विचार परिवार

विचार परिवार

भाजपा के 'पंडित दीनदयाल उपाध्याय प्रशिक्षण महाअभियान-2026' में 'विचार परिवार' का मुख्य विषय भारतीय जनता पार्टी को मात्र एक राजनीतिक दल न मानकर उसे एक विस्तृत वैचारिक परिवार के रूप में प्रस्तुत करना है।इस विषय के अंतर्गत कार्यकर्ताओं को निम्नलिखित बिंदुओं पर प्रशिक्षित किया जाता है:

सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और विचारधारा: भाजपा की वैचारिक पृष्ठभूमि, जैसे कि 'राष्ट्र प्रथम' का संकल्प, अंत्योदय और पंडित दीनदयाल उपाध्याय का 'एकात्म मानववाद'।

परिवार के रूप में संगठन: पार्टी को महज एक दल न मानकर एक ऐसा 'विचार परिवार' समझना, जो भारतीय संस्कृति और संस्कारों से जुड़ा हुआ है और आपसी सहयोग पर आधारित है।

विचारधारा के प्रति निष्ठा: कार्यकर्ताओं को पार्टी की मूल कार्यपद्धति, अनुशासन और विचारधारा के प्रति अटूट निष्ठा के साथ काम करने के लिए प्रेरित करना।

विभिन्न संगठनों का समन्वय: इस सत्र में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अन्य अनुषंगी संगठनों को एक 'परिवार' के रूप में जोड़कर राष्ट्र निर्माण की दिशा में काम करने पर जोर दिया जाता है।पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण वैचारिक सत्र होता है।

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1947 में देश स्वतंत्र हुआ, राष्ट्रीय पुनर्निर्माण का विचार अधिक सघनता से करने का शुभ अवसर आया।

रा.स्व.संघ के व्यक्तित्व निर्माण का कार्य संघ स्वयंसेवकों द्वारा समाज जीवन के विविध क्षेत्रों में साकार करने का विचार संघ में गतिमान होने का यह समय था।

1950 के दशक से इस प्रक्रिया का प्रारम्भ हुआ और संघ कार्यकर्ता धीरे-धीरे सामाजिक जीवन के एक क्षेत्र में स्वतंत्र रचना खड़ी करते हुए चलते गये।

आज की स्थिति में लगभग सभी क्षेत्रों में समान ध्येय एवं विचार-व्यवहार की प्रक्रियायें केन्द्र में रखते हुए ऐसे संगठन कार्यरत ही नहीं बल्कि प्रभावी रूप से इस पुनर्निर्माण के कार्य को प्रबल बना रहे हैं।

इसकी भूमिका बहुत ही स्पष्ट है— राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के व्यापक संदर्भ में ऐसे किसी एक क्षेत्र में— उस क्षेत्र की आवश्यकता तथा स्वरूप के अनुसार जनसंगठन खड़ा करके उस क्षेत्र में अपेक्षित परिवर्तन साध्य करने का यह प्रयास है।

1949 में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की स्थापना हुई— यह प्रारंभिक प्रयास रहा— उसके पश्चात एक-एक संगठन का निर्माण हुआ— आज की स्थिति में लगभग 40/42 ऐसे संगठन इस श्रृंखला में विद्यमान हैं।

रा.स्व.संघ के विचार की पृष्ठभूमि इन संगठनों के सिद्धांत का आधार है— राष्ट्र जीवन का विचार एकात्म भाव से हो, समाज हित सर्वोपरि हो, समर्पित कार्यकर्ता का निर्माण हो, भारतीय परंपरा, इतिहास, राष्ट्रपुरुष इनके प्रति सम्मान और आदर की भावना हो और जिस क्षेत्र में कार्य खड़ा करना है उस क्षेत्र की समस्याओं को मिटाकर स्वस्थ समाज को साकार करे ऐसी समान भूमिका इस विचार परिवार की आधारशिला है।

इस विचार परिवार से अपना भावनात्मक संबंध रखकर कार्य करने वाले ऐसे सभी संगठन स्वतंत्र हैं। स्वायत्त हैं। सबकी कार्यपद्धति संगठन के स्वरूप के अनुसार है और उनका कार्य विस्तार भी बढ़ती मात्रा में दिखाई देता है।

