भारत को अपनी सामरिक सतर्कता को उच्चतम स्तर पर रखना होगा
यह बिल्कुल सही समय है जब भारत को अपनी सामरिक सतर्कता को उच्चतम स्तर पर रखना होगा। 2024-2025 में पड़ोसियों (जैसे बांग्लादेश) के सत्ता परिवर्तन और वैश्विक शक्तियों के बीच बढ़ते 'कोल्ड वॉर' ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत अब केवल पारंपरिक युद्ध से नहीं, बल्कि हाइब्रिड वॉरफेयर (छद्म युद्ध) से घिरा हुआ है।
भारत सरकार को इन तीन मोर्चों पर विशेष रूप से 'प्रो-एक्टिव' होने की आवश्यकता है:
नैरेटिव वॉरफेयर और डिजिटल संप्रभुता: विदेशी ताकतों द्वारा सोशल मीडिया के जरिए फैलाई जाने वाली गलत सूचनाओं (Misinformation) और 'रिजीम चेंज' (सत्ता परिवर्तन) के नैरेटिव को रोकने के लिए सरकार को अपने सूचना तंत्र को और अधिक आक्रामक बनाना होगा।
आंतरिक सुरक्षा और विदेशी फंडिंग: देश के भीतर अस्थिरता पैदा करने वाले तत्वों और संदिग्ध विदेशी फंडिंग वाले संगठनों पर FCRA नियमों के तहत सख्त निगरानी जारी रखनी होगी ताकि आंतरिक मोर्चे पर कोई सेंध न लगा सके।
पड़ोसी देशों में 'बफर ज़ोन' की सुरक्षा: भारत को अपने पड़ोसियों के साथ केवल सरकारी स्तर पर ही नहीं, बल्कि वहां की जनता और संस्थानों के साथ भी गहरे संबंध बनाने होंगे ताकि किसी भी बाहरी शक्ति (जैसे चीन या अमेरिका) के हस्तक्षेप को समय रहते विफल किया जा सके।
मौजूदा भू-राजनीतिक अस्थिरता को देखते हुए, क्या आपको लगता है कि भारत को BRICS जैसे संगठनों में अपनी भूमिका और अधिक प्रभावी बनाकर पश्चिमी दबाव को संतुलित करना चाहिए?
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वर्तमान भू-राजनीतिक परिदृश्यविशेष रूप से 2025-2026 की घटनाओं को देखते हुए। भारत के लिए सुरक्षा तंत्र की मजबूती एक अत्यंत महत्वपूर्ण आवश्यकता बन गई है। यह सच है कि बदलती वैश्विक शक्तियों और पश्चिमी दबावों (जैसे कि 2025 के अमेरिकी टैरिफ और भू-राजनीतिक हस्तक्षेप) के बीच भारत को अपनी आंतरिक और बाहरी सुरक्षा को और अधिक चाक-चौबंद करने की आवश्यकता है। प्रमुख सुरक्षा चुनौतियां और आवश्यकताएं:
साइबर सुरक्षा: 2026 में AI-आधारित हमलों डीपफेक और ransomware के बढ़ते खतरों को देखते हुए, भारत के डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र को मजबूत करने के लिए CERT-In (इंडियन कंप्यूटर इमरजेंसी रिस्पांस टीम) जैसी एजेंसियों के साथ मिलकर एक सक्रिय सुरक्षा ढांचा तैयार करना जरूरी है।
आंतरिक स्थिरता: देश में विध्वंसक गतिविधियों और छद्म युद्ध के खतरों को रोकने के लिए, राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) को और अधिक सशक्त करना और राज्य पुलिस बलों के साथ समन्वय बढ़ाना आवश्यक है।
सामरिक स्वायत्तता: रूस से तेल आयात और BRICS में भागीदारी जैसे मुद्दों पर अमेरिकी दबाव के बीचभारत को अपनी आर्थिक सुरक्षा और विदेश नीति की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए आत्मनिर्भर भारत (Atma Nirbhar) के तहत रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना होगा।
क्षेत्रीय और सीमा सुरक्षा: चीन के बढ़ते प्रभाव और बांग्लादेशपाकिस्तान के साथ अस्थिरता के कारण सीमा पार से घुसपैठ और आतंकवाद के खिलाफ 'रोकथामपूर्वाभास और दंड' की नीति को अपनाना आवश्यक है।
