यूजीसी विवाद, विदेशी षड्यंत्र के आधार पर खड़ा किया गया फूट डालो राज करो अभियान - अरविन्द सिसोदिया
2014 में जब भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने, भाजपा के पूर्ण बहुमत की सरकार के प्रधानमंत्री का पद संभाला, तब ब्रिटेन की एक अखबार में बड़े दुखी मन से लिखा जिसका भाव था कि आज भारत ब्रिटेन की छाया से भारत मुक्त हो गया है। क्योंकि हमें इतिहास में ठीक से यह नहीं बताया गया कि कांग्रेस मूलतः ब्रिटेन के अंग्रेजों द्वारा स्थापित की गई, ब्रिटिश हितों की शुभचिंतक पार्टी है, पाश्चात्य जगत उसे ही भारत की सत्ता पर इसलिए देखना चाहता है कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाला देश उनका ग्राहक, उनका उपभोक्ता बना रहे. उन्हें लाभ कमाने देनें वाला अपरोक्ष गुलाम जैसा रहे। इसीलिए कभी-कभी ब्रिटिश न्यूज़ एजेंसी बीबीसी भी सामान्य तौर पर राष्ट्रवादी भाजपा सरकार के खिलाफ रिपोर्टिंग करता हुआ पाया जाता है।
भारत परोक्ष गुलाम रहे, उसके हिंदू कमजोर रहे, हिंदुत्व और राष्ट्रवाद कमजोर रहे, यह वैज्ञानिक और विकसित न बने, और कुल मिलाकर आने वाली इस सहस्त्रवदी में भारत और एशिया ईसा मसीह के नाम के नीचे खडे हो जाए । इस तरह के षड्यंत्र के विरुद्ध सबसे बड़ी बाधा है।
भारत में जागृत होता राष्ट्रवाद, जागृत होता हिंदुत्व जागृत होती हिंदू एकता, विश्व के बाहरी देश महसूस कर रहे हैं और वह लगातार उसे तोड़ने का प्रयत्न करते रहते हैं। और ऐसा आज से नहीं, करीब करीब 125 साल पहले से यह सब हो रहा है।
1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम हुआ, इसमें भारतियों की फूट का लाभ प्राप्त कर अंग्रेज सत्ता में बनें रहे। फिर उन्होंने देश में सबसे पहले हिंदू और मुसलमान के बीच में भेद पैदा किया, इसके बाद हिंदुओं में भी अंतर विरोध पैदा करने के लिए कई वर्गीकरण किये। इनका मूल उद्देश्य मूल मकसद भारत में फूट डालो राज करो की नीति पर आधारित था। इस षड्यंत्र को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने भी निरंतर बढ़ाया और वर्तमान में भी इस पार्टी की नीति यही है कि " सब लोग आपस में लड़ते रहे, छोटे-छोटे मकसद और छोटी-छोटी बातों में भी विवाद ग्रस्त रहे और उसे इसका लाभ कांग्रेस पार्टी को मिलता रहे।
भारत की सता पक्ष को काम करने से रोकने और नियम कानूनों में भारी अंतर्विरोध उत्पन्न करने के लिए न्यायालयों का दुरूपयोग भी चिंता का विषय है। किन्तु यह लगातार हो रहा है। यह प्रकरण भी न्यायालय के माध्यम से खड़ा किया गया और वर्तमान में न्यायालय द्वारा ही स्टे किया गया है।
यूजीसी विवाद को मूल का जन्म देने वाले लोग विदेशी वित्त पोषित थे, विदेशी वित्त पोषण के कारण ही इस मामले को आगे बढ़ाने वाली कटा मानवतावादी अधिवक्ता इंदिरा जैसी हिंदी है जिन पर फेर के अंतर्गत कार्रवाई हुई थी। इस मामले में कहीं ना कहीं कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद दिग्विजय सिंह जो कि संसदीय कमेटी के अध्यक्ष थे। वे भी चर्चा में आए हैँ। मुख्य विषय यही है कि एक विदेशी षड्यंत्र भारत में फूट डालो राज करो की नियत रखकर के प्रारंभ हुआ और वह सुप्रीम कोर्ट के निर्देश संसदीय समिति के नियम के द्वारा सफल भी हो गया। सतर्कता और जागरूकता के मोर्चे पर निश्चित रूप से राष्ट्रवादी विचारधारा के लोग सतर्क नहीं रहे अच्छा तो उनसे परोक्ष चूक हो गई। