कांग्रेस और राहुल गाँधी के चीन में हुए समझौते पर संसद में चर्चा एवं जांच हो, इससे भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है – अरविन्द सिसोदिया

कांग्रेस और राहुल गाँधी के चीन में हुए समझौते पर संसद में चर्चा एवं जांच हो, इससे भारत की सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा हो सकता है – अरविन्द सिसोदिया
कोटा, 8 फरवरी। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी अरविंद सिसोदिया ने लोकसभा में हाल ही में हुए दुर्भाग्यापूर्ण घटनाक्रम पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा कि " संसद में किया गया सुनियोजित हंगामा, अव्यवस्थित गतिविधियाँ, भ्रामक नारेबाज़ी तथा प्रधानमंत्री की कुर्सी को संसदीय मर्यादा भंग करते हुए घेरे में लेना, संसदीय परंपराओं के विपरीत है और लोकतंत्र की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाला कृत्य है।"

सिसोदिया ने कहा कि " संसद देश की सर्वोच्च लोकतांत्रिक एवं संवैधानिक संस्था है, जिसे जनता अपने मताधिकार से गठित करती है। यह वह मंच है जहाँ देश के नियम, कानून और व्यवस्था से जुड़े विषयों पर गंभीर चर्चा और समाधान होता है। विपक्ष का दायित्व है कि वह तथ्यों और तर्कों के आधार पर अपनी बात सदन में रखे, न कि सुनियोजित ढंग से कार्यवाहीयां बाधित कर लोकतांत्रिक व्यवस्था को विफल करे। "

उन्होंने कहा कि " यह तथ्य कथित माध्यमों से सर्वविदित है कि वर्ष 2008 में कांग्रेस पार्टी और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के बीच एक समझौता चीन में हुआ था, जिसके चित्र विभिन्न माध्यमों में गूगल आदि पर उपलब्ध रहे हैं। ऐसे में इस विषय पर संसद और संसद के बाहर खुली, पारदर्शी और तथ्यात्मक चर्चा होना अत्यंत आवश्यक है। देश यह जानना चाहता है कि कांग्रेस और राहुल गाँधी ने चीन में किन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए और उनका भारत के राष्ट्रीय हितों पर क्या प्रभाव पड़ा।"

अरविंद सिसोदिया ने कहा कि " कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी को देश के सामने स्पष्ट करना चाहिए कि उस समझौते की प्रकृति क्या थी, उसके उद्देश्य क्या थे और उससे भारत की सुरक्षा एवं संप्रभुता पर कोई प्रतिकूल प्रभाव तो नहीं हो रहा है । " उन्होंने " इस विषय की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच की मांग की, ताकि संपूर्ण सत्य सामने आ सके।"

सिसोदिया ने कहा कि " भारतीय संविधान की भावना यह है कि देश की शासन व्यवस्था और निर्णय प्रक्रिया पूर्णतः राष्ट्रहित के प्रति निष्ठावान हो। यदि किसी राजनीतिक दल के विदेशी राजनीतिक संगठनों से संबंधों को लेकर प्रश्न उठते हैं, तो उनका उत्तर पारदर्शिता और जिम्मेदारी के साथ दिया जाना चाहिए।"

उन्होंने कहा कि " कांग्रेस बार-बार यह साबित कर चुकी है कि वह स्वयं को भारत की जनता के निर्णय से ऊपर समझती है। पूर्व में अपने ही राष्ट्रीय अध्यक्ष सीताराम केसरी के साथ किया गया व्यवहार इसकी तानाशाही मानसिकता का उदाहरण है। यही मानसिकता आज संसद की कार्यवाही में भी दिखाई दे रही है, जिसे देश कतई स्वीकार नहीं करता है । संसद को बाधित करना, देश की छवि धूमिल करना और विदेशी ताकतों को अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँचाना कांग्रेस की आदत बनती जा रही है।"

अंत में सिसोदिया ने कहा कि " भारत की जनता देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सम्मान से जुड़े हर विषय पर अत्यंत संवेदनशील है और पूर्ण स्पष्टता चाहती है। किसी भी राजनीतिक दल द्वारा शत्रु राष्ट्र को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से लाभ पहुँचाने जैसी संदिग्ध गतिविधियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।"

— अरविंद सिसोदिया
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल
मो. 9414180151


