कविता - कभी पूछना भारत माँ से बँटवारे में क्या-क्या हुआ

कविता - कभी पूछना भारत माँ से बँटवारे में क्या-क्या हुआ



कभी पूछना भारत माँ से बँटवारे में क्या-क्या हुआ..?
रो बैठेगी मानवता, इंसानियत सिसकारेगी..!
“क्या-क्या न हुआ?” यह कह कर भारत मां आंसू बहा बैठेगी।
सिंध कहेगा, पंजाब कहेगा, बंगाल कहेगा,
कहेगी उस सदी की सारी गाथाएँ।
हम हिंदू हैँ हिंदुस्तान हमारा, 
हम पर क्यों हैवानियत नें डाका डाला।
===1===
उस वक़्त का मंजर कितना विभत्स था,
धरती पर इंसान नहीं, लाशों का बोझा था।
कुओं में भरे गए शव, गलियाँ ख़ून से भरी थीं,
माँ की गोद में कटा बच्चा और आँखें खुली थीं।
रेलें चलीं तो ज़िंदा नहीं, सिर्फ़ लाशें पहुँचीं,
हर डिब्बे से इंसानियत की साँसें टूटीं थीं।
मां बहने लूटी गईं, काटी गईं और बाँटी गईं,
हैवानियत को छूट मिली, सरकारें चुप्पी साधे थीं।
===2===
आजादी के कतरे-कतरे पर लिखा है बलिदान,
क्यों अब भी बहलाते हो लेकर अहिंसा का नाम।
दस - बीस लाख मरे, पर कोई युद्ध न था,
डेढ़ करोड़ उजड़े, घर छूटे कोई दुश्मन नहीं बंटवारा था।
हिंदू कटा, हिंदुस्तान टूटा,
भारत माँ का आँचल लहूलुहान हुआ था।
===3===
ये दंगे नहीं थे, ये उन्माद नहीं था,
ये सत्ता के लिए किया गया योजनाबद्ध नरसंहार था।
लकीर खींचकर इंसान काट दिए गए,
कुर्सी बची रही और देश बाँट लिया गया 
आज भी भारत माँ पूछती है,
“मेरे बच्चों का अपराध क्या था?”
===4===
जब तक सच स्वीकार नहीं होगा, न्याय अधूरा रहेगा,
हिंदू, हिंदुस्तान और भारत माँ का घाव हरा रहेगा।
माफ़ी नहीं, महिमा नहीं, बस सच का साहस चाहिए,
क्योंकि लाशों पर खड़ी आज़ादी, अब और नहीं बर्बादी चाहिए।
बहुत हो चुका झूठ का समंदर....अब सच की आग चाहिए,
हम हिंदू हैँ, इस देश के मालिक, सदियों - सादियों से,
हमें मालिकाना अधिकार चाहिए।
क्यों झुके हम, क्यों डरे हम,
क्यों किसी की सीख मानें,
हम हिंदू हैँ हिंदुस्तान हमारा अब यह सारा जग जाने.
=== समाप्त ===



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