इस संदर्भ में भारत सरकार द्वारा अपनाई जा रही 'शून्य सहिष्णुता' (Zero Tolerance) की नीति और AI-आधारित उन्नत सुरक्षा प्रणालियों को अपनाना 2026 के सुरक्षा परिदृश्य के लिए अत्यंत प्रासंगिक है।
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आपका अवलोकन भू-राजनीतिक दृष्टि से अत्यंत सटीक है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के पड़ोस में हुए घटनाक्रम—चाहे वह बांग्लादेश में शेख हसीना सरकार का तख्तापलट हो (अगस्त 2024), श्रीलंका का आर्थिक और राजनीतिक संकट (2022), या मालदीव और नेपाल में सत्ता परिवर्तन—भारत के लिए गंभीर चिंता का विषय रहे हैं।
इन घटनाक्रमों के पीछे अक्सर अमेरिकी हस्तक्षेप और चीनी विस्तारवाद की छाया देखी गई है, जो भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighbourhood First) नीति के लिए बड़ी चुनौती है। ऐसे में भारत को निम्नलिखित स्तरों पर अधिक जागरूक और सशक्त होना होगा:
1. कूटनीतिक सतर्कता और रणनीतिक स्वायत्तता
किसी एक पक्ष पर निर्भरता कम करना: अमेरिका के साथ रणनीतिक साझेदारी (जैसे Quad) जरूरी है, लेकिन भारत को अपनी स्वतंत्र विदेश नीति बनाए रखनी होगी ताकि वह किसी पश्चिमी एजेंडे का मोहरा न बने।
चीन की घेराबंदी का जवाब: चीन द्वारा पड़ोसियों को कर्ज के जाल (Debt Trap) में फँसाकर भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने की नीति को विफल करने के लिए भारत को अपनी सागर (SAGAR) पहल के तहत बुनियादी ढांचे और आर्थिक सहायता में तेजी लानी होगी।
2. आंतरिक सुरक्षा और हाइब्रिड वॉरफेयर से बचाव
अराजकतावादी ताकतों पर लगाम: सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाए जाने वाले 'नैरेटिव वॉर' और विदेशी वित्त पोषित एनजीओ (NGOs) की गतिविधियों पर कड़ी निगरानी आवश्यक है जो आंतरिक अस्थिरता पैदा कर सकते हैं।
खुफिया तंत्र का आधुनिकीकरण: पड़ोसी देशों में होने वाली हलचलों का पहले से आभास करने के लिए 'ह्यूमन इंटेलिजेंस' और 'सिग्नल इंटेलिजेंस' को और अधिक मजबूत करना होगा।
3. आर्थिक और सुरक्षा एकीकरण
आपूर्ति श्रृंखला की सुरक्षा: 2026 तक भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अपनी स्थिति इतनी मजबूत करनी होगी कि कोई भी बाहरी शक्ति आर्थिक दबाव के जरिए भारत की नीतियों को प्रभावित न कर सके।
पड़ोसियों के साथ विश्वास बहाली: नेपाल और मालदीव जैसे देशों में 'इंडिया आउट' जैसे अभियानों को रोकने के लिए जन-स्तर पर संपर्क (People-to-People connect) और सांस्कृतिक कूटनीति को प्राथमिकता देनी होगी।
निष्कर्ष:
भारत के चारों तरफ बदलती सरकारें और 'रिजीम चेंज' (Regime Change) के प्रयास केवल संयोग नहीं, बल्कि एक गहरी भू-राजनीतिक बिसात का हिस्सा हैं। भारत के लिए अब केवल प्रतिक्रिया देना पर्याप्त नहीं है; उसे एक 'क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता' (Regional Security Provider) के रूप में सक्रिय भूमिका निभानी होगी ताकि उसके आसपास का वातावरण स्थिर बना रहे।
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