रविवार, 28 जून 2015

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य





- लखेश्वर चंद्रवंशी 'लखेश'

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) सारी दुनिया के चिंतन का केन्द्रीभूत विषय बन गया है। संघ जहां धर्म, अध्यात्म, विश्व कल्याण और मानवीय मूल्यों की रक्षा करनेवालों के लिए शक्ति स्थल है, वहीं वह हिन्दू या भारत विरोधी शक्तियों के लिए चिंता और भय कम्पित करनेवाला संगठन भी है। विश्व के सबसे बड़े संगठन के रूप
में ख्यात राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना सन 1925 में विजयादशमी के दिन नागपुर में हुआ। पराधीन भारत में जन्में इस संगठन के विस्तार की राह आसान नहीं थी। संघ को रोकने के लिए विरोधी पग-पग पर कांटें बोते रहे पर वे संघ के संगठन शक्ति को रोक नहीं पाए।

आखिर, संघ के मूल में ऐसी कौन सी शक्ति छिपी है जिसने उसे इतना बड़ा कर दिया कि आज वह दुनिया के बुद्धिजीवियों के ध्यानाकर्षण का केन्द्र बन गया है। यही प्रश्न संघ के प्रशंसकों, विरोधियों और शोधकर्ताओं के मन में उठता है। इसलिए इन प्रश्नों के उत्तर यदि चाहिए तो सबको संघ संस्थापक एवं आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के विचारों को उचित परिप्रेक्ष्य में समझना होगा, क्योंकि उन्होंने ही संघ की स्थापना की और उसका लक्ष्य निर्धारित किया। वास्तव में डॉ.हेडगेवार के संदेशों में ही छिपा है आरएसएस के शक्तिशाली और विस्तारित होने का रहस्य।   
स्वयं के उद्धार के लिए संघ की स्थापना 


डॉ. हेडगेवार ने 13 अक्टूबर, 1937 को विजयादशमी के दिन अपने प्रबोधन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के उद्देश्य को निरुपित करते हुए कहा था कि,“राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना केवल अपने स्वयं के उद्धार के लिए ही किया गया है। संघ का कोई दूसरा-तीसरा उद्देश्य न होकर केवल स्वयं का उद्धार करना, यही उसकी इच्छा है। परन्तु स्वयं का उद्धार कैसे होगा, पहले हमें इस पर विचार करना होगा। स्वयं का उद्धार करने के लिए जीवित रहना पड़ता है,जो समाज जीवित रहेगा वही समाज स्वयं का और अन्यों का उद्धार कर सकता है और संघ की स्थापना इसी के लिए हुआ है। हिन्दू समाज जीवित रहे अथवा “Sarvival of the fittest” इस तत्व के अनुसार जीवित रहने योग्य रहे इस उद्देश्य से ही संघ का जन्म हुआ है।”



डॉ. हेडगेवार के इस आहवान को स्वीकार कर अनेकों ने संघ कार्य के लिए अपने जीवन को समर्पित किया, जिनमें श्रीगुरूजी गोलवलकर, बालासाहब देवरस, एकनाथ रानडे, भाउराव देवरस, यादवराव जोशी, दादा परमार्थ, बाबासाहेब आपटे तथा माधवराव मुले आदि महानुभावों प्रमुख थे।
आक्रान्ताओं को दोष न दें
डॉ.हेडगेवार ने कहा, 

“हिन्दू  राष्ट्र पर अतीत में अनेक आक्रमण हुए, वर्तमान में भी हो रहे हैं और कदाचित भविष्य में भी होता रहेगा, यह संघ जानता है। संघ को यह भी मालूम है कि  दूसरे समाज पर जो समाज आक्रमण करता है, दूर से देखनेवाले लोग उन्हें दोष  देते हैं और जिनपर आक्रमण होता है उसके प्रति सहानुभूति रखते हैं। पर ये  उनकी दृष्टि से ठीक है। अब जिनपर आक्रमण होता है उस समाज ने आक्रान्ताओं को दोष देते बैठे रहने के बजाय ये आक्रमण क्यों होते हैं, इसके कारणों को  खोजकर उसे दूर करना चाहिए। यह दृष्टि सामने रखकर अपने हिन्दू समाज की ओर  देखें तो ये अत्याचार व आक्रमण होने का मुख्य कारण हमारी दुर्बलता व नासमझी ही है। आज हिन्दू समाज इतना नासमझ हो गया है कि कोई भी आता है और अपने  सनकी मिजाज से हिन्दू समाज पर मनमानी अत्याचार करता है। पर अभी भी हमें  इसकी कोई चिंता नहीं होती तथा अपने असंगठित और बिखरेपन को दूर करने के लिए जैसा होना चाहिए वैसा प्रयास होता दिखाई नहीं देता, संघ को यह अच्छा नहीं  लगता। हमें गुस्सा आता है हिन्दुओं के इस तिरस्कृत मनोवृत्ति का, न कि  हिन्दुओं का। क्योंकि वे अपने ही हैं और उनके उद्धार के लिए ही हमारा जन्म
हुआ है। पर यह तिरस्करणीय मनोवृत्ति – स्वयं की रक्षा न करने की वृत्ति –  मौजूदगी की वजह से हिन्दू समाज पर होनेवाले आक्रमण समाप्त होना संभव नहीं। 


संघ को हिन्दुओं की इस कमजोरी को निकाल बाहर कर इस पाप को धोकर निकलना है
और इसलिए ही इस आसेतु हिमालय हिन्दुस्थान के प्रत्येक कोने में संघ की  शाखाओं का मजबूत संजाल फैलाकर सम्पूर्ण हिन्दू समाज को संगठित, प्रबल और  स्वरक्षणक्षम बनाना, यही यही संघ की इच्छा है।”




प्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए 


29 अगस्त, 1939 को लाहौर में संपन्न हुए अधिकारी शिक्षण वर्ग में डॉ.हेडगेवार ने अपने भाषण में संघ को अपेक्षित स्वयंसेवकों की योग्यता और गुण संवर्धन को लेकर महत्वपूर्ण बातें कही थी। उन्होंने कहा,   

“संघ को  प्रत्यक्ष काम करनेवाले लोग चाहिए। संघ के पास ऐसी कोई सत्ता नहीं कि किसी  से काम करवा सके, न धन है जिससे तनखा दे सके। संघ का कार्य moral force  (नैतिक बल) से चलता है। वह किसी पर जबरदस्ती नहीं कर सकता। इसलिए नैतिक बल
से ही लोगों को खींच कर आप संघ में ला सकते हैं। आपकी संख्या इतनी हो जानी  चाहिए कि आप लोगों को आकर्षित कर सकें, उनके दिलों को मोह लें, अपने  character (चरित्र) के मोह से। आपके सम्बन्ध में लोगों के दिलों में प्रेम  होना चाहिए। इस दृष्टि से आप attraction centre (आकर्षण का केन्द्र) बनने  की कोशिश करें। लोगों के अन्दर जो तकरार होती है, हमारे में न हो। आपको लोग आदर्श समझे। वह कहे कि नौजवान वह, कि जो संघ के स्वयंसेवक जैसा हो। उनके  मन में ऐसा विचार हो कि मेरा छोटा भाई भी संघ में जाकर ऐसा बनें। संघ के  स्वयंसेवक पर इस नाते सभी जवाबदारी है।”

उन्होंने कहा,“आपके मन में विचार हो कि पढ़ना भी संघ का कार्य है, क्योंकि संघकार्य के लिए पढ़ना है। जितना ज्यादा पढ़ जाऊंगा उतना ज्यादा कार्य कर सकूंगा। आपका व्यवहार आदर्श हो। दूसरे लोगों को भी ऐसा बनाने की आपकी जिम्मेदारी है। संघ का काम करने के लिए आपको योग्य होना चाहिए, शरीर से, दिमाग से, सब ओर से। ताकतवर आदमी कमजोर से ज्यादा कार्य कर सकता है।”  
प्रेम से प्रेम की वृद्धि 


डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को प्रेम का महत्त्व बताते हैं। वे कहते हैं,

“लोगों को ऐसा प्रतीत होना चाहिए कि यह हमारे पास आए, बैठे, बातचीत करें। ऐसा नहीं
कि आपको देखकर लोग दौड़े, छिपते फिरें। लोगों को आप प्रेम से देखें, तो लोग  भी आपको प्रेम से देखेंगे। प्रेम से प्रेम की वृद्धि होती है।”

उन्होंने कहा कि, “मेरा सन्देश यही है कि आप ऐसे प्रेम और आदर्श की मूर्ति बनें कि लोग आपकी ओर खींचे आए। आपके हाथ के साथ किसी का हाथ भी लगे, आपके साथ कोई बात भी कर ले फिर वह आपको न भूल सके। ऐसी आपकी वाणी में मिठास हो। किसी पुरुष के आप सदगुण ग्रहण करें, साथ ही अपने प्रभाव से उसके दुर्गुण दूर करें।”
डॉ. हेडगेवार स्वयंसेवकों को आत्मपरीक्षण की सलाह देते हुए कहते हैं कि, “आप कभी भी अपनाप को   सर्वगुणसम्पन्न मत समझो, नहीं तो आपके सब गुण निरर्थक हो

जाएंगे। आप रात को सोते समय विचार करें कि दिनभर मैंने क्या किया, क्या
गलती की है, आगे क्या करना है। ऐसा सोचने से तथा करने से आप समाज के नेता
बनेंगे और जाति का काम बहुत बढ़ा सकेंगे।”
  

डॉ. हेडगेवार राष्ट्र से जितना प्रेम करते थे, उतना ही प्रेम वे समाज व स्वयंसेवकों से करते थे। उनमें मनुष्य को
देशकार्य के लिए समर्पित होने की प्रेरणा देने का अदभुत कौशल था। वे स्वयंसेवकों को मातृवत स्नेह करते थे, सलाह देते थे, प्रेरित करते थे। उनकी वाणी, चरित्र और कार्य में इतना सामर्थ्य था कि उन्होंने जिसके कन्धों पर
हाथ रखा वे उनके साथ चलने लगे। उन्होंने जिसे पुकारा वे उनके हो गए।

उन्होंने जिनको संघ के माध्यम से राष्ट्रकार्य में लगाया, उन सभी ने अपने ही तरह सैंकड़ों को तैयार किया, सैंकड़ों ने हजारों को तैयार किया, हजारों ने लाखों स्वयंसेवकों का जीवन गढ़ा। अब स्वयंसेवकों की तादात करोड़ों में हो गई है और ये स्वयंसेवक देश और दुनिया में समाज के उत्थान के लिए सेवाकार्यों के माध्यम से अपना कर्तव्य कर रहे हैं।
आज संघ के ही एक स्वयंसेवक व प्रचारक श्री नरेन्द्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं। उनके ही प्रस्ताव को मानकर हाल ही में 21 जून, 2015 को दुनियाभर में “अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस” मनाया गया।

यह संघ के स्वयंसेवक के प्रस्ताव की वैश्विक मान्यता का अनुपम उदाहरण है।  

शनिवार, 27 जून 2015

शक्तिशाली संघ के रहते ‘आपातकाल’ कैसे टिक सकता था ?' - लखेश्वर चंद्रवंशी 'लखेश'




- लखेश्वर चंद्रवंशी 'लखेश'
25 जून, 1975 की काली रात को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने ‘आपातकाल’ (Emergency) लगाकर देश को लगभग 21 माह के लिए अराजकता और अत्याचार के घोर अंधकार में धकेल दिया। 21 मार्च, 1977 तक भारतीय लोकतंत्र ‘इंदिरा निरंकुश तंत्र’ बनकर रह गया। उस समय जिन्होंने आपातकाल की यातनाओं को सहा, उनकी वेदनाओं और अनुभवों को जब हम पढ़ते हैं या सुनते हैं तो बड़ी हैरत होती है। आपातकाल के दौरान समाचार-पत्रों पर तालाबंदी, मनमानी ढंग से जिसे चाहें उसे कैद कर लेना और उन्हें तरह-तरह की यातनाएं देना, न्यायालयों पर नियंत्रण, ‘न वकील न दलील’ जैसी स्थिति लगभग 21 माह तक बनी रही। आज की पीढ़ी ‘आपातकाल की स्थिति’ से अनभिज्ञ है, वह ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं कर सकती। क्योंकि हम लोग जो 80 के दशक के बाद पैदा हुए, हमें ‘इंदिरा के निरंकुश शासन’ के तथ्यों से दूर रखा गया। यही कारण है कि हमारी पीढ़ी ‘आपातकाल’ की जानकारी से सरोकार नहीं रख सके।
हम तो बचपन से एक ही बात सुनते आए हैं कि इंदिरा गांधी बहुत सक्षम और सुदृढ़ प्रधानमंत्री थीं। वे बहुत गरीब हितैषी,राष्ट्रीय सुरक्षा और बल इच्छाशक्ति वाली नारी थीं। ऐसे अनेक प्रशंसा के बोल अक्सर सुनने को मिलते रहे हैं। पर आज देश में भाजपानीत ‘एनडीए’ की मोदी सरकार का शासन है। यही कारण है तथ्यों से परदा उठना शुरू हो गया है। अब पता चल रहा है कि कांग्रेस पार्टी और उसके नेताओं ने किस तरह इंदिरा का महिमामंडन कर ‘आपातकाल’ के निरंकुश शासन के तथ्यों से देश को वंचित रखा।



