कविता - पारस भी अजीब अभागा है

    
कविता – पारस भी अजीब अभागा है
पारस भी अजीब अभागा है,
लोहे को स्वर्ण बनाता और खुद पत्थर रह जाता है।
इस तरह के लोगों का जीवन,
ईश्वर कुछ अलग ही ताकत से बनाता है।
सबकी खुशहाली कर स्वयं तरसता रहता है,
पारस का जीवन अजीब अभागा है।
===1===
सबको ऊँचा उठाने वाला
खुद नीचे ही रह जाता है,
दूसरों की राह में दीप जलाए
और अंधेरे में सो जाता है।
जिसके हाथों से तक़दीर सँवरती,
उसकी तक़दीर रूठी रहती है।
पारस भी अजीब अभागा है,
लोहे को स्वर्ण बनाता और खुद पत्थर रह जाता है।
===2===
होंठों पर हँसी सबके लिए,
पर आँखों में नमी छुपी रहती है।
दुनिया कहती है उसे शुभ,
पर भाग्य उससे दूर खड़ा है।
जो सबका बोझ उठाता है कंधों पर,
वही सबसे ज्यादा झुका हुआ है।
पारस भी अजीब अभागा है,
लोहे को स्वर्ण बनाता और खुद पत्थर रह जाता है।
===3===
घर के सबसे बड़े पुत्र की भी यही विडंबना है,
सबको सब कुछ देकर, खुद घोर अंधेरा है।
माँ-बाप की उम्मीदों का साया वही बनता है,
अपने सपनों को चुपचाप ही दफ़न करता है।
वो खुद को कभी नहीं परखता,
बस अपनों को निरख-निरख खुश रहता है।
पारस भी अजीब अभागा है,
लोहे को स्वर्ण बनाता और खुद पत्थर रह जाता है।
===4===
ये कैसी बेमानी है, जुल्म और अत्याचार की कहानी है,
शिक्षा का स्वप्न अधूरा, परिवार का पेट पहले है।
पिता के कर्तव्यों पर उसकी बली निराली है,
माँ-बाप को छोटा भाता है, बड़े में ही खोट नजर आता है।
बचपन गया, पचपन गया, क्या मायूसी है,
हर आश-विश्वास की पूरी-पूरी दूरी है।
पारस भी अजीब अभागा है,
लोहे को स्वर्ण बनाता और खुद पत्थर रह जाता है।
===5===
जो खुद मिटे, औरों को रच दे, वही महान कहलाता है,
पारस सा जो जीवन जीए, इतिहास वही बन जाता है।
=== समाप्त ===



टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

इस्लाम के प्रति महापुरुषों के विचार islam

स्वतंत्रता संग्राम से जन्मा: हिन्दुत्व का महानायक केशव Dr Keshav Baliram Hedgewar

खेतड़ी रियासत की संपत्ति सरकारी

राजस्थान के व्याबर जिले में देवमाली गांव,कैंसर का 'झाड़ा'

मातृ ऋण चुकाने पर ही अगले जन्म का सुधार होता है matri rin chukana

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

हिन्दु भूमि की हम संतान नित्य करेंगे उसका ध्यान

माँ बाण माता : सिसोदिया वंश की कुलदेवी

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान