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राहुल गाँधी हिंदू नहीं हैं...? फिरोज गाँधी टू राहुल गाँधी

[फिरोज गांधी] की वंश परंपरा को समझने के लिए हमें उनके परिवार के इतिहास, उनके माता-पिता और उनके मूल समुदाय (पारसी समाज) की जड़ों को देखना होगा। राजनैतिक विमर्शों से दूर, ऐतिहासिक और दस्तावेजी तथ्यों के आधार पर उनका वंशवृक्ष इस प्रकार है: ## 1. मूल स्थान और पूर्वज [फिरोज गांधी] का परिवार मूल रूप से [गुजरात के भरूच (Bharuch) का रहने वाला था।  * उनका पुश्तैनी मकान भरूच के 'कोटपारी वाड' (Kotpari Wad) इलाके में था। * उनके दादा का नाम सोराबजी घांडी था। पारसी समुदाय में 'घांडी' (Ghandy) सरनेम उन परिवारों को मिलता था जो हाथ से बने बर्तनों, लोहे के सामान या अन्य व्यापारिक गतिविधियों से जुड़े होते थे।  ## 2. माता-पिता और जन्म [फिरोज गांधी] के पिता का नाम जहांगीर फरीदुन घांडी (Jehangir Faredun Ghandy) और माता का नाम रतिमाई घांडी था।  * पिता का पेशा: [जहांगीर घांडी] बंबई (मुंबई) में किलिक निक्सन (Killick Nixon) नाम की एक ब्रिटिश शिपिंग कंपनी में मरीन इंजीनियर थे। बाद में वे एक केमिकल वारंटी कमांडर के रूप में भी जुड़े। * जन्म: फिरोज गांधी का जन्म 12 सितंबर 1912 को बंबई के फोर्ट इलाके...

तीसरी सहस्त्रावदी का ईसाई विस्तारवाद का आक्रमण हो चुका है

क्या एशिया पर भारत के रास्ते, ईसाई विस्तारवाद अभियान प्रारंभ हो चुका है  - अरविन्द सिसोदिया  याद रहे कि,18 अप्रैल से 14 मई, 1998 तक रोम में आयोजित विशेष एशियाई ईसाई धर्मसभा के विचारों और निष्कर्षों का निर्णय लिया गया जिसे  आधिकारिक तौर पर जॉन पॉल द्वितीय द्वारा 6 नवंबर, 1999 को नई दिल्ली, भारत में जारी किया गया था। इस दस्तावेज को 'एक्लेसिया इन एशिया' (Ecclesia in Asia - एशिया में चर्च) नीति पत्र कहा जाता है।  पोप इसमें कहते हैं कि "जिस प्रकार पहली सहस्राब्दी (फर्स्ट मिलननियम ) में यूरोप की धरती पर क्रॉस स्थापित हुआ, और दूसरी सहस्राब्दी में अमेरिका व अफ्रीका में; उसी प्रकार प्रार्थना करें कि तीसरी ईसाई सहस्राब्दी में एशिया के इस विशाल और महत्वपूर्ण महाद्वीप में विश्वास की एक बड़ी फसल काटी जाएगी।"  चूंकि पोप ने पूरे एशिया महाद्वीप में ईसाई धर्म के प्रचार (एवंगेलाइजेशन ) का रोडमैप जारी करने के लिए भारत की भूमि (नई दिल्ली) को चुना था, इसलिए विश्लेषकों द्वारा यह व्याख्या की गई कि वैटिकन एशिया में प्रवेश करने और अपने इस अभियान को सफल बनाने के लिए भारत को मुख्य केंद्र ...

अमेरिकन अंग्रेजों के नवउपनिवेशवाद के विरुद्ध भारतवासियों को प्रबलता से खड़ा होना होगा - अरविन्द सिसोदिया

प्रेस विज्ञप्ति अमेरिकी अंग्रेजों के नव-उपनिवेशवाद के विरुद्ध भारतवासियों को प्रबलता से खड़ा होना होगा — अरविन्द सिसोदिया कोटा। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल राजस्थान के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ विचारक अरविन्द सिसोदिया ने अमेरिका की भारत के प्रति बढ़ती आर्थिक, व्यापारिक और रणनीतिक दबाव की नीति पर कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि " भारत अब किसी विदेशी शक्ति की इच्छा से चलने वाला देश नहीं है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नया भारत अपनी विदेश नीति और राष्ट्रीय हितों का निर्धारण स्वयं करता है।" उन्होंने कहा कि "अमेरिका भारत को अपना मित्र कहता है, लेकिन मित्रता का अर्थ यह नहीं कि भारत अपने आर्थिक और सामरिक निर्णयों के लिए वाशिंगटन की अनुमति ले। भारत अमेरिका का साझेदार हो सकता है, पिछलग्गू नहीं।" भारत को धमकाने की अमेरिकी नीति नहीं चलेगी अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि " पिछले दो वर्षों में अमेरिका की ओर से भारत के प्रति टैरिफ, व्यापारिक दबाव, रूस से ऊर्जा संबंधों पर आपत्ति तथा भारतीय हितों को प्रभावित करने वाले अनेक निर्णय सामने आए हैं। अमेरिकी प्र...

कविता - बनाओ अखंड भारती .

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karun kahani vibhajan ki, hey veeron tumhe pukarti banao akhand bharti .....! — arvind sisodia 9414180151 करुण कहानी विभाजन की, हे वीरों तुम्हें पुकारती बनाओ अखंड भारती .....! — अरविन्द सीसोदिया करुण कहानी विभाजन की, हे वीरों तुम्हें पुकारती, जाग उठो अब - जाग उठो अब, बनाओ अखंड भारती, चीख रही थी तब मानवता, पर चिंघाड़ रही थी दानवी, खून से लथपथ वे मंजर, कंपकंपी आज भी छुड़ाते हैं, स्वतंत्रता की वेदी पर, तब नरमुंडों से हुई थी आरती!! ----- 1 ----- पंजाब बटा, बंगाल बटा, सिंध गया, बलूच गया, भारत माँ को काट दिया, बेदर्दी से हत्यारों ने, रावी की शपथ मौन थी, अखंडता का वचन गौण था, सोच-समझ का समय नहीं, भागो-भागो मची देश में, ----- 2 ----- गैर रहे न बचें, इस शैतानी में, पाक में नापाक हैवानियत थी, घरों पर हमले हुए, जिंदा जलाए, कत्ल हुए, भूखे-प्यासे राहों में भटके, खूब थके और खूब मरे, व्यवस्थित कोई बात न थी, अदला-बदली की सौगात न थी, न राह दिखानेवाला, न कोई बचानेवाला, गुंडों की गुंडागर्दी ही तब राज बनी थी, ताज बनी थी, ----- 3 ----- माता-बहिनों की मत पूछो, क्या-क्या उन पर जुल्म हुए, लाज गई, ...

"राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक"

स्थान - कोटा  दिनांक -  सेवा में, 1. महामहिम राष्ट्रपति महोदया, भारत गणराज्य 2. माननीय प्रधानमंत्री जी, भारत सरकार 3. माननीय अध्यक्ष जी, लोकसभा 4. माननीय सभापति जी, राज्यसभा 5. माननीय नेता प्रतिपक्ष, लोकसभा 6. माननीय नेता प्रतिपक्ष राज्यसभा विषय: "राइट टू नेशन, राइट टू पब्लिक" – संसद के अनिवार्य, निर्बाध और सुचारू संचालन हेतु ऐतिहासिक विधायी सुधार प्रस्ताव। आदरणीय, भारतीय लोकतंत्र का सर्वोच्च मंदिर—हमारी संसद—देश की 140 करोड़ से अधिक जनता की आकांक्षाओं, उनके अधिकारों और देश के भविष्य का निर्धारण करने वाला मंच है। अत्यंत खेद और चिंता का विषय है कि दलीय राजनीति, राजनीतिक गतिरोध और सुनियोजित व्यवधानों के कारण दोनों सदनों का बहुमूल्य समय और देश के संसाधनों का भारी नुकसान हो रहा है। वहीं यह सब देश को लज्जित करने वाला और देश के जनमत को दुःखी व आक्रोषित करने वाला है। भारत के मूल संविधान में राजनैतिक दल शब्द तक नहीं है, उसकी मूल अवधारणा जनता के प्रतिनिधि के रूप में मात्र जनप्रतिनिधि तक ही सीमित है। किन्तु धीरे धीरे राजनैतिक दलों ने दलगत हितों को अत्यंत मज़बूत कर लिया है। जिसका बड़ा नुक...

चर्चा, ईसाई सम्राज्यवाद, एशिया, पोप और सोसल मीडिया आराजकता

एशिया को ईसाई महाद्वीप बनाने का कोई आधिकारिक अभियान अस्तित्व में नहीं है और भारत को किसी प्रकार का 'अमेरिकन आक्रमण' समझना तथ्यात्मक रूप से गलत है। भारत की जनगणना के अनुसार देश में ईसाई आबादी दशकों से स्थिर (लगभग 2.3%) बनी हुई है, और विदेशी चंदे पर नियंत्रण तथा कानून निर्माण भारत के आंतरिक संप्रभु अधिकार हैं। [1, 2]  ## जनसांख्यिकी और तथ्यात्मक स्थिति * जनसंख्या के आंकड़े: भारत और एशिया में ईसाई आबादी की हिस्सेदारी में कोई असाधारण या व्यापक वृद्धि नहीं देखी गई है, जो इस प्रकार के किसी बड़े अभियान के दावों का खंडन करती है। [3, 4]  * आंतरिक नीतियां: भारत सरकार द्वारा विदेशी फंडिंग (जैसे Foreign Contribution (Regulation) Act) जैसे कानूनों में संशोधन पूरी तरह से पारदर्शिता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा आंतरिक संप्रभु मामला है, न कि किसी बाहरी आक्रमण का संकेत। [2]  * कूटनीतिक संबंध: भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंध रणनीतिक और आर्थिक हितों पर आधारित हैं। राजनैतिक बयानों या असहमतियों को किसी सैन्य या सांस्कृतिक 'आक्रमण' के रूप में देखना भ्रामक है। [5, 6]  ======1=====...