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगा दी है, और स्पष्ट यह भी कहा है कि यदि सामान्य वर्ग के छात्र की रैगिंग आरक्षित वर्ग का सीनियर छात्र करेगा तो उसे स्थिति में कानून में कुछ नहीं है। इसलिए यह स्पष्ट का से मनाना चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट भेदभावपूर्ण नजरिया को समझ गया है और वहीं से सफल नहीं होने देगा । सरकार के ध्यान में भी पूरी तरह से अब यह विषय आ चुका है । वह भी क्षमता मूलक रास्ता निकालने की कोशिश कर रही है। चर्चा यह भी है कि आगे चलकर यूजीसी को समाप्त ही कर दिया जाएगा इसके लिए कोई एक अलग से नई व्यवस्था लाने का प्रयास किया जा रहा है।
यह सवार मामला विश्वविद्यालय में चलने वाले छात्र रैगिंग का है और इसके कारण संपूर्ण हिंदू समाज को आपस में विघटित हो जाना दुर्भाग्यपूर्ण होगा। हिंदू एकता के तत्व को जीवित रखने के लिए, बहुत छोटी-छोटी बातों में आपस की टकराव को टालना होगा। निश्चित ही रैगिंग एक सत्य है किंतु कभी वह जाती है भेदभाव पर आधे डेट नहीं है बल्कि हमेशा ही रैगिंग सीनियर छात्रों द्वारा जूनियर छात्रों के साथ होती है और अब यह बहुत ही कम न्यूनतम स्तर पर है। मामले में जो भी आंकड़े बनाए जाते हैं वह भी बेहद हल्के स्तर के होते हैं और ना काफी होते हैं इसलिए इस मुद्दे को जितना उछाला गया है। यह मामला उस लाखों गुना कमतर है। इसलिए इस पर समाज को विघटित नहीं होने दिया जाना चाहिए।
1. पृष्ठभूमि: 2012 के नियमों की विफलता (2012-2019)
प्रारंभ: यूजीसी ने 2012 में भेदभाव विरोधी नियम बनाए थे, लेकिन वे केवल 'सलाहकारी' (Advisory) थे। उनमें कड़े दंड या अनिवार्य जांच का अभाव था।
महत्वपूर्ण घटनाएं: 2016 में रोहित वेमुला और 2019 में पायल तड़वी की आत्महत्या के मामलों ने देश को झकझोर दिया। इनके परिवारों ने आरोप लगाया कि 2012 के नियम पर्याप्त सुरक्षा देने में विफल रहे।
2. सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप और नए नियम (2019-2026)
याचिका (2019): पायल तड़वी और रोहित वेमुला की माताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर सख्त नियमों की मांग की।
निर्देश (2025): सुप्रीम कोर्ट ने यूजीसी को आदेश दिया कि वह पुराने नियमों की समीक्षा करे और भेदभाव रोकने के लिए एक मजबूत ढांचा तैयार करे।
अधिसूचना (13 जनवरी 2026): यूजीसी ने 'उच्च शिक्षण संस्थानों में समानता को बढ़ावा देने के नियम, 2026' अधिसूचित किए। इनमें OBC को भी सुरक्षा के दायरे में शामिल किया गया और संस्थानों के लिए कड़े दंड (जैसे मान्यता रद्द करना) का प्रावधान किया गया।
3. विवाद का विस्फोट (जनवरी 2026)
नियम लागू होते ही उत्तर प्रदेश, दिल्ली और बिहार जैसे राज्यों में सवर्ण संगठनों और छात्रों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिए। मुख्य आपत्तियां ये थीं:-
