कविता - संसद में राष्ट्र विरोधी पागलपन पर रोक होनी चाहिए


कविता – संसद में राष्ट्र विरोधी पागलपन पर रोक होनी चाहिए

संसद में राष्ट्र विरोधी पागलपन पर रोक होनी चाहिए,
कोई पागल घुस आए तो, उसे बाहर करने की ताकत होनी चाहिए।
अब लिहाज़ों के लबादों को उतार फेंको,
शत्रुता को सबक सिखाने का पुरुषार्थ होना चाहिए।
===1===
यह कैसी गुंडागर्दी है, यह कैसी मक्कारी है,
यह कैसी निर्ममता है, यह कैसी गद्दारी है,
अपने ही लोकतंत्र से, अपने ही संविधान से,
यह कैसी धोखाधड़ी है, यह कैसी गुंडागर्दी है।
===2===
जनमत को पैरों तले रौंद रहे,
संसद को सदन दंगल बना रहे,
सत्ता के काम में बाधा डाल रहे, 
देश विरोधी शोर-शराबा फैला रहे है।
===3===
व्यवस्था को लात, मर्यादा की हत्या,
संविधान को खुलेआम लजाया है,
जनता के धैर्य को ललकार रहे,
अराजकता का अरमान सजाया है।
===4===
देश की अस्मिता बेतार कर रहे,
विदेशी आँगन में सिर झुका रहे,
शत्रु को खुश करने के बीन बजाते,
अपने ही देश का चीर-हरण कर रहे हैं।
===5===
माँ भारती के माथे पर,
कलंक का टीका लगाते हैं,
फिर कैमरों के सामने आकर,
झूठ और भ्रम की नदियाँ बहाते हैं।
===6===
संविधान की किताब उठाकर,
उसी की ही हत्या करते हैं,
लोकतंत्र पर आक्रमण कर,
लोकतंत्र की ही हत्या की जाती है।
===7===
सत्ता की भूख में अंधे होकर,
हर मर्यादा को चीर हरण कर रहे हैं,
देश नहीं, इन्हें जबरदस्ती कुर्सी चाहिए,
अपने स्वार्थ के लिए, देश में ज़हर घोल रहे हैं।
===8===
सुन लो सत्ता के सौदागरो,
यह भारत सोया नहीं है,
यह देश श्मशान की राख नहीं,
पुरुषार्थ की ज्वाला रखता है।
===9===
जो संविधान को रौंदेगा,
जनमत उसे रौंद डालेगा,
जो लोकतंत्र से टकराएगा,
उसकी राजनीति शून्य हो जाएगी।
===10===
सब देख रहा है जनमत,
इलाज जानता है जनमत,
ज़मानतें भी नहीं बचा पाओगे,
यह भारत की ललकार है।
===समाप्त===

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