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शांति, एकता और सद्भाव विकास की पहली शर्त : नरेंद्र मोदी

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शांति, एकता और सद्भाव विकास की पहली शर्त : नरेंद्र मोदी नयी दिल्ली : राष्ट्रीय एकता की खातिर सरदार वल्लभ भाई पटेल के कार्यों का स्मरण करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आज कहा कि अगर भारत को आगे बढना है और विकास की नयी ऊंचाइयां हासिल करनी है तो इसके लिए एकता, शांति और सद्भाव पहली शर्त है. दादरी में पिछले दिनों एक व्यक्ति की पीट-पीट कर हत्या किये जाने, गौमांस विवाद और अन्य घटनाओं की पृष्ठभूमि में कथित तौर पर असहिष्णुता में वृद्धि को लेकर कलाकारों, लेखकों और वैज्ञानिकों द्वारा विरोध जाहिर किये जाने की पृष्ठभूमि में मोदी ने देश के पूर्व उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल की 140वीं जयंती पर अपने संबोधन में कहा ‘एकता हमारी सबसे बडी ताकत है. हमें एकता, शांति और सद्भाव के मंत्र के साथ आगे बढना होगा.' प्रधानमंत्री ने इस मौके पर वंशवाद की राजनीति पर प्रहार करते हुए कहा कि यह हमारी राजनीति का विष बन गयी है. उन्होंने कहा कि सरदार पटेल ने अपने परिवार के किसी भी सदस्य को राजनीति में आगे नहीं बढाया. सरदार पटेल की जयंती पर राष्ट्रीय एकता दिवस मनाया जा रहा है और इस मौके पर प्रधानमंत्री ने ‘एक

संघ समाज में समरसता का भाव जगाने के लिए प्रयासरत – सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी

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रांची . अखिल भारतीय कार्यकारी  मंडल की बैठक का विधिवत् उद्घाटन रांची के सरला बिरला स्कूल में पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन राव भागवत जी और सरकार्यवाह सुरेश भय्या जी जोशी ने किया. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह-सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबले जी ने प्रेस वार्ता में संघ की अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक के संबंध में जानकारी दी. उन्होंने कहा कि संघ की बैठक वर्ष में दो बार होती है, प्रतिनिधि सभा की बैठक मार्च में, जबकि कार्यकारी मंडल की बैठक विजयादशमी एवं दीपावली के बीच होती है. सामान्यतः इन बैठकों में संघ कार्य के विस्तार, गुणात्मकता की दृष्टि से प्रगति और समाज राष्ट्र जीवन में संघ कार्य के प्रभाव पर चर्चा एवं कार्यनीति की कई बातें तय करते हैं. समाज एवं राष्ट्रजीवन से संबंधित कुछ विषयों पर हिन्दू समाज के विचार एवं मन को व्यक्त करने वाले संघ की नीति और विचार से सुसम्बद्ध प्रस्ताव भी बैठक में पारित करते हैं. सह सरकार्यवाह जी ने बताया कि 30 अक्टूबर से प्रारंभ तीन दिवसीय अखिल भारतीय कार्यकारी मंडल की बैठक में 400 के लगभग संघ के अधिकारी भाग ले रहे हैं. इस बैठक में जनसंख्या असंतुलन पर हम

आज भारत की गीता, योगदर्शन, तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं – परम पूज्य डॉ. मोहन भागवत जी

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Thursday, October 22, 2015 आज भारत की गीता, भारत का योगदर्शन, भारत के तथागत विश्वमान्य हो रहे हैं – डॉ. मोहन भागवत जी परम पूज्य पू. सरसंघचालक डॉ. मोहन जी भागवत का विजयादशमी उत्सव 2015 (गुरुवार दिनांक 22 अक्तुबर 2015) के अवसर पर दिया उद्बोधन - नागपुर. कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि आदरणीय डॉ. वीके सारस्वत जी अन्य निमंत्रित अतिथि गण, उपस्थित नागरिक सज्जन, माता भगिनी तथा आत्मीय स्वयंसेवक बन्धु - विजयादशमी के प्रतिवर्ष संपन्न होने वाले पर्व के निमित्त आज हम यहां एकत्रित हैं. संघ कार्य प्रारम्भ होकर आज 90 वर्ष पूर्ण हुए. यह वर्ष भारतरत्न डॉ. भीमराव जी उपाख्य बाबासाहेब आम्बेडकर की जन्मजयंती का 125वां वर्ष है. सम्पूर्ण देश में सामाजिक विषमता की अन्यायी नागपुर (1कुरीति को चुनौती देते हुए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया. स्वतंत्र भारत के संविधान में आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से उस विषमता को निर्मूल कर समता के मूल्यों की प्रतिष्ठापना करने वाले प्रावधान वे कर गये. संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के शब्दों में आचार्य शंकर की प्रखर बुद्धि व तथागत बुद्ध की असीम करुणा का संगम उनकी प्रतिभा में था.

