परिवारवादी सामंतों से मोहभंग, राष्ट्रप्रथम के विचार से जुड़ रहे विपक्षी जनप्रतिनिधि — अरविन्द सिसोदिया
प्रेस विज्ञप्ति / आलेख
राष्ट्रवादी चेतना के उदय और परिवारवादी राजनीतिक क्षरण का दौर - अरविन्द सिसोदिया
परिवारवादी सामंतों से मोहभंग, राष्ट्रप्रथम के विचार से जुड़ रहे विपक्षी जनप्रतिनिधि — अरविन्द सिसोदिया
पश्चिम बंगाल में तृण मूल कांग्रेस की करारी हार और इसके बाद तृण मूल कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दलों के सांसद एवं विधायकों के द्वारा दल बदलना या नया दल खड़ा किया जाना देश में मुख्य चर्चा का विषय है। इससे पहले भी शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस में टूट हुई थी और पीछे चलें तो कांग्रेस से आधा दर्जनबार टूट के अन्य दल बनें हैँ। इसे सिर्फ खरीद फरोख्त के नजरिये से ही देखना पूरी तरह गलत होगा। क्योंकि सक्रिय जनप्रतिनिधियों पर जनभावनाओं और कार्यकर्ताओं की संतुष्टी और भविष्य का भी भारी दबाब रहता है जिसे कोई भी सजग जनप्रतिनिधि नकार नहीं सकता। आने वाले कल को दृष्टिगत भी विपक्ष के जनप्रतिनिधि अपने निर्णय ले रहे हैँ, इसके लिए वे स्वतंत्र भी हैँ।
राष्ट्र प्रथम की चेतना और बदलता राजनीतिक परिदृश्य
भारत की राजनीति आज एक गहरे वैचारिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। पिछले एक दशक में राष्ट्र प्रथम, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और सभ्यतागत चेतना का भाव समाज में अभूतपूर्व रूप से मजबूत हुआ है। यह केवल एक राजनीतिक नारा नहीं रहा, बल्कि करोड़ों करोड़ों भारतीयों की सोच और अपेक्षाओं का हिस्सा बन चुका है।
इसके साथ ही हिंदुत्व के प्रति समाज में स्वीकार्यता और आत्मविश्वास भी बढ़ा है। एक समय था जब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व के समर्थकों को अपनी बात सफाई देकर रखनी पड़ती थी, किंतु आज स्थिति बदल चुकी है। अब राष्ट्रवाद भारतीय राजनीति की मुख्यधारा का विमर्श बन गया है। परिणामस्वरूप वे राजनीतिक दल और नेता, जिन्होंने लंबे समय तक हिंदुत्व, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और राष्ट्रीय अस्मिता के विरोध को अपनी राजनीति का आधार बनाया, वे जनता के बीच लगातार अस्वीकार किए जा रहे हैं।
जनता अब ऐसे नेतृत्व को महत्व दे रही है जो राष्ट्र, संस्कृति, परंपरा और समाज के साथ स्पष्ट रूप से खड़ा दिखाई देता हो।
नरेंद्र मोदी और राष्ट्रप्रथम विचार का जनआंदोलन
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नें 1925 में जिस राष्ट्र प्रथम के भाव को स्थापित किया। उसी राष्ट्रप्रथम की भावना को भारतीय राजनीति में व्यापक जनस्वीकार्यता दिलाने का मुख्य श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी जाता है।
स्वतंत्रता के बाद लंबे समय तक राष्ट्रवाद, सांस्कृतिक गौरव और सभ्यतागत पहचान के विषय राजनीतिक विमर्श के केंद्र में नहीं रहे, किंतु मोदीजी ने इन्हें शासन और राजनीति के प्रमुख आधारों में स्थापित किया। उन्होंने भारत की सांस्कृतिक विरासत, राष्ट्रीय सुरक्षा, नारीशक्ति सम्मान, आत्मनिर्भरता, वैश्विक प्रतिष्ठा और जनभागीदारी को एक सूत्र में जोड़ते हुए राष्ट्रवाद को केवल वैचारिक अवधारणा नहीं रहने दिया, बल्कि उसे जनभावना का स्वरूप प्रदान किया। यही कारण है कि राष्ट्र प्रथम का विचार अब किसी दल विशेष का राजनीतिक नारा नहीं, बल्कि व्यापक राष्ट्रीय चेतना का अंग बनता जा रहा है और अब बदलते दौर में, राजनीतिक दलों तथा जनप्रतिनिधियों को भी अपनी भूमिका उसी कसौटी पर तय करनी पड़ रही है।
जनता अब केवल दल नहीं, विचारधारा को वोट दे रही है
भारतीय मतदाता पहले की अपेक्षा अधिक सजग और राजनीतिक रूप से परिपक्व हुआ है। अब मतदान केवल जातीय समीकरणों, क्षेत्रीय भावनाओं या व्यक्तिपूजा के आधार पर नहीं होता। मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा दल और कौन-सा नेता राष्ट्रहित, सांस्कृतिक अस्मिता, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनभावनाओं के साथ खड़ा है। पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में क्षेत्रवाद ध्वस्त हो गया।