परिभाषा पर विवाद: नियम 3(c) के तहत भेदभाव को केवल SC, ST और OBC के विरुद्ध कृत्यों तक सीमित रखा गया।
सुरक्षा का अभाव: 2025 के मसौदे में झूठी शिकायतों के खिलाफ सजा का प्रावधान था, जिसे अंतिम नियमों से हटा दिया गया।
विभाजनकारी प्रकृति: प्रदर्शनकारियों ने इसे 'काला कानून' कहा और आरोप लगाया कि यह कैंपसों में सामाजिक सद्भाव बिगाड़ेगा।
4. वर्तमान स्थिति: सुप्रीम कोर्ट की रोक (29 जनवरी 2026 - अब तक)
कोर्ट का आदेश: सुप्रीम कोर्ट ने 29 जनवरी 2026 को नए नियमों पर अंतरिम रोक (Stay) लगा दी।
टिप्पणी: मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने नियमों को 'अस्पष्ट' और 'प्रतिगामी' (Regressive) बताते हुए चिंता जताई कि ये समाज को बांट सकते हैं।
यथास्थिति: कोर्ट ने आदेश दिया कि जब तक अंतिम निर्णय नहीं होता, तब तक 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।
आगे क्या होगा?
केंद्र सरकार और यूजीसी को इन नियमों पर पुनर्विचार करने और एक नई समावेशी मसौदा समिति बनाने का सुझाव दिया गया है। मामले की अगली बड़ी सुनवाई 19 मार्च 2026 को होनी है।
क्या आप उन विशिष्ट कानूनी धाराओं के बारे में जानना चाहेंगे जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने "अस्पष्ट" करार दिया है?
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इस विवाद को कानूनी और नीतिगत रूप देने में अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह और संसदीय समिति की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। इन्हीं के प्रयासों से 2012 के पुराने नियमों को बदलकर 2026 के नए और सख्त नियम लाने का मार्ग प्रशस्त हुआ।
1. अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह की भूमिका (कानूनी संघर्ष)
इंदिरा जयसिंह इस मामले में मुख्य याचिकाकर्ताओं (रोहित वेमुला और पायल तड़वी की माताओं) की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रही हैं।
सख्त नियमों की मांग: जयसिंह ने तर्क दिया कि 2012 के यूजीसी नियम केवल कागजी हैं और जातिगत भेदभाव को रोकने में पूरी तरह विफल रहे हैं। उन्होंने परिसरों में "संस्थागत हत्याओं" (Institutional Murders) को रोकने के लिए दंडात्मक नियमों की मांग की।
OBC को शामिल करना: उन्हीं की दलीलों के आधार पर कोर्ट ने यूजीसी को नियमों का दायरा बढ़ाने का निर्देश दिया था, जिसके बाद 2026 के नियमों में पहली बार OBC छात्रों को भी सुरक्षा के दायरे में लाया गया।
उत्तरदायित्व: उन्होंने मांग की कि भेदभाव के मामलों में केवल आरोपी ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालय प्रशासन की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
2. संसदीय समिति की भूमिका (नीतिगत दबाव)
SC/ST कल्याण पर संसदीय समिति ने पिछले कुछ वर्षों में विश्वविद्यालयों में हो रहे भेदभाव पर कड़ी चिंता व्यक्त की थी:
