कविता - अट्टहास करता भ्रष्टाचार

कविता - अट्टहास करता भ्रष्टाचार
- अरविन्द सिसोदिया 9414180151
अट्टहास करता भ्रष्टाचार,रावण के दस सिर-सा दिखता है।
हर डाल पर बैठा हुआ,अपनी क्रूर हँसी को हँसता है।
“असली साम्राज्य तो मेरा है,नहीं कोई राजा मुझे हरा पाया,
मैं ही असली राजा हूँ, उदघोष यह करता है ।
अट्टहास करता भ्रष्टाचार.........
=====1====
घूसखोरी और रिश्वत लेकर, ईमान का गला दबाता है,
सुविधा शुल्क और दलालवाद से,हर अधिकार बिकवाता है।
पेपरलीक की काली सुरंगें, मेहनत का सूरज खा जातीं,
कोचिंग माफियाई के पंजे, गरीब प्रतिभाओं को डरा जातीं हैँ।
अट्टहास करता भ्रष्टाचार.........
=====2====
कालाधन और कमीशनखोरी, देश की नस-नस चाट रही,
स्वीश बैंकों में अघोषित जमाएँ,भारत की आत्मा धिक्कार रहीं।
मुफ्त की सुविधाओं के सपने,जनमत को भ्रमित कराते हैं,
पद के दुरुपयोग के सौदागर, संविधान तक झुकवाते हैं।
अट्टहास करता भ्रष्टाचार.........
=====3====
न्याय में देरी की बेड़ियाँ, निर्दोषों को रुलवाती हैं,
प्रशासनिक जटिलताएँ,जनता को रोज़ थकाती हैं।
सड़क से संसद तक,इसका काला जाल बिछा है,
सत्य आज घायल बैठा,झूठ स्वर्ण-सिंहासन पर चढ़ा है।
अट्टहास करता भ्रष्टाचार.........
=====4====
सुरसा की तरह बढ़ती,अवैध संपत्तियों का साम्राज्य,
जनसेवा के मंदिर में भी,फैल चुका है इसका आधार ।
भाई-भतीजावाद यहाँ,योग्यता को ठुकराता है,
वासना के आधार पर पक्षपात,प्रतिभाओं का हक रोंदती हैँ।
अट्टहास करता भ्रष्टाचार.........
=====5====


भ्रष्टाचार फिर हँसकर बोला, “मैं सत्ता का अभिमान हूँ,
मैं ही व्यवस्था का शासक,
मैं ही युग का भगवान हूँ।

कानूनों की जंजीरों से
हर बार निकल ही जाता हूँ,
ईमान जहाँ सिर उठाता है,
मैं उसको झुकवाता हूँ।”

लेकिन इतिहास सदा कहता—
हर रावण का अंत हुआ है,
अत्याचार के स्वर्ण-महल का
एक दिन निश्चित पतन हुआ है।

जब युवा आँखों में ज्वाला हो,
और मन में सत्य का नाद,
तब सबसे ऊँचा भ्रष्टाचार भी
हार जाता हर बार।

उठो विद्यार्थियों, जागो अब,
केवल क्रोध से काम न होगा,
यदि भारत को बदलना है,
तो संघर्षों का धाम बनोगे।

ईमान की सूखी धरती पर
फिर विश्वास के फूल खिलेंगे,
जब श्रम का मूल्य बिकेगा नहीं,
तब भारत के सपने मिलेंगे।

उस दिन यह अट्टहास रुकेगा,
रावण का अभिमान झुकेगा,
और मेहनत करने वाले का
नवभारत फिर से मुस्काएगा।





सिंहासन चाहे लोकतंत्र का हो, या न्याय के ऊँचे मंदिर हों,
मेरे कदमों की आहट से, कितने ही आदर्श बिखरते हैँ ।
कभी नोटों की खनक बनकर, कभी सत्ता की भूख में ढलकर,
कभी झूठे वादों के वस्त्र पहन, यह जनता के सपनों को छलता है।
=====*====
विद्यालयों की चौखट पर भी, इसने अपने पंजे गाड़ दिए,
ज्ञान जहाँ पूजा जाता था, वहाँ सौदेबाज़ी के बाज़ार दिए।
मेहनत की तपती दोपहरी में, जो विद्यार्थी सपने बोता है,
रातों की नींद गिरवी रखकर, भविष्य के दीप संजोता है,
उसकी आशाओं की धरती पर,जब छल का बादल छा जाता है,
पेपर लीक की काली आँधी में, उसका विश्वास टूट जाता है।
NEET की उस टूटी सुबह ने, कितनों का मन घायल कर डाला,
जिस परीक्षा को तपस्या समझा, उसे भी व्यापार बना डाला।

किससे पूछे वह छात्र बेचारा,
जिसने केवल श्रम को जाना था?
जिसके हाथों में पुस्तक थी,
न कोई सत्ता, न खजाना था।

भ्रष्टाचार फिर हँसकर बोला—
“देखो, कितना बलवान हूँ मैं,
कानूनों की जंजीरों से भी
हर बार बच निकलता हूँ मैं।

तुम लड़ते हो आदर्शों से,
मैं सौदों से दुनिया चलवाता हूँ,
ईमान जहाँ सिर उठाता है,
मैं उसे झुकना सिखलाता हूँ।”

लेकिन इतिहास यह कहता है—
हर रावण का अंत हुआ है,
अहंकार के स्वर्ण-महल का
एक दिन निश्चित पतन हुआ है।

जब युवा आँखों में ज्वाला हो,
और सत्य हृदय में पलता हो,
तब सबसे गहरा अंधियारा भी
एक दिन सूरज से जलता हो।

उठो विद्यार्थियों, जागो अब,
सिर्फ शिकायत से कुछ न होगा,
यदि व्यवस्था को बदलना है,
तो साहस का दीपक जलाना होगा।

ईमान की सूखी धरती पर
फिर विश्वास के फूल खिलेंगे,
जब श्रम का मूल्य बिकेगा नहीं,
तब भारत के सपने मिलेंगे।

उस दिन भ्रष्टाचार का अट्टहास
खामोशी में बदल जाएगा,
और मेहनत करने वाले का
सच्चा भारत मुस्काएगा।

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