कविता - भारत भूमि पुण्यधाम है
कविता - भारत भूमि पुण्यधाम है भारत भूमि पुण्यधाम है यह अपने जीवन का प्राण है, इसकी माटी में पुरखों का शान है, यह त्याग, तपस्या और बलिदान है। तेरी गोद में आँखें खोलीं, तेरे अन्न-जल से तन है, तेरे संस्कारों से सिंचित मेरा मन और जीवन है। हे भारत! तू जन्मभूमि अपनी , तू ही हमारा अभिमान है; तेरे कण-कण में बसता मेरा पूरा हिंदुस्तान है। हिमगिरि तेरे प्रहरी हैं, गंगा तेरी पहचान, वेदों की वाणी से गूँजा तेरा गौरवमय गान। बुद्ध, महावीर, नानक, तुलसी ने प्रेम-सत्य का पाठ पढ़ाया, वसुधैव कुटुम्बकम् का संदेश सारे जग को समझाया। पर जन्मभूमि केवल गौरव नहीं— इसका ऋण भी चुकाना है; जिस मिट्टी ने जीवन दिया, उसके काम हमें आना है। यह मेरी कर्मभूमि है, कर्म ही जिसकी पहचान, निष्काम कर्म, सत्य और सेवा जिसका सच्चा सम्मान। खेतों में किसान तपता है, सीमा पर सैनिक खड़ा, वैज्ञानिक नव सृजन करे, श्रमिक देश का भार उठा। कोई काम छोटा नहीं, कोई श्रम बेकार नहीं; राष्ट्रहित से बढ़कर जग में कोई और विचार नहीं। अन्याय जहाँ दिखे, वहाँ सत्य के साथ खड़े होना है, भूखे, निर्बल, वंचित जन के दुख को अपना दुख समझना है। नारी का सम्मान सुरक्ष...