रिपोर्ट और सिफारिशें: समिति ने अपनी रिपोर्टों में पाया कि कई केंद्रीय विश्वविद्यालयों और IITs में SC/ST छात्रों के लिए शिकायत निवारण प्रणाली (Grievance Redressal) या तो मौजूद नहीं है या निष्प्रभावी है।
UGC को फटकार: समिति ने यूजीसी को बार-बार फटकार लगाई कि वह अपने 2012 के नियमों को लागू करने में सुस्त रहा है। समिति के इसी निरंतर दबाव के कारण यूजीसी ने 2025 में नए नियमों का मसौदा तैयार करना शुरू किया।
निगरानी तंत्र: समिति ने सिफारिश की थी कि यूजीसी को एक ऐसा 'डैशबोर्ड' बनाना चाहिए जहां हर विश्वविद्यालय को प्राप्त शिकायतों और उन पर हुई कार्रवाई की जानकारी देनी अनिवार्य हो।
विवाद का नया मोड़
संसदीय समिति और इंदिरा जयसिंह के प्रयासों से नियम तो सख्त बन गए, लेकिन सवर्ण संगठनों का आरोप है कि इस प्रक्रिया में 'न्यूट्रलिटी' (तटस्थता) को नजरअंदाज कर दिया गया। इसी "एकतरफा दृष्टिकोण" को आधार बनाकर सवर्ण समाज ने विरोध शुरू किया, जिस पर अब सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है।
क्या आप संसदीय समिति की उस विशिष्ट रिपोर्ट के मुख्य अंश जानना चाहते हैं जिसने इन नए नियमों की नींव रखी?
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वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह भारत की सबसे प्रभावशाली और मुखर महिला वकीलों में से एक हैं। वे मानवाधिकारों, महिला अधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए अपने कानूनी संघर्षों के लिए जानी जाती हैं।
यहाँ उनका संक्षिप्त परिचय और प्रमुख प्रकरण दिए गए हैं:-
1. संक्षिप्त परिचय
प्रथम महिला उपलब्धियां: इंदिरा जयसिंह 1986 में बॉम्बे हाई कोर्ट की पहली महिला वरिष्ठ अधिवक्ता बनीं। बाद में, 2009 में वे भारत की पहली महिला अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) नियुक्त की गईं।
संस्थापक: उन्होंने 1981 में अपने पति आनंद ग्रोवर के साथ मिलकर 'लॉयर्स कलेक्टिव' (Lawyers Collective) नामक गैर-सरकारी संगठन की स्थापना की, जो गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों को कानूनी सहायता प्रदान करता है।
अंतरराष्ट्रीय भूमिका: वे संयुक्त राष्ट्र की 'महिलाओं के खिलाफ भेदभाव उन्मूलन समिति' (CEDAW) की सदस्य भी रही हैं।
2. प्रमुख कानूनी मामले (Landmark Cases)
इंदिरा जयसिंह ने कई ऐसे मामलों की पैरवी की है जिन्होंने भारतीय कानून की दिशा बदल दी:-
मामला विवरण और प्रभाव
मैरी रॉय बनाम केरल राज्य इस मामले में उन्होंने ईसाई महिलाओं के लिए पैतृक संपत्ति में समान अधिकार की लड़ाई जीती।
विशाखा बनाम राजस्थान राज्य कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न को रोकने के लिए 'विशाखा गाइडलाइंस' तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
भोपाल गैस त्रासदी उन्होंने गैस पीड़ितों के मुआवजे और पुनर्वास के लिए सर्वोच्च न्यायालय में लंबी कानूनी लड़ाई लड़ी।
घरेलू हिंसा अधिनियम 'घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005' का प्रारंभिक मसौदा (Draft) तैयार करने में उनका बड़ा योगदान था।
