गुरुवार, 27 फ़रवरी 2020

आजाद हूं और आजाद रहूंगा - चंद्रशेखर आज़ाद





चंद्रशेखर आज़ाद जी का आज बलिदान दिवस है !
एच०एस०आर०ए० द्वारा किये गये साण्डर्स-वध और दिल्ली एसेम्बली बम काण्ड में फाँसी की सजा पाये तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। अन्य सजायाफ्ता अभियुक्तों में से सिर्फ ३ ने ही प्रिवी कौन्सिल में अपील की। ११ फ़रवरी १९३१ को लन्दन की प्रिवी कौन्सिल में अपील की सुनवाई हुई। इन अभियुक्तों की ओर से एडवोकेट प्रिन्ट ने बहस की अनुमति माँगी थी किन्तु उन्हें अनुमति नहीं मिली और बहस सुने बिना ही अपील खारिज कर दी गयी। चन्द्रशेखर आज़ाद ने मृत्यु दण्ड पाये तीनों प्रमुख क्रान्तिकारियों की सजा कम कराने का काफी प्रयास किया। वे उत्तर प्रदेश की हरदोई जेल में जाकर गणेशशंकर विद्यार्थी से मिले। विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गये और २० फरवरी को जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की। आजाद ने पण्डित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधी जी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र- कैद में बदलवाने के लिये जोर डालें! अल्फ्रेड पार्क में अपने एक मित्र सुखदेव राज से मन्त्रणा कर ही रहे थे तभी सी०आई०डी० का एस०एस०पी० नॉट बाबर जीप से वहाँ आ पहुँचा। उसके पीछे-पीछे भारी संख्या में कर्नलगंज थाने से पुलिस भी आ गयी। दोनों ओर से हुई भयंकर गोलीबारी में आजाद को वीरगति प्राप्त हुई। यह दुखद घटना २७ फ़रवरी १९३१ के दिन घटित हुई और हमेशा के लिये इतिहास में दर्ज हो गयी।

पुलिस ने बिना किसी को इसकी सूचना दिये चन्द्रशेखर आज़ाद का अन्तिम संस्कार कर दिया था। जैसे ही आजाद की बलिदान की खबर जनता को लगी सारा इलाहाबाद अलफ्रेड पार्क में उमड पडा। जिस वृक्ष के नीचे आजाद शहीद हुए थे लोग उस वृक्ष की पूजा करने लगे। वृक्ष के तने के इर्द-गिर्द झण्डियाँ बाँध दी गयीं। लोग उस स्थान की माटी को कपडों में शीशियों में भरकर ले जाने लगे। समूचे शहर में आजाद की बलिदान की खबर से जब‍रदस्त तनाव हो गया। शाम होते-होते सरकारी प्रतिष्ठानों प‍र हमले होने लगे। लोग सडकों पर आ गये।

आज़ाद के बलिदान की खबर जवाहरलाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू को मिली तो उन्होंने तमाम काँग्रेसी नेताओं व अन्य देशभक्तों को इसकी सूचना दी।। बाद में शाम के वक्त लोगों का हुजूम पुरुषोत्तम दास टंडन के नेतृत्व में इलाहाबाद के रसूलाबाद शमशान घाट पर कमला नेहरू को साथ लेकर पहुँचा। अगले दिन आजाद की अस्थियाँ चुनकर युवकों का एक जुलूस निकाला गया। इस जुलूस में इतनी ज्यादा भीड थी कि इलाहाबाद की मुख्य सडकों पर जाम लग गया। ऐसा लग रहा था जैसे इलाहाबाद की जनता के रूप में सारा हिन्दुस्तान अपने इस सपूत को अंतिम विदाई देने उमड पड़ा हो। जुलूस के बाद सभा हुई। सभा को शचीन्द्रनाथ सान्याल की पत्नी प्रतिभा सान्याल ने सम्बोधित करते हुए कहा कि जैसे बंगाल में खुदीराम बोस की बलिदान के बाद उनकी राख को लोगों ने घर में रखकर सम्मानित किया वैसे ही आज़ाद को भी सम्मान मिलेगा। सभा को कमला नेहरू तथा पुरुषोत्तम दास टंडन ने भी सम्बोधित किया। इससे कुछ ही दिन पूर्व ६ फ़रवरी १९३१ को पण्डित मोतीलाल नेहरू के देहान्त के बाद आज़ाद भेस बदलकर उनकी शवयात्रा में शामिल हुए थे।

