कांग्रेस का असली सांप्रदायिक चेहरा


कांग्रेस का असली सांप्रदायिक चेहरा 

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रमेश पटेल लिंबाणी - Home | Facebook








हिंदू धर्म के लोग कांग्रेस से नफरत क्यों करते हैं?

मैं कांग्रेस पार्टी से नफरत क्यों करता हूं इसके लिए आप इस पोस्ट को एक बार अवश्य पढ़े। Google पर साम्प्रदायिक हिंसा बिल 2005-2011 सर्च कर डिटेल्स पढ़ें, दस सेकेंड लगेंगे,आपके पैरों के नीचे से जमींन खिसकने लगेगी। इसे सोनिया गांधी के नेतृत्व में बनाया गया था।

*"Communal violence bill"*

कांग्रेस के लिये जान फूंकने वाले हिंदुओं सुनो मैं कांग्रेस के घोर विरोधी क्यों हूं ।

"एंटोनी माइनो" की भयानक खतरनाक साजिश।

जिसे पढ़कर रोंगटे खड़े हो जायेगा।

अगर लागू हो गया होता तो मरना भी दूभर हो जाता।

जीने की बात ही छोड़ो।

तुम्हारे विनाश वाला बिल जिसे काँग्रेस ने दो बार संसद मे पेश किया। 2005 मे और फिर 2011में । कांग्रेस हिंदुओ के खिलाफ ऐसा बिल लेकर आई थी जिसको सुनकर आप कांप उठेंगे । परन्तु भाजपा के जबरदस्त विरोध के कारण वह पास नहीं करवा सकी । मुझे यकीन है कि 90% हिन्दुओ को तो अपने खिलाफ आये इस बिल के बारे में कुछ पता भी नहीं होगा जिसमें शिक्षित हिंदू भी शामिल है क्योंकि हिंदू सम्पत्ति जुटाने में लगा है उसको इस सब बातों को जानने के लिए समय नहीं है । जबकि मुसलमान के अनपढ़ भी इतने जागरूक है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान में धर्म के आधार पर प्रताड़ित किये गए हिन्दू व अन्य अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को नागरिकता देने वाले CAA क़ानून के खिलाफ मुसलमान का बच्चा बच्चा उठ खड़ा हुआ । अगर काँग्रेस दुबारा सत्ता में आई तो यह बिल फिर लेकर आएगी ।

क्या है "दंगा नियंत्रण कानून"

हिंदू समाज के लिए फांसी का फंदा, कुछ एक लोगों को इस बिल के बारे में पता होगा, 2011 में इस बिल की रुप रेखा को सोनिया गाँधी की विशेष टीम ने बनाया था जिसे NAC भी कहते थे, इस टीम में दर्जन भर से ज्यादा सदस्य थे और सब वही थे जिन्हें आजकल अर्बन नक्सली कहा जाता है.. कांग्रेस का कहना था की इस बिल के जरिये वो देश में होने वाले दंगों को रोकेंगे। अब इस बिल में कई प्रावधानो पर जरा नजर डालिए :--

📌 इस बिल में प्रावधान था कि दंगों के दौरान दर्ज अल्पसंख्यक से सम्बंधित किसी भी मामले में सुनवाई कोई हिंदू जज नहीं कर सकता था ।

📌 अगर कोई अल्पसंख्यक सिर्फ यह आरोप लगा दे कि मुझसे भेदभाव किया गया है तो पुलिस को अधिकार था कि आपके पक्ष को सुने बिना आपको जेल में डालने का हक होगा और इन केसों में जज भी अल्पसंख्यक ही होगा..