वास्तव में यह एक अनोखी रचना है— व्यापक रूप से विचारधारा समान है परन्तु भिन्न कार्यपद्धति है। विचार परिवार एक ही है परन्तु नियंत्रण, नियमन और कार्यकर्ताओं का बल अपने-अपने संगठन ने अपने प्रयास से खड़ा किया है।

शिक्षा, सेवा तथा वंचित समाज के स्थान को कार्यरत संगठनों ने समाजोत्कर्षक बहुत बड़ा कार्य खड़ा किया है। विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, सेवा भारती ऐसे उदाहरण प्रेरक हैं। छोटे-बड़े सेवाकार्य, एकल विद्यालय यह परिवर्तन के प्रतिमान बन चुके हैं।

विचार परिवार के घटक के रूप में जुड़े हुए विविध संगठन स्वतंत्र और स्वायत्त होते हुए भी सभी में समन्वय रहे, परस्पर-पूरकता रहे और मूल विचार के परिप्रेक्ष्य में विसंगति न रहे ऐसी आज की विद्यमान रचना है।

बहुत ही प्रभावी रूप से विविध क्षेत्र में सारे संगठन समाज हित में कार्य कर रहे हैं और नेतृत्व की भूमिका में रहे हैं। जैसे कि भारतीय मजदूर संघ आज विश्वभर में होने वाली गणना से क्रमांक एक का संगठन है। अ.भा.वि.परिषद छात्रों के क्षेत्र में सबसे बड़े, अनुशासित संगठन के रूप में विद्यमान है। हिंदुत्व के विचार को क्षेत्र में बड़ा संगठन विश्व हिंदू परिषद ने खड़ा किया है।

विचार परिवार की यह रचना आज स्थिर हो चुकी है। ऐसे संगठनों की भूमिका राजनीतिक सत्ता संपादन की नहीं। राजनीतिक क्षेत्र में राष्ट्रवाद से प्रतिबद्धता रखने वाले दल प्रति मानस तैयार होता है। यह स्वाभाविक परिणाम होगा। लेकिन किसी संगठन के हित तथा कार्यकर्ताओं का उपयोग दलगत राजनीतिक हितों के लिये करने की परंपरा नहीं है।

कार्य क्षेत्र भिन्न-भिन्न होते हुए भी समाज जीवन की दृष्टि से समान दृष्टिकोण विचार परिवार में स्वाभाविकतः दिखाई देता है जैसे कि समाज का विचार एकात्म भाव से ही हो, समाज जीवन टुकड़ों में बंटा नहीं है तो सभी अंग परस्पर-पूरक हैं, समरसता यह समाज जीवन के स्वास्थ्य का आधार है, विविधता में एकता का अनुभव है, वर्ण-वर्ग-जाति संघर्ष समाजहित में नहीं है। एक जन—एक राष्ट्र—एक संस्कृति यह समाज जीवन की अनुभूति है, भारतीय समाज मानस मूलतः आध्यात्मिक होने के कारण समष्टि के लिये त्याग की अभिव्यक्ति व्यक्ति मात्र में हो, धर्म कल्पना व्यापक ही है और समाज की धारणा करने वाली है— ऐसे सारे सिद्धांत विचार परिवार के सभी संगठनों ने धारण किये हैं।

विचार परिवार का यह आविष्कार राष्ट्र के परम वैभव से ही प्रेरित है। मूल प्रेरणा यही है। संगठन के सारे अंतर्गत व्यवहार और कार्यकर्ताओं के परस्पर संबंध सदा स्नेहपूर्ण रहने का मूल कारण समाज ध्येयवाद के प्रति समर्पण का भाव यही है।

आज समाज जीवन के लगभग सारे क्षेत्रों में ऐसे संगठन कार्य करके एक शक्ति के रूप में सम्पन्न है। यह शक्ति किसी के विरोध में नहीं, प्रतियोगिता में नहीं या वर्चस्व प्रतिष्ठापित करने के लिये बल्कि राष्ट्रीय पुनर्निर्माण से ही प्रेरित है।