आपातकाल लगाना जरुरी था या मज़बूरी?  
कांग्रेस के नेता यह दलील देते हैं कि उस समय ‘आपातकाल’ लगाना बहुत जरुरी था, इसके आभाव में शासन करना कठिन हो गया था। पर तथ्य कुछ और है? कांग्रेस के कुशासन और भ्रष्टाचार से तंग आकर जनता ने भूराजस्व भी देना बंद कर दिया था। जनता ने अवैध सरकार के आदेशों की अवहेलना शुरू कर दी थी। पूरे देश में इन्दिरा सरकार इतनी अलोकप्रिय हो चुकी थी कि चारों ओर से बस एक ही आवाज़ आ रही थी - इन्दिरा गद्दी छोड़ो। इधर लोकनायक जय प्रकाश नारायण का आन्दोलन अपने चरम पर था। बिहार में प्रत्येक कस्बे, तहसील, जिला और राजधानी में भी जनता सरकारों का गठन हो चुका था। जनता सरकार के प्रतिनिधियों की बात मानने के लिए ज़िला प्रशासन भी विवश था। ऐसे में इंदिरा गांधी के लिए शासन करना कठिन हो गया।
दूसरी ओर, इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जब इन्दिरा गांधी के रायबरेली लोकसभा क्षेत्र से चुनाव को अवैध ठहराने तथा उन्हें छह वर्षों तक चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध लगा दिया तो इंदिरा गांधी को अपनी सत्ता से बेदखल होने का दर सताने लगा। न्यायालय के इस निर्णय के बाद नैतिकता के आधार पर इंदिरा गांधी को इस्तीफा देना चाहिए था, लेकिन सत्ता के मोह ने उन्हें जकड लिया। सभी को किसी अनहोनी की आशंका तो थी ही, लेकिन  इंदिरा ऐसी निरंकुश हो जाएंगी, इसका किसी को अंदाजा नहीं था। उन्होंने इस्तीफ़ा नहीं दिया, बल्कि लोकतंत्र का गला घोंटना ही उचित समझा। 



प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी से 25 जून, 1975 की रात को ‘आपातकाल (इमर्जेन्सी) की घोषणा कर दी और भोर होने से पूर्व ही सीपीआई को छोड़कर सभी विरोधी दलों के नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया। इस अराजक कार्रवाई में न किसी की उम्र का लिहाज किया गया और न किसी के स्वास्थ्य की फ़िक्र ही की गई, बस जिसे चाहा उसे कारावास में डाल दिया गया। आपातकाल के दौरान लोकनायक जय प्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, चरण सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, जार्ज फर्नांडिस जैसे नेताओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के तत्कालीन सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस सहित हजारों स्वयंसेवकों को कैद कर लिया गया। देश के इन राष्ट्रीय स्तर के नेताओं को मीसा (Maintenance of Internal Security Act) के तहत अनजाने स्थान पर कैद कर रखा गया। मीसा वह काला कानून था जिसके तहत कैदी को कोर्ट में पेश करना आवश्यक नहीं था। इसमें ज़मानत का भी प्राविधान नहीं था।

सरकार ने जिनपर थोड़ी रियायत की उन्हें डीआईआर (Defence of India Rule) के तहत गिरफ़्तार किया गया। यह थोड़ा नरम कानून था। इसके तहत गिरफ़्तार व्यक्ति को कोर्ट में पेश किया जाता था।


आपातकाल और मीडिया
उस समय शहरों को छोड़कर दूरदर्शन की सुविधा कहीं थी नहीं। समाचारों के लिए सभी को आकाशवाणी तथा समाचार पत्रों पर ही निर्भर रहना पड़ता था। 25 जून, 1975 को आकाशवाणी ने रात के अपने समाचार बुलेटिन में यह समाचार प्रसारित किया कि अनियंत्रित आन्तरिक स्थितियों के कारण सरकार ने पूरे देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा कर दी है।

बुलेटिन में कहा गया कि आपातकाल के दौरान जनता के मौलिक अधिकार स्थगित रहेंगे और सरकार विरोधी भाषणों और किसी भी प्रकार के प्रदर्शन पर पूर्ण प्रतिबंध रहेगा। समाचार पत्र विशेष आचार संहिता का पालन करेंगे जिसके तहत प्रकाशन के पूर्व सभी समाचारों और लेखों को सरकारी सेन्सर से गुजरना होगा।
आपातकाल के दौरान 250 भारतीय पत्रकारों को बंदी बनाया गया, वहीं 51 विदेशी पत्रकारों की मान्यता ही रद्द कर दी गई। इंदिरा गांधी के इस तानाशाही के आगे अधिकांश पत्रकारों ने घुटने ही टेक दिए, इतना ही नहीं तो पत्रकारों ने ‘आप जैसा कहें, वैसा लिखेंगे’ की तर्ज पर काम करने को राजी हो गए। उस दौरान ‘दी इंडियन एक्सप्रेस’ ने अपना सम्पादकीय कॉलम कोरा प्रकाशित किया और ‘जनसत्ता’ ने प्रथम पृष्ठ पर कोई समाचार न छापकर पूरे पृष्ठ को काली स्याही से रंग कर ‘आपातकाल’ के खिलाफ अपना विरोध जताया था।



आपातकाल का उद्देश्य
- कांग्रेस विरोधी दलों को समाप्त करना।
- देश में भय का वातावरण निर्माण करना।
- प्रसार माध्यमों पर नियंत्रण रखना।
- ‘इंदिरा विरोधी शक्तियों को विदेशी शक्तियों के साथ सम्बन्ध’ की झूठी अफवाहों से जनता को भ्रमित करना, तथा इस आधार पर उन्हें कारागार में डालना। 
- लोक लुभावन घोषणा देकर जनमत को अपनी ओर खींचना।
- राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समाप्त कर संगठित विरोध को पूरी तरह समाप्त करने का षड़यंत्र।

आपातकाल की समाप्ति में संघ की भूमिका 


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने ‘आपातकाल’ के विरुद्ध देश में भूमिगत आन्दोलन, सत्याग्रह और सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए एक व्यापक योजना बनाई। संघ की प्रेरणा से चलाया गया भूमिगत आन्दोलन अहिंसक था। जिसका उद्देश्य देश में लोकतंत्र को बहाल करना था, जिसका आधार मानवीय सभ्यता की रक्षा, लोकतंत्र की विजय, पूंजीवाद व अधिनायकवाद का पराभव, गुलामी और शोषण का नाश, वैश्विक बंधुभाव जैसे उदात्त भाव समाहित था। आपातकाल के दौरान संघ ने भूमिगत संगठन और प्रचार की यंत्रणा स्थापित की, जिसके अंतर्गत सही जानकारी और समाचार गुप्त रूप से जनता तक पहुंचाने के लिए सम्पादन, प्रकाशन और वितरण की प्रभावी व्यवस्था बनाई गई।

साथ ही जेलों में बंद व्यक्तियों के परिवारजनों की सहायता के लिए भी व्यवस्थाएं विकसित की। संघ ने जनता के मनोधैर्य बना रहे, इसके लिए व्यापक कार्य किया। इस दौरान आपातकाल की सही जानकारी विदेशों में प्रसारित करने की भी योजना बनाई गई, इस कार्य के लिए सुब्रह्मण्यम स्वामी, मकरंद देसाई जैसे सक्षम लोग प्रयासरत थे।



आपातकाल के विरुद्ध सत्याग्रह 
आपातकाल के विरुद्ध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने जन आन्दोलन को सफल बनाने के लिए बहुत बहुत बड़ी भूमिका निभाई। 14 नवम्बर, 1975 से 14 जनवरी, 1976 तक पूरे देश में हजारों स्थानों पर सत्याग्रह हुए। तथ्यों के अनुसार देश में कुल 5349 स्थानों पर सत्याग्रह हुए, जिसमें 1,54,860 सत्याग्रही शामिल हुए। इन सत्याग्रहियों में 80 हजार
संघ के स्वयंसेवकों का समावेश था। सत्याग्रह के दौरान कुल 44,965 संघ से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया, जिनमें से 35,310 स्वयंसेवक थे तथा 9,655 संघ प्रेरित अन्य संगठनों के कार्यकर्ताओं का समावेश था।
संघ ने सत्याग्रहियों के निर्माण के लिए व्यापक अभियान चलाया। संघ समर्थक शक्तियों से सम्पर्क की यंत्रणा बनाई और सांकेतिक भाषा का उपयोग किया। देशभर में मनोधैर्य बनाए रखने तथा जागरूकता बहाल करने के लिए अनेक पत्रक बांटे गए। सारे देश में जन चेतना जाग्रत होने लगी। इसका ही परिणाम था कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के मन में जन विरोध का भय सताने लगा। अचानक तानाशाही बंद  हो गईं, गिरफ़्तारियां थम गईं। पर लोकतंत्र को कुचलने के वे काले दिन इतिहास के पन्नों में अंकित हो गया, पर ‘आपातकाल’ का इतिहास विद्यार्थियों तक पहुंच न सका। ऐसी आपातकाल देश में दुबारा न आए, पर पाठ्यक्रम में जरुर आना चाहिए जिससे इस पीढ़ी को जानकारी मिल सके।

आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है : अमित शाह



भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह जी
द्वारा आपातकाल के ४० वर्ष - लोकतंत्र का काला अध्याय विषय
पर आयोजित संगोष्ठी पर दिये गये भाषण के प्रमुख अंश

आपातकाल ना तो अध्यादेशों से आता है और ना ही अध्यादेशों को लाने के विचारों से आता है, आपातकाल कुत्सित मानसिकता से आता है: अमित शाह

आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है: अमित शाह

इतना संघर्षऔर दमन होने के बावजूद न कोई टूटा और न ही कोई झुका। वास्तव में भारत के मिटटी में लोकतंत्र की खुशबू बहुत गहरी है: अमित शाह

आज जो हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है, जो मीडिया की स्वतंत्रता बची है और लोगों की अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता व्यापक हुई है वह आपातकाल के दौरान उन हज़ारों लोगों के बलिदान के फलस्वरूप ही संभव हो पाया है: अमित शाह

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष श्री अमित शाह ने आज दिल्ली के मावलंकर हॉल में आपातकाल के ४० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी "लोकतंत्र का काला दिवस" को सम्बोधित किया।

उन्होंने अपने उद्बोधन की शुरुआत करते हुये सर्वप्रथम उनलोगों को श्रद्धा-सुमन अर्पित किया जिन्होंने आपातकाल की मानसिकता के खिलाफ संघर्ष किया था और १९७५-१९७७ के दौरान यातनाएं झेलीं थी। उन्होंने कहा कि इन्हीं लोगों ने उस नाजुक मोड़ पर देश के लोकतंत्र को न केवल बचाया वरन लोकतंत्र की जड़ों को और मजबूत किया तथा यह सुनिश्चित किया कि सालों साल तक किसी की हिम्मत न हो सके फिर से ऐसा दुस्साहस करने की। श्री शाह ने कहा की उनका बलिदान आनेवाली कई पीढ़ियों के लिए वंदनीय है।

श्री शाह ने सम्मलेन में द्वारिका में श्रीकृष्ण की शासन प्रणाली व मगध साम्राज्य के शासन व्यवस्था की चर्चा करते हुये कहा कि विश्व में सबसे पहले संवैधानिक शासन प्रणाली की शुरुआत भारत से ही हुई थी। भारत का लोकतंत्र दुनिया का सबसे बड़ा, सबसे मज़बूत और सबसे परिवर्तनशील लोकतंत्र है।

श्री शाह ने कहा कि २५ जून १९७५ से लेकर मार्च १९७७ तक का समय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय है। आपातकाल के संघर्ष को याद रखना नई पीढ़ी के लिए जरूरी है। आपातकाल ना तो अध्यादेशों से आता है और ना ही अध्यादेशों को लाने के विचारों से आता है, आपातकाल कुत्सित मानसिकता से आता है जब शासनतंत्र दूसरे के विचारों को सुनना ही नहीं चाहती, स्वतंत्र विचारों का दमन करने लगती है और लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को सीखचों के पीछे डाल देती है तो यह तानाशाही की ही मानसिकता होती है।

श्री शाह ने आपातकाल की पृष्ठभूमि की चर्चा करते हुये कहा कि इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही कांग्रेस में सिंडिकेट युग की शुरुआत हो गई और अंततः कांग्रेस के दो टुकड़े हो गये। उन्होंने इस बात पर जोर देते हुए कहा कि उस वक्त कांग्रेस के असंतुष्टों को पार्टी नहीं छोड़नी चाहिये थी, उन्हें पार्टी के अंदर रहते हुये संघर्ष करना चाहिए था ताकि लोकतंत्र की जड़ें मजबूत बनी रहती। उन लोगों के पार्टी छोड़ने से सत्ता और संगठन की सारी बागडोर इंदिरा गांधी के हाथों में आ गई और वह निरंकुश और तानाशाह हो गई और उसका ही परिणाम था कि देश को आपातकाल जैसी वीभत्स परिस्थितियों का सामना करना पड़ा।

श्री शाह ने कहा कि उस वक्त चापलूस और चाटुकारों का बोलबाला था, मुद्रास्फीति काफी बढ़ गई थी, शासन व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई थी और भ्रष्टाचार अपने चरम पर था। आपातकाल देश की शान्ति, सुरक्षा और संविधान की रक्षा के लिए नहीं लाया गया था जैसा कि प्रचारित किया गया वरन इसे अपनी सत्ता को बचाने के लिये लाया गया जो कि निश्चित रूप से एक असंवैधानिक कदम था।

उन्होंने एक घटना का ज़िक्र करते हुये कहा कि पटना में देवकांत बरूआ की गाड़ी ने एक ९ वर्ष के बच्चे को कुचल दिया। पूरा काफिला उस बच्चे के ऊपर से गुजर गया पर किसी ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब यह खबर इंडियन एक्सप्रेस में अगले दिन प्रकाशित हुई तो पूरे देश में आक्रोश के लहर दौड़ गई।

श्री शाह ने सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन का विस्तृत रूप से उल्लेख करते हुये कहा कि जयप्रकाश जी के आंदोलन ने पूरे देश में क्रांति की एक नई अलख जगाई थी। पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में जयप्रकाश नारायण ने संपूर्ण क्रांति का आहवान किया था।