📌 इस बिल में ये प्रावधान किया गया था कि कोई भी हिन्दू दंगों के दौरान हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़

के लिये अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध केस दर्ज नहीं करवा सकता ।

📌 इस बिल में प्रावधान किया गया था कि अगर कोई अल्पसंख्यक समुदाय का व्यक्ति हिन्दू पर हिंसा, आगजनी, तोड़फोड़, हत्या का आरोप लगाता है तो कोर्ट में साक्ष्य पेश करने की जिम्मेदारी उसकी नहीं है केवल मुकदमा दर्ज करवा देना ही काफ़ी है । बल्कि कोर्ट में निर्दोष साबित होने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की है जिस पर आरोप लगाया गया है ।

📌 इस बिल में ये प्रावधान किया गया था कि दंगों के दौरान अल्पसंख्यक समुदाय को हुए किसी भी प्रकार के नुकसान के लिए बहुसंख्यक को जिम्मेदार मानते हुए अल्पसंख्यक समुदाय के नुकसान की भरपाई हिंदू से की जाए । जबकि बहुसंख्यक के नुकसान के लिए अल्पसंख्यक को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता था ।

📌 अगर आपके घर में कोई कमरा खाली है और कोई मुस्लिम आपके घर आता है उसे किराए पर मांगने के लिए तो तो आप उसे कमरा देने से इंकार नहीं कर सकते थे क्योंकि उसे बस इतना ही कहना था कि आपने उसे मुसलमान होने की वजह से कमरा देने से मना कर दिया यानि आपकी बहन बेटी को छेड़ने वाले किसी अल्पसंख्यक के खिलाफ भी हम कुछ नहीं कर सकते थे। मतलब कि अगर कोई छेड़े तो छेड़ते रहने दो वर्ना वो आपके खिलाफ कुछ भी आरोप लगा देता….. आपकी सीधी गिरफ़्तारी और ऊपर से जज भी अल्पसंख्यक..

📌 देश के किसी भी हिस्से में दंगा होता, चाहे वो मुस्लिम बहुल इलाका ही क्यों न हो, दंगा चाहे कोई भी शुरू करता पर दंगे के लिए उस इलाके के वयस्क हिन्दू पुरुषों को ही दोषी माना जाता और उनके खिलाफ केस दर्ज कर जांचें शुरू होती। और इस स्थिति में भी जज केवल अल्पसंख्यक ही होता ऐसे किसी भी दंगे में चाहे किसी ने भी शुरू किया हो..

📌अगर दंगों वाले इलाके में किसी भी हिन्दू बच्ची या हिन्दू महिला का रेप होता तो उसे रेप ही नहीं माना जाता । बहुसंख्यक है हिन्दू इसलिए उसकी महिला का रेप रेप नहीं माना जायेगा और इतना ही नहीं कोई हिन्दू महिला बलात्कार की पीड़ित हो जाती और वो शिकायत करने जाती तो अल्पसंख्यक के खिलाफ नफरत फ़ैलाने का केस उस पर अलग से डाला जाता..

📌 इस एक्ट में एक और प्रस्ताव था जिसके तहत आपको पुलिस पकड़ कर ले जाती अगर आप पूछते की आपने अपराध क्या किया है तो पुलिस कहती की तुमने अल्पसंख्यक के खिलाफ अपराध किया है, तो आप पूछते की उस अल्पसंख्यक का नाम तो बताओ, तो पुलिस कहती – नहीं शिकायतकर्ता का नाम गुप्त रखा जायेगा..

📌 कांग्रेस के दंगा नियंत्रण कानून में ये भी प्रावधान था की कोई भी इलाका हो बहुसंख्यको को अपने किसी भी धार्मिक कार्यक्रम से पहले वहां के अल्पसंख्यकों का NOC लेना जरुरी होता यानि उन्हें कार्यक्रम से कोई समस्या तो नहीं है । ऐसे हालात में अल्पसंख्यक बैठे बैठे जजिया कमाते क्यूंकि आपको कोई भी धार्मिक काम से पहले उनकी NOC लेनी होती, और वो आपसे पैसे की वसूली करते और आप शिकायत करते तो भेदभाव का केस आप पर और ऐसे हालात में जज भी अल्पसंख्यक..

📌 और भी अनेको प्रावधान थे कांग्रेस के इस दंगा नियंत्रण कानून में जिसे अंग्रेजी में # Communal Violence Bill भी कहते है..

