह और सुखदेव के साथ ही राजगुरु को भी 23 मार्च 1931 को फांसी दी गई थी| आज़ादी का प्रण------- राजगुरु `स्वराज मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है और मैं उसे हासिल करके रहूंगा' का उद्घोष करने वाले लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के विचारों से बहुत प्रभावित थे। 1919 में जलियांवाला बाग़ में जनरल डायर के नेतृत्व में किये गये भीषण नरसंहार ने राजगुरु को ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ बाग़ी और निर्भीक बना दिया तथा उन्होंने उसी समय भारत को विदेशियों के हाथों आज़ाद कराने की प्रतिज्ञा ली और प्रण किया कि चाहे इस कार्य में उनकी जान ही क्यों न चली जाये वह पीछे नहीं हटेंगे। सुनियोजित गिरफ़्तारी------ जीवन के प्रारम्भिक दिनों से ही राजगुरु का रुझान क

चुण्डावत मांगी सेनाणी, सर काट दे दियो क्षत्राणी ....

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चुण्डावत मांगी सेनाणी, सर काट दे दियो क्षत्राणी .... फेसबुक से - Hindus Unsung Hero's photo एक ऐसी रानी जिसने युद्ध में जाते अपने पति को निशानी मांगने पर अपना सिर काट कर भिजवा दिया था यह रानी बूंदी के हाडा शासक की बेटी थी और उदयपुर (मेवाड़) के सलुम्बर ठिकाने के रावत रतन सिंह चुण्डावत की रानी थी जिनकी शादी का गठ्जोडा खुलने से पहले...ही उसके पति रावत रतन सिंह चुण्डावत को मेवाड़ के महाराणा राज सिंह (1653-1681) का औरंगजेब के खिलाफ मेवाड़ की रक्षार्थ युद्ध का फरमान मिला नई-नई शादी होने और अपनी रूपवती पत्नी को छोड़ कर रावत चुण्डावत का तुंरत युद्ध में जाने का मन नही हो रहा था यह बात रानी को पतालगते ही उसने तुंरत रावत जी को मेवाड़ की रक्षार्थ जाने व वीरता पूर्वक युद्ध करने का आग्रह किया युद्ध में जाते रावत चुण्डावत पत्नी मोह नही त्याग पा रहे थे सो युद्ध में जाते समय उन्होंने अपने सेवक को रानी के रणवास में भेज रानी की कोई निशानी लाने को कहा सेवक के निशानी मांगने पर रानी ने यह सोचकर कि कहीं उसके पति पत्नीमोह में युद्ध से विमुख न हो जाए या वीरता नही प्रदर्शित कर पाए इसी आशंका के

गंगा जल का वैज्ञानिक महत्व

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गंगा जल का वैज्ञानिक महत्व  

जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा

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जहाँ डाल-डाल पर जहाँ डाल-डाल पर सोने की चिड़िया करती है बसेरा वो भारत देश है मेरा जहाँ सत्य, अहिंसा और धर्म का पग-पग लगता डेरा वो भारत देश है मेरा ये धरती वो जहाँ ऋषि मुनि जपते प्रभु नाम की माला जहाँ हर बालक एक मोहन है और राधा हर एक बाला जहाँ सूरज सबसे पहले आ कर डाले अपना फेरा वो भारत देश है मेरा अलबेलों की इस धरती के त्योहार भी हैं अलबेले कहीं दीवाली की जगमग है कहीं हैं होली के मेले जहाँ राग रंग और हँसी खुशी का चारों ओर है घेरा वो भारत देश है मेरा जब आसमान से बातें करते मंदिर और शिवाले जहाँ किसी नगर में किसी द्वार पर कोई न ताला डाले प्रेम की बंसी जहाँ बजाता है ये शाम सवेरा वो भारत देश है मेरा - राजेंद्र किशन

vaidik saraswati river

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मेरी स्पष्ट मान्यता है की एक समय सरस्वती सभ्यता सर्वश्रेष्ठ रही है , जिसका वर्णन ऋगवेद में मिलता है | कालांतर में नये सिरे से हुई खुदाई में , इसे हड़प्पा / मोहनजोदड़ो सभ्यता नाम , अवशेष मिलने वाले स्थान के कारण दे दिया गया | आज भी प्रयागराज  (इलाहावाद ) में त्रिवेणी संगम है | जिसमें गुप्त मार्ग से सरस्वती का जल प्रगट होता है |  हजारों वर्षों से यह मान्यता यहाँ बहुत ही दृढ़ता से मानी जाती है | किसी भू गर्भिय सुनामी, भूकंप या आंतरिक प्लेट खिसकने से सरस्वती का मार्ग बदल गया और वह यमुना में समाहित हो गई |  _ अरविन्द सिसोदिया , कोटा राजस्थान 94141 80151  ऐसा प्रतीत होता है कि पृथ्वी की संरचना आंतरिकी में हुए बदलाव के चलते सरस्वती भूमिगत हो गई और यह बात नदी के प्रवाह को लेकर आम धारणा के काफी करीब है। प्रयागराज में यही बात है कि संगम पर अंदर से सरस्वती नदी का जल स्पष्टता से प्रगट होता हे, यह शोध का विषय कि सरस्वती का बदला हुआ आंतरिक मार्ग क्या हे। जो लोग भूगर्भ विज्ञानी है। वे यह भी जानते हैं कि पृथ्वी के अंदर भी नदियां जलधराओं आदि का एक अलोकिक संसार है। वैदिक काल में एक और नदी दृष