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हमारा देश : जम्बू दीपे भरत खण्डे आर्याव्रत देशांतर्गते

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तपस्तप्यन्ति यताये जुह्वते चात्र याज्विन।। दानाभि चात्र दीयन्ते परलोकार्थ मादरात्॥ 21॥ पुरुषैयज्ञ पुरुषो जम्बूद्वीपे सदेज्यते।। यज्ञोर्यज्ञमयोविष्णु रम्य द्वीपेसु चान्यथा॥ 22॥ अत्रापि भारतश्रेष्ठ जम्बूद्वीपे महामुने।। यतो कर्म भूरेषा यधाऽन्या भोग भूमयः॥23॥ जम्बू दीपे भरत खण्डे  Acharya Bal Krishna क्या आप जानते हैं कि....... ....... हमारे प्राचीन महादेश का नाम “भारतवर्ष” कैसे पड़ा....????? साथ ही क्या आप जानते हैं कि....... हमारे प्राचीन हमारे महादेश का नाम ....."जम्बूदीप" था....????? परन्तु..... क्या आप सच में जानते हैं जानते हैं कि..... हमारे महादेश को ""जम्बूदीप"" क्यों कहा जाता है ... और, इसका मतलब क्या होता है .....?????? दरअसल..... हमारे लिए यह जानना बहुत ही आवश्यक है कि ...... भारतवर्ष का नाम भारतवर्ष कैसे पड़ा.........???? क्योंकि.... एक सामान्य जनधारणा है कि ........महाभारत एक कुरूवंश में राजा दुष्यंत और उनकी पत्नी शकुंतला के प्रतापी पुत्र ......... भरत के नाम पर इस देश का नाम "भारतवर्ष" पड़ा...... परन्तु इ

अखंड भारत का परिदृश्य संभव हैं : प्रोफेसर सदानंद सप्रे

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  परिस्तिथि निर्माण से परिवर्तन सम्भव -  प्रोफेसर सदानंद सप्रे प्रोफेसर सदानंद सप्रे उध्बोधन देते हुए    जोधपुर ८ अगस्त २०१५। १५ अगस्त को विभाजन के प्रति वेदना मन में है। राष्ट्र स्वाधीन हुआ किन्तु दुर्भाग्यवश विभाजन भी हुआ , विभाजन मजहब आधारित हुआ जो षड्यंत्र का परिणाम था।  मुस्लिम मूलतः राष्ट्रवादी थे मजहब के नाम पर षड्यंत्र पूर्वक अलगाव पैदा कर अलगाववादी बनाया गया।  क्या 1857 का वृह्द भारत या कहे अखंड भारत का परिदृश्य पुनः  है ? संभव है सम्भावना  है। उक्त विचारो को प्रकट करते हुए प्रोफेसर सदानंद सप्रे ने कहा कि परिस्थिति निर्माण से विचार व् भाव पैदा कर अखंड भारत का परिदृश्य संभव हैं।  इंस्टिट्यूट ऑफ़ इंजीनियर्स के सभागार में मरू विचार मंच द्वारा आयोजित "अखंड भारत : संकल्पना एवं चिंतन" विषयक संगोष्ठी एवं व्याख्यान में मुख्य वक्ता राष्ट्रीय  स्वयंसेवक संघ के विश्व विभाग के सह संयोजक प्रोफेसर सदानंद सप्रे ने कहा कि १८५७ के परिदृश्य के समक्ष आज का मानचित्र रखेंगे तो पता चलेगा कि केवल एक भाग ही स्वाधीन हुआ है।   1857 के स्वाधीनता संग्राम का दृश्य व् इ