सुब्रमण्यम स्वामी ने इस बिल का सबसे पहले विरोध शुरू किया था और उन्होंने इस बिल के बारे में लोगों को जब बताया था तो 2012 में हिन्दू काँप उठे थे तभी से कांग्रेस के खिलाफ हिन्दुओं ने एकजुट होना शुरू कर दिया था। सुब्रमण्यम स्वामी का पूरा लेक्चर इस

"Communal Violence Bill" पर आज भी मौजूद है, 45 मिनट से ज्यादा का है। आप चाहे तो यू टयूब पर सर्च कर लें, और अच्छे से सुन लें..

अब इस के बाद भी जो हिन्दू कांग्रेस को support करता है वे जाने अनजाने अपने ही लोगो के लिए नरक का द्वार खोल रहे हो इसे जानो,

नोट -- इस सन्देश को जरूर शेयर करें।
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Hindi News

सांप्रदायिक हिंसा बिल आज संसद में!
नवभारत टाइम्स
Updated: 17 Dec 2013, 

नरेंद्र मोदी के जोरदार विरोध के बाद सरकार ने बिल के कुछ प्रावधानों में बदलावों को स्वीकार किया है। अब इसे कम्युनिटी न्यूट्रल बनाया गया है...
विशेष संवाददाता, नई दिल्ली

प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में सोमवार को हुई कैबिनेट कमिटी की मीटिंग में सांप्रदायिक हिंसा रोकने के विधेयक को मंजूरी दी गई। इसे मंगलवार को लोकसभा में पेश किया जा सकता है। बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी के जोरदार विरोध के बाद सरकार ने बिल के कुछ प्रावधानों में बदलावों को स्वीकार कर लिया है। अब इसे कम्युनिटी न्यूट्रल यानी समुदायों के प्रति तटस्थ बनाया गया है। पहले प्रस्ताव था कि प्रभावित इलाके में बहुसंख्यक समुदाय को ही हिंसा का जिम्मेदार माना जाएगा। हिंसा से निपटने में विधायिका की भूमिका को भी कम कर दिया गया है। हिंसा की स्थिति में केंद्र के सीधे दखल के प्रस्ताव को नरम बना दिया गया है। अब राज्य चाहे तो हालात से निपटने के लिए सेना आदि की मांग केंद्र से कर सकेगा।

प्रस्तावित विधेयक में ये कहा गया था

- प्रिवेंशन ऑफ कम्यूनल वॉयलेंस (एक्सेस टु जस्टिस ऐंड रिप्रेजेंटेशंस) बिल 2013 का मकसद केंद्र, राज्य और उनके अधिकारियों को सांप्रदायिक हिंसा को ट्रांसपेरेंसी के साथ रोकने के लिए जिम्मेदार बनाना है। इस कानून के तहत केंद्र और राज्य सरकारों को जिम्मेदारी दी गई है कि वे शेड्यूल्ड कास्ट, शेड्यूल्ड ट्राइब्स, धार्मिक और भाषाई अल्पसंख्यकों को निशाना बनाकर की गई हिंसा को रोकने, नियंत्रित करने के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल करें।

- कोई भी व्यक्ति जो अकेले, किसी संस्था का हिस्सा बनकर या किसी संस्था के प्रभाव में किसी खास धार्मिक या भाषाई पहचान वाले 'ग्रुप' के खिलाफ गैरकानूनी ढंग से हिंसा, धमकी या यौन उत्पीड़न में शामिल होता है तो वह संगठित सांप्रदायिक हिंसा का आरोपी होगा। बिल में ग्रुप की जो परिभाषा दी गई है, उसका मतलब धार्मिक या भाषाई तौर पर अल्पसंख्यकों से है। इस कानून के जरिए हेट प्रोपेगैंडा, कम्युनल वॉयलेंस के लिए फंडिंग, उत्पीड़न और पब्लिक सर्वेंट्स द्वारा ड्यूटी को न निभाना भी अपराध की श्रेणी में लाया गया है।

- ब्यूरोक्रेट्स और पब्लिक सर्वेंट्स के दंगों से निपटने के दौरान चूक के प्रति उन्हें जवाबदेह बनाया गया है। दंगों को कंट्रोल करने या रोकने में नाकाम रहने पर एफआईआर दर्ज की जा सकती है। अधिकारियों द्वारा एक खास धार्मिक या भाषाई पहचान वाले ग्रुप के खिलाफ जानबूझकर पीड़ा पहुंचाए जाने की स्थिति में जुर्माने का प्रावधान भी है। जूनियरों, सहयोगियों द्वारा दंगों को रोकने में नाकामी की स्थिति में या फोर्सेज को ठीक ढंग से सुपरवाइज न करने की स्थिति में सीनियर अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की गई है।