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RSS के जन्म के कारण

Rashtriya Swayamsevak Sangh (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की स्थापना 1925 में नागपुर में हुई थी। इसके संस्थापक Keshav Baliram Hedgewar थे। संघ के जन्म के पीछे कई ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण थे:

1. ब्रिटिश शासन और राष्ट्रीय चेतना

भारत उस समय अंग्रेज़ों के अधीन था।

स्वतंत्रता आंदोलन चल रहा था, लेकिन समाज में संगठन और अनुशासन की कमी महसूस की जा रही थी।

डॉ. हेडगेवार का विचार था कि केवल राजनीतिक आंदोलन पर्याप्त नहीं, बल्कि समाज का चरित्र निर्माण भी आवश्यक है।


2. हिंदू समाज की विखंडित स्थिति

जाति, क्षेत्र, भाषा और संप्रदाय के आधार पर समाज बँटा हुआ था।

संघ का उद्देश्य “हिंदू समाज को संगठित” करना बताया गया।


3. सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना

संघ ने भारतीय संस्कृति, परंपरा और इतिहास के संरक्षण को महत्व दिया।

“राष्ट्र पहले” और सामाजिक एकात्मता की भावना पर बल दिया गया।


4. अनुशासित कार्यकर्ता निर्माण

संघ ने शाखा पद्धति के माध्यम से शारीरिक, बौद्धिक और सामाजिक प्रशिक्षण की व्यवस्था बनाई।

इसका लक्ष्य ऐसे स्वयंसेवक तैयार करना था जो समाजसेवा और राष्ट्रकार्य में सक्रिय हों।



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भारत में RSS का प्रभाव

सामाजिक प्रभाव

संघ से प्रेरित कई संगठन शिक्षा, सेवा, श्रमिक, छात्र और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करते हैं।

उदाहरण:

Akhil Bharatiya Vidyarthi Parishad

Bharatiya Mazdoor Sangh

Vishwa Hindu Parishad

Seva Bharati



राजनीतिक प्रभाव

संघ स्वयं को सांस्कृतिक संगठन कहता है, लेकिन भारतीय राजनीति पर उसका प्रभाव व्यापक माना जाता है।

Bharatiya Janata Party के कई नेता संघ पृष्ठभूमि से आए हैं।

राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक पहचान और संगठनात्मक राजनीति में RSS की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।


शिक्षा और संस्कृति पर प्रभाव

भारतीय इतिहास, संस्कृति और परंपरा के पुनर्पाठ पर जोर।

विद्यालयों, गुरुकुलों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों के माध्यम से कार्य।

आपदा और सेवा कार्य

बाढ़, भूकंप, महामारी आदि के समय स्वयंसेवकों की सक्रिय भागीदारी देखी गई है।

ग्रामीण विकास, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्रों में भी कई सेवा परियोजनाएँ चलती हैं।
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आलोचनाएँ और विवाद

समर्थकों का दृष्टिकोण

RSS को राष्ट्र निर्माण, अनुशासन, सेवा और सांस्कृतिक जागरण का संगठन मानते हैं।


आलोचकों का दृष्टिकोण

कुछ लोग इसे हिंदू राष्ट्रवाद से जोड़ते हैं और आरोप लगाते हैं कि इससे धार्मिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।

भारतीय राजनीति और सामाजिक विमर्श में RSS लंबे समय से बहस का विषय रहा है।


समग्र निष्कर्ष

RSS का जन्म औपनिवेशिक काल में सामाजिक संगठन, सांस्कृतिक चेतना और राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से हुआ। लगभग एक सदी में यह भारत के सबसे प्रभावशाली सामाजिक-सांस्कृतिक संगठनों में से एक बन गया है। इसका प्रभाव समाजसेवा, शिक्षा, संस्कृति और राजनीति—सभी क्षेत्रों में देखा जाता है, जबकि इसके विचारों और भूमिका को लेकर समर्थन और आलोचना दोनों मौजूद हैं।

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