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कोटा संभाग निकाय

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कोटा संभाग (कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़) क -  1- कोटा नगर निगम - obc महिला / 100 वार्ड   2- रामगन्जमंडी   सामान्य /40 3- सांगोद    सामान्य /35 4-सुल्तानपुर   सामान्य sc/25 5-इटावा  सामान्य महिला /35 6- सुकेत  सामान्यobc /25 ख - बूँदी  1- बूँदी / सामान्य  2- के पाटन / सामान्य  3- कापरेन / सामान्य महिला  4- लाखेरी / सामान्य  5- इंद्रगढ़ / सामान्य महिला  6- नैनबा / सामान्य  7- हिण्डोली / सामान्य  8- देई / सामान्य sc  ग - झालावाड़  1- झालावाड़ / OBC जनरल  2- झालरापाटन / सामान्य  3- खानपुर / सामान्य महिला  4- मनोहर थाना  / सामान्य 5- अकलेरा OBC महिला 6- पिडावा  / सामान्य 7- भवानीमंडी  / सामान्य 8- डग / sc महिला  घ - बारां   1- बारां / जनरल महिला /60 2- अंता जनरल obc /35 3 अटरू जनरल sc /25 4- छबड़ा जनरल महिला /35 5- सीसवाली जनरल /20 6-मांगरोल जनरल /35

संघ ही स्वतंत्रता के बाद घावों पर मरहम बना, कांग्रेस हिंसा और तुष्टिकरण का पर्याय बनी

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भारत विभाजन पर बहुत बड़ी जनहानि  भारत के विभाजन (1947) के समय भड़की सांप्रदायिक हिंसा, कत्लेआम और दंगों का दौर भारतीय इतिहास का सबसे दर्दनाक अध्याय है। इस ऐतिहासिक त्रासदी में लाखों हिंदू-सिख और मुस्लिम परिवारों को अपनी जान गंवानी पड़ी और करोड़ों लोग विस्थापित हुए।  विभाजन के दौरान देश के शीर्ष नेताओं—जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल—की भूमिका और उनके प्रयासों को लेकर इतिहासकारों और समकालीन दस्तावेजों के आधार पर निम्नलिखित महत्वपूर्ण तथ्य सामने आते हैं:- ## 1. शरणार्थी संकट और राहत कार्य * राहत शिविरों की स्थापना: विभाजन के तुरंत बाद भारत सरकार ने दिल्ली, पंजाब और अन्य राज्यों में विशाल राहत शिविरों (जैसे दिल्ली का पुराना किला और किंग्सवे कैंप) का निर्माण किया। इन शिविरों में आने वाले लाखों हिंदू और सिख शरणार्थियों के लिए भोजन, कपड़े, चिकित्सा और सुरक्षा की व्यवस्था की गई।  * पुनर्वास मंत्रालय का गठन: शरणार्थियों की समस्याओं को प्राथमिकता से सुलझाने के लिए विशेष तौर पर 'पुनर्वास मंत्रालय' (Ministry of Rehabilitation) बनाया गया। ## 2. दंगों को रोकने के लिए व्यक्तिगत प्...

आरएसएस: सेवा, बलिदान और राष्ट्र निर्माण का एक शतक

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राजनाथ सिंह ( भारत के रक्षा मंत्री) आरएसएस: सेवा, बलिदान और राष्ट्र निर्माण का एक शतक - 4 अक्टूबर, 2025 जब डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने 27 सितंबर, 1925 को नागपुर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की, तब शायद ही किसी ने कल्पना की होगी कि आने वाले वर्षों में यह कितना लंबा और उल्लेखनीय सफर तय करेगा। आज आरएसएस निस्वार्थ सेवा का जीता-जागता उदाहरण है, जिसने भारत के सामाजिक ताने-बाने को आकार दिया है, इसकी संप्रभुता की रक्षा की है, इसके कमजोर समुदायों को सशक्त बनाया है और शाश्वत सभ्यतागत मूल्यों का पोषण किया है। आज, जब आरएसएस अपनी शताब्दी मना रहा है, तो इसके सफर पर एक नज़र डालना सार्थक होगा। हाल ही में दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम में, आरएसएस सरसंघचालक श्री मोहन भगवत ने देश को संगठन के समावेशी लोकाचार की याद दिलाई। उन्होंने कहा, “धर्म व्यक्तिगत इच्छा का विषय है; इसमें किसी प्रकार का प्रलोभन या दबाव नहीं होना चाहिए।” यह विचार संघ के संस्थापक दर्शन को प्रतिध्वनित करता है: एक ऐसा समाज बनाना जो संघर्ष के बजाय सद्भाव, विभाजन के बजाय सामूहिक शक्ति और भौतिक सुख-सुविधाओं के ...

