यह वह धरती है, जहाँ वीर उगाए जाते हैं

यह कविता 1857 की जनक्रांति हेतु लिखी गईं है... भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की भव भंगिमा पर आधारित है 

यह वह धरती है, जहाँ वीर उगाए जाते हैं,
तलवारों की धारों पर, शीश चढ़ाए जाते हैं।
शौर्य-तेज की हर सुबह, रक्त-सींच बुलाई जाती है।
युद्ध-मृत्यु का सतत् मंजर, सारे जग ने देखा है,
क्या कोई जीतेगा इसको — हार सुलाई जाती है।
अथक हिन्दू पथ है निरंतर, यह सबको संदेशा है।

====1====

माँ तो जन्म देती है, मगर मातृभूमि जीवन देती है।
दोनों का ऋण रोम-रोम पर, श्वास-श्वास पर।
आओ ऐसा कुछ कर जाएँ, जो ये माताएँ हर्षाएँ,
कहें गर्व से — “यह मेरा सपूत है”, जिससे नई दिशाएँ,
नई बुलंदियाँ खड़ी कर दिखाएँ, जो मातृभूमि को मार्ग दिखाएँ।
पुरुषार्थ ऐसा कर दिखलाएँ, जो युग-युग राह बन जाए।।

====2====

गंगा-जमुना की पावन धारा, रक्तिम होकर बहती थी,
स्वाधीनता की प्रथम मशाल, जन-जन में तब रहती थी।
मेरठ की रणभेरी गूँजी, दिल्ली ने हुंकार भरी,
मंगल पांडे के संकल्पों ने, हर आँख में चिंगारी धरी।
झाँसी की रानी ने रण में, सिंहनाद प्रखर किया,
“मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” — यह उद्घोष अमर किया।

====3====

तात्या टोपे रण में निकले, बन वज्र-प्रहारों वाले,
नाना साहब के स्वाभिमान ने, तोड़े बंधन काले।
बेगम हजरत महल ने भी, लखनऊ में ज्वाला बोई,
वीरों की उस जनक्रांति ने, अंग्रेजी नींव हिलाई।

====4====

कानपुर की मिट्टी बोली — “अब दासत्व न सह पाएंगे,”
अवध, बुंदेल, बिहार सभी, स्वतंत्र ध्वजा फहराएँगे।
कुँवर सिंह के वृद्ध भुजों में, युवा तेज फिर जागा था,
अस्सी वर्ष की आयु में भी, शौर्य-दीप अनुरागा था।

====5====

युद्ध-मृत्यु का सतत् दृश्य, सारे जग ने देखा था,
पर हिन्दू पथ का वह साहस, कभी नहीं रुकने वाला था।
अथक तपस्या, अटल प्रतिज्ञा, हर मन में संचारित थी,
मातृभूमि की जय-गाथा, रक्त-बूँद में लिखी जाती थी।

====6====

माँ तो जन्म देती है, मगर मातृभूमि देती जीवन है,
दोनों का ऋण रोम-रोम पर, हर श्वास पर अर्पण है।
आओ ऐसा कुछ कर जाएँ, जिससे भारत मुस्काए,
वीरों के उन बलिदानों पर, नव पीढ़ी गर्व जताए।

====7====

कहें धरा फिर गर्व सहित — “यह मेरा सपूत महान,”
जिसने त्याग, तपस्या, साहस से ऊँचा किया हिन्दुस्तान।
नई दिशाएँ, नई बुलंदी, फिर भारत को दिलवाएँ,
1857 की उस ज्वाला को, जन-जन तक पहुँचाएँ।

====8====

पुरुषार्थ का ऐसा दीप जले, जो युगों-युगों तक जलता हो,
हर भारतवासी के अंतर में, स्वाभिमान सदा पलता हो।
जब-जब मातृभूमि पुकारे, हर हृदय शस्त्र उठा जाए,
भारत की प्रथम जनक्रांति का, अमर संदेश सुना जाए।।

