शनिवार, 6 मई 2017

बद्रीनाथ धाम




6 मई 2017 को सुबह 4:15 पर बद्रीनाथ के कपाट खुलेंगे। नरेंद्रनगर में राजा मनुजयेंद्र शाह ने राजदरबार से तिथि की घोषणा की। पूजा अर्चना और मंत्रोचार के बाद पूरे विधि विधान से बाबा केदार के कपाट खुलने की तिथि घोषित की गई।

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इतिहास के पन्नो से.....बद्रीनाथ धाम
पौराणिक कथाओं और यहाँ की लोक कथाओं के अनुसार यहाँ नीलकंठ पर्वत के समीप भगवान विष्णु ने बाल रूप में अवतरण किया। यह स्थान पहले शिव भूमि (केदार भूमि) के रूप में व्यवस्थित था। भगवान विष्णुजी अपने ध्यानयोग हेतु स्थान खोज रहे थे और उन्हें अलकनंदा नदी के समीप यह स्थान बहुत भा गया। उन्होंने वर्तमान चरणपादुका स्थल पर (नीलकंठ पर्वत के समीप) ऋषि गंगा और अलकनंदा नदी के संगम के समीप बाल रूप में अवतरण किया और क्रंदन करने लगे। उनका रुदन सुन कर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। फिर माता पार्वती और शिवजी स्वयं उस बालक के समीप उपस्थित हो गए। माता ने पूछा कि बालक तुम्हें क्या चहिये? तो बालक ने ध्यानयोग करने हेतु वह स्थान मांग लिया। इस तरह से रूप बदल कर भगवान विष्णु ने शिव-पार्वती से यह स्थान अपने ध्यानयोग हेतु प्राप्त कर लिया। यही पवित्र स्थान आज बदरीविशाल के नाम से सर्वविदित है।
जब भगवान विष्णु योगध्यान मुद्रा में तपस्या में लीन थे तो बहुत अधिक हिमपात होने लगा। भगवान विष्णु हिम में पूरी तरह डूब चुके थे। उनकी इस दशा को देख कर माता लक्ष्मी का हृदय द्रवित हो उठा और उन्होंने स्वयं भगवान विष्णु के समीप खड़े हो कर एक बेर (बदरी) के वृक्ष का रूप ले लिया और समस्त हिम को अपने ऊपर सहने लगीं। माता लक्ष्मीजी भगवान विष्णु को धूप, वर्षा और हिम से बचाने की कठोर तपस्या में जुट गयीं । कई वर्षों बाद जब भगवान विष्णु ने अपना तप पूर्ण किया तो देखा कि लक्ष्मीजी हिम से ढकी पड़ी हैं। तो उन्होंने माता लक्ष्मी के तप को देख कर कहा कि हे देवी! तुमने भी मेरे ही बराबर तप किया है सो आज से इस धाम पर मुझे तुम्हारे ही साथ पूजा जायेगा और क्योंकि तुमने मेरी रक्षा बदरी वृक्ष के रूप में की है सो आज से मुझे बदरी के नाथ-बदरीनाथ के नाम से जाना जायेगा। इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बदरीनाथ पड़ा।
जहाँ भगवान बदरीनाथ ने तप किया था, वही पवित्र-स्थल आज तप्त-कुण्ड के नाम से विश्व-विख्यात है और उनके तप के रूप में आज भी उस कुण्ड में हर मौसम में गर्म पानी उपलब्ध रहता है।
पावन बद्रीनाथ धाम नर-नारायण पर्वत के मध्य में हिमालय की कोख में बसा है. यह धाम भगवान विष्णु को प्रिय होने के कारण नारद जैसे श्रेष्ठ मुनियों द्वारा अनवरत सेवित एवं साधना स्थली के रूप में विख्यात है. . बद्रीनाथ के संदर्भ में मान्यता है कि सतयुग के प्रारंभ में ही जगत के कल्याण की कामना धारण करके स्वयं नारायण ने मूर्तिमान होकर इस धाम में एक तपस्वी की तरह तप किया. सतयुग में भगवान श्रीनारायण के प्रत्यक्ष दर्शन होने के कारण यह धाम मुक्तिप्रदा के नाम से विख्यात हुआ. त्रेता युग में योगाभ्यासरत रहकर कुछ काल तक भगवान श्रीराम के दर्शन का लाभ मानव को मिलने के कारण इसे योगिसिद्धदा के नाम से जाना गया. द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण के प्रत्यक्ष दर्शन की आशा में बहुजन संकुल होने के नाते विषाला के नाम से जाना गया. प्रकृति के वैभव से आच्छादित, नर-नारायण को लुभाने वाला यह कलयुग में बद्रिकाश्रम बदरीनाथ धाम के नाम से विख्यात है.
