कविता - सत्य सनातन सभ्यता है नाम मेरा

कविता : सत्य सनातन सभ्यता है नाम मेरा

प्रथम चेतना के अधिष्ठाता,सत्य सनातन सभ्यता है नाम मेरा,
ज्ञान–विज्ञान के अनुसंधान का, प्रारंभ ही प्रारब्ध है मेरा।
हम विशुद्ध ज्ञान के ज्ञाता, सत्य की अमर पिपासा,
सदैव के अस्तित्व की शौर्य-गाथा, नूतन की नित्य अभिलाषा।
प्रथम चेतना के अधिष्ठाता, सत्य सनातन सभ्यता है नाम मेरा।
(1)
कैलाश कोई आसान नहीं, गंगा कोई सामान्य नहीं,
त्रिदेवों से त्रिकाल तक, जिसका बोध है असाधारण सही।
धर्म धारण कर सत्य खोजता, युग-युग से अविचल हूँ,
मैं सनातन हूँ, मैं सनातन हूँ— नित्य नवीन, नित्य नूतन हूँ।
(2)
प्रथम चेतना के अधिष्ठाता, सनातन सभ्यता है नाम मेरा,
ज्ञान–विज्ञान के अनुसंधान का, प्रारंभ ही प्रारब्ध है मेरा।
ऋषि-दृष्टि में प्रश्न जगे, अनुभव से उत्तर आकार लिए,
श्रुति में ब्रह्म स्वयं बोला, स्मृति ने काल से सार खोला ।
(3)
हम विशुद्ध ज्ञान के ज्ञाता, सत्य की अनंत पिपासा,
न जड़ में विश्वास हमारा, न मिथ्या में कोई आशा।
वेदों में नाद बना चेतन, उपनिषद् में मौन विचार,
जहाँ आत्मा ही प्रयोगशाला, जीवन स्वयं प्रमाण-सार।
(4)
सदैव के अस्तित्व की शौर्य-गाथा, नूतन की अभिलाषा,
क्षण में सृष्टि को स्वीकारा, प्रलय में भी अविनाशा।
युग बदले, पर धारा न रुकी, न झुकी, न थमी कहीं,
सनातन वह दीप निरंतर, जो हर अंधकार में स्वयं जली।
(5)
न हम केवल परंपरा हैं, न स्मृतियों का जड़ बोझ,
हम प्रश्न उठाने का साहस हैं, उत्तर पाने की खोज।
सहिष्णुता हमारा स्वभाव, समन्वय हमारा धर्म,
विविधता में एकता ही है, हमारे अस्तित्व का मर्म।
(6)
कैलाश शिला में तप बनकर, गंगा जल में करुणा धार,
एक स्थिर में समाधि बोली, एक प्रवाह में जीवन-सार।
योग में देह को साधा, ध्यान में चेतन का विस्तार,
जहाँ विज्ञान ठहर जाता है, वहीं से जन्मे हैँ विचार।
(7)
प्रथम चेतना के अधिष्ठाता, सनातन सभ्यता है नाम मेरा,
काल मेरा साक्षी है सदा, भविष्य भी अधिकार मेरा।
मैं न बीता, न केवल वर्तमान, न सीमाओं में बंधा,
मैं सत्य हूँ, मैं खोज हूँ—vमैं ही मानवता का पथ प्रदा।

=== समाप्त === 






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