भारतीय संविधान का अनुच्छेद 102 संसद के सदस्यों (सांसदों) की अयोग्यता से संबंधित है। यह अनुच्छेद उन आधारों को स्पष्ट करता है जिनके तहत कोई व्यक्ति सांसद चुने जाने के लिए या सांसद बने रहने के लिए अयोग्य हो जाता है। 

अनुच्छेद 102 के तहत अयोग्यता के आधार:
अनुच्छेद 102(1) के अनुसार, कोई व्यक्ति सांसद के रूप में अयोग्य घोषित कर दिया जाएगा यदि: 
लाभ का पद (Office of Profit): वह भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी लाभ के पद पर आसीन हो (सिवाय उन पदों के जिन्हें संसद ने कानून द्वारा छूट दी है)।
विकृत चित्त (Unsound Mind): यदि किसी सक्षम न्यायालय ने उसे मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित कर दिया हो।
अशोधित दिवालिया (Undischarged Insolvent): यदि वह घोषित दिवालिया हो।
नागरिकता का त्याग: वह भारत का नागरिक न रहा हो, या उसने स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता प्राप्त कर ली हो, या किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा स्वीकार कर ली हो।
संसदीय कानून द्वारा अयोग्यता: वह संसद द्वारा बनाए गए किसी अन्य कानून (जैसे 'लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951') के तहत अयोग्य हो।
दलबदल (अनुच्छेद 102(2)): यदि उसे दसवीं अनुसूची (Anti-Defection Law) के तहत अयोग्य ठहराया गया हो। 
इन आधारों पर हुई प्रमुख कार्यवाहियां:
अनुच्छेद 102 और उससे जुड़े कानूनों के आधार पर भारत में कई हाई-प्रोफाइल सांसदों पर कार्यवाही हुई है। कुछ प्रमुख उदाहरण निम्नलिखित हैं:
1. लाभ के पद (Office of Profit) के आधार पर:
जया बच्चन (2006): राज्यसभा सदस्य रहते हुए वे 'उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम' की अध्यक्ष थीं। इसे लाभ का पद माना गया और उन्हें अनुच्छेद 102(1)(a) के तहत अयोग्य घोषित कर दिया गया।
सोनिया गांधी (2006): लाभ के पद (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष) के विवाद के कारण उन्होंने स्वयं इस्तीफा दे दिया था और फिर से चुनाव लड़ा था। 
2. दलबदल (10वीं अनुसूची) के आधार पर:
शरद यादव और अली अनवर (2017): जेडीयू (JDU) के इन नेताओं को राज्यसभा से अयोग्य घोषित कर दिया गया क्योंकि उन्होंने पार्टी के निर्देशों के विपरीत विपक्षी गतिविधियों में भाग लिया था।
3. लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA, 1951) के तहत (अपराधिक सजा): 
अनुच्छेद 102(1)(e) के तहत संसद द्वारा बनाए गए कानून (RPA) के कारण कई सांसदों की सदस्यता गई है: 
लालू प्रसाद यादव (2013): चारा घोटाले में सजा मिलने के बाद उनकी लोकसभा सदस्यता समाप्त कर दी गई।
राहुल गांधी (2023): मानहानि के मामले में 2 साल की सजा मिलने के बाद उनकी सदस्यता रद्द हुई थी (हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने सजा पर रोक लगा दी और सदस्यता बहाल हो गई)।
मोहम्मद फैजल (लक्षद्वीप सांसद): हत्या के प्रयास के मामले में सजा मिलने पर अयोग्य घोषित हुए (बाद में हाईकोर्ट से राहत मिली)। 
4. विदेशी नागरिकता के आधार पर:
चेन्नमनेनी रमेश (तेलंगाना विधायक/सांसद स्तर के विवाद): हालांकि यह मामला अक्सर राज्य विधानसभाओं में अधिक देखा गया है, लेकिन विदेशी नागरिकता के संदेह में कई बार निर्वाचन रद्द किए जाने की याचिकाएं कोर्ट तक पहुंची हैं।
निर्णय कौन लेता है?
सामान्य अयोग्यता (102(1)): इन मामलों में निर्णय राष्ट्रपति लेते हैं, लेकिन वे चुनाव आयोग (Election Commission) की राय के अनुसार कार्य करते हैं।
दलबदल (102(2)): इसका निर्णय सदन का अध्यक्ष (लोकसभा अध्यक्ष) या सभापति (राज्यसभा) करता है। 
क्या आप जानना चाहेंगे कि 'लाभ का पद' (Office of Profit) की परिभाषा क्या है, क्योंकि इसे लेकर अक्सर विवाद होता रहता है?



