कविता - मन की संसद से सीखो देश की संसद चलाना

शीर्षक: मन की संसद से सीखो देश की संसद चलाना 

आँखें बंद कीं तो एक विचार आया,
मन के भीतर संवाद छाया,
तर्क - वितर्क हुए, समझ बनी, निर्णय पाया,
ईश्वर ने कहा, मेरे बनाये मन से सीखो भाई,
क्यों संसद को तमाशा बनाते, क्यों करते हो जग हँसाई।
===1===
मन की संसद में न शोर होता है,
न कोई ऊँचा-नीचा होता है,
सच बोलता है, सच सुनता है,
हर तर्क अपने दोष चुनता है।
वहाँ न लालच की कोई कुर्सी,
न झूठ की कोई तैयारी,
बस आत्मा की सच्ची आवाज़,
जो दिखाए जीवन की राह हमारी।
अगर बाहर की संसद से पहले,
हम भीतर की संसद सुन लें,
तो झगड़े कम, प्यार ज़्यादा हो,
और इंसान बेहतर बन जाएँ हम।
इसलिए रोज़ खुद से बात करो,
अपने मन को साफ़ करो,
यही ईश्वर की सबसे बड़ी सीख है,
मन की संसद से सीखो।

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