आपातकाल में भूमिगत स्वयंसेवक
1975-1977 के 21 महीने के आपातकाल (इमरजेंसी) के दौरान भारतीय लोकतंत्र की बहाली में भूमिगत (Underground) स्वयंसेवकों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती है। इंदिरा गांधी सरकार द्वारा संघ पर प्रतिबंध लगाने के बाद, इसके कार्यकर्ताओं ने 'लोक संघर्ष समिति' के बैनर तले पूरे देश में एक सुव्यवस्थित और मौन प्रतिरोध आंदोलन चलाया। [1, 2, 3]
विभिन्न ऐतिहासिक और समकालीन दस्तावेजों के अनुसार, भूमिगत स्वयंसेवकों के संघर्ष का विस्तृत ब्यौरा इस प्रकार है:
## 1. भूमिगत नेटवर्क और सूचनाओं का आदान-प्रदान
आपातकाल में प्रेस पर पूरी तरह से सेंसरशिप लागू थी, जिससे सरकार विरोधी खबरें बाहर नहीं आ सकती थीं। [4, 5]
*
* 'सत्यवाणी' और गुप्त पत्रक: स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर 'सत्यवाणी' जैसे गुप्त समाचार पत्रों और पर्चों को छापने और वितरित करने का काम किया। ये पत्रक रात के अंधेरे में लोगों के घरों, मिलों और बाजारों में पहुंचाए जाते थे। [1, 3, 6, 7]
* 4-सदस्यीय सेल (Cells): प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट (जनवरी 1976) की रिपोर्ट के अनुसार, संघ ने ग्रामीण स्तर तक 4-4 कार्यकर्ताओं की गुप्त टोलियां (Cells) बनाई थीं, जो बिना पकड़े गए सूचना तंत्र को जीवित रखती थीं। [6, 8, 9]
*
## 2. भेष बदलकर जनसंपर्क और नेतृत्व
पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए शीर्ष नेताओं और प्रचारकों ने अपने नाम और रूप बदल लिए थे। [10, 11]
*
* वेष बदलना: तत्कालीन युवा प्रचारक नरेंद्र मोदी (सिख और संन्यासी का भेष धारण कर) और नानाजी देशमुख जैसे नेताओं ने पूरे देश में घूम-घूम कर विपक्षी दलों (समाजवादी, कांग्रेस-ओ, जनसंघ) के बीच पुल का काम किया। [10, 11, 12, 13, 14]
* शेल्टर होम (आश्रय स्थल): आम नागरिकों और स्वयंसेवकों के घरों को गुप्त ठिकानों में बदल दिया गया था, जहां आंदोलन की रणनीतियां बनती थीं। [15]
*
## 3. 'मौन संघर्ष' और अनोखे सत्याग्रह
दमनकारी माहौल में जनता का मनोबल बनाए रखने के लिए स्वयंसेवकों ने कई अनोखे तरीकों से मौन और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए: [1, 13]
*
* सार्वजनिक कार्यक्रमों में पर्चे बांटना: 15 अगस्त 1975 को लाल किले पर पीएम के भाषण के दौरान, राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि पर, और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में विदेशी राष्ट्रमंडल सांसदों के सामने अचानक प्रकट होकर स्वयंसेवकों ने आपातकाल विरोधी साहित्य बांटा और नारे लगाए।
* अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव: कई स्वयंसेवकों (जैसे सुब्रमण्यम स्वामी) ने विदेश जाकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भारत की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया, जिससे इंदिरा सरकार पर वैश्विक दबाव बढ़ा。 [3, 16]
*
## 4. जेल में बंद परिवारों की आर्थिक मदद
जब हजारों प्रमुख कार्यकर्ता जेलों (मीसा और डीआईआर के तहत) में बंद थे, तब भूमिगत स्वयंसेवकों ने समाज से गुप्त रूप से संसाधन जुटाए। उन्होंने जेल गए कार्यकर्ताओं के परिवारों के भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और कानूनी लड़ाई का पूरा खर्च मौन रूप से उठाया, जिससे आंदोलनकारियों का हौसला नहीं टूटा। [1, 3, 12, 17, 18]
## 5. सत्याग्रह के आंकड़े और बलिदान
ऐतिहासिक दस्तावेजों (जैसे पी.जी. सहस्रबुद्धे की पुस्तक The People Versus Emergency) के अनुसार: [17]
*
* कुल 1 लाख 30 हजार सत्याग्रहियों में से 1 लाख से अधिक संघ से जुड़े स्वयंसेवक थे।
* जेलों में बंद 30,000 मीसा (MISA) बंदियों में से लगभग 25,000 संघ के कार्यकर्ता थे।
* हिरासत और पुलिस प्रताड़ना के कारण पांडुरंग क्षीरसागर सहित करीब 100 स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी। [3, 13]
*
## निष्कर्ष
प्रसिद्ध पत्रकार दीनानाथ मिश्र ने इसे 'पूर्णतः स्वदेशी संघर्ष' कहा था, क्योंकि इस भूमिगत आंदोलन को न तो किसी विदेशी धन की सहायता प्राप्त थी और न ही विदेशी नेतृत्व की। मार्च 1977 में जब चुनाव घोषित हुए, तो इसी मौन जन-जागरण के कारण जनता ने लोकतांत्रिक ताकतों को भारी बहुमत से जिताया और आपातकाल का अंत हुआ। [7, 10, 19, 20]
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विभिन्न ऐतिहासिक और समकालीन दस्तावेजों के अनुसार, भूमिगत स्वयंसेवकों के संघर्ष का विस्तृत ब्यौरा इस प्रकार है:-
## 1. भूमिगत नेटवर्क और सूचनाओं का आदान-प्रदान
आपातकाल में प्रेस पर पूरी तरह से सेंसरशिप लागू थी, जिससे सरकार विरोधी खबरें बाहर नहीं आ सकती थीं।
* 'सत्यवाणी' और गुप्त पत्रक: स्वयंसेवकों ने भूमिगत रहकर 'सत्यवाणी' जैसे गुप्त समाचार पत्रों और पर्चों को छापने और वितरित करने का काम किया। ये पत्रक रात के अंधेरे में लोगों के घरों, मिलों और बाजारों में पहुंचाए जाते थे।
* 4-सदस्यीय सेल (Cells): प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका द इकोनॉमिस्ट (जनवरी 1976) की रिपोर्ट के अनुसार, संघ ने ग्रामीण स्तर तक 4-4 कार्यकर्ताओं की गुप्त टोलियां (Cells) बनाई थीं, जो बिना पकड़े गए सूचना तंत्र को जीवित रखती थीं।
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## 2. भेष बदलकर जनसंपर्क और नेतृत्व
पुलिस की गिरफ्तारी से बचने के लिए शीर्ष नेताओं और प्रचारकों ने अपने नाम और रूप बदल लिए थे।
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* वेष बदलना: तत्कालीन युवा प्रचारक नरेंद्र मोदी (सिख और संन्यासी का भेष धारण कर) और नानाजी देशमुख जैसे नेताओं ने पूरे देश में घूम-घूम कर विपक्षी दलों (समाजवादी, कांग्रेस-ओ, जनसंघ) के बीच पुल का काम किया।
* शेल्टर होम (आश्रय स्थल): आम नागरिकों और स्वयंसेवकों के घरों को गुप्त ठिकानों में बदल दिया गया था, जहां आंदोलन की रणनीतियां बनती थीं।
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## 3. 'मौन संघर्ष' और अनोखे सत्याग्रह
दमनकारी माहौल में जनता का मनोबल बनाए रखने के लिए स्वयंसेवकों ने कई अनोखे तरीकों से मौन और शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन किए:-
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* सार्वजनिक कार्यक्रमों में पर्चे बांटना: 15 अगस्त 1975 को लाल किले पर पीएम के भाषण के दौरान, राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि पर, और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में विदेशी राष्ट्रमंडल सांसदों के सामने अचानक प्रकट होकर स्वयंसेवकों ने आपातकाल विरोधी साहित्य बांटा और नारे लगाए।
* अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दबाव: कई स्वयंसेवकों (जैसे सुब्रमण्यम स्वामी) ने विदेश जाकर अंतरराष्ट्रीय मीडिया को भारत की वास्तविक स्थिति से अवगत कराया, जिससे इंदिरा सरकार पर वैश्विक दबाव बढ़ा।
## 4. जेल में बंद परिवारों की आर्थिक मदद
जब हजारों प्रमुख कार्यकर्ता जेलों (मीसा और डीआईआर के तहत) में बंद थे, तब भूमिगत स्वयंसेवकों ने समाज से गुप्त रूप से संसाधन जुटाए। उन्होंने जेल गए कार्यकर्ताओं के परिवारों के भरण-पोषण, बच्चों की पढ़ाई और कानूनी लड़ाई का पूरा खर्च मौन रूप से उठाया, जिससे आंदोलनकारियों का हौसला नहीं टूटा।
## 5. सत्याग्रह के आंकड़े और बलिदान
ऐतिहासिक दस्तावेजों (जैसे पी.जी. सहस्रबुद्धे की पुस्तक The People Versus Emergency) के अनुसार: -
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* कुल 1 लाख 30 हजार सत्याग्रहियों में से 1 लाख से अधिक संघ से जुड़े स्वयंसेवक थे।
* जेलों में बंद 30,000 मीसा (MISA) बंदियों में से लगभग 25,000 संघ के कार्यकर्ता थे।
* हिरासत और पुलिस प्रताड़ना के कारण पांडुरंग क्षीरसागर सहित करीब 100 स्वयंसेवकों ने अपने प्राणों की आहुति दी।
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## निष्कर्ष
प्रसिद्ध पत्रकार दीनानाथ मिश्र ने इसे 'पूर्णतः स्वदेशी संघर्ष' कहा था, क्योंकि इस भूमिगत आंदोलन को न तो किसी विदेशी धन की सहायता प्राप्त थी और न ही विदेशी नेतृत्व की। मार्च 1977 में जब चुनाव घोषित हुए, तो इसी मौन जन-जागरण के कारण जनता ने लोकतांत्रिक ताकतों को भारी बहुमत से जिताया और आपातकाल का अंत हुआ।
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आपातकाल (1975-1977) के दौरान देश भर में लोकतंत्र की बहाली के लिए हजारों कार्यकर्ताओं ने भूमिगत रहकर काम किया। इनमें से कुछ प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं के नाम इस प्रकार हैं:
## 1. राष्ट्रीय स्तर के प्रमुख सूत्रधार (शीर्ष नेतृत्व)
ये वे नेता थे जिन्होंने पूरे देश में आंदोलन की कमान संभाली और विपक्षी दलों को एक मंच पर लाए:
* नानाजी देशमुख: लोक संघर्ष समिति के मुख्य सचिव, जिन्होंने जयप्रकाश नारायण (JP) की गिरफ्तारी के बाद भूमिगत आंदोलन का खाका तैयार किया।
* दत्तोपंत ठेंगड़ी: भारतीय मजदूर संघ के संस्थापक, जिन्होंने भूमिगत रहकर श्रमिक वर्ग और बुद्धिजीवियों को आंदोलन से जोड़े रखा।
* माधवराव मुले: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तत्कालीन सरकार्यवाह, जिन्हें पूरे देश में भूमिगत नेटवर्क चलाने का मुख्य संचालक (Mastermind) माना जाता है।
* रवींद्र वर्मा: गांधीवादी और कांग्रेस (ओ) के नेता, जिन्होंने नानाजी देशमुख की गिरफ्तारी के बाद भूमिगत कमान संभाली।
## 2. प्रमुख युवा और क्षेत्रीय भूमिगत कार्यकर्ता
इन नेताओं ने पुलिस को छकाते हुए भेष बदलकर देश के विभिन्न हिस्सों में गुप्त सूचनाओं और साहित्य का प्रसार किया:
* नरेंद्र मोदी: गुजरात में लोक संघर्ष समिति के गुजरात सेल के महासचिव रहे। उन्होंने सिख और संन्यासी का भेष धरकर प्रतिबंधित साहित्य बांटने और नेताओं को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम किया।
* सुब्रमण्यम स्वामी: एक बेहद साहसी घटना के लिए प्रसिद्ध हुए। वे भूमिगत रहते हुए अचानक संसद पहुंचे, आपातकाल का विरोध किया और पुलिस के पकड़ने से पहले ही भेष बदलकर विदेश चले गए।
* जॉर्ज फर्नांडीस: फायरब्रांड समाजवादी नेता, जिन्होंने 'बड़ौदा डायनामाइट मामले' के तहत भूमिगत रहकर सरकार के खिलाफ हिंसक और अहिंसक दोनों तरह के प्रतिरोध की योजना बनाई थी।
* के. एस. सुदर्शन: (बाद में संघ के सरसंघचालक बने) इन्होंने मध्य भारत और अन्य क्षेत्रों में भूमिगत रहकर कार्यकर्ताओं का मार्गदर्शन किया।
## 3. महिला भूमिगत कार्यकर्ता
महिलाओं ने पुलिस की नजरों से बचकर गुप्त संदेशों को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने (Couriers) और शेल्टर होम चलाने में बड़ी भूमिका निभाई:
* मृणाल गोरे: समाजवादी नेता, जिन्हें पुलिस लंबे समय तक नहीं पकड़ पाई थी। वे मुंबई और महाराष्ट्र में भूमिगत रहकर आंदोलन चलाती रहीं।
* डॉ. सुशीला नायर: गांधीवादी नेता, जिन्होंने गुप्त बैठकों और संदेशों के आदान-प्रदान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
* अहिल्या रांगणेकर: कम्युनिस्ट और सामाजिक कार्यकर्ता, जिन्होंने मुंबई में भूमिगत नेटवर्क को मजबूत किया।
## 4. अन्य महत्वपूर्ण नाम (जो बाद में देश के प्रमुख राजनेता बने)
* अरुण जेटली: दिल्ली विश्वविद्यालय के तत्कालीन छात्र संघ अध्यक्ष, जिन्होंने शुरुआती दौर में भूमिगत रहकर विरोध प्रदर्शन आयोजित किए (बाद में गिरफ्तार हुए)।
* वेंकैया नायडू: आंध्र प्रदेश और दक्षिण भारत में भूमिगत छात्र आंदोलन के प्रमुख चेहरे।
* राम बहादुर राय: प्रसिद्ध पत्रकार, जो जेपी आंदोलन और आपातकाल के दौरान भूमिगत रहकर 'सत्यवाणी' अखबार के संपादन से जुड़े थे।
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1975 के आपातकाल के दौरान 24-25 वर्ष के युवा आरएसएस प्रचारक के रूप में नरेंद्र मोदी ने गुजरात में भूमिगत आंदोलन को चलाने में एक बेहद साहसी और रणनीतिक भूमिका निभाई थी। उनकी संगठनात्मक क्षमता को देखते हुए उन्हें 'गुजरात लोक संघर्ष समिति' (GLSS) का महासचिव बनाया गया था, जहां उनकी मुख्य जिम्मेदारी पुलिस की नजरों से बचकर प्रतिरोध को जिंदा रखना था।
ब्लूक्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित पुस्तक 'द इमरजेंसी डायरीज – इयर्स दैट फोर्स्ड अ लीडर' और अन्य संस्मरणों के अनुसार, उनके भूमिगत जीवन का विस्तृत ब्यौरा इस प्रकार है:
## 1. भेष बदलने में महारत (Master of Disguise)
पुलिस रिकॉर्ड और डोजियर में नाम आने के बाद नरेंद्र मोदी को गिरफ्तार होने से बचना सबसे बड़ी चुनौती थी, क्योंकि कमान संभालने वाले प्रभावी कार्यकर्ताओं का बाहर रहना जरूरी था। इसके लिए उन्होंने कई भेष बदले: [1, 5]
* सिख (सरदारजी) का भेष: उन्होंने दाढ़ी बढ़ाई और पगड़ी पहनकर सिख युवक का रूप धरा। एक बार वे सिख के भेष में ऑटो से जा रहे थे और ड्राइवर असली सरदार निकला, जिसने पंजाबी में बात शुरू कर दी। मोदी ने तुरंत बिना घबराए आत्मविश्वास से कहा कि वे गुजरात में ही पले-बढ़े हैं, इसलिए उनकी पंजाबी थोड़ी कमजोर है और वे बच निकले।
