कविता - चुनौतियाँ जितनी भी मिलें, अच्छी ही हैं।



कविता - चुनौतियाँ जितनी भी मिलें, अच्छी ही हैं।

चुनौतियाँ जितनी भी मिलें, अच्छी ही हैं।
कुछ सिखाती हैं, कुछ दिखाती हैं,
बंद आँखों को खोल जाती हैं।
चुनौतियाँ जितनी भी मिलें, अच्छी ही हैं।

ठोकरों से राह बनती है,
गिरकर ही तो चाल सँवरती है,
अग्नि में तपकर सोना निखरता है,
रात के बाद ही तो भोर सँवरती है।

आँधियाँ साहस जगाती हैं,
लहरें तैरना सिखाती हैं,
जब हौसले साथ खड़े हों,
दीवारें भी झुक जाती हैं।

कठिनाइयाँ डराने नहीं,
हमें मजबूत बनाने आती हैं,
हर संघर्ष की तपीश में
नई पहचान गढी जाती हैं।

जब मन थककर बैठ जाता है,
आशा फिर हाथ थाम लेती है,
एक कदम और बढ़ा दे जो,
मंज़िल खुद आवाज़ देती है।

इसलिए चुनौतियाँ जितनी भी मिलें,
स्वीकार करो, वे साथी हैं,
ये जीवन की गुरु बनकर
हमको ऊँचाइयों तक ले जाती हैं।

चुनौतियाँ जितनी भी मिलें,
सच में अच्छी ही हैं।

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