- संगठित सांप्रदायिक हिंसा के लिए उम्रकैद, जबकि नफरत भरा प्रचार फैलाने के लिए 3 साल तक की सजा या जुर्माना या दोनों का प्रावधान है। ड्यूटी ठीक से न निभाने के लिए 2 से 5 साल तक की कैद और आदेश के उल्लंघन की दशा में 10 साल तक की सजा तय की गई है। मृत शख्स के करीबियों को 7 लाख रुपये का मुआवजा का प्रवधान।

इसलिए हो रहा था विरोध

- इस बिल के प्रावधानों को लेकर बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों को चिट्ठी लिख चुके हैं। यूपीए को समर्थन देने वाली पार्टियां एसपी और बीएसपी भी इससे राज्यों के अधिकार में दखल पड़ने का अंदेशा जता चुकी हैं। तृणमूल कांग्रेस, तमिलनाडु की एआईएडीएमके और ओडिशा की बीजेडी ने भी इस तरह की शंका जताई थी।

- बीजेपी ने बिल के ओरिजिनिल ड्रॉफ्ट पर सवाल उठाते हुए कहा था कि यह बिल बहुसंख्यक समाज के खिलाफ है और राज्यों की शक्तियों में दखल देने वाला है। पार्टी के मुताबिक, केंद्र उन मुद्दों पर कानून बना रहा है जो राज्य के अधिकारों की जद में आता है। सांप्रदायिक हिंसा को कानून-व्यवस्था का मामला माना जाता है, जो राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है।

- मोदी का कहना था कि यह बिल धार्मिक और भाषाई आधार पर समाज को बांटने वाला है क्योंकि इससे धार्मिक और भाषाई पहचान हमारे समाज में मजबूत हो चलेगी और आसानी से हिंसा के साधारण घटना को भी सांप्रदायिक रंग दिया जा सकेगा। यह कानून धार्मिक और भाषाई पहचान वाले नागरिकों के लिए आपराधिक कानूनों को अलग-अलग ढंग से अप्लाई करने का मौका दे सकता है।

- बिल के ब्रीच ऑफ कमांड रिस्पॉन्सिबिलिटी के प्रावधान के मुताबिक, एक पब्लिक सर्वेंट को उसके मातहतों की नाकामी के लिए सजा का प्रावधान है। बीजेपी का कहना था कि इसकी वजह से सीनियर अधिकारी आपराधिक उत्तरदायित्व के डर से दखल देने से दूरी बनाए रखेंगे और जूनियरों को फील्ड में अपनी हालत पर छोड़ देंगे। साथ ही अधिकारियों को राजनीतिक तौर पर निशाना बनाए जाने की कोशिशों को बल मिलेगा।

- दंगों के पीड़ित अल्पसंख्यक समूह धार्मिक, भाषायी और सांस्कृतिक किसी भी प्रकार के हो सकते हैं। इसके तहत अनुसूचित जाति-जनजाति समूहों की रक्षा के उपाय भी हैं। देखा जाए तो सैद्धांतिक रूप में जहां हिंदू अल्पसंख्यक होंगे, वहां उन्हें इस कानून का लाभ मिलेगा, लेकिन उन इलाकों में जहां अन्य समुदाय और इनका अंतर ज्यादा नहीं है, किस तरह से कार्रवाई होगी, यह स्पष्ट नहीं है।

- एक से अधिक अल्पसंख्यक 'समूहों' के बीच टकराव की स्थिति में क्या होगा, इस बारे में बिल कोई साफ तौर पर नजरिया पेश नहीं करता। बीजेपी इस बिल को लेकर प्रमुख तौर पर दलील दे रही है कि इस बिल से ऐसा इंप्रेशन पड़ेगा कि सांप्रदायिक हिंसा केवल बहुसंख्यक वर्ग ही करता है।

- बिल की धारा-6 में साफ किया गया है कि इसके अंतर्गत एससी, एसटी के खिलाफ हुआ अपराध उन अपराधों के अलावा है जो अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन आते हैं। बिल के विरोधियों का कहना है कि क्या एक ही अपराध के लिए दो बार सजा दी जा सकती है?

