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नर से नारायण बनने का मार्ग : एकात्म मानवदर्शन

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नर से नारायण बनने का मार्ग बताता है एकात्म मानवदर्शन साभार:: पाञ्चजन्य              साकेन्द्र प्रताप वर्मा प्रख्यात चिंतक और विचारक पं. दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि स्वतंत्रता के पश्चात देश की दिशा को लेकर कोई स्पष्टता नहीं रही। स्वतंत्र भारत की गतिविधियों पर लगभग 18 वर्ष तक उन्होंने गहन चिंतन किया। उससे निकली भावधारा एकात्म मानव  दर्शन या एकात्म मानववाद के रूप में सामने आई। इस दर्शन की जड़ें हिन्दुस्थान में समाहित हैं तथा यह समाज के समस्त मानवों के लिए आत्मगौरव से परिपूर्ण, आत्मीयतायुक्त, सत्य के धरातल पर स्थापित कर्ता-बोध का संदेश है। भारत का यह दुर्भाग्य ही था कि इस चिंतन के जनक, इस चिंतन को प्रस्तुत करने के मात्र तीन वर्ष बाद 11 फरवरी, 1968 को चिंतन से घबराये लोगों की साजिश का शिकार बन गए। दीनदयाल जी ने कहा था कि हमने अपनी प्राचीन संस्कृति का विचार किया है, परन्तु हम कोई पुरातत्ववेत्ता नहीं हैं जो किसी पुरातत्व संग्रहालय के संरक्षक बनकर बैठ जाएं। हमारा ध्येय संस्कृति का संरक्षण नहीं है, अपितु उसे गति देकर सजीव व सक्षम बनाना है। हमको अनेक रूढ़ियां छोड़कर सुधार करन

एक हिन्दू देश में : गौमांस भक्षण हिन्दुंओं का अपमान और घोर साम्प्रदायिकता है

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गौमांस भक्षण रूकने से क्या बिगड़ जाएगा ? प्रवीण गुगनानी साभार :: न्यूज़ भारती सम्पूर्ण भारत में दादरी की धूम है। नेता दादरी के पहाड़े पढ़ रहे हैं तो उनके चमचे दादरी की गिनती को अनगिनत तक गिने जा रहे हैं। धर्मनिरपेक्षता की मोक्ष भूमि बन गया है दादरी। दु:ख तो सभी को है, सम्पूर्ण भारत को है। अंततः हमारे संस्कार और हमारा देश “सर्वे भवन्तु सुखिन:” की सतत कामना करनेवाला राष्ट्र सदियों से रहा है और इस धर्मनिरपेक्ष जैसे अशब्द के पापपूर्ण अविष्कार से तो हजारों वर्ष पूर्व से रहा है। गौमांस भक्षण से उत्पन्न होनेवाली समस्याओं का विश्लेषण करें तो हमें मुस्लिम समाज द्वारा किये जा रहे गौमांस भक्षण के इतिहास को भी समझ लेना चाहिए। उल्लेखनीय और चिंतनीय विषय है कि मुस्लिम समाज के लगभग नौ सौ वर्षों के इतिहास में प्रारम्भ के सात सौ वर्षों में मुस्लिमों द्वारा कभी भी गौमांस खाने के तथ्य नहीं मिलते हैं। इतिहास में कभी भी गौमांस मुस्लिम समाज के पूर्वजों का भोजन नहीं रहा है। मध्य और पश्चिम एशिया में जहां के मुस्लिम मूल निवासी कहलाते हैं या जहां मुस्लिम समाज का सर्वप्रथम उद्भव हुआ, वहां गाय नामक प्राणी

आखिर कहाँ गया जयगढ़ किले का खजाना ?

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आखिर कहाँ  गया जयगढ़ किले का खजाना_____________________ कुंवर लवपाल् सिंह (09320854858) न्यू मुम्बई । अक्सर सुनने को मिलता है कि आपातकाल में भारत सरकार ने जयपुर के पूर्व राजघराने पर छापे मारकर उनका खजाना जब्त किया था, राजस्थान में यह खबर आम है कि - चूँकि जयपुर की महारानी गायत्री देवी कांग्रेस व इंदिरा गांधी की विरोधी थी अत: आपातकाल में देश की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने जयपुर राजपरिवार के सभी परिसरों पर छापे की कार्यवाही करवाई, जिनमें जयगढ़ का किला प्रमुख था, कहते कि राजा मानसिंह की अकबर के साथ संधि थी (जो की मन घंडन्त और सच्चाई से परे बाते हे, जिसका कोई भी प्रमाण मूल ऐतिहासिक बुक में नहीं हे पर अबुल फजल और कर्नल टॉड ने ऐसा ही लिखा हे., अंदेशा हे की ये सब राजपूतो को आपस में लड़वाने के लिए भ्रान्ति मात्र हे.)... राजा मानसिंह अकबर के सेनापति के रूप में जहाँ कहीं आक्रमण कर जीत हासिल करेंगे उस राज्य पर राज अकबर होगा और उस राज्य के खजाने में मिला धन राजा मानसिंह का होगा| इसी कहानी के अनुसार राजा मानसिंह ने अफगानिस्तान सहित कई राज्यों पर जीत हासिल कर वहां से ढेर सारा धन प्राप्त किया