३ जनवरी १९७५ को तत्कालीन रेल मंत्री श्री ललित नारायण मिश्रा की हत्या कर दी गई। १२ जून १९७५ को इलाहबाद हाई कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में इंदिरा गांधी के चुनाव को निरस्त कर इसे असंवैधानिक करार कर दिया। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई। उच्चतम न्यायालय ने उच्च न्यायालय के फैसले पर हालांकि रोक लगा दी और एक ऐसा फैसला दिया जिससे इंदिरा गांधी का प्रधानमंत्री पद पर बने रहना बिलकुल असंवैधानिक हो गया। इंदिरा गांधी और उनके पूरे शासन तंत्र ने यह प्रचारित करने की पूरी कोशिश की कि यह इंदिरा गांधी की जीत हो गयी है। इतने अपमानित तरीके से प्रधानमंत्री की कुर्सी बचाई गई कि पूरा लोकतंत्र शर्मसार हो गया और अंततः २५ जून की आधी रात को पूरे देश में आपातकाल लागू कर दिया गया और फिर शुरू हुआ दमन चक्र। विरोधी पक्ष के लोग जो जहाँ थे उन्हें वहीं गिरफ्तार कर लिया गया, उन्हें नज़रबंद कर दिया गया। सुबह ६ बजे कैबिनेट की बैठक बुलाई गई तब कैबिनेट को पता चला कि देश में आपातकाल लगा दिया गया है। एक आंकड़े के अनुसार सुबह ६ बजे तक लगभग ९ हज़ार से ज्यादा लोगों को एक रात में ही गिरफ्तार कर लिया गया था। श्री अटल बिहारी वाजपेयी एवम श्री आडवाणी जी को बंगलोर में ही गिरफ्तार कर लिया गया।

सरकार ने अध्यादेश पर अध्यादेश जारी करके न्यायपालिका को मजबूर कर दिया, मीडिया पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया और मीसा को और अधिक मजबूत बना दिया ताकि लोगों की आवाजें पूर्णतया खामोश हो जाये। कांग्रेस सरकार ने लोकतंत्र के चारों स्तम्भों को कुचलने की भरपूर कोशिश की गई। लगभग १ लाख ४० हज़ार लोगों को अमानवीय तरीके से लगातार १९ महीनों तक जेल के सलाखों के पीछे रखा गया और उन्हें कठोरतम यातनाएं दी गई लेकिन इतना संघर्ष और दमन होने के बावजूद न कोई टूटा और न ही कोई झुका। वास्तव में भारत के मिटटी में लोकतंत्र की खुशबू बहुत गहरी है।

इन संघर्षों के परिणामस्वरूप १९७७ में जनसंघ ने नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिये और लोकतंत्र को और मजबूत करने के लिए जनता पार्टी में अपना पूर्ण विलय कर दिया। श्री मोरारजी के नेतृत्व में सरकार बनते ही आपातकाल के दौरान जारी किये गए सारे अध्यादेशों को निरस्त कर दिया गया और संविधान संशोधन द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जा सके।

आज जो हमारा लोकतंत्र इतना मजबूत है, जो मीडिया की स्वतंत्रता बची है और लोगों की अभिव्यक्ति की जो स्वतंत्रता व्यापक हुई है वह आपातकाल के दौरान उन हज़ारों लोगों के बलिदान के फलस्वरूप ही संभव हो पाया है।

श्री शाह ने संगोष्ठी को सम्बोधित करते हुए कहा कि क्यों कांग्रेस पार्टी को नेताजी सुभाषचन्द्र बोस की जासूसी करानी पडी, क्यों सरदार पटेल को भारत रत्न देने में सालों लग जाते हैं, संविधान निर्माता बाबासाहब अंबेडकर के चित्र को संसद में लगाने में वर्षों लग जाते हैं वहीँ भारतीय जनता पार्टी की सरकार नेहरू जी के जन्मशती मनाने के लिए समिति का तुरंत गठन कर देती है और लौह पुरुष सरदार पटेल की सबसे ऊंची प्रतिमा लगाने का कार्य गुजरात में शुरू करती है।

कांग्रेस के आतंरिक लोकतंत्र पर हमला करते हुए श्री शाह ने कहा कि जिस पार्टी का कभी भी आतंरिक लोकतंत्र में विश्वास नहीं रहा, जिसकी सोच ही तानाशाही है, जहाँ किसी भी फैसले में आम कार्यकर्ताओं की सुनी ही नहीं जाती उसके हाथ में सबसे बड़े और सबसे मजबूत लोकतंत्र की चाभी कैसे दी जा सकती है। कांग्रेस का पूरा अतीत इस बात की गवाही देता है कि शुरू से लेकर अबतक केवल एक परिवार के हाथ में ही पार्टी की पूरी कुंजी रही है।

उन्होंने सम्मलेन में उपस्थित लोगों से अपील करते हुए कहा कि आप व्यक्ति को वोट ना दें। देश की जनता का विचार बदलने का वक्त आ गया है। आप पार्टी की विचारधार व विचारों में अपनी आस्था व्यक्त करें, आप एक ऐसी पार्टी को चुनें जहाँ आपकी बातों व हितों को महत्व दिया जाए, जिस पार्टी में आतंरिक लोकतंत्र की जड़ें गहरी हो। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि अगर ऐसा होता है तो देश में कभी भी आपातकाल नहीं आयेगा।

उन्होंने कहा कि वर्तमान में १६५० पार्टियों के जंगल में दो-तीन पार्टियां ही ऐसी हैं जिसमे आतंरिक लोकतंत्र है। उन्होंने आश्वासन दिया कि भारतीय जनता पार्टी राजनीति को उन्हीं दिशाओं में ले जाने का सतत प्रयास करेगी जिसका सपना स्वर्गीय श्री जय प्रकाश नारायण ने की थी और जिसकी रक्षा के लिए हज़ारों लोगों ने संघर्ष किया और यातनाएं झेलीं।

उन्होंने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा बिहार के छपरा में जन आंदोलन के नायक स्वर्गीय श्री जय प्रकाश नारायण जी की स्मृति में स्मारक बनाये जाने की घोषणा पर अपना आभार व्यक्त करते हुये कहा कि हम लोग सदैव जय प्रकाश जी के जीवन से प्रेरणा लेते रहेंगे।

मंगलवार, 23 जून 2015

“जम्मू और कश्मीर” डॉ0 मुखर्जी के बलिदान से ही भारत में - महेश विजयवर्गीय




प्रेस विज्ञप्ति
महासम्पर्क अभियान पखवाडे़ का शुभारम्भ
सम्पर्क अभियान सामग्री का वितरण किया गया
डॉ0श्यामाप्रसाद मुखर्जी बलीदान दिवस संगोष्ठि

“जम्मू और कश्मीर” डॉ0 मुखर्जी के बलिदान से ही भारत में - महेश विजयवर्गीय


23 जून कोटा । भाजपा शहर जिला कोटा के द्वारा महासम्पर्क अभियान 2015 के तत्वाधान में जनसंघ के संस्थापक डॉ0 श्यामाप्रसाद मुखजी के 23 जून बलिदान दिवस से 6 जुलाई जयंती तक विशेष सम्पर्क अभियान चलाया जायेगा। इसीक्रम में मंगलवार सायं 5 बजे स्वर्णरजत कला मार्केट , सब्जिमण्डी के हाल में बलिदान दिवस कार्यक्रम का आयोजन हुआ, जिसके मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि , पूर्व जिला अध्यक्ष एवं कोर कमेटी सदस्य महेश विजयवर्गीय थे एवं अध्यक्षता जिला अध्यक्ष हेमन्त विजयवर्गीय ने की । इस अवसर पर उपमहापौर श्रीमती सुनीता व्यास, प्रदेश कार्यसमिति सदस्य हनुमान शर्मा एवं वरिष्ठ भाजपा नेता जटाशंकर शर्मा मंचस्थ थे। संचालन जिला महामंत्री अरविन्द सिसोदिया ने किया। धन्यवाद ज्ञापन जिला महामंत्री अमित शर्मा ने किया तथा सूचनायें जिला महामंत्री जगदीश जिंदल ने दी। स्वागत जिला उपाध्यक्ष कृष्णकुमार सोनी रामबाबू ने किया। कार्यक्रम के समापन के बाद सम्पर्क अभियान की सामग्री का वितरण उपस्थित कार्यकर्ताओं के मध्य किया गया जिसमें केन्द्र एवं राज्य सरकार की उपलब्धियां तथा डेटा पत्रक सम्मिलित है।

मुुख्य अतिथि महेश विजयवर्गीय ने कहा “  प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की सरकार ने जम्मू और कश्मीर प्रांत को विषेश दर्जा देकर सह राष्ट्र जैसी स्थिती में लाकर, भारत से लगभग अलग होने की स्थिती प्रदान करदी थी। तब नेहरूजी की गलती से अलग झंडा, अलग निशान , अलग संविधान और प्रवेश के लिये परमिट व्यवस्था जम्मू और कश्मीर प्रांत में  थीं। इस स्थिती की भावी गंभीरता और राष्ट्रीय अखण्डता के नुकसान को जनसंघ के संस्थापक डॉ0 श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने पहचाना और आंदोलन किया “एक देश में दो निशान दो प्रधान और दो विधान नहीं चलेंगे - नहीं चलेंगे।” उन्होने परमिट व्यवस्था को तोड़ते हुये जम्मू और कश्मीर सरकार के समक्ष गिरफ्तारी दी और उनकी संदिग्ध परिस्थिती में वहीं 23 जून को बंदी रहते हुये मुत्यु हुई। कुछ अरसे बाद उसी जम्मू और कश्मीर राज्य के तत्कालीन प्रधानमंत्री शेख अब्दुल्ला को नेहरू सरकार को अलगाववादी हरकतों के कारण गिरिफ्तार कर जेल में ड़ालना पडा था। इस प्रकार राष्ट्रहित के लिये स्वंतत्र भारत में पहली बली डॉ0 मुखर्जी ने दी और आज भारत का अभिन्न अंग जम्मू और कश्मीर डॉ0 मुखर्जी के बलिदान से ही है।

जिला अध्यक्ष हेमन्त विजयवर्गीय ने कहा जब तक जम्मू और कश्मीर का नाम रहेगा तब तक डॉ0 मुखर्जी का नाम उसके साथ अमर है। उन्होने कहा तब विश्व के सबसे कम उम्र के कुलपती रहे डॉ0 मुखर्जी ने पूरे जीवन राष्ट्रहित से समझौता नहीं किया और उनके ही बलिदान से कश्मीर आज भारत का अंग है।

उपमहापौर श्रीमती सुनीता व्यास ने कहा जनसंघ से लेकर भाजपा तक जम्मू और कश्मीर हमारा अहम एजेंडा है और जब तक अलगाववादी धारा 370 से इसकी मुक्ति नहीं होती तब तक निरंतर संघर्ष जारी रहेगा।

प्रदेश कार्य समिति सदस्य हनुमान शर्मा ने कहा डॉ0 मुखर्जी का बलिदान हमें देशहितों की चिन्ता के लिए प्रेरित करता हे। वरिष्ठ भाजपा नेता जटाशंकर शर्मा ने कहा डॉ मुखर्जी का जीवन सदियों तक राष्ट्रभक्तों को प्रेरणा देता रहेगा।

संगोष्ठि में जिला उपाध्यक्ष कृष्णकुमार सोनी रामबाबू, अशोक चौधरी, सतीष गोपालानी, लक्ष्मण सिंह खींची, विशाल जोशी, त्रिलोक सिंह, जिला मंत्री मुकेश विजय, कैलाश गौतम, अर्थपालसिंह, रविन्द्रसिंह हाड़ा, किसान मोर्चा अध्यक्ष गिरिराज गौतम, अनुसूचित जाती मोर्चा अध्यक्ष अशोक बादल, हीतेन्द्रसिंह हाडा, राकेश चतुर्वेदी, प्राची दीक्षित, प्रभा तंवर, रेखा खेलवाल, सुमन मेहरा, लक्ष्मी शर्मा, पार्षद पवन अग्रवाल, नरेन्द्र सिंह हाडा, प्रकाश सैनी, भगवान स्वरूप गौतम, रेखा लखेरा, मधुकंवर हाड़ा सहित गोपालकृष्ण सोनी, वीरेन्द्रसिंह भानावत, पंकज साहू, प्रखर कौशल, जीतेन्द्र खजांची, चन्द्रशेखर नरवाल, सचिन मिश्रा,अनिल भडाना, सुरेन्द्र शर्मा आदि उपस्थ्ति थे।


                                                                                                            भवदीय
                                                                                                 अरविन्द सिसोदिया                                                                                                                                 महामंत्री , भाजपा शहर जिला कोटा

सोमवार, 22 जून 2015

कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए नया मार्ग खुला

कैलास मानसरोवर यात्रा दूसरा मार्ग

नई दिल्ली। चीन ने भारत के साथ ताजा विश्वास बहाली उपायों के तहत कैलाश-मानसरोवर यात्रा में भारतीय श्रद्धालुओं के पहले जत्थे को इजाजत देते हुए नाथू ला होकर तिब्बत जाने का दूसरा मार्ग खोल दिया। समुद्र तल से 4,000 मीटर की उंचाई पर सिक्किम में नाथू ला के हिमालयी दर्रे से होकर दूसरे मार्ग को खोले जाने की औपचारिक घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पिछले महीने चीन के दौरे के दौरान हुई थी। इससे और अधिक श्रद्धालुओं को इस पवित्र यात्रा पर जाने का मौका मिलेगा।
लिपूलेख दर्रा के अलावा यह एक नया मार्ग है। 2013 में उत्तराखंड में आई बाढ़ की वजह से इस मार्ग को बहुत ज्यादा क्षति पहुंची थी। इस वार्षिक यात्रा के लिए 44 श्रद्धालुओं के पहले जत्थे ने सिक्किम में भारत की ओर से सीमा को पार किया और तिब्बत की ओर चीनी अधिकारियों ने गर्मजोशी से उनका स्वागत किया। तिब्बत में तकरीबन 6,500 मीटर की उंचाई पर स्थित कैलाश के लिए विभिन्न उम्र समूहों और भारत के विभिन्न हिस्सों से आए श्रद्धालुओं ने नाथू ला दर्रा पार किया।