- कुछ आलोचकों का कहना है कि धारा 7 के मुताबिक, दंगों के हालत में अगर बहुसंख्यक समुदाय से जुड़ी महिला के साथ अगर रेप होता है तो यह इस बिल के तहत अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा क्योंकि बहुसंख्यक महिला 'ग्रुप' की डेफिनिशन में नहीं आएगी।
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साभार - 

सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण अधिनियम

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से



सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा निवारण विधेयक भारत का 2011 में कांग्रेस सरकार द्वारा लाया गया एक विधेयक था जो की पूरी होने की प्रक्रिया में थी। इस अधिनियम का प्रारूप संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की अध्यक्षा श्रीमती सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के द्वारा तैयार किया गया

प्रमुख राजनैतिक दल भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना आल इण्डिया आन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) तथा तृणमूल कांग्रेस सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद् जैसे कई सामाजिक संगठन इस विधेयक का इस आधार पर विरोध कर रहे थे की यह अधिनियम केवल अल्पसंख्यकों को सुरक्षा प्रदान करता है परन्तु अल्पसंख्यकों के आक्रमण से पीड़ित बहुसंख्यकों को यह अधिनियम कोई सुरक्षा प्रदान नहीं करता है। इस प्रकार यह अधिनियम मुस्लिमों के हाथों में हिन्दुओं के विरुद्ध एक शस्त्र के भाँती कार्य करेगा तथा यह भारत के संघीय ढांचे के लिए हानिकारक सिद्ध होगा। ऐसा सोचना था भारतीय जनता पार्टी, शिवसेना आल इण्डिया आन्ना द्रविड़ मुनेत्र कषगम (AIADMK) तथा तृणमूल कांग्रेस सहित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, विश्व हिन्दू परिषद् जैसे कई दलों का।


अनुक्रम
1 इतिहास
2 अधिनियम
3 समूह की परिभाषा
4 अनुसूचित जाति जनजाति सम्बंधित अपराध
5 यौन सम्बन्धी अपराध
6 घृणा संबंधी प्रचार
7 यातना दिये जाने संबंधी अपराध
8 सरकारी कर्मचारी को दंड
9 सशस्त्र सेना अथवा सुरक्षा बल
10 प्रत्यायोजित दायित्व का सिद्धांत
11 अधिनियम निर्मात्री समिति
11.1 प्रारूप बनाने वाली समिति के सदस्य
11.2 सलाहकार समिति के सदस्य
12 केंद्र-राज्य के रिश्ते
13 वैधानिक चुनौतियाँ


इतिहास
इस विधेयक को सर्वप्रथम मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार ने 2005 में लागू करने का प्रयास किया था परन्तु भारी विरोध को देखते हुए सरकार ने इसे वापस ले लिया था। 2011 में पुनः सरकार इस विधेयक को कुछ संशोधनों के साथ लाया गया था जिसके अंतर्गत अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लोगों को भी इस विधेयक के अंतर्गत लाया गया था। परन्तु इस विधेयक के विरोधियों का कहना था कि यदि कोई सांप्रदायिक हिंसा मुस्लिमों और अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजातियों के मध्य होती, तो उस स्थिति में यह विधेयक मुस्लिमों का साथ देता और इस प्रकार दलितों की रक्षा के लिए बना हुआ दलित एक्ट भी अप्रभावी हो जाता।

अधिनियम
राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (एनएसी) ने 14 जुलाई 2010 को सांप्रदायिकता विरोधी बिल का खाका तैयार करने के लिए एक प्रारूप समिति का गठन किया था और 28 अप्रैल 2011 की एनएसी बैठक के बाद नौ अध्यायों और 138 धाराओं में तैयार हिंदी में अनूदित किया और अभी तक की संभावित योजनाओ के अनुसार सरकार इसे 2011 के शीतकालीन सत्र में लाने की योजना पर कार्य कर रही थी। इस अधिनियम की सबसे अधिक विवादस्पद बात ये थी कि इस विधेयक में यह बात पहले से ही मान ली गयी थी कि हिंसक केवल बहुसंख्यक होते हैं। अल्पसंख्यक नहीं हैं।