शक्तिशाली समाज ही विजयशाली होती है : मा. क्षेत्र संघचालक डॉ. दर्शनलाल जी अरोड़ा

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शक्तिशाली समाज ही विजयशाली होती है – डॉ. दर्शन लाल जी मेरठ (विसंकें). मा. क्षेत्र संघचालक डॉ. दर्शन लाल अरोड़ा ने कहा कि जिस प्रकार भगवान राम ने साधारण जनजातियों का संगठन कर दुष्ट महाबली रावण व उसकी शक्तिशाली सेना पर विजय प्राप्त की. उसी प्रकार डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने हिन्दू समाज को संगठित करने का कार्य शरू किया. समाज को विस्मृति, जड़ता, दीनता से मुक्त कराने तथा अपनी शक्ति की पहचान कराने लिये 1925 में विजयादशमी के दिन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की. क्षेत्र संघचालक जी त्यागी छात्रावास के मैदान में विजयादशमी के उपलक्ष्य में आयोजित शस्त्र पूजन कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे. उन्होंने कहा कि पूर्व में भारत एक वैभवशाली, शक्ति सम्पन्न राष्ट्र था. सिकन्दर की विशाल सेना को भी हमारे एक छोटे राज्य की सेना ने परास्त किया. इतनी धन सम्पदा थी कि विदेशियों की गिद्ध दृष्टि लगी रहती थी. हमारे पास विश्व को ज्ञान देने के लिये नालन्दा, तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय थे. लेकिन हम सैकड़ों वर्षों तक आक्रांताओं की दासता में रहे और संघर्ष करते रहना पड़ा. हमारी इस स्थिति का कारण था, एक राष्

मानव कल्याण ही अंतिम उद्देश्य : माननीय सरकार्यवाह श्री सुरेश भय्या जी जोशी

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मानव कल्याण ही हमारा अंतिम उद्देश्य – माननीय श्री  सुरेश भय्या जी जोशी ठाणे (विसंकें). राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह माननीय श्री सुरेश भय्या जी जोशी ने कहा कि नैतिक, धार्मिक, तथा मानव कल्याण के लिए भारत को विश्व का नेतृत्व करना आवश्यक है. जिसके लिए समाज का नेतृत्व करने वाले सामर्थ्यवान व्यक्तियों का निर्माण करने, तथा जागृत, निस्वार्थ, संगठित समाज खड़ा करने के लिए संघ निरंतर प्रयास कर रहा है. विश्व गुरू के पद पर विराजमान होने के लिए भारत को अभी बहुत मार्ग तय करना है. जिसके लिए संघ का प्रयास सही दिशा में आगे बढ़ रहा है, ऐसे संकेत भी मिल रहे हैं. हमारे भारत देश को परम वैभव तक ले जाकर मानव कल्याण करना, यही हमारा अंतिम उद्देश्य है. सरकार्यवाह ठाणे में विजयादशमी के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को संबोधित कर रहे थे. मंच पर उनके साथ जैनाचार्य सुरेश्वर मुनि, विभाग संघचालक मधुकर बापट, जिला संघचालक विवेकानंद जी, ह.भ.प. सद्गिर महाराज, इस्कॉन संस्था, चिन्मय मिशन तथा ज्यू समाज के प्रतिनिधि उपस्थित थे. उन्होंने कहा कि संघ स्थापना की 90वीं सालगिरह यह कोई छोटा या बड़ी क