सबरीमाला मामला उन्होंने सभी आयु वर्ग की महिलाओं के मंदिर में प्रवेश के अधिकार का समर्थन करते हुए दलीलें पेश कीं।
तीन तलाक (Shayara Bano Case) उन्होंने तीन तलाक को असंवैधानिक घोषित करने के पक्ष में महत्वपूर्ण कानूनी तर्क दिए।
रोहित वेमुला और पायल तड़वी वर्तमान UGC विवाद में वे इन दोनों छात्रों की माताओं की ओर से शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव के खिलाफ कड़े कानून बनाने की पैरवी कर रही हैं।
3. विवाद और सक्रियता
FCRA विवाद: 2016 में, भारत सरकार ने उनके एनजीओ 'लॉयर्स कलेक्टिव' का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया था, जिसमें विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग का आरोप लगाया गया था। जयसिंह ने इसे मानवाधिकारों के लिए आवाज उठाने के कारण "राजनीतिक प्रतिशोध" बताया था।
न्यायपालिका की आलोचना: वे न्यायपालिका की पारदर्शिता और कॉलेजियम सिस्टम पर अक्सर मुखर होकर अपनी राय रखती हैं।
वर्तमान स्थिति:
यूजीसी रेगुलेशन 2026 के मामले में, वे सुप्रीम कोर्ट में इस बात पर जोर दे रही हैं कि "समानता" का अर्थ केवल अवसर देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी छात्र को उसकी पृष्ठभूमि के कारण प्रताड़ित न किया जाए।
क्या आप पायल तड़वी मामले में उनके द्वारा दी गई उन विशिष्ट दलीलों के बारे में जानना चाहते हैं जिनके कारण यूजीसी को नए नियम बनाने पड़े?
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यूजीसी (UGC) के समानता नियमों (Equity Regulations) 2026 के निर्माण में संसदीय समिति की भूमिका अत्यंत निर्णायक रही है। समिति ने ही नीतिगत आधार तैयार किया, जिसके आधार पर यूजीसी ने 2012 के पुराने नियमों को बदलकर सख्त प्रावधान लागू किए।
1. संसदीय समिति की भूमिका (Role)
दबाव और सिफारिश: समिति ने पाया कि उच्च शिक्षण संस्थानों (जैसे IITs, IIMs और केंद्रीय विश्वविद्यालयों) में SC/ST छात्रों के साथ भेदभाव के मामले बढ़ रहे हैं। समिति ने दिसंबर 2025 में अपनी रिपोर्ट संसद में पेश की, जिसमें पुराने नियमों की विफलता को उजागर किया गया था।
सख्ती का निर्देश: समिति ने सिफारिश की थी कि भेदभाव के मामलों में केवल सलाह देना काफी नहीं है, बल्कि दोषी संस्थानों की मान्यता रद्द करने जैसे कड़े दंडात्मक प्रावधान होने चाहिए।
OBC का समावेश: समिति के सुझावों के आधार पर ही पहली बार नियमों में OBC छात्रों को भी सुरक्षा के दायरे में शामिल किया गया, जो पहले केवल SC/ST तक सीमित था।
2. समिति क्यों शामिल हुई?
आत्महत्या के मामले: रोहित वेमुला और पायल तड़वी जैसे छात्रों की आत्महत्या के बाद देशव्यापी आक्रोश था।
शिकायतों में वृद्धि: आंकड़ों के अनुसार, पिछले 5 वर्षों में जातिगत भेदभाव की शिकायतों में 118% से अधिक की वृद्धि हुई थी, जिसे संसदीय समिति ने गंभीरता से लिया।
संवैधानिक जवाबदेही: एससी/एसटी कल्याण पर समिति का मुख्य कार्य यह सुनिश्चित करना है कि संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन जमीनी स्तर पर हो रहा है या नहीं।
3. समिति में कौन-कौन थे?