बौद्ध धर्म के नयन-महायान समुदायों के आपसी संघर्ष ने बद्रिकाश्रम को भी प्रभावित किया. आक्रमण एवं विनाश की आशंका से ग्रस्त एवं खुद रक्षा करने में असमर्थ इस धाम के पुजारी भगवान की मूर्ति को नारद कुंड में डालकर यहां से पलायन कर गए. जब भगवान की प्रतिमा के दर्शन नहीं हुए तो नर-देवता संयुक्त रूप से देवाधिदेव भगवान शिव की शरण में जाते हैं, जो उस समय कैलाश में समाधि लिए हुए थे. आराधना से प्रकट होकर भगवान कैलाशपति ने कहा कि नारायणश्री की मूर्ति कहीं गई नहीं है. वहीं समीप के नारद कुंड में ही है, परंतु तुम लोग वर्तमान में शक्तिहीन हो. भगवान नारायणश्री मेरे भी आराध्य हैं. अतएव मैं स्वयं अवतार धारण करके मूर्ति का उद्धार कर जगत का कल्याण करूंगा. कालांतर में भगवान आशुतोष शिव ही दक्षिण भारत के कलाड़ी नामक स्थान में ब्राह्मण भेरवदत्त उ़र्फ शिव गुरु के घर माता आर्यम्बा की कोख से जन्म लेकर आदिगुरु शंकराचार्य के नाम से विख्यात हुए.
जगतगुरु शंकराचार्य द्वारा संपूर्ण भारत में अव्यवस्थित तीर्थों का सुदृढ़ीकरण, बौद्ध मतों का खंडन एवे सनातन वैदिक मत का मंडन सर्वविदित है. शिव रूप आदिगुरु शंकराचार्य ने ठीक ग्यारह वर्ष की अवस्था में दक्षिण भारत से बद्रिकाश्रम पहुंच कर नारद कुंड से भगवानश्री की दिव्य मूर्ति का विधिवत उद्धार करके उसे पुन: प्राण प्रतिष्ठित किया. बद्रीनाथ धाम में आज भी उन्हीं के द्वारा शुरू परंपरा के अनुसार उन्हीं के वंशज नांबूदरीपाद ब्राह्मण ही भगवान नारायण रूप बद्रीनाथ जी की पूजा-अर्चना वैदिक परंपरा के अनुसार करते हैं. अति हिमपात के कारण इस धाम के कपाट वर्ष में छह माह बंद रहते हैं. मंदिर के कपाट पूजन के लिए अप्रैल के अंत अथवा मई के प्रथम पखवारे में श्रद्धालुओं के दर्शनार्थ खोल दिए जाते हैं. कुंभ 2010 के अवसर पर इस बार भी कपाट 19 मई को खोले गए. मंदिर खुलने के दिन अखंड ज्योति दर्शन का विशेष महत्व है. छह माह बाद मंदिर के पट बंद होने का दिन लगभग नवंबर मास के दूसरे सप्ताह में आता है, जो प्रत्येक वर्ष दशहरे के दिन निश्चित किया जाता है. भगवान बद्रीनाथ जी की मूर्ति का स्वरूप एवं भगवानश्री की दिव्य मूर्ति की प्रतिष्ठा का इतिहास लगभग द्वापर युग के श्रीकृष्णावतार के समय का माना जाता है. भगवान बद्रीनाथ की इस तीसरी प्रतिष्ठा का इतिहास कुछ इस प्रकार है, जब विधर्मियों-पाखंडियों का प्रभाव बढ़ा तो उन्होंने भगवानश्री की प्रतिमा को क्षति पहुंचाने का प्रयास किया. बचाव में पुजारियों ने भगवानश्री की प्रतिमा पास के नारद कुंड में डाल दी, जिसकी प्राण प्रतिष्ठा स्वयं शिवावतार आदि शंकराचार्य ने