इस साल यात्रा में हिस्सा लेने के लिए 250 लोगों के पहले जत्थे को मंजूरी मिली और ये श्रद्धालु इसी समूह के सदस्य हैं। एक श्रद्धालु भरत दास ने बताया कि मेरे लिए कैलाश-मानसरोवर की यात्रा जीवन की एक उपलब्धि के समान है। जीवन में इससे ज्यादा और कुछ नहीं हो सकता। श्रद्धालुओं में कई अधेड़ और सेवानिवृत्त लोग हैं। इन लोगों का कहना है कि लंबे समय से इस तरह के मौके का वह इंतजार कर रहे थे।
नाथू ला र्दे से होकर गुजरने वाला यह मार्ग भारतीय श्रद्धालुओं के लिए आरामदायक है। बसों के जरिए यह यात्रा खासकर भारतीय बुजुर्ग नागरिकों के लिए अच्छी रहेगी हालांकि हिमालयी क्षेत्रों में ऑक्सीजन का स्तर कम होना भी उनके लिये एक चुनौती होती है। भारत में चीन के राजदूत ली युचेंग भारत की तरफ से कल यहां पहुंचने वाले पहले ऐसे चीनी अधिकारी हो गए जिन्होंने नये मार्ग के जरिए सीमा पार की।
ली के साथ भारतीय दूतावास में वाणिज्य दूत श्रीला दत्त कुमार और तिब्बत के आला चीनी अधिकारियों ने सीमा पार करने पर श्रद्धालुओं का स्वागत किया। चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने पिछले साल सितंबर में नई दिल्ली की यात्रा के दौरान मोदी से यात्रा के लिए नए मार्ग को खोलने का वादा किया था।
कठिन और दुर्गम चढ़ाई, खच्चरों पर बैठकर जोखिम वाली यात्रा सहित उत्तराखंड और नेपाल होकर मौजूदा मार्गों की कठिनाइयों के चलते मोदी यात्रा के लिए दूसरा मार्ग चाहते थे। 1500 किलोमीटर लंबे नाथू ला मार्ग से श्रद्धालु बसों के जरिए नाथू ला से कैलाश तक जा सकेंगे।
श्रद्धालुओं का स्वागत करते हुए ली ने कहा कि चीनी तरफ खासकर तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र की प्रांतीय सरकार ने नए होटल का निर्माण कर, सड़कें सुधार कर, अनुवादकों, पर्यटन गाइडों और भारतीय भोजन की तैयारियों के लिए प्रशिक्षित किये जाने के साथ काफी तैयारियां की हैं। उन्होंने कहा कि यह मार्ग पुराने मार्ग की तुलना में ज्यादा आरामदायक और सुरक्षित होगा।

रविवार, 21 जून 2015

सम्पूर्ण प्राणी जगत के कल्याण की सोच ही हमें “ विश्वगुरू” बनायेगी - दामोदर प्रसाद शांडिल्य

विश्व योग दिवस के क्रम में कार्यक्रम
सम्पूर्ण प्राणी जगत के कल्याण की सोच ही हमें “ विश्वगुरू” बनायेगी - दामोदर प्रसाद शांडिल्य
21वीं सदी विश्व में भारतीय संस्कृति के अभ्युदय की होगी- - दामोदर प्रसाद शांडिल्य





21 जून। सम्पूर्ण प्राणी जगत के कल्याण की सोच ही हमें “ विश्वगुरू” बनायेगी, हमारी भारतीय संस्कृति बिना किसी भेद के सम्पूर्ण प्राणी जगत के कल्याण और उन्नती के मार्ग पर चलती है। इसी आचार - विचार और भावना से ही विश्व का कल्याण होगा। अब 21 वीं सदी भारतीय संस्कृति के विश्वव्यापी अभ्युदय की होगी। यह उद्गार भारतीय जनता पार्टी, शहर जिला कोटा की ओर से विश्व योग दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के मुख्य वक्ता एवं मुख्य अतिथि से रूप में दामोदर प्रसाद शांडिल्य ने व्यक्त किऐ। वे वरिष्ठ साहित्यकार , लेखक एवं जनसंघ कालिक भाजपा नेता हैं।

ट्रैफिक गार्डन मौजीबाबा की गुफा के पास आयोजित कार्यक्रम ठीक प्रातः 6.15 बजे प्रारम्भ हुआ, प्रारम्भ में योग गुरू एवं जनसंघ कालिक भाजपा कार्यकर्ता सत्यनारायण सैन ने सभी को योग अभ्यास करवाया तथा विभिन्न बीमारियों से दूर रहने के तरीके बताये। स्वांस-प्रस्वांस का महत्व समझाते हुये ध्यान मार्ग से देवदर्शन करवाने की तरकीब भी बताई।

भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ एवं संघ के द्वितीय सरसंघ चालक श्रीगुरूजी के विचारों पर दो पुस्तके लिख चुके वरिष्ठ साहित्यकार मुख्य अतिथि दामोदर प्रसाद शांडिल्य ने कहा “ एक अवसर था , 11 सितम्बर 1893 के दिन, विश्व धर्म संसद, लगभग 7000 धर्मज्ञों से खचाखच भरे , आर्ट इंस्टीट्यूट शिकांगो में विभिन्न देशों के श्रेष्ठतम प्रतिनिधि के मध्य स्वामी विवेकानन्द जी ने भारतीय चिन्तन को रखा और उसकी श्रैष्ठता की विश्व विजयी ध्वजा को लहराया । तब से प्रारम्भ इस यात्रा ने आज पुनः उससे उन्नत और सम्पूर्ण विश्व व्यापी दृष्य उपस्थित किया है कि सम्पूर्ण विश्व भारतीय ज्ञान के श्रैष्ठ अनुसंधान योगा को स्विकारते हुये उसके साथ कदम ताल मिला रहा है।”
उन्होने कहा “हमारा धर्म -हमारी संस्कृति युगों - युगों से सबके कल्याण की बात करती है । वह मनुष्य की ही नहीं वरन सम्पूर्ण प्राणी जगत और सृष्टि के कल्याण का विचार करती है। इसीलिये उसको अन्ततः सम्पूर्ण विश्व में सर्व स्विकार्यता प्राप्त होनी ही है।”

कार्यक्रम में योग आचार्य वैद्य नित्यानंद शर्मा ने योग से निरोग रहने के अनेकों आसनों के वारे में बताया , इस अवसर पर योग कार्यकर्ता सुश्री धन्वनतरी और सुश्री प्रियंका भी उपस्थित थीं। भाजपा जिला अध्यक्ष हेमन्त विजयवर्गीय शहर से बाहर होने के कारण सम्मिलित नहीं हो सके।

  कार्यक्रम का संचालन जिला महामंत्री अरविन्द सिसोदिया ने किया, सूचनाओं की जानकारी जिला महामंत्री अमित शर्मा ने दी, धन्यवाद ज्ञापन जिला महामंत्री जगदीश जिंदल ने किया।
कार्यक्रम की व्यवस्थायें जिला उपाध्यक्ष सतीश गोपलानी, जिला उपाध्यक्ष अशोक चौधरी, जिला मंत्री कैलाश गौतम एवं युवा नेता हितेन्द्र सिंह हाडा एवं श्याम गौड ने संभाली।

इस अवसर पर प्रदेश कार्यसमिति सदस्य एवं पूर्व जिला प्रमुख गोविन्द सिंह परमार, पूर्व प्रदेश मंत्री हीरेन्द्र शर्मा, नेता खण्डेलवाल, भाजपा जिला उपाध्यक्ष लक्ष्मण सिंह खिंची, त्रिलोक सिंह, विशाल जोशी, जिला मंत्री राजेन्द्र अग्रवाल, पूर्व नेता प्रतिपक्ष बृजमोहन सेन, अजा मोर्चा अध्यक्ष अशोक बादल, किसान मोर्चा अध्यक्ष गिरिराज गौतम, प्रभा तंवर, कृष्णा खण्डेलवाल, सीमा खण्डेलवाल, रेखा खेलवाल, कलावती नीमषे, शमशेर परनामी, कुसुम परनामी, डॉ0 आर सी गौतम,  गोपालकृष्ण सोनी, वीरेन्द्र सिंह भानावत, सचिन मिश्रा, देवेन्द्र तिवारी, चन्द्रप्रकाश नागर, प्रखर कौशल, चन्द्रशेखर नरवाल, सुनील पोकरा, पंकज साहू, अरविन्द जौहरी,राधेश्याम प्रजापति, गिरीश भार्गव, पार्षद देवेन्द्र चौधी मामा, पार्षद भगवान गौतम, अभिषेक मलेठी, सहित बडी संख्या में भाजपा कार्यकर्ता एवं सामाजिक कार्यकर्ता थे।

अरविन्द सिसोदिया
महामंत्री
भाजपा शहर जिला कोटा

शुक्रवार, 19 जून 2015

भारतीय ज्ञान की श्रेष्ठता के सम्मान का ऐतिहासिक दिन



21 जून विश्व योग दिवस: उत्सवपूर्वक मनायें

रंग लाई मोदी की मुहिम, UN ने किया 21 जून को विश्व योग दिवस मनाने का ऐलान
aajtak.in [Edited By: अमरेश सौरभ] | नई दिल्ली, 11 दिसम्बर 2014 
संयुक्त राष्ट्र ने 21 जून को विश्व योग दिवस मनाने का ऐलान किया है. भारतीयों के लिए गर्व की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूएन से योग दिवस मनाए जाने की अपील की थी.
वैसे तो योग हजारों साल से भारतीयों की जीवन-शैली का हिस्सा रहा है. दुनिया के कई हिस्सों में इसका प्रचार-प्रसार हो चुका है. यूएन के ऐलान के बाद अब इसका फैलाव और तेजी से होने की उम्मीद है.

गौरतलब है कि बीते 27 सितंबर को पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रस्ताव पेश किया था कि संयुक्त राष्ट्र को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत करनी चाहिए. संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने पहले भाषण में मोदी ने कहा था कि भारत के लिए प्रकृति का सम्मान अध्यात्म का अनिवार्य हिस्सा है. भारतीय प्रकृति को पवित्र मानते हैं. उन्होंने कहा था कि योग हमारी प्राचीन परंपरा का अमूल्य उपहार है.

यूएन में प्रस्ताव रखते वक्त मोदी ने योग की अहमियत बताते हुए कहा था, 'योग मन और शरीर को, विचार और काम को, बाधा और सिद्धि को ठोस आकार देता है. यह व्यक्ति और प्रकृति के बीच तालमेल बनाता है. यह स्वास्थ्य को अखंड स्वरूप देता है. इसमें केवल व्यायाम नहीं है, बल्कि यह प्रकृति और मनुष्य के बीच की कड़ी है. यह जलवायु परिवर्ततन से लड़ने में हमारी मदद करता है.'

आखि‍रकार पीएम मोदी की यह अपील कामयाब साबित हुई, 'आइए, हमसब मिलकर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की शुरुआत करें.'
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अंतरराष्ट्रीय योग दिवस
अंतरराष्ट्रीय योग दिवस 21 जून को मनाया जाएगा। जिसकी पहल भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण में रखकर की। जिसके बाद 21 जून को "अंतरराष्ट्रीय योग दिवस" घोषित किया गया। 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र में 193 सदस्यों द्वारा 21 जून को "अंतरराष्ट्रीय योग दिवस" को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली। प्रधानमंत्री मोदी के इस प्रस्ताव को 90 दिन के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के लिए खास तैयारियां
भारत में पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के लिए भाजपा खास तैयारियों में जुटी हुई है, इसे गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने की तैयारी की जा रही है। वहीं योग को जन-जन तक पहुंचाने वाले योगगुरु बाबा रामदेव भी इसके लिए पूरी तैयारी कर ली है। विश्व योग दिवस को यादगार बनाने और पूरे विश्व को योग के प्रति जागरूक करने के लिए रामदेव ने 35 मिनट का विशेष पैकेज तैयार किया है।

योग दिवस समारोह
भारत में 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस बड़े पैमाने पर मनाया जाएगा जिसकी तैयारियां बड़े जोर-शोर से सरकार कर रही है| योग दिवस का मुख्य समारोह दिल्ली के राजपथ पर होगा जिसमें खुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी शिरकत करेंगे| प्रधानमंत्री राजपथ पर 16000 लोगों के साथ योग करेंगे|अंतरराष्ट्रीय योग दिवस समारोह का गणतंत्र दिवस समारोह जैसा कवरेज दूरदर्शन द्वारा किया जायेगा| इसका सीधा प्रसारण किया जायेगा, प्रसारण अंतरराष्ट्रीय मानक का हो यह सुनिश्चित करने के लिए अत्याधुनिक उपकरण का इस्तेमाल किया जायेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के साथ राहुल गाँधी और अरविंद केजरीवाल को भी योग दिवस के लिए न्यौता भेजा है| राजनीतिक लोगों के अलावा योग गुरु बाबा रामदेव और बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन को भी न्योता भेजा गया है। संयुक्त राष्ट्र में भी योग दिवस मनाने के लिए व्यापक तैयारी चल रही है| पहले अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के उपलक्ष्य में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज संयुक्त राष्ट्र में आयोजित समारोह की अध्यक्षता करेंगी| टाइम्स स्क्वायर से वैश्विक दर्शकों के लिए इसका प्रसारण होगा।

गुरुवार, 18 जून 2015

विश्व योग दिवस : भारतीय विरासत की वैश्विक पहचान' : शिशिर सिन्हा

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस : भारतीय विरासत की वैश्विक पहचान'
शिशिर सिन्हा
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)