इस विवाद से जुड़ी शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति (Parliamentary Standing Committee on Education) और SC/ST कल्याण समिति के प्रमुख सदस्य निम्नलिखित थे:
दिग्विजय सिंह (अध्यक्ष): कांग्रेस सांसद, जो शिक्षा संबंधी स्थायी समिति के अध्यक्ष रहे। उनकी अध्यक्षता में ही दिसंबर 2025 की वह रिपोर्ट तैयार हुई जिसने इन नियमों का आधार रखा।
डॉ. फग्गन सिंह कुलस्ते: SC/ST कल्याण समिति के अध्यक्ष, जिन्होंने विश्वविद्यालयों में आरक्षण और भेदभाव विरोधी नियमों की निरंतर समीक्षा की।
अन्य प्रमुख सदस्य: समिति में विभिन्न दलों के सांसद शामिल थे, जिनमें ए. राजा, चंद्रशेखर आजाद, डॉ. कानिमोझी एन.वी.एन. सोमू, और जियाउर रहमान बर्क (जो वर्तमान में नियमों की स्पष्टता पर सवाल उठा रहे हैं) प्रमुख हैं।
वर्तमान विवाद: समिति के ही कुछ सदस्यों (जैसे भाजपा सांसद करण भूषण) ने हाल ही में बयान दिया है कि नियमों के अंतिम ड्राफ्ट को तैयार करने में उनकी कोई भूमिका नहीं थी और उन्होंने यूजीसी से इन पर पुनर्विचार करने का आग्रह किया है।
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दिसंबर 2025 में संसदीय समिति द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट के वे प्रमुख अंश नीचे दिए गए हैं, जिन्होंने UGC रेगुलेशन 2026 की नींव रखी और जिन पर वर्तमान में सबसे अधिक विवाद हो रहा है:-
1. दंडात्मक कार्यवाही (Punitive Action)
समिति ने सिफारिश की कि केवल 'परामर्श' पर्याप्त नहीं है। यदि कोई विश्वविद्यालय भेदभाव रोकने में विफल रहता है, तो UGC को उसकी अनुदान (Grants) रोकने और डिग्री प्रदान करने की शक्ति छीन लेने का अधिकार होना चाहिए। सवर्ण संगठनों का तर्क है कि इससे संस्थानों पर अनावश्यक दबाव बढ़ेगा।
2. 'भेदभाव' का व्यापक दायरा
समिति ने सुझाव दिया कि केवल शारीरिक या मौखिक दुर्व्यवहार ही नहीं, बल्कि निम्नलिखित को भी भेदभाव माना जाए:
इंटरव्यू या प्रैक्टिकल में जानबूझकर कम अंक देना।
गाइड द्वारा शोध (Research) कार्य में जानबूझकर देरी करना।
छात्रावासों या मेस में बैठने की अलग व्यवस्था।
3. जाति-संवेदीकरण (Caste Sensitization)
समिति ने अनिवार्य किया कि हर संस्थान में प्रवेश के समय सभी शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के लिए 'कास्ट सेंसिटाइजेशन' कोर्स अनिवार्य हो। आलोचकों का कहना है कि यह शिक्षकों को अपराधी की दृष्टि से देखने जैसा है।
4. अनिवार्य 'एंटी-डिस्क्रिमिनेशन ऑफिसर'
समिति की रिपोर्ट में प्रत्येक कॉलेज में एक लोकपाल (Ombudsperson) के अलावा एक समर्पित SC/ST/OBC सेल और एक अधिकारी की नियुक्ति की सिफारिश की गई, जिसे सीधे UGC को रिपोर्ट करने का अधिकार हो।
5. पारदर्शिता और डैशबोर्ड
समिति ने मांग की कि हर विश्वविद्यालय को अपनी वेबसाइट पर एक पब्लिक डैशबोर्ड बनाना होगा, जिसमें भेदभाव की कितनी शिकायतें आईं और उन पर क्या कार्रवाई हुई, इसका विवरण सार्वजनिक करना होगा।
विवाद का मुख्य बिंदु (सिफारिश बनाम नियम)
संसदीय समिति की रिपोर्ट में मुख्य रूप से "हाशिए पर पड़े समुदायों" की सुरक्षा पर जोर था, लेकिन जब UGC ने इसे नियमों (Regulation 2026) में बदला, तो 'झूठी शिकायतों पर कार्रवाई' वाला खंड हटा दिया गया। सवर्ण समाज का आरोप है कि समिति की सिफारिशों का उपयोग एक तरफा कानून बनाने के लिए किया गया।
क्या आप जानना चाहेंगे कि सुप्रीम कोर्ट ने समिति की इन सिफारिशों के किन हिस्सों को "अस्पष्ट" और "संविधान के विरुद्ध" माना है?