* संन्यासी (स्वामीजी) का भेष: भगवा वस्त्र और बाबा का रूप धरकर वे घूमते थे। सितंबर 1976 में वे इसी भेष में गुजरात की एक जेल के अंदर पहुंचे और वहां बंद विपक्ष के नेताओं से मिलकर आंदोलन की गुप्त रणनीति पर चर्चा की।
* अन्य रूप: वे कभी साधारण व्यापारी (बटुक भाई), कभी हिप्पी, तो कभी अगरबत्ती या अखबार बेचने वाले फेरीवाले बनकर पुलिस को चकमा देते रहे।
*
## 2. 'इन्फो-वारफेयर' और गुप्त साहित्य का वितरण
सेंसरशिप के कारण जनता तक सही खबरें नहीं पहुंच रही थीं, जिसे दूर करने का काम मोदी के जिम्मे था:
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* उन्होंने आपातकाल विरोधी साहित्य की छपाई, अनुवाद और राष्ट्रव्यापी वितरण की खतरनाक जिम्मेदारी संभाली।
* इन प्रतिबंधित पर्चों और बुकलेट्स को नाई की दुकानों, संतों-पुजारियों और धार्मिक नेटवर्कों के माध्यम से आम लोगों और महिलाओं तक पहुंचाया जाता था।
* पुलिस को छकाना: एक बार जब वे रिक्शा में भारी मात्रा में प्रतिबंधित साहित्य के बंडल ले जा रहे थे और पुलिस ने रोका, तो उन्होंने बिना डरे कहा, "यह विश्वविद्यालय के परीक्षा के प्रश्न पत्र हैं, आप चाहें तो बंडल खोलकर जांच लें।" उनके इस आत्मविश्वास को देखकर पुलिस ने बंडल को हाथ भी नहीं लगाया।
*
## 3. सुरक्षा के लिए अपनाए गए अनूठे नियम
भूमिगत बैठकों को सुरक्षित रखने के लिए मोदी ने कई कड़े और व्यावहारिक नियम बनाए थे:
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* जूते-चप्पल बेतरतीब रखना: उन्होंने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया था कि जहां भी गुप्त बैठक हो, घर के बाहर जूते-चप्पल सलीके से न रखें, बल्कि बिखेर कर रखें। सलीके से रखे जूते देखकर पुलिस को बड़ी बैठक होने का शक हो जाता था।
* कोड नेम और उल्टे फोन नंबर: पूरे भूमिगत आंदोलन के दौरान उनका कोड नेम 'प्रकाश' था। वे कार्यकर्ताओं को डायरी में फोन नंबरों को उलट-पलट कर लिखने की सलाह देते थे ताकि पुलिस के हाथ डायरी लगने पर भी वे असली नंबर ट्रैक न कर पाएं।
* ड्राइवर बनना: जब कभी उन्हें किसी बड़े नेता को गुप्त सुरक्षित स्थान पर ले जाना होता था, तो वे स्वयं कार के ड्राइवर बन जाते थे ताकि नाकेबंदी पर किसी को उन पर शक न हो।
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## 4. कैदियों के परिवारों की देखभाल
नरेंद्र मोदी केवल आंदोलन ही नहीं चला रहे थे, बल्कि जो कार्यकर्ता मीसा (MISA) के तहत जेलों में बंद थे, वे गुप्त रूप से उनके घरों पर जाते थे। वे पीड़ित परिवारों की आर्थिक स्थिति का जायजा लेते थे, बीमार परिजनों के इलाज की व्यवस्था करते थे और समाज से संसाधन जुटाकर उन तक मदद पहुंचाते थे।
## जीवन पर प्रभाव
इस 19 महीने के भूमिगत संघर्ष (1975-1977) ने नरेंद्र मोदी को बहुत कम उम्र में विपरीत परिस्थितियों को संभालने, आपदा में कूटनीति करने और देश के आम नागरिकों के साथ गहराई से जुड़ने का व्यावहारिक अनुभव दिया। यही कारण है कि वे इस दौर को भारतीय लोकतंत्र का 'सबसे काला अध्याय' मानते हैं और उनके कार्यकाल में ही सरकार ने 25 जून को हर साल 'संविधान हत्या दिवस' के रूप में मनाने की घोषणा की।
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