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आज ही 1931 में शहीद हुये थे चंद्रशेखर आजाद, पढ़िये कैसे अकेले भिड़े थे अंग्रेजों से
By अमरीष मनीष शुक्ला  | Updated: Monday,July 23, 2018

इलाहाबाद। हिंदुस्तान के इतिहास में आज का दिन स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। यह दिन उस वीर क्रांतिकारी के जीवन का आखिरी दिन था जिसके नाम से अंग्रेजी हुकूमत के अधिकारी कांप जाया करते थे। हालांकि बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि आज के ही दिन महान क्रांतिकारी पंडित चंद्रशेखर आजाद तिवारी वीरगति को प्राप्त हुए थे। 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद में अंग्रेजी फौज से अकेले ही भिड़े आजाद ने अपनी कसम को पूरा करने के लिए उस वक्त खुद पर गोली चलाई जब उनके पिस्टल से सिर्फ एक गोली बची थी। 15 अंग्रेज सिपाहियों को निशाना बनाने के बाद जब आजाद की पिस्टल में आखरी गोली बची थी तब उस गोली को खुद को मार कर देश के प्रति अपना सर्वोच्च बलिदान कर गए थे। वह आखिरी दिन आज भी कई बुजुर्गों को याद हैं और जाने कितनी किताबों में यह घटनाक्रम हमेशा के लिए अमर हो गया है। आइये हम आपको आजाद के उस आखिरी दिन की कहानी से रूबरू कराते हैं और आजादी के नायक वीर योद्धा को श्रद्धांजलि देते हैं।

अल्फ्रेड पार्क चल रहा था विचार विमर्श
 भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद अब उन्हें फांसी दिए जाने की तैयारियां चल रही थी। चंदशेखर आजाद इसे लेकर बहुत ज्यादा परेशान थे। वह जेल तोड़कर भगत सिंह को छुड़ाने की योजना बना चुके थे, लेकिन भगत सिंह जेल से इस तरह बाहर निकलने को तैयार नहीं थे। परेशान चंदशेखर आजाद हर तरह से भगत को की फांसी रोकने का प्रयास कर रहे थे। आजाद अपने साथी सुखदेव आदि के साथ आनंद भवन के नजदीक अल्फ्रेड पार्क में बैठे थे। वहां वह आगामी योजनाओं के विषय पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूचना अंग्रेजों को दे दी गई। मुखबिरी मिलते ही अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को घेर लिया। अंग्रेजों की कई टुकड़ियां पार्क के अंदर घुस आई जबकि पूरे पार्क को बाहर से भी घेर लिया गया। उस समय किसी का भी पार्क से बचकर निकल पाना मुश्किल था, लेकिन आजाद यूं ही आजाद नहीं बन गए थे । अपनी पिस्टल के दम पर उन्होंने पहले अपने साथियों को पेड़ों की आड़ से बाहर निकाला और खुद अंग्रेजों से अकेले ही भिड़ गए । हाथ में मौजूद पिस्टल और उसमें रही 8 गोलियां खत्म हो गई। आजाद ने अपने पास रखी 8 गोलियों की दूसरी मैगजीन फिर से पिस्टल में लोड कर ली और रुक रुक कर अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे।