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29 जनवरी 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने UGC रेगुलेशन 2026 पर मुख्य रूप से इन चार गंभीर आपत्तियों के आधार पर स्टे (रोक) लगाया है:
भेदभाव की संकीर्ण परिभाषा (खंड 3-c): कोर्ट ने पाया कि नए नियम 'जातिगत भेदभाव' को केवल SC, ST और OBC के खिलाफ होने वाले कृत्यों तक सीमित रखते हैं। कोर्ट ने सवाल किया कि क्या सामान्य वर्ग (General Category) के छात्र भेदभाव के शिकार नहीं हो सकते? इस परिभाषा को 'विभेदात्मक' और 'अपवर्जित' (Exclusionary) माना गया है।
दुरुपयोग की संभावना (Misuse): बेंच (CJI सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची) ने टिप्पणी की कि नियमों में झूठी शिकायतों को रोकने या सजा देने का कोई प्रावधान नहीं है। कोर्ट को डर है कि स्पष्ट दिशा-निर्देशों के अभाव में इन नियमों का उपयोग निजी प्रतिशोध या डराने-धमकाने के लिए किया जा सकता है।
सामाजिक विभाजन का खतरा: मुख्य न्यायाधीश ने इन नियमों को 'अत्यधिक व्यापक' (Too Sweeping) और 'प्रतिगामी' बताया। कोर्ट का मानना है कि ये नियम परिसरों में एकता को बढ़ावा देने के बजाय समाज को और अधिक बांट सकते हैं और "जातिविहीन समाज" की दिशा में हुई 75 वर्षों की प्रगति को पीछे धकेल सकते हैं।
रैगिंग (Ragging) का मुद्दा: कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 2012 के पुराने नियमों में रैगिंग को भेदभाव के एक रूप में शामिल किया गया था, लेकिन 2026 के नियमों में इसे हटा दिया गया है। कोर्ट ने पूछा कि क्या सामान्य वर्ग का छात्र, यदि किसी आरक्षित वर्ग के सीनियर द्वारा रैग किया जाता है, तो उसे इन नियमों के तहत कोई सुरक्षा मिलेगी?
वर्तमान निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों को "अस्पष्ट" बताते हुए इन्हें स्थगित (Abeyance) रखने का आदेश दिया है और सरकार से 19 मार्च 2026 तक जवाब मांगा है। तब तक 2012 के पुराने नियम ही प्रभावी रहेंगे।
क्या आप जानना चाहते हैं कि 19 मार्च की सुनवाई में सरकार इन नियमों में क्या बड़े बदलाव कर सकती है?