समूह की परिभाषा
विधेयक का सबसे महत्वपूर्ण पहलू था 'समूह की परिभाषा। समूह से तात्पर्य पंथिक या भाषायी अल्पसंख्यकों से थी, जिसमें उस वक़्त की स्थितियों के अनुरूप अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों को भी शामिल किया जा सकता था। पूरे विधेयक में सबसे ज्यादा आपत्ति इसी बिंदु पर रही कि इसमें बहुसंख्यक समुदाय को समूह की भाषा से बाहर रखा गया था।

अनुसूचित जाति जनजाति सम्बंधित अपराध
खंड 6 में यह स्पष्ट किया गया था कि इस विधेयक के अन्तर्गत अपराध उन अपराधों के अलावा होगी जो अनुसूचित जाति एवं जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के अधीन आते हैं। इस विधेयक के विरोधी यह प्रश्न पूछ रहे थे कि क्या किसी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए दो बार दंडित किया जा सकता है?

यौन सम्बन्धी अपराध[संपादित करें]
खंड 7 में निर्धारित किया गया है कि किसी व्यक्ति को उन हालात में यौन संबंधी अपराध के लिए दोषी माना जायेगा यदि वह किसी 'समूह से संबंध रखने वाले व्यक्ति के, जो उस समूह का सदस्य है, विरूद्ध कोई यौन अपराध करता है। परन्तु यदि पीड़ित उस समूह का सदस्य नहीं है तो यह अपराध नहीं माना जायेगा| इसका सीधा प्रभाव यह पड़ेगा की यदि सांप्रदायिक दंगों की स्थिति में किसी हिन्दू महिला के साथ कोई यौन अप्रध्य बलात्कार होता है तो यह अपराध की श्रेणी में नहीं आएगा क्यूँकि वह हिन्दू महिला समूह की परिभाषा के अंतर्गत नहीं आती होगी।

घृणा संबंधी प्रचार[संपादित करें]
खंड 8 में यह निर्धारित किया गया है कि 'घृणा संबंधी प्रचार उन हालात में अपराध माना जायेगा जब कोई व्यक्ति मौखिक तौर पर या लिखित तौर पर या स्पष्टतया अम्यावेदन करके किसी 'समूह आव किसी 'समूह से संबंध रखने वाले व्यक्ति के विरूद्ध घृणा फैलाता है। पुनश्च समूह द्वारा बहुसंख्यकों के विरुद्ध घृणा फैलाने की स्थिति में यह विधेयक मौन है।

यातना दिये जाने संबंधी अपराध
यातना दिये जाने संबंधी अपराध का वर्णन खंड 12 में किया गया है, जिसमें कोई सरकारी कर्मचारी किसी 'समूह से संबंध रखने वाले व्यक्ति को पीड़ा पहुंचाता है या मानसिक अथवा शारीरिक चोट पहुचाता है। विरोधियों का कहना है कि यदि कोई अल्पसंख्यक किसी बहुसंख्यक को पीड़ा पहुंचाता है या मानसिक अथवा शारीरिक चोट पहुचाता हैतो उस सम्बन्ध में इस विधेयक का मौन रहना आपत्तिजनक है।

सरकारी कर्मचारी को दंड
खंड 13 में किसी सरकारी व्यक्ति को इस विधेयक में उल्लिखित अपराधों के संबंध में अपनी ड्यूटी निभाने में ढिलाई बरतने के लिये दंडित किये जाने का प्रावधान है।

सशस्त्र सेना अथवा सुरक्षा बल
खंड 14 में इन सरकारी व्यक्तियों को दंड देने का प्रावधान है जो सशस्त्र सेनाओं अथवा सुरक्षा बलों पर नियंत्रण रखते हैं। और अपनी कमान के लोगों पर कारगर ढंग से अपनी ड्यूटी निभाने हेतु नियंत्रण रखने में असफल रहते हैं।। इस खंड का इस आधार पर विरोध हो रहा है कि इससे शसस्त्र बलों ले मनोबल पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा|