दिनांक - 14 जून, दिन - रविवार, समय – सुबह के पांच बजे, स्थान – नयी दिल्ली का जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम। आम तौर पर रविवार के दिन दिल्ली में विभिन्न स्थानों पर सुबह-सुबह सैर, व्यायाम या योग करने वालों की संख्या कम ही दिखती है। वजह, सप्ताह भर की थकान को उतारने के लिए रविवार को देर तक सोने का चलन आम है। लेकिन 14 जून रविवार को जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम में तड़के चार बजे से ही बड़ी तादाद में हर उम्र के लोगों का जुटना शुरु हो गया था। मौका था, ठीक सात दिन बाद होने वाले अंतरराष्ट्रीय योगा दिवस के पूर्व योग गुरु रामदेव की ओर से आयोजित प्रशिक्षण लेने का।

एक अनुमान के मुताबिक, पांच हजार से भी ज्यादा लोगों ने जहां इस शिविर में भाग लिया, वहीं टेलीविजन के माध्यम से देश विदेश में करोड़ों लोग जुड़े। यह तो महज प्रशिक्षण शिविर था ताकि लोग सात दिनों के बाद देश दुनिया में कहीं भी अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के सहभागी बने। इसी के साथ योग में विश्वास की बेहद बड़ी बानगी दिखेगी।

वैसे तो हम भारतीय आदि अनंत काल से योग करते आ रहे हैं, लेकिन जब से संयुक्त राष्ट्र संघ ने प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी की अपील पर 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाने का प्रस्ताव पारित किया, उसके
बाद तो योग का स्वरूप ही बिल्कुल नया हो गया है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री श्री मोदी ने जब 31 मई को रेडियो पर अपने मन की बात कही तो योग दिवस का जिक्र कुछ इस तरह किया



 “मेरे प्यारे देश वासियों! याद है 21 जून? वैसे हमारे इस भू-भाग में 21जून को इसलिए याद रखा जाता है कि ये सबसे लंबा दिवस होता है। लेकिन 21 जून अब विश्व के लिए एक नई पहचान बन गया है। गत सितम्बर महीने में यूनाइटेड नेशन्स में संबोधन करते हुए मैंने एक विषय रखा था और एक प्रस्ताव रखा था कि 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग-दिवस के रूप में मनाना चाहिए। और सारे विश्व को अचरज हो गया, आप को भी अचरज होगा, सौ दिन के भीतर भीतर एक सौ सतत्तर देशो के समर्थन से ये प्रस्ताव पारित हो गया, इस प्रकार के प्रस्ताव ऐसा यूनाइटेड नेशन्स के इतिहास में, सबसे ज्यादा देशों का समर्थन मिला, सबसे कम समय में प्रस्ताव पारित हुआ, और विश्व के सभी भू-भाग, इसमें शरीक हुए, किसी भी भारतीय के लिए, ये बहुत बड़ी गौरवपूर्ण घटना है।

लेकिन अब जिम्मेवारी हमारी बनती है। क्या कभी सोचा था हमने कि योग विश्व को भी जोड़ने का एक माध्यम बन सकता है? वसुधैव कुटुम्बकम की हमारे पूर्वजों ने जो कल्पना की थी, उसमें योग एक कैटलिटिक एजेंट के रूप में विश्व को जोड़ने का माध्यम बन रहा है। कितने बड़े गर्व की, ख़ुशी की बात है। लेकिन इसकी ताक़त तो तब बनेगी जब हम सब बहुत बड़ी मात्रा में योग के सही स्वरुप को, योग की सही शक्ति को, विश्व के सामने प्रस्तुत करें। योग दिल और दिमाग को जोड़ता है, योग रोगमुक्ति का भी माध्यम है, तो योग भोगमुक्ति का भी माध्यम है और अब तो में देख रहा हूँ, योग शरीर मन बुद्धि को ही जोड़ने का काम करे, उससे आगे विश्व को भी जोड़ने का काम कर सकता है।

हम क्यों न इसके एम्बेसेडर बने! हम क्यों न इस मानव कल्याण के लिए काम आने वाली, इस महत्वपूर्ण विद्या को सहज उपलब्ध कराएं। हिन्दुस्तान के हर कोने में 21 जून को योग दिवस मनाया जाए। आपके रिश्तेदार दुनिया के किसी भी हिस्से में रहते हों, आपके मित्र परिवार जन कहीं रहते हो, आप उनको भी टेलीफ़ोन करके बताएं कि वे भी वहाँ लोगो को इकट्ठा करके योग दिवस मनायें।

अगर उनको योग का कोई ज्ञान नहीं है तो कोई किताब लेकर के, लेकिन पढ़कर के भी सबको समझाए कि योग क्या होता है। एक पत्र पढ़ लें, लेकिन मैं मानता हूँ कि हमने योग दिवस को सचमुच में विश्व कल्याण के लिए एक महत्वपूर्ण क़दम के रूप में, मानव जाति के कल्याण के रूप में और तनाव से ज़िन्दगी से गुजर रहा मानव समूह, कठिनाइयों के बीच हताश निराश बैठे हुए मानव को, नई चेतना, ऊर्जा देने का सामर्थ योग में है।

मैं चाहूँगा कि विश्व ने जिसको स्वीकार किया है, विश्व ने जिसे सम्मानित किया है, विश्व को भारत ने जिसे दिया है, ये योग हम सबके लिए गर्व का विषय बनना चाहिए।“

क्या है योग

करीब 4000 वर्ष पूर्व ऋग्वेद में जिक्र किए योग को आप क्या कहेंगे? क्या एक तरह का व्यायाम, आसन या फिर कुछ और? श्री श्री रविशंकर की संस्था आर्ट ऑफ लिविंग की मानें तो योग संस्कृत धातु 'युज' से उत्‍पन्न हुआ है जिसका अर्थ है व्यक्तिगत चेतना या आत्मा का सार्वभौमिक चेतना या रूह से मिलन। करीब 5000 साल पुराने भारतीय ज्ञान का समुदाय की संज्ञा देते संस्था आगे कहती है यद्यपि कई लोग योग को केवल शारीरिक व्यायाम ही मानते हैं जहाँ लोग शरीर को तोड़ते -मरोड़ते हैं और श्वास लेने के जटिल तरीके अपनाते हैं |

वास्तव में देखा जाए तो ये क्रियाएँ मनुष्य के मन और आत्मा की अनंत क्षमताओं की तमाम परतों को खोलने वाले ग़ूढ विज्ञान के बहुत ही सतही पहलू से संबंधित हैं, वहीं योग पूरी जीवन शैली से जुड़ा है।

वहीं योग का एक अर्थ ‘जोड़’ है। इस संदर्भ में कई ग्रंथों में कहा गया कि यह शरीर, मन और आत्मा को जोड़ने का एक माध्यम है। यह एक आध्यात्मिक प्रक्रिया है जिसका उल्लेख कई धर्म जैसे हिंदू, बौद्ध और जैन में मिलता है।
अब जब मामला आध्यात्म से जुड़ जाए तो कुछ धार्मिक संगठनों में योग को लेकर विवाद तो होना ही है। कुछ मुस्लिम संगठन योग को अपने धर्म के विरूद्ध मानते हैं। शायद इसी वजह से 2008 में मलयेशिया और फिर बाद में इंडोनेशिया की प्रमुख इस्लामिक संस्था ने योग के खिलाफ फतवा जारी किया, हालांकि इन फतवों को दारुल उलूम, देओबंद ने आलोचना की।

विवाद खत्म करने की कोशिश

इस्लामिक मान्यताओं को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार भी साफ कर चुकी है कि योग करते वक्त ना तो श्लोक पढ़ना जरूरी है और ना ही सूर्य नमस्कार।

आयूष मंत्री (जिस मंत्रालय पर अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के आयोजन की जिम्मेदारी है) श्रीपद नायक कहते हैं कि मुस्लिम योग करते वक्त अल्लाह का नाम ले सकते हैं। वैसे भी दारूल उलूम, देवबंद ने भी योग दिवस का समर्थन करते हुए कहा है कि इसका किसी मजहब से कोई लेना-देना नहीं है। यह संस्था साफ तौर पर मानती है कि योग एक व्यायाम है।

योग के फायदे

अब ये सवाल उठता है कि योग क्यों? इस सवाल का जवाब पद्मविभूषण बेल्लूर कृष्णमचारी सुंदरराज यानी बीकेएस अयंगार की जिंदगी से मिल जाएगा। बीते वर्ष उनके निधन के बाद बीबीसी ने जहां उन्हे योग के ‘इंटरनेशनल ब्रांड ऐम्बैसडर’ के रुप में संबोधित किया, वहीं एक प्रसिद्ध अंग्रेजी अखबार बिजनेस स्टैंडर्ड ने लिखा कि
“विश्वविख्यात योग गुरु और अयंगार स्कूल ऑफ योग के संस्थापक बीकेएस अयंगार ने वर्ष 2002 में न्यूयॉर्क टाइम्स से कहा था कि योग ने उन्हें 65 सालों का बोनस दिया है क्योंकि बचपन में कई बीमारियों से घिरे रहने के कारण बचपन में डॉक्टरों को यह उम्मीद नहीं थी कि वह 20 साल की उम्र से ज्यादा जी पाएंगे।” लेकिन उन्होंने एक लंबी जिंदगी जी और 95 वर्ष की उम्र में अंतिम सांसे ली। उन्होंने अयंगारयोग की स्थापना की तथा इसे सम्पूर्ण विश्व में मशहूर बनाया। उन्होंने विभिन्न देशों में अपने संस्थान की 100 से अधिक शाखाएं स्थापित की। यूरोप में योग फैलाने में वे सबसे आगे थे।

आयंगर जैसे कई और उदाहरण हमें अपने आस पास ही मिल जाएगें। कई चिकित्सक भी कहते हैं कि बीमारी से मुक्ति तो मिल ही सकती है, वहीं कई बीमारियों को अपने करीब फटकने से भी रोक सकते हैं। दरअसल, योग एक स्वस्थ्य जीवन का आधार है और इसके लिए सुबह-सुबह का वक्त सबसे अच्छा होता है जब पेट पूरी तरह से
खाली हो। जगह साफ-सुधरी हो और वहां पर ताजी हवा का प्रवाह होता रहे।

अब सवाल यह है कि योग कितनी देर की जाए। इस बारे में योग गुरु रामदेव कहते हैं कि 15-30 मिनट का समय पर्याप्त है, बस जरूरत इस बात कि है कि इसे पूरे ध्यान से किया जाए। यह भी सलाह दी जाती है कि जिस आसन के बारे में जानकारी नहीं है या करना नहीं आता, उसे नहीं करना चाहिए। यह बिल्कुल उसी तरह है जिस तरह से व्यायाम की कुछ विधियों के बारे में जानकारी नहीं है औऱ किया जाए तो उससे दिक्कत ही पैदा हो सकती है।

योग को नयी पहचान

फिलहाल, अब नजर 21 जून पर है जब दिल्ली के राजपथ पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में 35 हजार से ज्यादा लोग योग करेंगे। इसके साथ ही विश्व के 190 देशों में (जिनमें इस्लामिक देशों के संगठन यानी OIC के 47
सदस्य भी शामिल है) भारतीय दूतावासों के सहयोग से योग कार्यक्रम की तैयारी है। वरिष्ठ मंत्रियो में जहां विदेश मंत्री सुषमा स्वराज न्यूयार्क स्थित संयुक्त राष्ट्र संघ के मुख्यालय में आयोजित विशेष कार्यक्रम में भाग लेंगी वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली सैन फ्रांसिस्को और अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री नजमा हेपतुल्ला शिकागो के कार्यक्रम में हिस्सा लेंगे। इसके अलावा भूतल परिवहन मंत्री नितिन गडकरी नागपुर, शहरी विकास मंत्री एम वेंकैया नायडू चेन्नई, दूरसंचार मंत्री रविशंकर प्रसाद कोलकाता, मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी शिमला और संसदीय कार्य राज्य मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी रामपुर में आयोजित योग कार्यक्रमों में मौजूद रहेंगे।

एक और महत्वपूर्ण बात। शायद दुनिया भर में यह पहला मौका है जब एक वर्ष के भीतर किसी भी सरकार के दो कार्यक्रमों को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह दिए जाने की तैयारी है। वित्तीय समावेशन के लिए सरकार की महत्वकांक्षी योजना प्रधानमंत्री जन धन य़ोजना को पहले ही गिनीज बुक में जगह दी गयी जब बीते वर्ष 23 से 29 अगस्त के बीच 1,80,96,130 बैंक खाते खोले गए। यह सात दिनों के भीतर सर्वाधिक खाता खोलने का कीर्तिमान है। अब कोशिश है कि एक साथ सबसे ज्यादा लोगों के द्वारा एक आसन करने का उपलब्धि दर्ज करायी जाए।



न्यूयार्क में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर जुटेंगे 30 हजार लोग

न्यूयार्क में अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर जुटेंगे 30 हजार लोग
By  एजेंसी Wednesday, 17 June 2015




न्यूयार्क: अमेरिका के न्यूयार्क शहर में 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर 30 हजार से अधिक लोग जुटेंगे और टाइम्स स्क्वेयर पर योग करेंगे. इससे पहले संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में दुनिया के विभिन्न देशों के नेता और राजनयिक योग करेंगे.
संयुक्त राष्ट्र में भारत के स्थाई दूत अशोक कुमार मुखर्जी ने मंगलवार को संवाददाताओं को बताया कि मुख्य कार्यक्रम का आयोजन ईस्ट रीवर के किनारे किया जाएगा. कार्यक्रम को संयुक्त राष्ट्र महासचिव बान की-मून संबोधित करेंगे. संयुक्त राष्ट्र महासभा के अध्यक्ष सैम कुतेसा तथा भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी इस अवसर पर अपनी बात रखेंगे और अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के प्रस्ताव को समर्थन देने वाले देशों के प्रतिनिधियों से मुखातिब होंगे.

आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर योग के फायदों पर व्याख्यान देंगे. वह वीडियो लिंक के जरिये टाइम्स स्क्वेयर पर भी हजारों लोगों को योग के बारे में बताएंगे.

अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के लिए अपने संदेश में बान ने कहा, "योग शारीरिक एवं आध्यात्मिक स्वास्थ्य की बेहतरी के लिए एक सरल, सुगम माध्यम है." अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस का विचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल सितंबर में संयुक्त राष्ट्र महासभा के अपने संबोधन के दौरान प्रस्तावित किया था.

इस साल से 21 जून को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के बारे में अशोक मुखर्जी ने कहा कि इससे संबंधित प्रस्ताव को इस साल के आखिर तक पारित किया जाना है.

प्रस्ताव के सह-प्रायोजकों में मुस्लिम देशों की भूमिका और भारत में कुछ मुसलमानों द्वारा पर इस पर विवाद के बारे में पूछे जाने पर मुखर्जी ने कहा कि योग स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दे के रूप में पेश किया गया है, न कि धार्मिक मुद्दे के रूप में.

उन्होंने बताया कि ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन के 56 मुस्लिम राष्ट्रों के समूह में से 47 ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया है. हालांकि पाकिस्तान और सऊदी अरब इसका समर्थन नहीं कर रहे हैं, लेकिन उन्होंने इस पर आपत्ति भी नहीं जताई है.

मंगलवार, 16 जून 2015

सुषमा स्वराज ने नए मार्ग नाथू ला दर्रे के के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा को हरी झंडी दिखाई

सुषमा स्वराज ने नए मार्ग के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा को हरी झंडी दिखाई
 Tuesday, June 16, 2015



नई दिल्ली : विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने आज नए मार्ग नाथू ला दर्रे के जरिए कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तीर्थयात्रियों के पहले जत्थे को हरी झंडी दिखाई । इस नए मार्ग की घोषणा चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग ने सितंबर में अपनी भारत यात्रा के दौरान घोषणा की थी ।
उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे के जरिए होने वाली यात्रा के मौजूदा रास्ते की तुलना में समुद्र तल से 4,000 मीटर की उंचाई पर स्थित हिमालय का नाथू ला दर्रा भारतीय तीर्थयात्रियों, खासकर बुजुर्गों के लिए बसों के जरिए अधिक आरामदायक यात्रा सुनिश्चित करेगा ।
सुषमा ने कहा, ‘मैं आज कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए तीर्थयात्रियों के जत्थे को झंडी दिखाकर दो कारणों से खुश हूं । पहला, यह कि मैंने बुजुर्ग लोगों को यात्रा करने में सक्षम बनाने का पिछले साल जो वायदा किया था, वह पूरा हो रहा है और दूसरा यह कि मुझे इन लोगों के चेहरों पर खुशी दिखाई दे रही है जो अन्यथा यात्रा करने में सफल नहीं होते ।’ ब्रिटेन से यात्रा दस्तावेज हासिल कराने में आईपीएल के पूर्व आयुक्त ललित मोदी की मदद को लेकर रविवार को उठे विवाद के बाद से सुषमा का यह पहला सार्वजनिक कार्यक्रम है ।
मौजूदा रास्ते के जरिए कुल 18 जत्थे कैलाश मानसरोवर यात्रा पर जाएंगे । प्रत्येक जत्थे में करीब 60 तीर्थयात्री होंगे । नए मार्ग के जरिए पांच जत्थे कैलाश मानसरोवर पहुंचेंगे । प्रत्येक जत्थे में 50 तीर्थयात्री होंगे ।
सुषमा ने कहा, ‘जब मैंने विदेशमंत्री के रूप में कार्यभार संभाला था तो मैंने वायदा किया था कि हम कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए एक वैकल्पिक मार्ग विकसित करने के लिए चीन से चर्चा कर रहे हैं जो पूरी तरह वाहनचालित होगा ।’’ उन्होंने कहा कि सरकार तीर्थयात्रियों की गतिविधि पर नजर रखेगी, ताकि जरूरत पड़ने पर मदद उपलब्ध कराई जा सके। तीर्थयात्रियों के साथ दो अधिकारी भी मौजूद रहेंगे ।
‘हमने इस पर तब चर्चा की थी जब चीनी विदेश मंत्री वांग यी भारत आए थे । हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के साथ मुद्दा उठाया था और मार्ग को अंतिम रूप मिल गया । सुषमा ने कहा, ‘जब मैं चीन गई तो इस संबंध में पत्रों का आदान प्रदान हुआ और जब प्रधानमंत्री चीन गए तो उन्होंने चिनफिंग को धन्यवाद दिया ।’’ मंत्री ने कहा कि इस मार्ग को खोला जाना भारत और चीन के बीच कूटनीतिक संबंधों में महत्वपूर्ण मील का पत्थर है ।
उन्होंने कहा, ‘कूटनीति में लोगों से लोगों के संपर्क का प्रमुख महत्व होता है तथा यदि यह तर्थयात्रा के जरिए हो तो यह और भी महत्वपूर्ण हो जाता है ।’ विदेश मंत्री ने कहा, ‘मुझे विश्वास है कि इस जत्थे में बुजुर्ग लोग चीन का धन्यवाद करेंगे क्योंकि अन्यथा वे इस अनुभव से वंचित रहते ।’ सालाना यात्रा के तहत सुषमा ने उत्तराखंड में लिपुलेख दर्रे के जरिए मौजूदा मार्ग से तीर्थयात्रियों के पहले जत्थे को गत 11 जून को हरी झंडी दिखाई थी ।
भाषा

सोमवार, 15 जून 2015

राष्ट्र सेवा के व्रती गढ़ने का उपक्रम: संघ शिक्षा वर्ग

राष्ट्र सेवा के व्रती गढ़ने का उपक्रम: संघ शिक्षा वर्ग


नागपुर की भयंकर गर्मी की तपिश को सहते हुए कश्मीर से ले कर कन्याकुमारी तक और गुजरात से मणिपुर तक के ये युवा सुबह ५ बजे से रात्रि १० बजे तक अविरत कार्यमग्न रहते हैं. नागपुर के रेशिमबाग में यह दृश्य पिछले लगभग तीन सप्ताह से लोगों के परिचय का हो चूका हैं. शुरू में लगनेवाले आश्चर्य का स्थान अब इस युवकों के प्रति स्नेह और प्यार में परिवर्तित हो चूका हैं.

जी हाँ, ये दृश्य है नागपुर में प्रतिवर्ष होने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का. हर वर्ष देश के विभिन्न प्रान्तों से स्वयंसेवक नागपुर आते हैं. संघ संस्थापक आद्य सरसंघचालक डॉक्टर केशव बलिराम हेडगेवार और द्वीतीय सरसंघचालक पूजनीय माधव सदाशिव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरूजी के कर्मस्थली में उनकी समाधी की छत्रछाया में संघकार्य का प्रशिक्षण ग्रहण करते हैं और अपने-अपने कार्यक्षेत्र में जाकर संघ का हिन्दू समाज के संघटन का काम करने हेतु स्वयं को तैयार करते हैं.
पिछले लगभग ८५ वर्षीं से यह साधना अखंड चल रही हैं.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ या आर एस एस यह नाम आज देश-विदेशों में नया नहीं रहा. जहाँ एक ओर संघ के बढ़ते प्रभाव ने सामान्य नागरिक को आश्वस्त किया हैं वहीँ दूसरी ओर हिंदुत्व के विरोधियों के दिल में धडकने बढ़ दी हैं. २०१४ के चुनाव के बाद जब से नरेन्द्र मोदी जी के प्रधानमंत्री बनने के पश्चात अनेकों विवादों में संघ को घेरने का प्रयास हो रहा हैं, हालांकि संघ के विरोधक उसमे सफल नहीं हो रहे. उनके अनेक प्रयासों के बावजूद संघ की शक्ति दिन दुनी रात चौगुनी बढती ही चली जा रही हैं और अब तो विदेशों में भी ३५ देशों में ६०० से अधिक शाखाएं चल रही हैं.
संघ का यह जो विस्तार हुआ उस के रीढ़ की हड्डी अगर कोई हैं तो संघ के स्वयंसेवक हैं यह सब जानते हैं. डॉक्टर हेडगेवारजी ने जब हिन्दू समाज को संगठित करने का संकल्प किया तो उस संकल्प की पूर्ति के लिए उन्होंने किशोर एवं बालकों को चुना. उन्हें संस्कारित करने दैनंदिन शाखा का सरल परन्तु प्रभावी तंत्र दिया और संगठन को देश भर पहुँचाया.
प्रारंभ में संघ का काम नागपुर में १९२५ के विजयादशमी को शुरू हुआ. पर जैसे-जैसे अन्य प्रान्तों में संघ शुरू करने की आवश्यकता अनुभव हुई तो संघ के तंत्र में और कार्यपद्धति में प्रशिक्षित कार्यकर्ताओं की आवश्यकता भी महसूस हुई. इसी आवश्यकता ने संघ शिक्षा वर्ग की संकल्पना को जन्म दिया.
संघ के एक ज्येष्ठ्य कार्यकर्ता एवं जानकार रहे स्व.बापुरावजी वराडपांडे के अनुसार प्रथम संघ शिक्षा वर्ग की योजना १९२९ में बनी. विद्यार्थी स्वयंसेवकों की संख्या अधिक होने के कारण छुट्टियों का ध्यान रखते हुए यह वर्ग १ मई से १० जून इस कालावधि में होगा ऐसा तय किया गया. इस वर्ग में प्रतिभागी स्वयंसेवकों के शारीरिक-मानसिक-बौद्धिक-आत्मिक उन्नति के साथ-साथ संघकार्य करने की क्षमता का विकास करना यह प्राथमिक उद्देश्य इस संघ शिक्षा वर्ग का रखा गया.
इस वर्ग का नाम क्या हो इस पर भी विचार-विमर्श हुआ और Officers’ Training Camp (OTC) ऐसा अंग्रेजी में नाम तय हुआ. संघ के प्रारंभिक काल में सभी आज्ञाएँ अंग्रेजी में हुआ करती थी. इसलिए शायद वर्ग का नाम भी अंग्रेजी में सोचा गया.

आगे चल कर किसी ने इसका हिंदी में अनुवाद कर “अधिकारी शिक्षण वर्ग” (अशिव) ऐसा कर दिया. पर बाद में पूजनीय श्री गुरूजी के सुझाव के साथ इस का नाम १९५० के बाद संघ शिक्षा वर्ग (सशिव) ऐसा रूढ़ हुआ. पर आज भी पुराने स्वयंसेवकों से हम ‘ओटीसी’ ही सुनते हैं.
शुरू में संघ शिक्षा वर्गों का आयोजन नागपुर में ही होता था क्यों की संघ का विस्तार नागपुर और आस-पास  के क्षेत्र में था. १९३७ तक इस संघ शिक्षा वर्ग में प्रत्येक शनिवार को रात्रि को मनोरंजन के कार्यक्रम होते थे और अगले दिन रविवार को साप्ताहिक छुट्टी रहती थी. लेकिन १९३८ में यह साप्ताहिक अवकाश बंद कर दिया और वर्ग के कार्यक्रम अन्य दिनों की तरह रविवार को भी होने लगे. बाद में ४० दिन की अवधि घटाकर ३० दिन की की गई.
१९३४ तक संघ शिक्षा वर्ग नागपुर में ही होते थे. १९३५ से पुणे में ऐसा ही एक वर्ग शुरू हुआ. पुणे का वर्ग २२ अप्रैल से २ जून तक और नागपुर का १ मई से १० जून तक होता था और पूजनीय डॉक्टर हेडगेवार पुणे में १५ मई तक और बाद में नागपुर के वर्ग में रहते थे. वर्ग में सम्मिलित प्रत्येक स्वयंसेवक से व्यक्तिशः मिलना, उसके बारे में पूर्ण जानकारी प्राप्त करना और उससे आत्मीय सम्बन्ध बना कर उसे संघ कार्य के लिए प्रेरित करना यही उनका उद्देश्य रहता था.
१९३८ में लाहोर में प्रथम और द्वितीय वर्ष के वर्ग का आयोजन किया गया था. लाहोर का वर्ग वहां के कॉलेज के छात्रों के ग्रीष्म अवकाश के अनुसार तय किया गया. उसके बाद अन्य प्रान्तों में बढ़ते संघकार्य को देखते हुए संघ शिक्षा वर्गों का आयोजन किया जाने लगा.
नागपुर के पास सिंदी में संघ के प्रमुख कार्यकर्ताओं की एक चिंतन बैठक १९३९ में हुई. इस बैठक में डॉक्टर हेडगेवार, श्री गुरूजी, बालासाहेब देवरस, अप्पाजी जोशी, जैसे मूर्धन्य कार्यकर्ता थे. उस बैठक में संघ शिक्षा वर्गों के विषय में श्री बालासाहेब देवरस ने जो विचार रखे वे सभी को मान्य हुए. श्री बालासाहेबने कहा: “१९३५ से हम पुणे में ग्रीष्म कालीन वर्ग आयोजित कर रहे हैं. अभी पिछले वर्ष (१९३८) में लाहोर में भी वर्ग हुआ. कार्य के विस्तार के साथ अन्य प्रान्तों में भी ऐसे वर्ग होंगे. पर नागपुर का अपना एक वैशिष्ट्यपूर्ण महत्त्व हैं. सभी प्रान्तों से स्वयंसेवक वर्ग में एकसाथ रहे इसका संस्कार अधिक परिणामकारक होगा. संघ का प्रशिक्षण तीन वर्षों में विभाजित करने का हम विचार कर रहे हैं. मुझे ऐसा लगता हैं की प्रथम और द्वितीय वर्ष का संघ शिक्षा वर्ग उस-उस प्रान्त का हो. पर तृतीय वर्ष का वर्ग केवल नागपुर में ही होना चाहिए. इस वर्ग के लिए देश के सभी प्रान्तों से स्वयंसेवक नागपुर आये यह जरुरी हैं. हम इस विषय में आग्रही रहे.”.
श्री बालासाहेबजी का यह विचार सर्वमान्य हुआ और तब से संघ के तृतीय वर्ष का प्रशिक्षण वर्ग नागपुर में रेशमबाग़ में डॉक्टर हेडगेवार की कर्मस्थली एवं श्री गुरूजी के समाधी के सान्निध्य में संपन्न होता हैं. संघ के ९० साल के इतिहास में आपातकाल के दो वर्षों का कालखंड और १९४८ के प्रतिबन्ध का काल छोड़ कर यह परंपरा चल रही हैं.