संविधान के अनुच्छेद 102(1)(d) के तहत, यदि कोई सांसद स्वेच्छा से किसी विदेशी देश की नागरिकता ले लेता है या किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा (Adherence/Allegiance) प्रकट करता है, तो उसकी सदस्यता तत्काल समाप्त की जा सकती है।
विदेशी निष्ठा के आधार पर हुई प्रमुख कार्यवाहियां और चर्चित मामले नीचे दिए गए हैं:
1. विदेशी नागरिकता और निष्ठा का सबसे चर्चित मामला
भारत में "विदेशी निष्ठा" का मुद्दा अक्सर दोहरी नागरिकता के संदेह से जुड़ा रहा है। यद्यपि अनुच्छेद 102 के तहत सीधे तौर पर संसद से निष्कासन के उदाहरण कम हैं, लेकिन अदालतों और चुनाव आयोग ने इस पर कड़े रुख अपनाए हैं:
चेन्नमनेनी रमेश मामला (तेलंगाना): हालांकि वे विधायक थे, लेकिन यह मामला 'विदेशी निष्ठा' का सबसे सटीक उदाहरण है। गृह मंत्रालय ने उनकी भारतीय नागरिकता इस आधार पर रद्द कर दी थी कि उन्होंने जर्मन नागरिकता छिपाई थी। भारत का संविधान अनुच्छेद 102 और 191 के तहत किसी भी ऐसे व्यक्ति को सदन में बैठने की अनुमति नहीं देता जिसकी निष्ठा विदेशी राज्य के प्रति हो। गृह मंत्रालय - नागरिकता आदेश
2. स्वेच्छा से निष्ठा स्वीकार करना (Voluntary Allegiance)
यदि कोई सांसद किसी विदेशी देश से कोई ऐसा सम्मान, पद या लाभ लेता है जिसमें उस देश के प्रति वफादारी की शपथ जुड़ी हो, तो उसे "विदेशी निष्ठा" माना जाता है।
प्रणब मुखर्जी (राष्ट्रपति चुनाव के दौरान विवाद): उनके प्रतिद्वंद्वी पी.ए. संगमा ने आरोप लगाया था कि मुखर्जी एक अंतरराष्ट्रीय संस्थान (ISI कोलकाता, जिसे विदेशी वित्त पोषित बताया गया था) में लाभ का पद धारण कर रहे थे। हालांकि यह 'लाभ के पद' का मामला था, लेकिन इसमें 'विदेशी प्रभाव' की दलील भी दी गई थी। भारत का निर्वाचन आयोग - राष्ट्रपति चुनाव निर्णय
3. लाभ का पद और विदेशी संस्थाएं
सांसदों को किसी विदेशी सरकार के अधीन काम करने या वहां से वेतन लेने की अनुमति नहीं है। अनुच्छेद 102 के तहत इसे अयोग्यता माना जाता है क्योंकि इससे व्यक्ति की निष्ठा विभाजित हो सकती है।
4. हालिया विवाद और कड़े कानून
राहुल गांधी (ब्रिटिश नागरिकता का आरोप): 2019 में गृह मंत्रालय ने राहुल गांधी को एक नोटिस जारी किया था, जिसमें एक ब्रिटिश कंपनी के वार्षिक रिटर्न में उनकी नागरिकता 'ब्रिटिश' दिखाए जाने पर स्पष्टीकरण मांगा गया था। यदि यह प्रमाणित हो जाता कि उन्होंने विदेशी नागरिकता ली है या विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा दिखाई है, तो अनुच्छेद 102(1)(d) के तहत उनकी सांसदी तुरंत रद्द हो जाती। MHA - विदेशी नागरिकता नोटिस
इस आधार पर कार्यवाही की प्रक्रिया:
राष्ट्रपति की भूमिका: अनुच्छेद 103 के अनुसार, यदि यह प्रश्न उठता है कि किसी सांसद ने विदेशी निष्ठा स्वीकार की है, तो मामला राष्ट्रपति के पास जाता है।
चुनाव आयोग की राय: राष्ट्रपति इस पर भारत के चुनाव आयोग (ECI) से राय लेते हैं और वह राय बाध्यकारी होती है।
न्यायिक समीक्षा: यदि कोई सांसद अपनी निष्ठा छिपाता है, तो उसकी जीत को 'चुनावी याचिका' (Election Petition) के जरिए हाईकोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
निष्कर्ष: "विदेशी निष्ठा" भारत में सदस्यता रद्द करने का सबसे गंभीर आधार है क्योंकि भारत दोहरी नागरिकता (Dual Citizenship) की अनुमति नहीं देता।
क्या आप यह जानना चाहते हैं कि खुफिया एजेंसियों (IB/RAW) की रिपोर्ट के आधार पर किसी सांसद की 'संदिग्ध निष्ठा' की जांच कैसे की जाती है?