प्रत्यायोजित दायित्व का सिद्धांत
खंड 15 में प्रत्यायोजित दायित्व का सिद्धांत दिया गया है। किसी संगठन का कोई वरिष्ठ व्यक्ति अथवा पदाधिकारी अपने अधीन अधीनस्थ कर्मचारियों पर नियंत्रण रखने में नाकामयाब रहता है, तो यह उस द्वारा किया गया एक अपराध माना जाऐगा। वह उस अपराध के लिए प्रत्यायोजित रूप से उत्तरदायी होगा जो कुछ अन्य लोगों द्वारा किया गया है। इस प्रकार अगर किसी संगठन का एक भी व्यक्ति अल्पसंख्यक समुदाय के विरुद्ध किसी अपराध में लिप्त पाया जाता है तो पूरे संगठन को दण्डित किया जा सकता है।

अधिनियम निर्मात्री समिति
इस अधिनियम का प्रारूप श्रीमती सोनिया गाँधी के नेतृत्व वाली २२ सदस्यों वाणी राष्ट्र्री सलाहकार परिषद् ने किया है। इस विधेयक के प्रारूप के बनाने वाली समिति के सदस्य निम्नलिखित हैं।

प्रारूप बनाने वाली समिति के सदस्य[संपादित करें]
गोपाल सुब्रमनियम
मजा दारूवाला
नजमी वजीरी
P.I.जोसे
प्रसाद सिरिवेल्ला
तीस्ता सीताल्वाडा
उषा रामनाथन (२० Feb २०११ तक)
वृंदा ग्रोवर (२० Feb २०११तक)
फराह नकवी
हर्ष मंदर

सलाहकार समिति के सदस्य
अबुसलेह शरफ
असगर अली इंजिनियर
गगन सेठी
H.S फुल्का
जॉन दयाल
न्यायमूर्ति होस्बेत सुरेश
कमाल फारुकी
मंज़ूर आलम
मौलाना निअज़ फारुकी
राम पुनियानी
रूपरेखा वर्मा
सौम्य उमा
शबनम हाश्मी
मारी स्कारिया
सुखदो थोरात
सैयद शहाबुद्दीन
उमा चक्रवर्ती
उपेन्द्र बक्सी

केंद्र-राज्य के रिश्ते
बिल के अनुसार 'संगठित सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा का होना भारत के संविधान के अनुच्छेद ३५५ के अर्थ के अंतर्गत आंतरिक अशांति गठित करेगा और केंद सरकार इसके अधीन उल्लिखित कर्तव्यों के अनुसार ऐसे उपाय कर सकेगी जो मामले की प्रकृति और परिस्थितियों के संबंध में इस प्रकार अपेक्षित हो। इसी आधार पर दिल्ली में हुई मुख्यमंत्रियों की बैठक में अधिकांश गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्रियों ने इस विधेयक का यह कह कर विरोध किया है कि इसका राजनैतिक दुरूपयोग हो सकता है।

वैधानिक चुनौतियाँ
राजनैतिक दल जनता पार्टी के अध्यक्ष डॉ॰ सुब्रमनियम स्वामी ने दिल्ली पुलिस में २४ अक्टूबर २०११ को एक प्रथिमिकी दर्ज करवाई है जिसमे सोनिया गाँधी एवं राष्ट्रीय सलाहकार परिषद् के विरुद्ध जिसमे आरोप लगाया गया है कि सांप्रदायिक और लक्ष्यित हिंसा निवारण विधेयक बनाकर भारत के धर्मनिरपेक्ष ढांचे को क्षति पहुचाने का प्रयास किया गया है तथा हिन्दुओं और मुस्लिमों में मध्य सांप्रदायिक सौहार्द को समाप्त करने का प्रयास किया गया है। डॉ॰ सुब्रमनियम स्वामी ने यह भी कहा है कि कार्यवाई न होने की स्थिति में वो उच्च न्यायलय भी जायेंगे।


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