समाज व्यवस्था का मूल आधार सम्मान और समन्वय है - अरविन्द सिसोदिया
समाज व्यवस्था का मूल आधार सम्मान और समन्वय है
यह कथन बिल्कुल सत्य है कि समाज व्यवस्था का मूल आधार सम्मान और समन्वय (Coexistence and Coordination) है। एक स्थिर और प्रगतिशील समाज के निर्माण में ये दोनों तत्व सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
समाज व्यवस्था में सम्मान और समन्वय की भूमिका को निम्नलिखित बिंदुओं के माध्यम से समझा जा सकता है:
१. सम्मान (Respect) - सामाजिक संरचना का आधारपारस्परिक मान्यता: समाज का अर्थ ही व्यक्तियों के बीच पारस्परिक संबंधों का जाल है, जो सम्मान पर आधारित होता है।प्रतिष्ठा और स्वीकृति: जब व्यक्ति एक-दूसरे के गुणों, कार्यों और विचारों का सम्मान करते हैं, तो समाज में [सामाजिक प्रतिष्ठा] और एकता बनी रहती है।मानवीय संवेदना: एक सभ्य समाज में सम्मान के माध्यम से ही मानवीय संवेदनाएं, प्रेम और भाईचारा विकसित होता है।
२. समन्वय (Coordination/Integration) - एकता का सूत्र सहयोग और सहयोग: समन्वय का अर्थ है- समाज की विभिन्न क्रियाशील इकाइयों (व्यक्तियों, समूहों, संस्थाओं) का आपस में एक अर्थपूर्ण ढंग से जुड़ा होना, जिससे सामाजिक व्यवस्था बनी रहे।विविधता में एकता: भारत जैसे विविध समाज में क्षेत्रीय, धार्मिक और भाषाई विविधता के बावजूद समन्वय ही समाज को एक सूत्र में बांधता है।सामान्य हित: जब लोग अपने निजी स्वार्थों से ऊपर उठकर सामान्य हितों (Common Interests) के लिए मिलकर काम करते हैं, तो वह समन्वय का उत्कृष्ट उदाहरण है।३. समाज व्यवस्था के अन्य सहायक तत्वअपनापन: लोगों को अपना मानकर उनके साथ कार्य करना ही सामाजिक व्यवस्था की नींव है।
नियम और मूल्य: सम्मान और समन्वय के लिए समाज में कुछ नियम, संस्थाएं और मूल्य (जैसे- सहयोग, सहिष्णुता) अनिवार्य होते हैं।
समानता: भारतीय संविधान के अनुरूप सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक न्याय और प्रतिष्ठा व अवसर की समानता भी समाज के आधारभूत स्तंभ हैं।निष्कर्ष:यदि समाज में सम्मान और समन्वय की भावना कम हो जाए, तो समाज में संघर्ष, ईर्ष्या, द्वेष और हिंसा जैसी कुरुतियां फैल सकती हैं। इसलिए, एक स्वस्थ और स्थिर समाज के लिए इन मूल्यों को बनाए रखना अनिवार्य है।
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