की. भगवानश्री की दिव्य मूर्ति हरित वर्ण की पाषाण शिला में निर्मित है, जिसकी ऊंचाई लगभग डेढ़ फुट आंकी जाती है. भगवानश्री नारायण यहां पद्मासन में विराजमान हैं, पद्मासन भी योग मुद्रा में है. पद्मासन पर भगवानश्री के गंभीर बुर्तलाकार नाभिहृदय के दर्शन होते हैं. यही ध्यान साधक को साधना में गंभीरता प्रदान करता है, जिससे साधक के मन की चपलता स्वयं समाप्त हो जाती है. नाभि के ऊपर भगवानश्री के विशाल वक्षस्थल के दर्शन होते हैं. बाएं भाग में भृगुलता का चिन्ह एवं दाएं भाग में श्रीवत्स चिन्ह स्पष्ट दिखता है. भृगुलता भगवानश्री की सहिष्णुता एवं क्षमाशीलता का परिचायक है. श्रीवत्स दर्शन शरणागत दायक और भक्त वत्सलता का प्रतीक है. पुराण इसका स्वयं साक्षी है कि त्रिदेवों में महान कौन है के परीक्षण के क्रम में भृगुऋृषि ने भगवान विष्णु जी के वक्षस्थल पर पैर से प्रहार किया तो भगवान ने क्षमादान के साथ अपने श्रेष्ठ गुणों का भी प्रदर्शन किया. श्रीवत्स चिन्ह में बाणासुर की रक्षा के लिए भगवान शिव द्वारा फेंके गए त्रिशूल के घाव एवं श्रीकृष्ण के वक्षस्थल स्पष्ट रूप से दिखते हैं. सुवर्ण रेखा के रूप में लक्ष्मी प्रदाता प्रतीक बने हैं. यह चिन्ह दाएं भाग में स्थित हैं. इस पर भगवानश्री के दिव्य कंबुग्रीवा के दर्शन होते हैं, जो महापुरुषों के लक्षणों का परिचायक है. इसके ऊपर भगवान बद्रीनाथ जी की विशाल जटाओं से सुख भाग के दर्शन होते हैं.
भगवानश्री का दर्शन मानव को जन्म-मृत्यु के बंधन से मुक्ति प्रदान करने वाला है. नारद जी-भगवान बद्रीनाथ जी के दरबार के बाएं भाग में ताम्रवर्ण की छोटी सी मूर्ति मुनिवर नारद जी की है. परंपरानुसार शीतकाल में देव पूजा के क्रम में नारद जी द्वारा ही भगवानश्री एवं
देवतागण सुपूजित होते हैं. उद्धव जी-नारद जी के पृष्ठ भाग में चांदी की दिव्य मूर्ति उद्धव जी की है. द्वापर में भगवान श्रीकृष्ण के सखा रहे उद्धव जी उन्हीं के आदेश से यहां पधारे थे. यह भगवानश्री के उत्सव मूर्ति के रूप में सुपूजित होती है. शीतकाल में देव पूजा के समय उद्धव जी की ही पूजा पांडुकेश्वर के योगध्यानी मंदिर में संपन्न होती है. नरपूजा में ग्रीष्मकाल में उद्धव जी पुन: भगवानश्री की पंचायत बद्रीनाथ के वामपार्श्व में विराजते हैं. भगवान नारायण उद्धव एवं नारद जी के बाएं भाग में शंख, चक्र एवं गदा धारण किए हुए पद्मासन में स्थित हैं. स्कंध भाग में लीलादेवी, बाएं उरुभाग में उर्वशी, बाएं मुखारबिंद के पास श्रीदेवी एवं कटि भाग के पास भूदेवी भगवानश्री की सेवा में विराजमान हैं. स्वयं भगवान नारायण योग मुद्रा में तपस्या में लीन हैं.
