कविता - सिफ़ारिशों के आधार पर मिलता है पुरुस्कार



कविता

सिफ़ारिशों के आधार पर मिलता है पुरुस्कार और सम्मान,
जिला हो, संभाग हो या राज की राजधानी, सब तरफ वही व्यवधानी,
योग्यता रह जाती है कोने में धरी खोकर अपना स्थान।
किसी की डिज़ायर,किसी के लेटरपैड,से चढ़ती सफलता की सीढ़ी,
आखिर क्यों इतना गिर गया निज़ाम,
न बचा कोई धर्म,न बचा कोई ईमान।

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मेहनत यहाँ मौन खड़ी, देखती है तमाशा चुपचाप,
जहाँ काबिल हाथ खाली हैं, और अयोग्य ताज के पास।
योग्यता की हार बनती है सिफ़ारिश,
सच की आवाज़ दब जाती है हर बार।
यह सिर्फ़ अन्याय के समान नहीं,
यह अन्याय का सबसे कुरूप अवतार।
जब रिश्ते बिकते हैं अंकों से महंगे,
और ईमान सस्ता हो जाता है,
तब समाज की नींव हिलती है,
और भविष्य अंधेरों में खो जाता है।
कब टूटेगा यह झूठा तंत्र,
कब मिलेगा मेहनत को अधिकार?
जब सिफ़ारिश नहीं, योग्यता बोलेगी,
तभी आएगा सच में उजाला हर बार।


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