कविता - कालचक्र


कविता - कालचक्र

अनादि नभ के निस्तब्ध प्रांगण में,
जब शब्द भी था मौन कहीं,
तब समय स्वयं ध्यानस्थ हुआ —
और जन्मा काल, अनंत यहीं।

सतयुग की स्वर्णिम प्रभा से,
त्रेता की मर्यादा जागी,
द्वापर में धर्म डगमगाया,
कलि में चेतना फिर भी जागी।

चक्र घूमता, युग बदलते,
धरा नित्य नवीन बनती है,
क्षण में सृष्टि, क्षण में लय —
पर सत्य सदा अडिग रहती है।

मन्वंतर बहते सागर जैसे,
महायुगों की लहरें उठतीं,
ब्रह्मा का दिन, ब्रह्मा की रात्रि —
कल्पों में सृष्टि रचती-बुनती।

नभ के नाप अनंत यहाँ हैं,
संख्या भी हो जाती लघु,
जहाँ अरबों वर्ष एक श्वास हों —
वहाँ मानव का क्या मोल, कहो?

फिर भी इस क्षुद्र कण में छिपा,
वेदों का गहन प्रकाश,
ऋषि-दृष्टि ने काल को बाँधा —
ज्ञान बना जग का विश्वास।

नमन उस चिंतन-परंपरा को,
जिसने अनंत को छू डाला,
काल नहीं बस गणना मात्र —
वह आत्मा का भी है उजियाला।


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