बेहोश हुये लोकतंत्र का जब हुआ एक्सरे
बेहोश हुये लोकतंत्र का जब हुआ एक्सरे ,
भ्रष्टाचार जिन्दा था,
लूट खसोट की दौड़ प्रतियोगिता चल रहीं थीं सांसे।
भेड़ बकरी जैसी भरी थी जनता रेलों में,
पिस रही थी सच्चाई न्यायालय और जेलों में,
दम तोड़ चुका था न्याय का वायदा
और दफन हो चुकीं थीं सभी संवेधानिक बातें।
बेहोश हुये लोकतंत्र का जब हुआ एक्सरे ,
तंत्र का पोस्टमार्टम
फाइल खुलती है,
पहले दर पूछती है।
कानून पीछे बैठा,
नोट आगे बोलते है।
थाने में न्याय नहीं,
रेट लिस्ट टंगी है,
जिसके पास वजन है,
उसकी हर हर गंगे है।
पटवारी भगवान है काग़ज़ का,
कलम से बाँटता काटता है,
जिसने मुट्ठी गरम रखी,
उसी का हक़ बनाता है।
पंच बोले—“मजबूरी है”,
प्रधान बोले—“सिस्टम है”,
जनप्रतिनिधि हँसकर कहे—
“सब चलता है, यही रिवाज़ है।”
बेहोश हुये लोकतंत्र का जब हुआ एक्सरे ,
भ्रष्टाचार जिन्दा था,
लूट खसोट की दौड़ प्रतियोगिता चल रहीं थीं सांसे।
भेड़ बकरी जैसी भरी थी जनता रेलों में,
पिस रही थी सच्चाई न्यायालय और जेलों में,
दम तोड़ चुका था न्याय का वायदा
और दफन हो चुकीं थीं सभी संवेधानिक बातें।
बेहोश हुये लोकतंत्र का जब हुआ एक्सरे ,
विकास आया काग़ज़ में,
ज़मीन पर गड्ढे हैं,
सड़क आधी, नाली टूटी,
पूरे सिर्फ़ ठेके हैं।
मंच से देशभक्ति टपकती,
पर मंच भी कमीशन से बनता है,
जनता पूछे—“हिसाब कहाँ?”
तंत्र बोले—“चुनाव रहता है।”
जो सवाल करे, वो अराजक,
जो लूटे, वो सम्मानित,
ईमानदारी अपराध बनी,
भ्रष्टता पूर्ण संरक्षित।
यह गणतंत्र नहीं तमाशा है,
जहाँ कुर्सी बिकती है,
वर्दी, कलम और सत्ता
एक ही थैली में सिमटती है।
बेहोश हुये लोकतंत्र का जब हुआ एक्सरे ,
भ्रष्टाचार जिन्दा था,
लूट खसोट की दौड़ प्रतियोगिता चल रहीं थीं सांसे।
भेड़ बकरी जैसी भरी थी जनता रेलों में,
पिस रही थी सच्चाई न्यायालय और जेलों में,
दम तोड़ चुका था न्याय का वायदा
और दफन हो चुकीं थीं सभी संवेधानिक बातें।
बेहोश हुये लोकतंत्र का जब हुआ एक्सरे ,
जब तक अमल कानून का नहीं,
तब तक़ कुर्सी का राज रहेगा,
झंडा ऊँचा ही रहेगा साहब,
पर आदमी झुका सम्मान रहेगा।
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