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विजयादशमी - परंपरा शक्ति पूजन की

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विजयादशमी - परंपरा शक्ति पूजन की -प्रो. योगेश चन्द्र शर्मा शक्ति की कामना और तदनुसार उसकी उपासना, आदिकाल से ही मनुष्य की सहज स्वाभाविक प्रवृत्ति रही है। प्रारंभ में शक्ति-प्राप्ति का उद्देश्य केवल शिकार करना और उससे अपना पेट भरना था। इसलिए उस आदिम काल में पत्थरों के अनगढ़ से और बेडौल सी आकृति वाले हथियार ही पर्याप्त समझे जाते थे। उदरपूर्ति के इस उद्देश्य के साथ, आत्मसुरक्षा की भावना भी सहज रूप से जुड़ी हुई थी। धीरे-धीरे इन उद्देश्यों के साथ अन्य बातें भी जुड़तीं चली गईं जैसे विरोधियों को परास्त करना, उनकी सम्पत्ति (पशु, दास आदि) छीनना तथा अपने प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाना आदि। ज्यों-ज्यों समाज का स्वरूप विकसित होता चला गया, त्यों-त्यों उसकी उलझने भी बढ़ती चली गईं और उसके साथ हथियारों का स्वरूप भी भयानक से भयानकतर बनता चला गया। पत्थरों के स्थान पर धाुत के हथियार बनने लगे। उनके आकार प्रकार में परिवर्तन हुए। बारुद के आविष्कार ने उन्हें एक नया मोड़ दिया। युद्ध का क्षेत्र जब भूमि से आगे समुद्र और आकाश तक बढ़ गया तो हथियारों की प्रहार क्षमता भी काफी बढ़ गई। आणविक शक्ति के आविष्कार

विजय का प्रतीक विजयादशमी - डॉ़0 मनमोहन वैद्य

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साधना और विजय का प्रतीक विजयादशमी - डॉ़0  मनमोहन वैद्य लेखक- रा.स्व.संघ के अ़ भा़ प्रचार प्रमुख  हैं   विजयादशमी विजय का उत्सव मनाने का पर्व है। यह असत्य पर सत्य की, अन्याय पर न्याय की, दुराचार पर सदाचार की, तमोगुण पर दैवीगुण की, दुष्टता पर सुष्टता की,भोग पर योग की, असुरत्व पर देवत्व की विजय का उत्सव है। भारतीय संस्कृति में त्योहारों की रंगीन श्रृंखला गुंथी हुई है। प्रत्येक त्यौहार किसी न किसी रूप में कोई संदेश लेकर आता है। लोग त्योहार तो हषार्ेल्लास सहित उत्साहपूर्वक मनाते हैं किंतु उसमें निहित संदेश के प्रति उदासीन रहते हैं। विजयादशमी उत्सव यानी कि दशहरा आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को भगवान श्रीराम के द्वारा दैत्यराज रावण का अंत किये जाने की प्रसन्नता व्यक्त करने के रूप में और मां दुर्गा द्वारा आतंकी महिषासुर का मर्दन करने के उपलक्ष्य में मनाया जाता है। इसके साथ इस पर्व का सन्देश क्या है इसके विषय में भी विचार करने की आज आवश्यकता है। भारतीय संस्कृति हमेशा से ही वीरता की पूजक एवं शक्ति की उपासक रही है। शक्ति के बिना विजय संभव नहीं है। इसीलिए हिन्दुओं के