हिन्दू हिन्दू एक रहें : प.पू. सरसंघचालक भागवत जी

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सरसंघचालक डॉ श्री मोहन जी भागवत द्वारा विजयादशमी उत्सव (गुरुवार दिनांक 22 अक्तुबर 2015) के अवसर पर दिये गये उद्बोधन का सारांश कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि आदरणीय डॉ. वी. के. सारस्वत जी अन्य निमंत्रित अतिथि गण, उपस्थित नागरिक सज्जन, माता भगिनी तथा आत्मीय स्वयंसेवक बन्धु:- श्री विजयादशमी के प्रतिवर्ष संपन्न होनेवाले पर्व के निमित्त आज हम यहाँ एकत्रित हैं। संघ कार्य प्रारम्भ होकर आज 90 वर्ष पूर्ण हुए। यह वर्ष भारतरत्न डॉ. भीमराव रामजी उपाख्य बाबासाहेब आम्बेडकर की जन्मजयंती का 125 वाँ वर्ष है। सम्पूर्ण देश में सामाजिक विषमता की अन्यायी कुरीति को चुनौति देते हुए उन्होंने जीवनभर संघर्ष किया। स्वतंत्र भारत के संविधान में आर्थिक व राजनीतिक दृष्टि से उस विषमता को निर्मूल कर समता के मूल्यों की प्रतिष्ठापना करनेवाले प्रावधान कर वे गये। संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरुजी के शब्दों में आचार्य शंकर की प्रखर बुद्धि व तथागत बुद्ध की असीम करुणा का संगम उनकी प्रतिभा में था। गत वर्ष संघ के संस्थापक पू. डॉ. हेडगेवार जी की जयंती का भी 125 वाँ वर्ष था। समतायुक्त शोषणमुक्त हिन्दू समाज के सामूहि

विजयादशमी - परंपरा शक्ति पूजन की

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विजयादशमी - परंपरा शक्ति पूजन की -प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा शक्ति की कामना और तदनुसार उसकी उपासना, आदिकाल से ही मनुष्य की सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है। प्रारंभ में शक्ति-प्राप्ति का उद्देश्य केवल शिकार करना और उससे अपना पेट भरना था। इसलिए उस आदिम काल में पत्थरों के अनगढ़ से और बेडौल सी आकृति वाले हथियार ही पर्याप्त समझे जाते थे। उदरपूर्ति के इस उद्देश्य के साथ, आत्मसुरक्षा की भावना भी सहज रूप से जुड़ी हुई थी। धीरे-धीरे इन उद्देश्यों के साथ अन्य बातें भी जुड़तीं चली गईं जैसे विरोधियों को परास्त करना, उनकी सम्पत्ति (पशु, दास आदि) छीनना तथा अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाना आदि। ज्यों-ज्यों समाज का स्वरूप विकसित होता चला गया, त्यों-त्यों उसकी उलझने भी बढ़ती चली गईं और उसके साथ हथियारों का स्वरूप भी भयानक से भयानकतर बनता चला गया। पत्थरों के स्थान पर धाुत के हथियार बनने लगे। उनके आकार प्रकार में परिवर्तन हुए। बारुद के आविष्कार ने उन्हें एक नया मोड़ दिया। युद्ध का क्षेत्र जब भूमि से आगे समुद्र और आकाश तक बढ़ गया तो हथियारों की प्रहार क्षमता भी काफी बढ़ गई। आणविक शक्ति के आविष्कार

विजय का प्रतीक विजयादशमी - डॉ़0 मनमोहन वैद्य

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साधना और विजय का प्रतीक विजयादशमी - डॉ़0  मनमोहन वैद्य लेखक- रा.स्व.संघ के अ़ भा़ प्रचार प्रमुख  हैं   विजयादशमी विजय का उत्सव मनाने का पर्व है। यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, दुराचार पर सदाचार की, तमोगुण पर दैवीगुण की, दुष्टता पर सुष्टता की,भोग पर योग की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का उत्सव है। भारतीय संस्कृति में त्योहारों की रंगीन श्रृंखला गुंथी हुई है। प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी रूप में कोई संदेश लेकर आता है। लोग त्योहार तो हषार्ेल्लास सहित उत्साहपूर्वक मनाते हैं किंतु उसमें निहित संदेश के प्रति उदासीन रहते हैं। विजयादशमी उत्सव यानी कि दशहरा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम के द्वारा दैत्यराज रावण का अंत किये जाने की प्रसन्नता व्यक्त करने के रूप में और मां दुर्गा द्वारा आतंकी महिषासुर का मर्दन करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसके साथ इस पर्व का सन्देश क्या है इसके विषय में भी विचार करने की आज आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति हमेशा से ही वीरता की पूजक एवं शक्ति की उपासक रही है। शक्ति के बिना विजय संभव नहीं है। इसीलिए हिन्दुओं के