==== समाप्त ====





यह वह धरती है, जहां वीर उगाये जाते हैं,
तलवारों की धारों पर, शीश चढ़ाये जाते हैं।
शौय-तेज की हर सुबह,रक्त सींच बुलाई जाती है।
युद्ध मृत्यु का सतत् मंजर, सारे जग ने देखा है,
क्या कोई जीतेगा इसको, हार सुलाई जाती है,
अथक हिन्दू पथ है निरंतर, यह सब को संदेशा हैं।
====1====
मां तो जन्म देती है, मगर मातृभूमि जीवन देती है।
दोनों का ऋण रोम-रोम पर, श्वांस-श्वांस पर,
आओ ऐसा कुछ कर जायें, जो ये मातायें हर्षायें,
कहें गर्व से, यह मेरा सपूत है, जिससे नई दिशायें,
नई बुलंदीयां ख़डी कर दिखाएँ,जो मातृभूमि को मार्ग दिखाये 
पुरूषार्थ ऐसा कर दिखलाएँ , जो युग-युग राह बनजाये ।।
====2====
गंगा-जमुना की पावन धारा, रक्तिम होकर बहती थी,
स्वाधीनता की प्रथम मशाल, जन-जन में तब रहती थी।
मेरठ की रणभेरी गूँजी, दिल्ली ने हुंकार भरी,
मंगल पांडे के संकल्पों ने, हर आँख में चिंगारी धरी।
झाँसी की रानी ने रण में, सिंहनाद प्रखर किया,
“मैं अपनी झाँसी नहीं दूँगी” — यह उद्घोष अमर किया।
====3====
तात्या टोपे रण में निकले, बन वज्र प्रहारों वाले,
नाना साहब के स्वाभिमान ने, तोड़े बंधन काले।
बेगम हजरत महल ने भी, लखनऊ में ज्वाला बोई,
वीरों की उस जनक्रांति ने, अंग्रेजी नींव हिलोई ।
====4====
कानपुर की मिट्टी बोली, “अब दासत्व न सह पाएंगे,”
अवध, बुंदेल, बिहार सभी, स्वतंत्र ध्वजा फहरायेंगे।
कुँवर सिंह के वृद्ध भुजों में, युवा तेज फिर जागा था,
अस्सी वर्ष की आयु में भी, शौर्य-दीप अनुरागा था।
====5====
युद्ध मृत्यु का सतत् दृश्य, सारे जग ने देखा था,
पर हिन्दू पथ का वह साहस, कभी नहीं रुकने वाला था।
अथक तपस्या, अटल प्रतिज्ञा, हर मन में संचारित थी,
मातृभूमि की जय-गाथा, रक्त-बूँद में लिखी जाती थी।
====6====
माँ तो जन्म देती है, मगर मातृभूमि देती जीवन है,
दोनों का ऋण रोम-रोम पर, हर श्वांस पर अर्पण है।
आओ ऐसा कुछ कर जाएँ, जिससे भारत मुस्काये,
वीरों के उन बलिदानों पर, नव पीढ़ी गर्व जताये।
====7====
कहें धरा फिर गर्व सहित — “यह मेरा सपूत महान,”
जिसने त्याग, तपस्या, साहस से ऊँचा किया हिन्दुस्तान।
नई दिशाएँ, नई बुलंदी, फिर भारत को दिलवाएँ,
1857 की उस ज्वाला को, जन-जन तक पहुँचाएँ।
====8====
पुरुषार्थ का ऐसा दीप जले, जो युगों-युगों तक जलता हो,
हर भारतवासी के अंतर में, स्वाभिमान सदा पलता हो।
जब-जब मातृभूमि पुकारे, हर हृदय शस्त्र उठा जाए,
भारत की प्रथम जनक्रांति का, अमर संदेश सुना जाए।।
==== समाप्त ====

टिप्पणियाँ

इन्हे भी पढे़....

तेरा वैभव अमर रहे माँ, हम दिन चार रहें न रहे।

छत्रपति शिवाजी : सिसोदिया राजपूत वंश

10 मई, 1857 की क्रांति की वर्षगांठ के अवसर पर : जनक्रांति: 1857

सेंगर राजपूतों का इतिहास एवं विकास

खींची राजवंश : गागरोण दुर्ग

पराक्रमी महाराणा प्रताप Mighty Maharana Pratap

कण कण सूं गूंजे, जय जय राजस्थान

गोरक्षा आन्दोलन 1966 जब संतों के खून से नहाई थी दिल्ली, इंन्दिरा गांधी सरकार ने की थी गोलीबारी

भारत की जनता ने सनातन विरोधियों को कड़ा संदेश दिया है – अरविन्द सिसोदिया

सर्वप्रथम 27 दिसम्बर 1911 को गाया गया था राष्ट्रगान जन गण मन अधिनायक जय है jan-gan-man