कविता - थोड़ा सा बड़ा बनते ही बेईमान हुआ

अच्छे से वह दिन जब घास की रोटी भी मिलबाँट के खाते थे,
आधे पेट सो जाते थे फिर भी, एक-दूसरे के दुःख सहलाते थे।

जब से थोड़ीसी जायदाद आई, छिना झपटी की सौगात लाई,
कहीं कोई रिश्ता ना बचा, नहीं कोई लिहाज बचा पाई,
सारे कसमे वादे झूठे हुये,थोड़ा सा बड़ा बनते ही बेईमान हुआ।

ना ऊँची दीवारें थीं, ना मन में कोई फासला था,
छोटे से आँगन में ही, पूरा संसार रचता बसता था।

माँ के हाथों की वो खुशबू,अब नोटों में खो जाती है,
बाप के माथे की शिकन भी, औलाद कहाँ पढ़ पाती है।

भाई अब भाई से डरता है, बहन भी दूरी रखती है,
रिश्तों की गर्मी जाने कहाँ,ठंडी साँसों में सिमटती है।

पहले दुख भी अपने लगते थे, अब सुख भी बाँटे नहीं जाते,
लोग घर तो बड़े बना लेते हैं, पर दिल छोटे छोटे होते जाते ।


वो मिट्टी के चूल्हे अच्छे थे, जहाँ प्रेम धुएँ सा उठता था,
आज महलों की चमक में भी, मन भीतर से सूना रहता है।

काश फिर वही दौर लौट आए, जहाँ अपनापन जिंदा हो,
ना दौलत से इंसान तौला जाए, ना रिश्ता कोई शर्मिंदा हो।

फिर कोई भूखा सो जाए तो, पूरा गाँव बेचैन रहे,
और किसी के आँख के आँसू पर, हर अपना हैरान रहे।

टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

25 वर्षों में जनसेवा से वैश्विक नेतृत्व तक, मोदीजी की स्वाभिमानी राष्ट्र निर्माण की ऐतिहासिक यात्रा — अरविन्द सिसोदिया

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

भगवान कृष्ण का जलवा पूजन : डोल ग्यारस

'उच्च-स्तरीय जनसांख्यिकी मिशन' क्यों...?

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

जगाया तुमको कितनी बार jgaya tumko kitni bar

जनसांख्यिकीय हेरफेर घुसपैठ से कहीं अधिक सामाजिक सद्भाव के लिए 'बड़ा खतरा' है: प्रधानमंत्री मोदी

Lord Dattatreya's 24 Gurus and the Teachings Received from Them