कविता - वफादार को कूड़ेदान

कविता - वफादार को कूड़ेदान

गद्दारों को मान मिले सम्मान मिले और वफादार को कूड़ेदान,
राजनीति का खेल अलग है,भ्रष्ट आचरण होगया पद प्रतिष्ठा का प्रमाण ।
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दल-बदल की गंगा देखो, दागों की धुल जाए पहचान,
कल तक जिनने पत्थर फेंके, आज वही भगवान।
झंडे बदले, नारे बदले, बदला पूरा बयान,
सिद्धांतों की रीढ़ झुक गई, पर रही कुटिल मुस्कान।
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राजनैतिक गद्दारी को कहते “रणनीतिक बदलाब ”,
पीठ में खंजर घोपें, मुंह में महानता के यशो गान।
विचारधारा किराये पर है, कुर्सी में बसे है प्राण,
मतदाता की याद तभी तक, जब तक होता मतदान ।
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घोटालों की राख कुरेदो, निकले अनगिनित बखान,
दाग यहाँ पर अलंकरण हैं, बेशर्म के आव्हान ।
जिनके हाथ स्याही से काले, देते स्वच्छता का ज्ञान,,
सच की आवाज़ों को मिलता है केवल अपमान।
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ईमानदारी खड़ी चौराहे, ढूँढे अपना मान,
चापलूसी के शोर में दबता उसका हर अरमान।
जो प्रश्न करे वह देशद्रोही, जो झुके वही विद्वान,
तालियाँ बजती भीड़ कहे — “वाह! यही समाधान।”
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जनता भी अब सोच रही है, किसको दे पहचान?
हर मौसम में रंग बदलते जैसे गिरगिट-प्राण।
वोटों की खेती लहलहाए, सूखा पड़े इंसान,
वायदों के बादल गरजें, बरसे ना वरदान।
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आदर्शों की शवयात्रा पर भाषण बने प्रधान,
नीति और नीयत का रिश्ता रहता सदा अंजान।
इस रंगमंच की लीला देखो, कितना अजब विधान —
सच को मिलता सूखा तिरस्कार, झूठ बने सम्मान।
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गद्दारों को मान मिले सम्मान मिले और वफादार को कूड़ेदान,
राजनीति का खेल अलग है,भ्रष्ट आचरण को पद प्रतिष्ठा का दान ।

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