कविता - नाट्य मंच है दुनिया सारी

कविता - नाट्य मंच है दुनिया सारी

नाट्य मंच है दुनिया सारी, खेल रहे हैं प्राणी,
हर जन्म में नए-नए रोलों की करते हैं मनमानी।
कभी बनते राजा-महाराजा, कभी निर्धन अभिमानी,
क्षण भर का यह खेल जगत का, समझ न पाता प्राणी।

स्वप्न समान यह संसार सारा, स्वप्नों का है मेला,
आया जो इस जग के भीतर, अंत समय फिर अकेला।
माया के रंगमंच पर देखो, कितने रूप सजाए,
अपने ही बनाए बंधनों में, मानव स्वयं फँस जाए।

हँसना-रोना, मिलना-बिछुड़ना, सब अभिनय की कड़ियाँ,
सुख-दुख, यश-अपयश की छाया, क्षणिक समय की लड़ियाँ।
जो आज अपना कहलाता, कल होगा अनजाना,
इस सत्य को जिसने पहचाना, उसने खुद को जाना।

संयम से जी ले जीवन अपना, संयम से मर जाना,
लोभ-मोह के गहरे सागर में मत खुद को बह जाना।
सत्य, दया और धर्म के पथ पर अपने चरण बढ़ाना,
आत्मदीप बन अंधियारे में जीवन ज्योति जलाना।

भवसागर के पार उतरने की यही सच्ची तैयारी,
सद्कर्मों की नाव बना ले, यही श्रेष्ठ समझदारी।
नाट्य मंच है दुनिया सारी, खेल रहे हैं प्राणी,
ईश्वर के इस अद्भुत नाटक की हम सब हैं कहानी।

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