कविता - सिस्टम का सच

सिस्टम का सच

लोकतंत्र और संविधान को
हर दिन निगल रहा सिस्टम,
नेता मंचों पर लड़ते दिखते,
पीछे साथ हँसता सिस्टम।

जनता भूखी, जनता प्यासी,
फिर भी जश्न मनाता सिस्टम,
झूठ, दलाली और भ्रष्टाचार से
अपना महल सजाता सिस्टम।

मनमर्जी के कानूनों से
देश चलाता बैठा है,
कुर्सी पर चाहे कोई भी हो,
असली राजा सिस्टम है।

न्याय यहाँ नीलाम पड़ा है,
सच को सूली चढ़ना पड़ता,
जिसके पास पहुँच और पैसा,
उसके आगे कानून झुकता।

ईमानदार कुचले जाते,
चोर यहाँ सम्मानित हैं,
मेहनतकश की टूटी हड्डी,
और महलों में दावतें हैं।

हर चुनाव में सपने बाँटे,
हर भाषण में झूठ परोसा,
जनता को बस भीड़ समझकर
हर अधिकार यहाँ है नोचा।

अफसर, दलाल और नेताओं का
गहरा काला गठबंधन,
जनता की मेहनत लूट-लूटकर
भरते अपना तिजोरी-वन।

मंदिर-मस्जिद में उलझाकर
रोटी का सवाल दबाया,
धर्म के नामों की आग लगाकर
सत्ता ने सिंहासन पाया।

अब भी यदि तुम चुप बैठे,
तो अपराधी तुम भी हो,
जो अन्याय पर मौन खड़ा है,
वो भी उतना दोषी हो।

उठो, सवालों की मशालें
अब हर गली में जलनी हों,
टूटे झूठ का ये साम्राज्य,
न्याय की सुबह निकलनी हो।

सिंहासन अब न्याय करे,
न कि धन का अभिमान,
जनता फिर से राज करे,
बचे देश और संविधान।

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