यह विषय भारतीय राजनीति में काफी चर्चा और कानूनी व्याख्याओं का केंद्र रहा है। इस मामले को संवैधानिक और कानूनी दृष्टिकोण से समझना आवश्यक है:-

जिस समझौते और तस्वीरों की आप बात कर रहे हैं, वह मुख्य रूप से 2008 में कांग्रेस पार्टी (INC) और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच हुआ एक 'मेमोरियल ऑफ अंडरस्टैंडिंग' (MoU) है। इस पर राहुल गांधी और चीन के तत्कालीन उप-राष्ट्रपति शी जिनपिंग (जो अब राष्ट्रपति हैं) की मौजूदगी में हस्ताक्षर किए गए थे।

क्या यह अनुच्छेद 102(1)(d) के तहत 'विदेशी निष्ठा' माना जाएगा? इसके कानूनी पहलू निम्नलिखित हैं:
1. पार्टी बनाम राष्ट्र (Party vs State)
संवैधानिक कानून के अनुसार, एक राजनीतिक दल द्वारा दूसरे देश की राजनीतिक पार्टी के साथ किया गया समझौता सीधे तौर पर व्यक्तिगत रूप से सांसद की विदेशी निष्ठा नहीं माना जाता।
अनुच्छेद 102 के तहत 'विदेशी निष्ठा' का अर्थ है कि व्यक्ति ने औपचारिक रूप से किसी दूसरे देश की नागरिकता ले ली हो या उस देश के प्रति वफादारी की कानूनी शपथ ली हो।
राजनीतिक दलों के बीच होने वाले समझौते कूटनीतिक या वैचारिक आदान-प्रदान का हिस्सा माने जाते हैं, जब तक कि वे देश के कानूनों (जैसे FCRA) का उल्लंघन न करें।
2. सुप्रीम कोर्ट का रुख (2020)
अगस्त 2020 में, सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी, जिसमें इस 2008 के MoU की जांच NIA से कराने की मांग की गई थी।
कोर्ट की टिप्पणी: तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश एस.ए. बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिका पर आश्चर्य व्यक्त किया था लेकिन इसे सुनने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि "हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि एक राजनीतिक दल चीन के साथ समझौता कैसे कर सकता है," लेकिन साथ ही यह भी कहा कि यह मामला अदालत के बजाय सरकार के जांच के दायरे में आता है।
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से कहा कि वे हाईकोर्ट जाएं, जिसके बाद यह मामला कानूनी रूप से 'विदेशी निष्ठा' साबित करने के स्तर तक नहीं पहुँच सका।
3. कानूनी जांच (FCRA और अन्य)
सरकार ने इस समझौते और राजीव गांधी फाउंडेशन को मिलने वाले चीनी फंड की जांच के लिए गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा एक अंतर-मंत्रालयी समिति का गठन किया था।
अक्टूबर 2022 में, केंद्र सरकार ने 'राजीव गांधी फाउंडेशन' (RGF) का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया था, क्योंकि इसमें विदेशी फंडिंग के नियमों का उल्लंघन पाया गया था।
हालाँकि, फंडिंग नियमों का उल्लंघन करना 'वित्तीय अनियमितता' की श्रेणी में आता है, इसे सीधे तौर पर 'देशद्रोह' या 'विदेशी निष्ठा' (Allegiance) के कानूनी प्रमाण के रूप में अभी तक स्थापित नहीं किया गया है जिससे सदस्यता रद्द हो सके।
4. सदस्यता पर प्रभाव क्यों नहीं पड़ा?
किसी सांसद की सदस्यता रद्द करने के लिए ठोस न्यायिक प्रमाण की आवश्यकता होती है।
विपक्ष (BJP) ने बार-बार इसे "देश के साथ विश्वासघात" बताया है, लेकिन संवैधानिक रूप से इसे 'विदेशी निष्ठा' साबित करने के लिए यह दिखाना होगा कि सांसद ने भारत की संप्रभुता के विरुद्ध चीन के निर्देशों पर काम किया है।
अभी तक किसी भी संवैधानिक संस्था (चुनाव आयोग या राष्ट्रपति) ने इस समझौते को अनुच्छेद 102 के उल्लंघन के रूप में अधिसूचित नहीं किया है।
निष्कर्ष:
राजनीतिक रूप से यह 'नैतिकता' और 'राष्ट्रीय सुरक्षा' का बड़ा मुद्दा हो सकता है, लेकिन संवैधानिक रूप से किसी समझौते की तस्वीर मात्र को 'विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा' मानकर सदस्यता रद्द नहीं की जा सकती, जब तक कि देश की कोई अदालत या सक्षम जांच एजेंसी इसे 'देशद्रोह' या 'विदेशी नागरिकता' के समान न मान ले।



