संदेश

जून 29, 2021 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत - अरविन्द सीसौदिया

चित्र
 26 जून: आपातकाल दिवस के अवसर पर याद रहे, लोकतंत्र की रक्षा का महाव्रत - अरविन्द सीसौदिया      मदर इण्डिया नामक फिल्म के एक गीत ने बड़ी धूम मचाई थीः दुख भरे दिन बीते रे भईया, अब सुख आयो रे, रंग जीवन में नया छायो रे!     सचमुच 1947 की आजादी ने भारत को लोकतंत्र का सुख दिया था। अंग्रेजों के शोषण और अपमान की यातना से मातृभूमि मुक्त हुई थी, मगर इसमें ग्रहण तब लग गया जब भारत की सबसे सशक्त प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगा दिया, तानाशाही का शासन लागू हो गया और संविधान और कानून को खूंटी पर टांग दिया गया। इसके पीछे मुख्य कारण साम्यवादी विचारधारा की वह छाया थी जिसमें नेहरू खानदान वास्तविक तौर पर जीता था, अर्थात साम्यवाद विपक्षहीन शासन में विश्वास करता हैं, वहां कहने को मजदूरों का राज्य भले ही कहा जाये मगर वास्तविक तौर पर येन-केन प्रकारेण जो इनकी पार्टी में आगे बढ़ गया, उसी का राज होता है। भारतीय लोकतंत्र की धर्मजय     भारत की स्वतंत्रता के साठ वर्ष होने को आये। इस देश ने गुलामी और आजादी तथा लोकतंत्र के सुख और तानाशाही के दुःख को बहुत करीब से देखा। 25 जून 1975 की रात्री के 11 बजकर 45 मिनिट स

देश की जनता को अपनी भाषा का मूल अधिकार मिले!

चित्र
    देश की जनता को अपनी भाषा का मूल अधिकार मिले! अरविन्द सीसौदिया “....एक मातृभाषा को जानने वाले दो व्यक्ति अंग्रेजी में बात करें और हमारा बस चले तो उन्हे  6 महीने की जेल कर देनी चाहिए।“     - राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ” शिक्षा भारत में विदेशी पौधा नहीं है। ऐसा कोई भी देश नहीं है जहाँ ज्ञान के प्रति प्रेम का इतने प्राचीन समय में प्रारम्भ हुआ हो या जिसने इतना स्थायी और शक्तिशाली प्रभाव उत्पन्न किया हो। वैदिक युग के साधारण कवियों से लेकर आधुनिक युग के बंगाली दार्शनिक काल तक शिक्षको और विद्वानों का एक निर्विघ्न क्रम रहा है।“ - एफ. डब्ल्यू. थामस     राजभाषा हिन्दी के संदर्भ में जब भी विषय संसद में आया तब तमिलनाडु के नेताओं को आगे करके कांग्रेस सरकारों ने अंग्रेजी को बनाये रखा! इसके पीछे उनके क्या निहित स्वार्थ हैं, यह तो भगवान ही अधिक जानता होगा। मगर पहली बात तमिलनाडू को हिन्दी के विरोध का क्या अधिकार था और अंग्रेजी से क्या मीठा है, यह भी समझ से परे है। क्योंकि कथित रूप से तमिलनाडू के विरोध के साथ, वहां की आम जनता हो यह समझ में नहीं आता! क्योंकि आम तमिल जनता को अंग्रेजी और हिन्दी एक बराबर

जब नेता बेईमान हो जाता है.......! (कविता....)

चित्र
 जब नेता बेईमान हो जाता है.......! (कविता....) Arvind Sisodia    जब नेता बेईमान हो जाता है.......! अरविन्द सीसौदिया, राष्ट्रवाद के प्रखर प्रवक्ता, इनके लेख अक्सर आप पढते रहते हैं, आपातकाल की स्थिति - परिस्थिति पर व्यंग्य करती हुई एक ओजस्वी कविता..... जब नेता बेईमान हो जाता है, नीति मर जाती है, न्याय मर जाता है, जिधर देखो उधर शैतान नजर आता है, विश्वास में विष, आशीर्वाद में आघात, हमदर्दी में दुखः-दर्द, मिठास में मधुमेह, पावनता में महापतन और..., ईमान में महाबेईमान घटित हो जाता है।     (1) भगवान भी जिसके भय से कांपने लगता है, राष्ट्रधर्म प्राण बचाकर भागने लगता है, सूरज भी पश्चिम से उगता है यारों, जब राजसिंहासन बेईमान हो जाता है...! लोगों, जीवन नर्क बन जाता है बातों की नकाबों में, इन शैतानों में, सम्पत्ति की होड़ - धनलूट की दौड़ , बीस साल पहले, जिस पर कोड़ी भी नहीं थी यारों, वह करोपतियों में भी सिरमौर नजर आता है।     (2) गले में महानता के उसूल टांगे, वाणी में संतों की सम्प्रभुता की बांगें, जो मिले उसे लूट लेना हैं मकशद, अपनी तो हवस मिट ही जायेगी, असल इंतजाम तो, अगली अस्सी पीढ़ी का कर जाना है या