स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य तथ्य - मुरलीधर RSS Swtantrta Sangram

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स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य तथ्य - मुरलीधर कोटा 16 अगस्त । स्वतंत्रता दिवस की 80 वी वर्षगाठ के शुभ अवसर पर भारतीय जनकल्याण समिति, कोटा द्वारा सूरज भवन, बल्लभबाड़ी कोटा पर स्वतंत्रता दिवस का भव्य समारोह आयोजित किया गया । कार्यक्रम की अध्यक्षता कोटा विभाग के विभाग संघचालक पन्नालाल शर्मा ने की। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, चितौड़ प्रांत के प्रान्त प्रचारक मुरलीधर ने मुख्य वक्ता के रूप में अपने संबोधन में कहा कि " भारतीय इतिहास को धूमिल करने के प्रयास अब और नहीं टिकेंगे। " उन्होंने " स्वाधीनता संग्राम में संघ की भूमिका के अकाट्य प्रमाण प्रस्तुत किये।" मुरलीधर ने उद्बोधन में स्पष्ट किया कि " भारत की आजादी बिना खड़ग-बिना ढाल से नहीं बल्कि क्रांतिकारियों के बलिदान और जनजन के संघर्षों का परिणाम है। इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक के संस्थापक डॉ केशवराव हेडगेवार एवं तत्कालीन स्वयंसेवकों की टोली ने अपना अमूल्य योगदान दिया। " उन्होंने कहा कि " जो लोग संघ पर आरोप लगाते हैं उनको “संघ और स्वतंत्रता आंदोलन” नाम की पुस्तक पढ़नी चाहिए। "  ...

भारत की स्वतंत्रता के लिए, 15 अगस्त ही क्यों चुना...?

15 अगस्त ही क्यों चुना....यह सोचना पूरी तरह स्वाभाविक है, क्योंकि तारीख का चुनाव निश्चित रूप से ब्रिटिश कमांडर लॉर्ड माउंटबेटन के अहंकार और उनके व्यक्तिगत "विजय दिवस" से जुड़ा था। लेकिन भारत की स्वतंत्रता की असलियत केवल इस एक तारीख तक सीमित नहीं है। माउंटबेटन का फैसला सिर्फ एक प्रशासनिक औपचारिकता (Formalities) और तारीख का ठप्पा था, जबकि आजादी का असली आधार दशकों लंबा संघर्ष था।  ## आजादी की असली वजहें * जन आंदोलन का दबाव: महात्मा गांधी के नेतृत्व में [भारत] छोड़ो आंदोलन, सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलनों ने ब्रिटिश हुकूमत की नींव हिला दी थी।  * आजाद हिंद फौज का खौफ: नेताजी सुभाष चंद्र बोस और उनकी 'आजाद हिंद फौज' के सैन्य प्रयासों ने अंग्रेजों को यह अहसास करा दिया था कि वे अब भारतीय सैनिकों के भरोसे राज नहीं कर सकते। * नौसेना विद्रोह (1946): मुंबई में हुए रॉयल इंडियन नेवी के विद्रोह ने ब्रिटिश सरकार को डरा दिया कि अब भारतीय सशस्त्र बल उनके नियंत्रण में नहीं हैं।  * ब्रिटेन की आर्थिक कंगाली: द्वितीय विश्व युद्ध के बाद ब्रिटेन आर्थिक रूप से इतना कमजोर हो चुका था कि उसके लिए...