जनप्रतिनिधित्व अधिनियम (RPA), 1951 या भारत का कोई भी वर्तमान कानून किसी राजनीतिक दल को किसी विदेशी राजनीतिक दल के साथ संधि या समझौता (MoU) करने की स्पष्ट अनुमति नहीं देता, और न ही इसे स्पष्ट रूप से प्रतिबंधित करता है।

हालाँकि, इस प्रकार के समझौतों को नियंत्रित करने के लिए कुछ अन्य कानून और संवैधानिक सीमाएँ हैं:
1. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (RPA)
इस कानून की धारा 29A के तहत, किसी भी राजनीतिक दल को पंजीकरण के समय यह शपथ लेनी होती है कि वह "भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता" के प्रति सच्ची निष्ठा रखेगा। यदि कोई विदेशी समझौता इस निष्ठा को खंडित करता पाया जाता है, तो चुनाव आयोग उस दल का पंजीकरण रद्द कर सकता है। जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 - धारा 29A
2. विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम (FCRA)
यह सबसे महत्वपूर्ण कानून है। भारत में कोई भी राजनीतिक दल या उसका सदस्य विदेशी चंदा या फंड नहीं ले सकता।
यदि किसी विदेशी दल के साथ "संधि" के तहत वित्तीय लेन-देन होता है, तो यह FCRA कानून का सीधा उल्लंघन है।
2008 के कांग्रेस-चीन समझौते (MoU) पर विवाद का एक बड़ा कारण यही था कि क्या इसके पीछे वित्तीय हित जुड़े थे।
3. राजनीतिक दलों की स्थिति (Legal Entity)
भारत में राजनीतिक दल 'निजी निकाय' (Private Entities) के रूप में पंजीकृत होते हैं, वे 'संप्रभु' (Sovereign) नहीं होते।
संधि का अधिकार: अंतर्राष्ट्रीय संधियाँ करने का अधिकार केवल भारत सरकार (Union Government) को है।
कोई भी पार्टी किसी विदेशी सरकार या दल के साथ ऐसा समझौता नहीं कर सकती जो भारत की विदेश नीति या राष्ट्रीय सुरक्षा को प्रभावित करे।
4. सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी
2020 में जब कांग्रेस और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के MoU का मामला सुप्रीम कोर्ट गया, तो कोर्ट ने मौखिक रूप से कहा था कि: "हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि एक राजनीतिक दल किसी दूसरे देश के साथ समझौता कैसे कर सकता है।" हालाँकि, कोर्ट ने इसे सरकार के क्षेत्राधिकार का मामला बताते हुए हस्तक्षेप नहीं किया। सुप्रीम कोर्ट केस विवरण
निष्कर्ष:
कानून में एक "ग्रे एरिया" (स्पष्टता का अभाव) है। दल वैचारिक आदान-प्रदान के लिए अनौपचारिक संबंध रख सकते हैं, लेकिन लिखित संधि या समझौता करना संवैधानिक नैतिकता और संप्रभुता के सिद्धांतों के विरुद्ध माना जाता है। यदि ऐसा समझौता राष्ट्रहित के खिलाफ पाया जाए, तो सरकार 'गैर-कानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम' (UAPA) के तहत भी कार्रवाई कर सकती है।
क्या आप उन विशिष्ट कानूनों के बारे में जानना चाहते हैं जिनके तहत किसी राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है?