15 अंग्रेस सिपाहियों को बना था निशाना
चंद्रशेखर आजाद ने जितनी भी गोलियां चलाई हर बार अचूक निशाने पर लगी और कोई न कोई वर्दीधारी मारा गया। दहशत के कारण अंग्रेज भी पेड़ों की आड़ में छुप चुके थे। एक अकेले क्रांतिकारी के सामने सैकड़ों अंग्रेज सिपाहियों की टोली बौनी साबित हो रही थी। चंदशेखर आजाद ने 15 वर्दीधारियों को अपना निशाना बना लिया था, लेकिन अब उनकी गोलियां खत्म होने वाली थी। चंदशेखर आजाद ने अपनी पिस्टल चेक की तो अब सिर्फ एक गोली बची हुई थी। वह चाहते तो एक और अंग्रेज अधिकारी को गोली मार सकते थे, लेकिन उन्होंने कसम खाई थी कि जीते जी उन्हें कोई भी अंग्रेज हाथ नहीं लगा सकेगा। इस कसम को पूरी करने के लिए आखिरकार उस महान योद्धा ने वह फैसला लिया जिसे जिससे वह हमेशा के लिए आजाद हो गए। 27 फरवरी 1931 का वह दिन आजाद के लिये अंतिम दिन बन गया। चंदशेखर आजाद ने पिस्टल की आखिरी गोली अपनी कनपटी पर चला दी और वहीं पेड़ के नीचे हमेशा के लिए शांत होकर अमर हो गए।

'आजाद' नाम से डरते थे अंग्रेज
आजाद की ओर से गोलियां चलनी बंद हुई और लगभग आधे घंटे तक जब एक भी गोली नहीं चली तो अंग्रेज सिपाही धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, लेकिन आजाद का खौफ इस तरह था कि एक एक कदम आगे बढ़ने वाले सिपाही जमीन पर रेंगते हुए अब आजाद की ओर बढ रहे थे । आजाद के मृत शरीर पर जब अंग्रेजों की नजर पड़ी तो उन्होंने राहत की सांस ली , लेकिन अंग्रेजो के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर भी गोलियाँ चलाई गयी और जब अंग्रेज आश्वस्त हुये तब आजाद की मृत्यु की पुष्टि हुई। यह आज भी कयी किताबों में लिखा है कि आजाद की मुखबिरी एक बड़े नेता ने की थी और यह राज आज भी भारत सरकार के पास सुरक्षित फाइलों में दफन है।

चंद्रशेखर आजाद का परिचय
चंद्रशेखर आज़ाद का पूरा नाम चंद्रशेखर तिवारी था, इनका नाम 23 जुलाई, 1906 को उत्‍तर प्रदेश के उन्‍नाव जिले के बदरका गांव में 1906 में हुआ था लेकिन इनका पूरा बचपन एमपी में बीता। 1922 में चंद्रशेखर की मुलाकात राम प्रसाद बिस्मिल से हुई और चंद्रशेखर क्रांतिकारी बन गये। चंद्रशेखर आजाद ने हिंदुस्तान रिपब्लिकन क्रांतिकारी दल का पुनर्गठन किया और भगवतीचरण वोहरा, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु आदि के साथ अंग्रेजी हुकूमत में दहशत फैला दी। आजाद के नाम से अंग्रेजी हुकूमत में इतनी दहशत थी कि पुलिस की एक्का दुक्का टुकड़ी सूचना मिलने के बाद छापेमारी में भी दहशत खाती थी। 17 जनवरी 1931 को आजाद पर इनाम की घोषणा कर दी गयी। 27 फरवरी 1931 को वह इलाहाबाद में अंग्रेजों के साथ मुठभेड़ के दौरान वीरगति को प्राप्त हुए थे।

साथियों से क्या कहते थे आजाद
 "गिरफ़्तार होकर अदालत में हाथ बांध बंदरिया का नाच मुझे नहीं नाचना है। मेरी पिस्तौल में आठ गोली हैं और आठ की दूसरी मैगजीन भी है। पन्द्रह दुश्मन पर चलाऊंगा और सोलहवीं खुद पर !" "लेकिन जीते जी अंग्रेजों के हाथ नहीं आउंगा। जिंदा रहते हुये अंग्रेज मुझे हाथ भी नहीं लगा पायेंगे आजाद हूं और आजाद रहूंगा "- चंद्रशेखर आज़ाद !