राजस्थान विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025
विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन विधेयक विशेषांक का विमोचन
धर्मांतरण कानून को प्रभावी तरीके से लागू करने पर ही उसकी सार्थकता होगी — ललित शर्मा
कोटा, 11 मार्च। श्रीराम मंदिर प्रबंध समिति, कोटा जंक्शन से संचालित ‘श्रीराम ज्योति’ पत्रिका के “विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध विधेयक” के विमोचन कार्यक्रम का आयोजन बुधवार सायंकाल माधव भवन, श्रीराम मंदिर में किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि जिला सेशन एवं सत्र न्यायाधीश, कोटा सत्यनारायण व्यास थे। मुख्य वक्ता क्षेत्रीय संयोजक, धर्म जागरण समन्वय, राजस्थान क्षैत्र ललित शर्मा तथा अध्यक्षता श्रीराम मंदिर प्रबंध समिति के अध्यक्ष डॉ. सुधीर उपाध्याय ने की। प्रबंध समिति के सभापति महेश वर्मा एवं पत्रिका के संपादक चंद्रशेखर शर्मा मंचासीन रहे। कार्यक्रम का संचालन अनिल जैन ने किया।
कार्यक्रम में श्रीराम मंदिर प्रबंध समिति, कोटा जंक्शन से प्रकाशित होने वाली ‘श्रीराम ज्योति’ पत्रिका के “विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध विधेयक” विशेषांक का विमोचन मंचस्थ अतिथियों ने किया तथा अतिथियों को स्मृति-चिन्ह देकर सम्मानित किया गया।
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्य वक्ता, क्षेत्रीय संयोजक धर्म जागरण समन्वय, राजस्थान क्षैत्र श्री ललित शर्मा ने राजस्थान सरकार के “विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध विधेयक” की आवश्यकता एवं उपयोगिता पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि, “यूं तो सनातन हिंदू सभ्यता में धर्म का मुख्य अर्थ कर्तव्य होता है। धारण करने योग्य कर्तव्यों का समूह—धरती माता के प्रति कर्तव्य, राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, माता-पिता के प्रति कर्तव्य—अर्थात कर्तव्यों के प्रति संकल्पित होना ही धर्म है।”
उन्होंने कहा कि “विश्व में एक ही धर्म है, वह है सनातन हिंदू धर्म। अन्य मत हैं, जिनमें मान्यता एक पुस्तक, एक ईश्वर और एक पूजा-स्थल तक सीमित होती है। वहीं हमारी सनातन हिंदू संस्कृति बहुदेववाद पर आधारित है। यह बहुआयामी और विविध श्रेष्ठताओं का समूह है। हमने श्रेष्ठ मान्यताओं को स्वीकार किया और सामाजिक व्यवस्था में समृद्ध किया। किंतु विश्व में इस्लाम और ईसाइयत ने अपनी मान्यताओं को जबरदस्ती दूसरों पर थोपा है—या तो उनकी मान्यताओं को मानो या मरो की स्थिति पैदा की। यह संघर्ष लंबे समय से चलता हुआ आज भी विविध प्रकार से मौजूद है और इसी जबरदस्ती से सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए राजस्थान सरकार द्वारा ‘विधि विरुद्ध धर्म परिवर्तन प्रतिषेध विधेयक’ कानून बनाया गया है।”
क्षेत्रीय संयोजक शर्मा ने भारत पर हुए धर्मांतरणकारी आक्रमणों और घटनाक्रमों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि “भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 का दुरुपयोग धर्मांतरण के मामलों में बहुत हुआ, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने ‘रेव. स्टेनिसलॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य’ प्रकरण में स्पष्ट कहा है कि ‘अनुच्छेद 25 में प्रचार करने के अधिकार का मतलब दूसरों को अपने धर्म में जबरन परिवर्तित करने का अधिकार नहीं है।’ यह मौलिक अधिकार केवल अपने धर्म के सिद्धांतों को फैलाने का है।”