राहुल गांधी के चीन के साथ संबंधों और उनके द्वारा चीन की 'बढ़त' या भारत की 'कमजोरी' को दर्शाने वाले बयानों पर समय-समय पर बड़ा राजनीतिक विवाद हुआ है। इन बयानों और साक्ष्यों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में बांटा जा सकता है: -

1. कांग्रेस-चीनी कम्युनिस्ट पार्टी (CPC) के बीच MoU (2008) 
सबसे प्रमुख "साक्ष्य" जिसका उल्लेख विपक्ष बार-बार करता है, वह 7 अगस्त 2008 को बीजिंग में हस्ताक्षरित एक समझौता ज्ञापन (MoU) है। 

तस्वीरें: इस दौरान राहुल गांधी और चीन के वर्तमान राष्ट्रपति (तत्कालीन उप-राष्ट्रपति) शी जिनपिंग के बीच समझौता पत्र साझा करते हुए तस्वीरें सार्वजनिक हैं।
विवाद: बीजेपी का आरोप है कि यह एक "गुप्त समझौता" था जिसका उद्देश्य भारतीय हितों के विरुद्ध सूचना साझा करना था। हालांकि, कांग्रेस इसे दो पार्टियों के बीच वैचारिक आदान-प्रदान का सामान्य समझौता बताती है। 

2. "चीन की बढ़त" और भारत की "हार" से संबंधित प्रमुख बयान
राहुल गांधी ने विभिन्न मौकों पर चीन की औद्योगिक शक्ति और सैन्य स्थिति को भारत से बेहतर या 'विजेता' जैसा बताया है: 
"मेक इन इंडिया" की विफलता और चीन का कब्जा: फरवरी 2025-2026 के संसदीय सत्रों के दौरान उन्होंने कहा कि चीन भारतीय क्षेत्र के भीतर इसलिए बैठा है क्योंकि 'मेक इन इंडिया' विफल हो गया है। उन्होंने तर्क दिया कि चीन का औद्योगिक तंत्र (Industrial System) भारत से कहीं अधिक मजबूत और बड़ा है, इसलिए उनमें भारत के भीतर आने की हिम्मत है।

सैनिकों के पीटे जाने का बयान (2022): राजस्थान में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान उन्होंने कहा था कि "अरुणाचल प्रदेश में हमारे जवानों को चीनी सैनिक पीट रहे हैं"। इस बयान की सेना और सरकार दोनों ने कड़ी निंदा की थी।

2000 वर्ग किमी जमीन का दावा: उन्होंने बार-बार दावा किया है कि चीन ने भारत की 2000 वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा कर लिया है। अगस्त 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने इन टिप्पणियों को "भ्रामक" बताते हुए मौखिक रूप से कहा था कि "यदि आप सच्चे भारतीय होते, तो ऐसा नहीं कहते"।

चीन की 'सफलता' की प्रशंसा: कोलंबिया में एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने चीन की उत्पादन क्षमता की तुलना भारत से करते हुए कहा कि चीन ने निर्माण क्षेत्र में सफलता पाई है, जबकि भारत वैश्विक नेतृत्व के विचार में "अहंकारी" नहीं है। 

3. हालिया विवाद: जनरल नरवणे की अप्रकाशित किताब (फरवरी 2026)
फरवरी 2026 में लोकसभा में राहुल गांधी ने पूर्व सेना प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की एक अप्रकाशित किताब का हवाला देते हुए दावा किया कि: 
2020 के गतिरोध के दौरान चीनी टैंक भारतीय क्षेत्र (डेमचोक/डोकलाम) में घुस आए थे।

उन्होंने आरोप लगाया कि पीएम मोदी ने जिम्मेदारी नहीं ली और सेना प्रमुख को "अकेला" छोड़ दिया। सरकार और रक्षा मंत्री ने इन दावों को "गढ़ा हुआ" (Concocted) और सदन को गुमराह करने वाला बताया। 

निष्कर्ष:
राहुल गांधी के आलोचक इन बयानों को "चीन के प्रोपेगेंडा" को आगे बढ़ाने और भारतीय सेना का मनोबल गिराने वाला मानते हैं। वहीं, राहुल गांधी का तर्क है कि वे केवल कड़वे सच को सामने रख रहे हैं जिसे सरकार छिपाना चाहती है। अब तक ये बयान राजनीतिक विवाद का हिस्सा रहे हैं और किसी भी अदालत ने इन्हें 'विदेशी निष्ठा' का कानूनी प्रमाण नहीं माना है। 


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