इसी परंपरा में संघ में जो वरिष्ठ स्वयंसेवक हैं और जिन के द्वारा कठोर शारीरिक परिश्रम करना संभव नहीं पर संघ के माध्यम से चलाये जा रहे विविध क्षेत्रों में कामों में जो सहयोग कर सकते हैं ऐसे स्वयंसेवकों के लिए विशेष संघ शिक्षा वर्ग का आयोजन पिछले ७-८ वर्षों से शुरू किया गया हैं. इस वर्ग में प्रतिभागी स्वयंसेवकों की आयु मर्यादा ४० से ६०-६५ तक की हैं और उनके लिए सेवा, ग्रामविकास, गोरक्षा, जैविक कृषि, प्रचार जैसे विषय रखे गए हैं. साथ ही योगासन, और कुछ शारीरिक भी होता हैं.
किन्तु ग्रीष्म काल में आयोजित वर्गों में १८-४० तक आयु के स्वयंसेवक हिस्सा लेते हैं और प्रातः ५ बजे से रात्रि १० बजे तक शारीरिक, बौद्धिक, चर्चा, घोष आदि का प्रशिक्षण पाते हैं. संघ के कोई वरिष्ठ अधिकारी वर्ग के पालक अधिकारी होते हैं और पूर्ण समय वर्ग में रहकर सभी स्वयंसेवकों से आत्मीय संपर्क बनाते हैं. इस वर्ष नागपुर के तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग में अखिल भारतीय सहसंपर्क प्रमुख श्री अरुण कुमारजी पालक अधिकारी हैं. चित्तोड़ प्रान्त के श्री गोविन्द जी टांक सर्वाधिकारी और गुजरात के श्री यशवंतभाई चौधरी वर्ग के कार्यवाह हैं.
सरसंघचालक डॉक्टर मोहनराव भागवत, सरकार्यवाह श्री भय्याजी जोशी, सह सरकार्यवाह श्री दत्तात्रेय होसबले, डॉक्टर कृष्ण गोपाल, सुरेशजी सोनी, भागय्याजी, और संघ हे अखिल भारतीय अधिकारी तथा वरिष्ठ नेता वर्ग में आकर स्वयंसेवकों का बौद्धिक स्तर उन्नत करनेका प्रयास करते हैं. देश, समाज और विश्व की समस्याएं और उनके समाधान का हिन्दू तत्वज्ञान के प्रकाश में रास्ता और उसमे संघ का कार्य कैसे सहायक सिद्ध हो सकता हैं इस की चर्चा होती विभिन्न आयामों से होती हैं.
नागपुर के संघ शिक्षा वर्ग का एक और वैशिष्ट्य हैं. यहाँ भारत के सभी प्रान्तों से स्वयंसेवक आते हैं. प्रवास का खर्चा, वर्ग का २५ दिन का व्यय, संघ के गणवेश का खर्चा स्वयम उठाते हैं और नागपुर की भीषण गर्मी में बड़े उत्साह से रहते हैं. इस बार के वर्ग में १६ भाषाएँ बोलनेवाले स्वयंसेवक हैं. एक प्रकार से विविधताओं से भरपूर भारत का यह एक लघु रूप दिखाई देता हैं. सभी भाषाये अपने हैं यह आत्मीयता का भाव निर्माण होता हैं और उसका कारण हैं गणशः रचना. अलग-अलग भाषा बोलनेवाले स्वयंसेवक एक गण में होते हैं और परस्पर टूटी-फूटी हिंदी में बात करते हैं साथ में एक दुसरे के भाषा के कुछ शब्द सीख भी लेते हैं.

इस वर्ग में प्रवेश के लिए कुछ निर्धारित मानक तय किये गए हैं. तृतीय वर्ष का वर्ग संघ का दीक्षांत वर्ग होता हैं. प्रथम और द्वितीय वर्ष के वर्गों में अपने-अपने प्रान्तों में स्वयंसेवक जो शिक्षा पाते हैं उससे उन्नत इस वर्ग का पाठ्यक्रम होता हैं. साथ में इस वर्ग के उपरांत संघ कार्य के लिए अपने जीवन के कुछ वर्ष देने का संकल्प करनेवाले स्वयंसेवक प्रचारक के रूप में निकलते हैं. इस वर्ग में आनेवाले स्वयंसेवक अपने-अपने प्रान्त में जाकर संघ के काम को अधिक मजबूती से करेंगे ऐसी अपेक्षा भी रहती हैं. यह सब पूर्ण करने की क्षमता रखनेवाले अनुभवी, मंजे हुए और प्रत्यक्ष संघ के कार्य में हैं ऐसे ही स्वयंसेवकों का चयन इस वर्ग के लिए होता हैं.
संघ का एक घोषित उद्देश्य हैं, एक मिशन हैं. वह हैं ‘परम वैभवं नेतुमेतत स्वराष्ट्रं’. याने इस देश को परमवैभव तक ले जाना. इस उद्देश्य पूर्ति के लिए स्वयंसेवक एक उपकरण हैं और शाखा इसका साधन हैं. अतः यह उपकरण अधिक प्रभावी हो सके इस हेतु से संघ शिक्षा वर्गों का आयोजन होता हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस उद्देश्य की बड़ी सरल भाषा में व्याख्या की हैं ‘सब का साथ सब का विकास’. संघ के शाखा के अलावा देश भर में पिछड़े, दुर्बल, वनवासी, बंधुओं के लिये लाखो सेवा कार्य चलते हैं. इस सभी कार्यों को सुचारू रुप से चला कर अपनी ध्येय पूर्ति की ओर अग्रेसर होने के लिए इन संघ शिक्षा वर्गों में सम्मिलित स्वयंसेवक अपना महति योगदान दे सके इसीलिए यह संघ शिक्षा वर्ग की साधना में संघ निरंतर लगा हुआ हैं

समतायुक्त, शोषणमुक्त समाज निर्माण संघ कर रहा है – प.पू. डॉ. मोहनजी भागवत

समतायुक्त, समतायुक्त,शोषणमुक्त समाज निर्माण संघ कर रहा है – डॉ. मोहनजी भागवत

सरसंघचालक प.पू. डॉ मोहन जी भागवत समारोप कार्यक्रम में संबोधित करते हुए


नागपुर. सरसंघचालक प.पू. डॉ मोहन जी भागवत ने कहा कि भारत में, हर क्षेत्र में आज बदलाव का अनुभव हो रहा है. दुनिया में भारत की मान-प्रतिष्ठा बढ रही है, भारत के प्रति दुनिया की आशा-आकांक्षा बढ़ रही है. सरसंघचालक जी रेशिमबाग परिसर में तृतीय वर्ष संघ शिक्षा वर्ग के समारोप कार्यक्रम में संबोधित कर रहे थे.

भारत के प्रति दुनिया के इस बदले हुए दृष्टिकोण का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि, भारत के प्रधानमंत्री द्वारा ‘योग दिवस’ के बारे में संयुक्त राष्ट्र संघ में प्रस्ताव रखते ही, यह प्रस्ताव चर्चा के बिना ही तीन चौथाई से मतों पारित हो गया. दुनिया भारत द्वारा पहल करने की राह देख रही  थी.
उन्होंने कहा कि शक्ति के क्षेत्र में जिसकी शक्ति बढ़ती है, उसकी प्रतिष्ठा बढती है. आर्थिक-सामरिक क्षमता के आधार पर ऐसा होता है. लेकिन समयचक्र बदलने पर उस देश की मान और प्रतिष्ठा भी कम हो जाती है.

किंतु भारत के संदर्भ में ऐसा नहीं है. भारत अपने अस्तित्व के समय से आज तक भले ही भौतिक दृष्टि से दुर्बल रहा हो, लेकिन दुनिया में विश्‍वास के संदर्भ में भारत सदैव अग्रसर रहा है. यही हमारी परंपरा है. किसी भी बात की आड़ लेकर भारत ने स्वार्थ का अजेंडा नहीं अपनाया है. विश्‍व को परिवार माना है. यह भारतीय समाज का स्वभाव है, इसे ही संस्कृति कहते है. दुनिया में बलवान बहुत होंगे, लेकिन विश्‍वासपात्र केवल एक भारत ही है, ऐसी दुनिया की भावना है.

एकात्म में आत्मसाधना और लोगों के बीच सेवा और परोपकार यह सनातन हिंदू संस्कृति है, इसने ही देश को जोड़कर रखा है. लेकिन गत हजार-पंद्रह सौ वर्षों से जो चला आ रहा है, वह सब हिंदू धर्म नहीं है, ऐसा बताते हुए मोहनजी ने कहा कि, अयोग्य बातें त्यागनी होंगी. हिंदू धर्म कोई जाति-भेद नहीं मानता, हम सब भाई-भाई हैं, ऐसी घोषणा विश्‍व हिंदू सम्मेलन में संतों और मठाधीशों ने की, इसे व्यवहार में भी उतारना होगा, संघ यही काम कर रहा है. भेदों के आधार पर व्यवहार, यह विकृति है. समाज को एकसूत्र में बांधने के लिए डॉ आंबेडकर जी के बंधुभाव का दृष्टिकोण अपनाना होगा. अंत में सरसंघचालक जी ने कहा कि, समतायुक्त, शोषण-मुक्त समाज निर्माण करने का काम संघ कर रहा है. लेकिन यह काम केवल अकेले संघ का नहीं है, सारे समाज ने इसमें हाथ बंटाना है.

कार्यक्रम के प्रमुख अतिथि धर्मस्थल कर्नाटक के धर्माधिकारी पद्मविभूषण डॉ. विरेन्द्रजी हेगडे जी ने कहा कि संघ ने ‘हिंदू राष्ट्र सहोदर सर्वे’ की भावना समाज में दृढ की है. राजनितिक और आर्थिक विचार भिन्न रखनेवालों को भी देशहित की दृष्टि से हिंदुत्व की भावना अपनानी चाहिए.

भारतीय समाज में जाति-संप्रदाय के भेद थे. इन भेदों को मिटाने के लिए विश्‍व हिंदू परिषद ने देश के संत और मठाधिपीतयों को एक मंच पर लाने का उल्लेखनीय काम किया है. इसी प्रकार अस्पृश्यता और असमानता मिटाने के लिए डॉ. आंबेडकरजी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. हम सभी को इस दिशा में काम करना चाहिए.

कार्यक्रम के आरंभ में शिक्षा वर्ग में आये स्वयंसेवकों ने व्यायाम और योग के प्रात्यक्षिक प्रस्तुत किये. इस वर्ग में देश भर से 875 स्वयंसेवकों ने भाग लिया. अतिथियों का स्वागत वर्ग के सर्वाधिकारी, चित्तौड़ प्रान्त संघचालक गोविंद सिंह जी टांक ने किया. मंच पर नागपुर महानगर के संघचालक राजेश जी लोया उपस्थित थे.  कार्यक्रम का संचालन गुजरात के कार्यवाह यशवंत भाई चौधरी ने किया.

गुरुवार, 11 जून 2015

संघ साधना में गुरु का महत्व - पृथ्वी सिंह"चित्तौड़"



संघ साधना में गुरु का महत्व
-पृथ्वी सिंह"चित्तौड़" 

(श्री गुरु पूर्णिमा 12 july 2014 पर विशेष,स्वयंसेवक बंधुओं से निवेदन है इसका पूरा अध्ययन करें)
प्रतिवर्ष इसकी प्राशंगिकता है।