मुख्य अतिथि जिला सेशन एवं सत्र न्यायाधीश, कोटा सत्यनारायण व्यास ने कहा कि “राज्य का कोई धर्म नहीं होता, उसके लिए सभी नागरिक समान होते हैं। किंतु कुछ समय से यह देखने में आता रहा है कि प्रलोभन, प्रताड़ना, षड्यंत्र और अनुचित प्रभाव के द्वारा धर्मांतरण करवाया जाता है। इसी कारण यह कठोर कानून प्रभाव में आया है।”
उन्होंने एक्ट के बारे में बताया कि “अब गैर-कानूनी तरीके से कराया गया धर्मांतरण संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है तथा इसमें कठोर कारावास की व्यवस्था है। कुछ परिस्थितियों में अपराधी को दस से बीस वर्ष तक की सजा भी हो सकती है। महिला, एससी/एसटी, दिव्यांग, अपराध की पुनरावृत्ति और सामूहिक धर्मांतरण के मामलों में कानून और भी अधिक कठोर है। वहीं यदि कोई धर्मांतरण करना चाहे तो उसे जिला कलेक्टर को आवेदन करना होगा और जांच होने के बाद ही अनुमति मिल सकेगी। साथ ही इस कानून में यह व्यवस्था भी है कि यदि कोई अपने धर्म में वापस आना चाहे तो उसे वापसी की छूट है।”
मंदिर समिति के अध्यक्ष डॉ. सुधीर उपाध्याय ने कहा कि “हमारा सनातन सृष्टि के प्रारंभ से ही है। हमारे बीच धीरे-धीरे विभिन्न वर्ग और जातियां व्याप्त हो गईं और हम अपनी मूल पहचान भूल गए। इसी विभाजन को समाप्त कर हमें सनातन को पुनः पूर्ण प्रतिष्ठा के साथ स्थापित करना है।” उन्होंने कहा कि राजस्थान देश का 12वां प्रदेश है, जहां धर्मांतरण पर रोक लगाने का प्रभावी कानून है।
सभापति महेश वर्मा ने कहा कि “कानून की सार्थकता तभी है जब उसका कठोरता से पालन हो।”
इस अवसर पर परमानंद शर्मा, प्रतापभान सिंह,अर्जुन सिंह चंदेल हरी शर्मा, राजेंद्र चावला, देवकीनंदन शर्मा, रघुनंदन विजय, कृष्ण कुमार अय्यर सहित श्रीराम मंदिर प्रबंध समिति के पदाधिकारी तथा बड़ी संख्या में लोग उपस्थित रहे।
भवदीय
श्रीराम मंदिर प्रबंध समिति
कोटा जंक्शन
मोबाइल: 7727874959
रेव. स्टेनिसलॉस बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1977): कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 25 में 'प्रचार करने' के अधिकार का मतलब दूसरों को अपने धर्म में जबरन परिवर्तित (Convert) करने का अधिकार नहीं है। मौलिक अधिकार केवल अपने धर्म के सिद्धांतों को फैलाने का है।
राजस्थान विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम, 2025 (Rajasthan Prohibition of Unlawful Conversion of Religion Act, 2025) राज्य में धोखाधड़ी, प्रलोभन, बल, या विवाह के माध्यम से होने वाले जबरन धर्मांतरण को रोकने के लिए एक सख्त कानून है। 8 अक्टूबर 2025 को अधिसूचित इस कानून के तहत, दोषियों को 20 वर्ष तक की जेल या आजीवन कारावास तथा भारी जुर्माने का प्रावधान है।
अधिनियम की प्रमुख विशेषताएं:
1- निषेध: प्रलोभन, बल प्रयोग, अनुचित प्रभाव, दबाव, विवाह या किसी भी कपटपूर्ण तरीके से धर्म परिवर्तन कराना अवैध है।
2- सजा का प्रावधान:
सामान्य मामला: 7 से 14 वर्ष की कारावास और ₹5 लाख तक का जुर्माना।
3- महिला, नाबालिग, SC/ST, दिव्यांग: 10 से 20 वर्ष की जेल और ₹10 लाख तक का जुर्माना।
सामूहिक धर्मांतरण: 20 वर्ष से आजीवन कारावास और ₹25 लाख तक का जुर्माना।
4- दोबारा अपराध करने पर: आजीवन कारावास और ₹50 लाख तक का जुर्माना।
5- विवाह: केवल धर्मांतरण के उद्देश्य से किया गया विवाह अमान्य घोषित किया जा सकता है।
6- पूर्वानुमति: धर्म बदलने से पहले जिला मजिस्ट्रेट को 60 दिन पूर्व सूचना देना अनिवार्य है।
7- जांच और कार्रवाई: सभी अपराध संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-bailable) होंगे, और जांच के दौरान संपत्ति ज़ब्त या ध्वस्त की जा सकती है।
8- विशेष नियम: स्वयं की इच्छा से मूल धर्म में वापसी (घर वापसी) को इस कानून के तहत अपराध नहीं माना गया है
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