यह निर्णय संविधान, लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली की ऐतिहासिक विजय - अरविन्द सिसोदिया
प्रेस विज्ञप्ति
विपक्ष की झूठी नौटंकी औंधे मुंह गिरी - अरविन्द सिसोदिया
यह निर्णय संविधान, लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली की ऐतिहासिक विजय - अरविन्द सिसोदिया
कोटा, 28 मार्च। राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल के शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्यासी एवं वरिष्ठ बुद्धिजीवी अरविन्द सिसोदिया ने कहा कि " सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भारत निर्वाचन आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) तथा मतदाता सूची शुद्धिकरण प्रक्रिया को संवैधानिक और आवश्यक मानना भारतीय लोकतंत्र की मजबूती का प्रतीक है। न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि मतदाता सूची की पारदर्शिता और शुद्धता लोकतांत्रिक व्यवस्था की आत्मा है तथा निर्वाचन आयोग को यह अधिकार और दायित्व दोनों संविधान से प्राप्त हैं। "
उन्होंने कहा कि " सर्वोच्च न्यायालय द्वारा चुनाव आयोग के पक्ष में दिया गया यह निर्णय न केवल आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता को प्रमाणित करता है, बल्कि देश की लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को भी सुदृढ़ करता है। इस निर्णय से भारतीय लोकतंत्र और संविधान का सिर गर्व से ऊँचा हुआ है।"
सिसोदिया ने कहा कि " प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी, तकनीकी रूप से सक्षम और निष्पक्ष बनाने के निरंतर प्रयास हुए हैं। मतदाता सूची का शुद्धिकरण भी उसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, जिससे फर्जी मतदान, मृत अथवा अवैध प्रविष्टियों और दोहरे नामों जैसी समस्याओं पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।"
सिसोदिया ने विपक्षी दलों पर निशाना साधते हुए कहा कि " जनता के बीच अपनी साख और विश्वास खो चुके कुछ राजनीतिक दल चुनावी पराजयों के बाद लोकतांत्रिक संस्थाओं पर प्रश्नचिह्न लगाने की आदत बना चुके हैं। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उनके सभी आरोपों और आपत्तियों को निरस्त किया जाना उनकी झूठी राजनीति और नौटंकी के औंधे मुंह गिरने जैसा है। न्यायालय के निर्णय ने स्पष्ट कर दिया है कि विपक्ष द्वारा उठाए गए मुद्दे तथ्यहीन, बेबुनियाद और केवल राजनीतिक भ्रम फैलाने के उद्देश्य से प्रेरित थे।"
सिसोदिया ने कहा कि " आज देशहित से जुड़े लगभग प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय और सुधारात्मक कार्य में कुछ विदेशी वित्तपोषित एनजीओ एवं उनसे प्रेरित समूहों द्वारा अनावश्यक अड़ंगे खड़े करने की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। लोकतांत्रिक संस्थाओं और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर अविश्वास फैलाने का यह प्रयास अंततः राष्ट्रहित के विरुद्ध वातावरण तैयार करता है। किंतु सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय ने ऐसे देशविरोधी मंसूबों और भ्रम फैलाने वाले प्रयासों को पूरी तरह विफल कर दिया है। यह देशवासियों के लिए संतोष और गर्व की बात है कि न्यायपालिका ने सत्य तथा राष्ट्रहित के पक्ष को मजबूती प्रदान की है।"
उन्होंने कहा कि " भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और उसकी पवित्रता बनाए रखना प्रत्येक नागरिक, राजनीतिक दल और संवैधानिक संस्थाओं की सामूहिक जिम्मेदारी है। मतदाता सूची की शुद्धता लोकतंत्र की विश्वसनीयता को और मजबूत प्रदान करती है। सर्वोच्च न्यायालय का यह निर्णय आने वाले समय में लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के प्रति जनता के विश्वास को और अधिक सुदृढ़ करेगा।"
सिसोदिया ने कहा कि " देशहित और लोकतंत्रहित के प्रश्नों पर राजनीति से ऊपर उठकर कार्य होना चाहिए। न्यायालय का यह निर्णय संविधान, लोकतंत्र और निष्पक्ष चुनाव प्रणाली की ऐतिहासिक विजय के रूप में याद किया जाएगा।"
भवदीय
अरविन्द सिसोदिया.
9414180151
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SIR को गैर-संवैधानिक करार नहीं दे सकते, फ्री एंड फेयर इलेक्शन जरूरी', सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
-27 May 2026
'SIR को गैर-संवैधानिक करार नहीं दे सकते, फ्री एंड फेयर इलेक्शन जरूरी', सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
'SIR को गैर-संवैधानिक करार नहीं दे सकते, फ्री एंड फेयर इलेक्शन जरूरी', सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
SIR को लेकर सुप्रीम कोर्ट में फैसला आना शुरू हो गया है. सीजेआई सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच बुधवार (27 मई 2026) को अपना फैसला सुना रही है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग ने अपनी शक्तियों का इस्तेमाल किया है, अपनी शक्तियों के बाहर नहीं. पूरी प्रक्रिया को गैर-संवैधानिक करार नहीं दे सकते. ईसीआई ने अपने अधिकार का इस्तेमाल किया है.
इस मामले में लंबी सुनवाई के बाद पीठ ने इसी साल की शुरुआत में अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था. इन याचिकाओं में चुनाव आयोग की ओर से शुरू की गई एसआईआर प्रक्रिया की वैधता को चुनौती दी गई थी.
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि यह संशोधन प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 326, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 और उसके तहत बनाए गए नियमों के तहत चुनाव आयोग को दी गई शक्तियों से कहीं आगे जाती है. यह विवाद मुख्य रूप से चुनाव आयोग की उस शर्त से जुड़ा है, जिसके तहत साल 2002 (या कुछ राज्यों में 2003) की मतदाता सूची से बाहर रहे मतदाताओं को अब नागरिकता सिद्ध करनी होगी. इसके लिए उन्हें किसी ऐसे व्यक्ति से अपना पैतृक संबंध साबित करना होगा, जिसका नाम उस समय की मतदाता सूची में दर्ज था.
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