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UGC शिकायतें (2019–20 से 2023–24)
कुल शिकायतें = 1,160
उसी अवधि में उच्च शिक्षा में छात्रों की संख्या (अनुमान)
AISHE (All India Survey on Higher Education) के अनुसार:
2019–20 → लगभग 3.8 करोड़
2020–21 → लगभग 3.9 करोड़
2021–22 → लगभग 4.1 करोड़
2022–23 → लगभग 4.3 करोड़
2023–24 → अनुमानित लगभग 4.4 करोड़
औसत मान लें: लगभग 4 करोड़ छात्र प्रति वर्ष
5 वर्षों में कुल पढ़ने वाले छात्रों की संचयी संख्या (सरल अनुमान):
4 करोड़ × 5 वर्ष = 20 करोड़ छात्र-वर्ष (student exposures)
ध्यान दें: यह यूनिक छात्र नहीं, बल्कि हर वर्ष का नामांकन जोड़कर मोटा अनुमान है।
प्रतिशत गणना
कुल शिकायतें = 1,160
कुल छात्र-वर्ष = 20,00,00,000 (20 करोड़)
अब प्रतिशत:
= 0.000058%
यानी लगभग:
0.00006%
वैकल्पिक गणना (यदि 4.3 करोड़ औसत मानें)
4.3 करोड़ × 5 = 21.5 करोड़ छात्र-वर्ष
≈ 0.000053%
सरल भाषा में
पिछले 5 वर्षों में:
लगभग 20–21 करोड़ छात्र नामांकन हुए
शिकायतें = 1,160
प्रतिशत = लगभग 0.00005% से 0.00006%
अर्थात:
👉 लगभग हर 10 लाख छात्रों में 5–6 शिकायतें
या
👉 लगभग हर 2 लाख छात्रों में 1 शिकायत से भी कम
ध्यान देने योग्य बात
यह केवल UGC तक पहुँची औपचारिक शिकायतें हैं।
यह नहीं कहा जा सकता कि वास्तविक घटनाएँ इससे अधिक या कम नहीं हो सकतीं।
यह प्रतिशत केवल “रिपोर्टेड शिकायतों” का गणितीय अनुपात है।
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भारत में उच्च शिक्षा (Higher Education) के विभिन्न स्तरों पर नामांकित छात्रों की संख्या का वितरण काफी असमान है। AISHE 2021-22 और 2022-23 (अनंतिम) के आंकड़ों के अनुसार, यह विभाजन इस प्रकार है: -
स्तर-वार छात्र नामांकन (Enrollment Breakdown)
अंडरग्रेजुएट (UG): उच्च शिक्षा के कुल छात्रों में से ~78.9% छात्र इसी स्तर पर हैं। यह संख्या लगभग 3.41 करोड़ से अधिक बैठती है। सबसे अधिक नामांकन आर्ट्स (34.2%), साइंस (14.8%) और कॉमर्स (13.3%) में होता है।
पोस्ट-ग्रेजुएट (PG): कुल नामांकन का लगभग 12.1% छात्र पीजी स्तर पर नामांकित हैं। इनकी कुल संख्या लगभग 52 लाख के करीब है। इसमें सोशल साइंस और साइंस सबसे लोकप्रिय विषय हैं।
पीएचडी (Ph.D.): कुल छात्र संख्या का केवल 0.5% हिस्सा पीएचडी स्तर पर है। हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में इसमें भारी वृद्धि हुई है और 2021-22 में पीएचडी नामांकन बढ़कर 2.12 लाख से अधिक हो गया है। इसमें सबसे ज्यादा छात्र इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी (25%) के क्षेत्र में हैं।
डिप्लोमा और अन्य: शेष लगभग 8.5% छात्र डिप्लोमा, पीजी डिप्लोमा, एम.फिल और सर्टिफिकेट पाठ्यक्रमों में नामांकित हैं।
वार्षिक नए दाखिले और पास-आउट
नए नामांकन: प्रतिवर्ष लगभग 1.1 करोड़ से 1.2 करोड़ नए छात्र उच्च शिक्षा प्रणाली में प्रवेश लेते हैं।
पास-आउट: 2021-22 के आंकड़ों के अनुसार, देश भर में उच्च शिक्षा से पास होने वाले छात्रों की कुल संख्या लगभग 1.07 करोड़ रही है।
संस्थानों की संख्या: देश में अब 1,168 विश्वविद्यालय, 45,473 कॉलेज और 12,002 स्टैंडअलोन संस्थान (जैसे पॉलिटेक्निक या पीजीडीएम संस्थान) इस विशाल छात्र आबादी को संभाल रहे हैं।
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