रामराज्य अर्थात इस भारत भूमि के परम वैभव की साधना में लीन कर्मयोगियों के लिये साधना अनुरूप मार्गदर्शन की समय समय पर आवश्यकता पडती हैं ।इस अनिवार्य आवश्यकता को ध्यान में रख कर प.पू.डा.हेडगेवारजी (संघ rss संस्थापक)ने परम पवित्र भगवा ध्वज को गुरु रूप में हम सभी के समक्ष रखा । संघ कार्य में गुरु के महत्व पर आज कुछ विचार करें । ॐ
गुरु के महत्व पर संत शिरोमणि तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है –
गुर बिनु भवनिधि तरइ न कोई।
जों बिरंचि संकर सम होई।।
भले ही कोई ब्रह्मा, शंकर के समान क्यों न हो, वह गुरु के बिना भव सागर पार
नहीं कर सकता। धरती के आरंभ से ही गुरु
की अनिवार्यता पर प्रकाश डाला गया है। वेदों, उपनिषदों, पुराणों, रामायण,
गीता, गुरुग्रन्थ साहिब आदि सभी धर्मग्रन्थों एवं
सभी महान संतों द्वारा गुरु की महिमा का गुणगान किया गया है। गुरु
और भगवान में कोई अन्तर नहीं है। संत शिरोमणि तुलसीदास
जी रामचरितमानस में लिखते हैं –
बंदउँ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि।
महामोह तम पुंज जासु बचन रबिकर निकर।।
अर्थात् गुरू मनुष्य रूप में नारायण ही हैं। मैं उनके चरण
कमलों की वन्दना करता हूँ। जैसे सूर्य के निकलने पर अन्धेरा नष्ट हो जाता है,
वैसे ही उनके वचनों से मोहरूपी अन्धकार का नाश हो जाता है।
किसी भी प्रकार की विद्या हो अथवा ज्ञान हो, उसे
किसी दक्ष गुरु से ही सीखना चाहिए। जप, तप,
यज्ञ, दान आदि में भी गुरु का दिशा निर्देशन जरूरी है
कि इनकी विधि क्या है? अविधिपूर्वक किए गए सभी शुभ कर्म
भी व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं जिनका कोई उचित फल
नहीं मिलता। स्वयं की अहंकार की दृष्टि से किए गए
सभी उत्तम माने जाने वाले कर्म भी मनुष्य के पतन का कारण बन
जाते हैं। अत: संघ कार्य हमें अहंकार शून्य बनाता है ।भौतिकवाद में भी गुरू
की आवश्यकता होती है।
सबसे बड़ा तीर्थ तो गुरुदेव ही हैं जिनकी कृपा से फल
अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। गुरुदेव का निवास स्थान शिष्य के लिए
तीर्थ स्थल है। उनका चरणामृत ही गंगा जल है। वह मोक्ष
प्रदान करने वाला है। गुरु से इन सबका फल अनायास ही मिल जाता है।
ऐसी गुरु की महिमा है।
तीरथ गए तो एक फल, संत मिले फल चार।
सद्गुरु मिले तो अनन्त फल, कहे कबीर विचार।।
मनुष्य का अज्ञान यही है कि उसने भौतिक जगत को ही परम
सत्य मान लिया है और उसके मूल कारण चेतन को भुला दिया है
जबकि सृष्टि की समस्त क्रियाओं का मूल चेतन शक्ति ही है।
चेतन मूल तत्व को न मान कर जड़ शक्ति को ही सब कुछ मान
लेनाअज्ञानता है। इस अज्ञान का नाश कर परमात्मा का ज्ञान कराने वाले गुरू
ही होते हैं।
किसी गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रथम आवश्यकता समर्पण
की होती है। समर्पण भाव से ही गुरु का प्रसाद शिष्य
को मिलता है। शिष्य को अपना सर्वस्व श्री गुरु देव के चरणों में समर्पित कर
देना चाहिए। इसी संदर्भ में सद गुरु कबीरदास जी ने उल्लेख किया गया है कि
यह तन विष की बेलरी, और गुरू अमृत की खान,
शीश दियां जो गुरू मिले तो भी सस्ता जान।
हमारा गुरु हमसे राष्ट्र यज्ञ में समय की आहुति चाहते है ।
गुरु ज्ञान गुरु से भी अधिक महत्वपूर्ण है। प्राय: शिष्य गुरु को मानते हैं पर
उनके संदेशों को नहीं मानते। इसी कारण उनके जीवन में
और समाज में अशांति बनी रहती है।
गुरु के वचनों पर शंका करना शिष्यत्व पर कलंक है। जिस दिन शिष्य ने गुरु को मानना शुरू
किया उसी दिन से उसका उत्थान शुरू शुरू हो जाता है और जिस दिन से शिष्य ने गुरु
के प्रति शंका करनी शुरू की, उसी दिन से शिष्य
का पतन शुरू हो जाता है।
सद्गुरु एक ऐसी शक्ति है जो शिष्य की सभी प्रकार
के ताप-शाप से रक्षा करती है। शरणा गत शिष्य के दैहिक, दैविक, भौतिक
कष्टों को दूर करने एवं उसे बैकुंठ धाम में पहुंचाने का दायित्व गुरु का होता है।
आनन्द अनुभूति का विषय है। बाहर की वस्तुएँ सुख दे सकती हैं
किन्तु इससे मानसिक शांति नहीं मिल सकती। शांति के लिए गुरु
चरणों में आत्म समर्पण परम आवश्यक है। सदैव गुरुदेव का ध्यान करने से
जीव नारायण स्वरूप हो जाता है। वह
कहीं भी रहता हो, फिर भी मुक्त ही है।
ब्रह्म निराकार है। इसलिए उसका ध्यान करना कठिन है। ऐसी स्थिति में सदैव
गुरुदेव का ही ध्यान करते रहना चाहिए। गुरुदेव नारायण स्वरूप हैं। इसलिए गुरु
का नित्य ध्यान करते रहने से जीव नारायणमय हो जाता है।
भगवान श्रीकृष्ण ने गुरु रूप में शिष्य अर्जुन को यही संदेश
दिया था –
सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्याि माम शुच: ।। (गीता 18/66)
अर्थात् सभी साधनों को छोड़कर केवल नारायण स्वरूप गुरु
की शरणगत हो जाना चाहिए। वे उसके सभी पापों का नाश कर देंगे।
शोक नहीं करना चाहिए।
जिनके दर्शन मात्र से मन प्रसन्न होता है, अपने आप धैर्य और शांति आ
जाती हैं, वे परम गुरु हैं। जिनकी रग-रग में ब्रह्म का तेज व्याप्त
है, जिनका मुख मण्डल तेजोमय हो चुका है, उनके मुख मण्डल से
ऐसी आभा निकलती है कि जो भी उनके
समीप जाता है वह उस तेज से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।संघ स्थान पर विद्यमान प.पवित्र भगवा ध्वज उसी नारायण का मूर्ति मान स्वरूप है ।
उस गुरु के शरीर से निकलती वे अदृश्य किरणें
समीपवर्ती मनुष्यों को ही नहीं अपितु
पशु पक्षियों को भी आनन्दित एवं मोहित कर देती है। उनके दर्शन
मात्र से ही मन में बड़ी प्रसनन्ता व शांति का अनुभव होता है। मन
की संपूर्ण उद्विग्नता समाप्त हो जाती है। ऐसे परम गुरु
को ही गुरु बनाना चाहिए। और ये सभी भगवत गुण हमारे श्री गुरु परम पवित्र भगवद ध्वज में प्रत्यक्ष है ।
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"संगठन विज्ञान "
केवल ध्येय और विचार ही उदात्त होने से काम नहीं चलता संगठन के सामने दृष्टि भी उदार होनी आवश्यक है।
बड़े लक्ष्य लेकर चलने से ही बड़े कार्य सम्भव होते है। यदि संग्ठन अपने
सम्मुख लक्ष्य ही छोटा रख ले तो फिर
उसका दायरा भी सीमित हो जायेगा। शक्तिपूजा हमें
उदात्तता की ही प्रेरणा देती है। 1897 में जब
भारत की स्वतंत्रता का भी को चिन्ह नहीं दिखाई
दे रहा था तब स्वामी विवेकानन्द ने भारत के सम्मूख विश्वविजय का ध्येय
रखा। 12 संन्यासी भाइयों से प्रारम्भ कर रामकृष्ण मठ को विश्व को हिन्दू
संस्कृति व वेदान्त के संदेश का कार्य दिया। डा हेड़गेवार जी ने जब 1925
की विजयादशमी को कुछ मुठ्ठीभर बालकों के साथ
संघ की स्थापना कि थी तभी उनके सम्मूख पूरे हिन्दू समाज के
संगठन का लक्ष्य था। इन उदात्त विचारों ने ही चमत्कार किये है।
महान विचार के साथ लोग जुड़ते है तभी संगठन का स्वरूप बनता है। केवल
कुछ लोगों तक विचार पहुँचाने मात्र से संगठन का काम नहीं हो जाता। अधिक
से अधिक लोगों के जीवन में यह विचार उतारना ही संगठन
का ध्येय है। ध्येयवादी संगठन सत्य पर आधृत होता है। इस विचार
की सार्वभौमिकता के कारण ही यह सबके लिये
स्वीकार्य हो सकता है। सनातन हिन्दू धर्म इन्हीं शाश्वत
सिद्धांतों को व्यावहारिक रूप में उतारने का नाम है। जब संगठन का आधार
भी ऐसा ही पूर्णतः शास्त्रीय सनातन सिद्धांत
होता है तब संगठन सार्वजनिक हो जाता है और उससे जुड़ने
से लोगों की संख्या असीम
होती है। वास्तव में कोई भी ऐसे संगठन से विचार के स्तर पर
जुड़ सकता है। कार्यप्रणाली व पद्धति के अनुसार रूचि रखनेवाले लोग
ही संगठन से जुड़ेंगे किन्तु विचार के स्तर पर
किसी को भी कोई
आपत्ती नहीं होगी। इन सनातन सत्यों को अनेक
प्रकार से पुकारा जाता है। उनमें से एक नाम है ब्रह्म। संगठन का ध्येय
ही ब्रह्म है।
ब्रह्मचर्य का सही अर्थ है – ब्रह्मकी ओर चलना।
ब्रह्मैव चरति इति ब्रह्मचारी। संगठनात्मक सन्दर्भ में इसका अर्थ
हुआ सतत ध्येय की ओर चलना। मार्ग में आनेवाले अन्य
प्रलोभनों अथवा आकर्षणों की ओर किंचित भी ध्यान ना बंटनें
देना। नवरात्री के दूसरे दिन की देवी है
माँ ब्रह्मचारीणी। माता पार्वती द्वारा पूर्ण
एकाग्रता से दीर्घकाल तक किये तप के कारण उन्हें यह नाम मिला है।
अपने ध्येय शिवकृपा के लिये सबकुछ दांव पर लगानेवाले तप की अवधि में
माता ने पूर्ण कठोरता के साथ ब्रह्मचर्य का पालन किया। यहाँ तक
की आहार का भी पूर्ण त्याग कर दिया। एक समय पेड़ के
पत्तों का सेवन भी त्याग देने के कारण ही उनका एक नाम
पड़ा – अपर्णा। पार्वती की तपस्या से विव्हल
उनकी माता ने करूण पुकार के साथ उन्हे कहा ‘अरी मत’
संस्कृत में उSSमा और पार्वती का नाम ही पड़ गया उमा।
माता ब्रह्मचारिणी इस तप की प्रतिक हैं।
इसीलिए उनके हाथ में जपमाल है। जप मन की उकतानता से
की गई धारणा का द्योतक है। यह जपमाल रूद्राक्ष की है।
रूद्र के अक्ष की आस में ही तो सारा तप चल रहा है ना?
संगठन में ब्रह्मचारिणी की साधना का क्या अर्थ होगा?
यहाँ केवल एक व्यक्ति की व्यक्तिगत निष्ठा की बात
नहीं है। पूरे संगठन का ही एकसाथ एक विचार पर एकाग्र
होना संगठनात्मक ब्रह्मचर्य होगा। इसलिये ये लम्बी प्रक्रिया है।
अत्यंत सुव्यवस्थित योजना से संगठन के मन का संस्कार करना होता है। सब एक विचार
पर एकाग्र हो सके इस हेतु संगठन को एक सामान्य शब्दावली का निर्माण
करना होता है। संगठनात्मक अनुशासन
की रचना करनी होती है। विविध स्वभाव के
कार्यकर्ता संगठन में एक विचार से एक ध्येय के लिये एकसाथ आकर कार्य कर रहे
होते है। थोड़ासा भी व्यवधान होने से व्यक्तिगत आकांक्षायें, क्षुद्र
अहंकार उपर आ जाते हैं। यह सब संगठन की एकाग्रता को भग्न करने
के लिये पर्याप्त होते है। उपाय एक ही है सतत ध्येयस्मरण। पर फिर
याद रहे कि एक व्यक्ति के मन की बात नहीं है। अनेक
विविधताओं से भरे, कई बार मीलों की दूरी पर
फैली शाखाओं में कार्यरत व्यक्तियों के समूह को अनेक प्रकार
की स्थितियों के मध्य इस ध्येयस्मरण को जीवित रखना है।
संगठन के किसी भी सदस्यों को, कार्यकर्ता,
पदाधिकारी सभी को एक मन से एक विचार पर एकाग्र होना है।
एक संकल्प के साथ एकसमान स्वप्न देखने से ही यह सम्भव है।
सबके स्वप्न एक हो, संकल्प एक हो और वे एक मन से किये गये एक विचार पर
आधृत हो। इस अद्वितीय एकात्मता हेतु विशिष्ठ तकनिक का प्रयोग
करना होता है। इस तकनिक को नित्य कार्यपद्धति कहते है।
ब्रह्मचारिणी माता की जपमाल ही संगठन
की कार्यपद्धति है। संगठन के विचार, ध्येय व स्वभाव के अनुरूप
ही संगठन की कार्यपद्धति को गढ़ना होता है। जैसे जपमाल में
एक एक मणके को फेरने के साथ इष्ट का नामस्मरण किया जाता है वैसे
ही कार्यपद्धति में नियमित अंतराल में नियत गतिविधि के द्वारा ध्येयस्मरण
किया जाता है। कार्यपद्धति की नियमितता उसका सबसे प्रमुख लक्षण है।
नियमित समय के अंतराल पर आयोजित होने कारण इसकी आदत
पड़ती है मन को संस्कारित करने का यही एकमात्र उपाय है।
कार्यपद्धति की गतिविधि सबके लिये होती है। अतः उसके
बहुत अधिक क्लिष्ट होने से नहीं चलेगा। कार्यपद्धति के कार्यक्रम
सहज सरल होने चाहिये। बहुत अधिक साधनों अथवा स्थान आदि में
विशिष्ठता की आवश्यकता नहीं होनी चाहिये।
कार्यपद्धति जितनी सरल
होगी उतनी ही प्रभावी होग
ी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रभाव का सबसे प्रमुख कारण
उसक अत्यंत सरल कार्यपद्धति में है। प्रतिदिन लगनेवाली शाखा के लिये
किसी भी विशेष साधन अथवा प्रशिक्षण
की आवश्यकता नहीं होती। सहज, सरल, सुलभ
होना ही इसकी सफलता का रहस्य है।
प्रत्येक संगठन को अपनी कार्यपद्धति की रचना करनी होती है। जो संगठन ऐसा कर पाते है वे संगठन लम्बे चलते है और एक मन,
विचार, संकल्प और स्वप्न के साथ ध्येय की ओर अग्रसर होते है।
ब्रह्मचारिणी की कृपा का यही माध्यम है। आइये
अपनी कार्यपद्धति की माला जपे और संगठनात्मक
ब्रह्मचर्य के द्वारा ध्येय की ओर बढ़ें।
पृथ्वी सिंह"चित्तौड़"