पाकिस्तान से लेंगे आजादी : कांपा पाकिस्तान

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पाकिस्तान से लेंगे आजादी : कांपा पाकिस्तान - प्रशान्त वाजपेयी ‘हम सब क्या चाहते -आजादी पाकिस्तान से लेंगे- आजादी यलगार से बोलो- आजादी सब सोच के बोलो-आजादी है जान हमारी -आजादी है जान से प्यारी -आजादी ’ पाकिस्तान के अवैध कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर, जिसे पाकिस्तान  ‘आजाद कश्मीर’ बोलता है, में हजारों युवकों, महिलाओं और बच्चों की भीड़ पाकिस्तानी फौजियों की संगीनों को मुंह चिढ़ाते हुए आजादी के नारे लगा रही थी। फौज की पिट्ठू स्थानीय पुलिस पंजाब (पाकिस्तानी पंजाब) से आयातित अपने अफसरों के हुक्म पर लोगों पर बर्बरता से लाठियां बरसा रही थी। लोग ये भी जानते थे कि आईएसआई और मिलिटरी इंटेलीजेंस के लोग भीड़ में अपने आगामी शिकारों को चुन रहे हैं, लेकिन आजादी के निर्भीक स्वर वादी में गूंज   रहे थे। आज पाक कब्जे वाले कश्मीर-गिलगित-बाल्टिस्तान में ऐसे प्रदर्शन आम बात हैं। इस प्रदर्शन के कुछ दिनों बाद ही 30 सितंबर 2015 को नवाज शरीफ संयुक्त राष्टÑसभा में कागज पर आंखें गड़ाए अपना भाषण पढ़ रहे थे, जिसका मजमून रावलपिंडी से स्वीकृत होकर आया था। मुट्ठी भर सुनने वाले ऊबे हुए थे, क्योंकि वे इस सालाना पाकिस्त

९ औषधियों में विराजती है नवदुर्गा

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९ औषधियों में विराजती है नवदुर्गा - अरविन्द कौशल कोटा 🌹मां दुर्गा नौ रूपों में अपने भक्तों का कल्याण कर उनके सारे संकट हर लेती हैं। इस बात का जीता जागता प्रमाण है, संसार में उपलब्ध वे औषधियां, जिन्हें मां दुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के रूप में जाना जाता है। नवदुर्गा के नौ औषधि स्वरूपों को सर्वप्रथम मार्कण्डेय चिकित्सा पद्धति के रूप में दर्शाया गया और चिकित्सा प्रणाली के इस रहस्य को ब्रह्माजी द्वारा उपदेश में दुर्गाकवच कहा गया है। ऐसा माना जाता है कि यह औषधियां समस्त प्राणियों के रोगों को हरने वाली और और उनसे बचा रखने के लिए एक कवच का कार्य करती हैं, इसलिए इसे दुर्गाकवच कहा गया। इनके प्रयोग से मनुष्य अकाल मृत्यु से बचकर सौ वर्ष जीवन जी सकता है। आइए जानते हैं दिव्य गुणों वाली नौ औषधियों को जिन्हें नवदुर्गा कहा गया है। 🍁१ प्रथम शैलपुत्री यानि हरड़ - नवदुर्गा का प्रथम रूप शैलपुत्री माना गया है। कई प्रकारकी समस्याओं में काम आने वाली औषधि हरड़, हिमावती है जो देवी शैलपुत्री का ही एक रूप हैं। यह आयुर्वेद की प्रधान औषधि है, जो सात प्रकार की होती है। इसमें हरीतिका (हरी