बद्रीनाथ धाम में सनातन धर्म के सर्वश्रेष्ठ आराध्य देव श्री बदरीनारायण भगवान के पांच स्वरूपों की पूजा अर्चना होती है। विष्णु के इन पांच रूपों को ‘पंच बद्री’ के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ के मुख्य मंदिर के अलावा अन्य चार बद्रियों के मंदिर भी यहां स्थापित है।
श्री विशाल बद्री
श्री विशाल बद्री (श्री बद्रीनाथ में) विशाल बद्री के नाम से प्रसिद्घ मुख्य बद्रीनाथ मन्दिर, पंच बद्रियों में से एक है। इसकी देव स्तुति का पुराणों में विशेष वर्णन किया जाता है। ब्रह्मा, धर्मराज तथा त्रिमूर्ति के दोनों पुत्रों नर तथा नारायण ने बद्री नामक वन में तपस्या की, जिससे इन्द्र का घमण्ड चकनाचूर हो गया। बाद में यही नर नारायण द्वापर युग में कृष्ण और अर्जुन के रूप में अवतरित हुए तत्पश्चात बद्रीनारायण नारद शिला के नीचे एक मूर्ति के रूप प्राप्त हुए। जिन्हें हम विशाल बद्री के नाम से जानते हैं।
श्री योगध्यान बद्री
श्री योगध्यान बद्री (पाण्डुकेश्वर में) 1500 वर्षो से भी प्राचीन योगध्यान बद्री का मन्दिर जोशीमठ तथा पीपलकोठी पर स्थित है। महाभारत काल के अंत में कौरवों पर विजय प्राप्त करने के, कलियुग के� प्रभाव से बचने हेतु पाण्डव हिमालय की ओर आए और यही पर उन्होंने स्वर्गारोहण के पूर्व घोर तपस्या की थी।
श्री भविष्य बद्री
श्री भविष्य बद्री (जोशीमठ के पास) जोशीमठ के पूर्व में 17 कि.मी. की दूरी पर और तपोवल के सुबैन के पास भविष्य बद्री का मंदिर स्थित है। आदि ग्रंथों के अनुसार यही वह स्थान है जहां बद्रीनाथ का मार्ग बन्द हो जाने के पश्चात धर्मावलम्बी यहां पूजा-अर्चना के लिए आते हैं।
श्री वृद्घ बद्री
श्री वृद्घ बद्री (अणिमठ पैनीचट्टी के पास) यह जोशीमठ से 8 कि.मी. दूर 1380 मी. की ऊंचाई पर स्थित है। ऐसी मान्यता है कि जब कलियुग का आगमन हुआ तो भगवान विष्णु मंदिर में चले गये। यह मंदिर वर्ष भर खुला रहता है। वृद्घ बद्री को आदि शंकराचार्य जी की मुख्य गद्दी माना जाता है।
श्री आदि बद्री
कर्ण प्रयाग-रानी खेत मार्ग पर कर्ण प्रयाग से 18 कि.मी. दूर स्थित है। आदि बद्री को अन्य चार बद्रियों का पिता कहा जाता है। यहां 16 छोटे मंदिरों का समूह है। ऐसा विश्वास किया जाता है कि इन मंदिरों के निर्माण की स्वीकृति गुप्तकाल में आदि शंकराचार्य ने दी थी जो कि हिन्दू आदर्शो के प्रचार-प्रसार को देश के कोने-कोने में करने के लिए उद्दत थे।