इसी कारण राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रति समाज का समर्थन बढ़ा है। जनता अब यह महसूस करना चाहती है कि उसकी सरकार और उसके प्रतिनिधि राष्ट्र के सम्मान, संस्कृति के संरक्षण और परंपराओं के गौरव के लिए प्रतिबद्ध हों।
परिवारवाद और सामंतवादी राजनीति से बढ़ती निराशा
लोकतंत्र का आधार कार्यकर्ता और मतदाता होते हैं, किंतु अनेक विपक्षी दलों में आंतरिक लोकतंत्र के स्थान पर परिवारवाद और वंशवाद ने जड़ें जमा ली हैं। ऐसे दलों में निर्णय योग्यता, संघर्ष और संगठन क्षमता के आधार पर नहीं, बल्कि पारिवारिक उत्तराधिकार के आधार पर लिए जाते हैं।
जब किसी दल का कार्यकर्ता वर्षों संघर्ष करने के बाद भी स्वयं को उपेक्षित पाता है और नेतृत्व कुछ परिवारों तक सीमित दिखाई देता है, तब स्वाभाविक रूप से असंतोष जन्म लेता है। धीरे-धीरे यह असंतोष दलों में टूट, विद्रोह और नेतृत्व परिवर्तन का कारण बनता है।
यही कारण है कि अनेक विपक्षी जनप्रतिनिधि आज स्वयं को ऐसी स्थिति में पाते हैं जहाँ एक ओर उनके मतदाता, समर्थक और कार्यकर्ता हैं, जबकि दूसरी ओर परिवारवादी नेतृत्व की सीमाएँ हैं। ऐसी परिस्थिति में दल बदलना, इस्तीफा देना अथवा नया राजनीतिक विकल्प तलाशना उनके लिए स्वाभाविक निर्णय बन जाता है।
मूल शिवसेना का उदाहरण : मतदाता सर्वोपरि
महाराष्ट्र की राजनीति इसका महत्वपूर्ण उदाहरण प्रस्तुत करती है। मूल शिवसेना लंबे समय तक हिंदुत्व और मराठी अस्मिता की राजनीति का प्रमुख प्रतीक रही। बालासाहेब ठाकरे के नेतृत्व में उसकी वैचारिक पहचान स्पष्ट और दृढ़ थी। किन्तु जब भाजपा से अलग होकर तुष्टिकरणवादी कांग्रेस के साथ गठबंधन का निर्णय लिया गया, तब बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों के भीतर वैचारिक असहजता उत्पन्न हुई। परिणामस्वरूप पार्टी में विभाजन हुआ। यही नहीं विभाजित शिवसेना के तथाकथित बागी गुट को जनता नें असली शिवसेना की तरह वोट देकर भी जिताया। इसी तरह असम में कांग्रेस और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस घुसपेठियों की पक्षधर होनें से जनता द्वारा नकार दी गईं हैँ। यह घटनाऐं बताती है कि किसी भी राजनीतिक दल की वास्तविक शक्ति उसके मतदाता और कार्यकर्ता होते हैं, न कि केवल उसके शीर्ष नेतृत्व में।
राजनीतिक दल तब तक ही मजबूत रहते हैं जब तक वे अपने मूल समर्थक वर्ग की भावनाओं और अपेक्षाओं का सम्मान करते हैं।
राष्ट्रवाद के विरुद्ध राजनीति का सीमित होता प्रभाव
देश में एक व्यापक धारणा विकसित हुई है कि राजनीति का आधार राष्ट्रहित होना चाहिए, न कि तुष्टिकरण। नागरिकों का एक बड़ा वर्ग समान नागरिक दृष्टि, राष्ट्रीय सुरक्षा, सांस्कृतिक सम्मान और जनसंख्या संतुलन जैसे विषयों को गंभीरता से देखता है।
अवैध घुसपैठ, आतंकवाद, आराजकतावाद, विदेशों में राष्ट्र अपमान, मतदाता सूचियों की शुद्धता, राष्ट्रीय सुरक्षा और सांस्कृतिक पहचान जैसे विषय अब केवल राजनीतिक मुद्दे नहीं रहे, बल्कि जनभावना का हिस्सा बन चुके हैं। जब कोई दल इन विषयों पर जनता की अपेक्षाओं के विपरीत खड़ा दिखाई देता है, तब उसके अपने कार्यकर्ताओं और जनप्रतिनिधियों में भी असंतोष बढ़ने लगता है।
विपक्ष की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा नहीं,
बदली हुई जनमानस की सोच है
अक्सर विपक्षी दल अपनी पराजयों का कारण भाजपा की संगठन क्षमता या सत्ता को बताते हैं। कभी वे वोटिंग मशीन को दोष देते हैँ, कभी वे अन्य कारण बताते हैँ किन्तु कभी अपने जन विरोधी क्रिया कलापों पर भी ध्यान दें तो सहज समझ आता है कि जन भावना की वास्तविकता इससे कहीं अधिक व्यापक और मातृभूमि के मान सम्मान तक जाती है।
वास्तविक परिवर्तन भारतीय समाज की सोच में आया है। जनता अब राष्ट्रहित, विकास, सांस्कृतिक गौरव, सुरक्षा और स्पष्ट और योग्य नेतृत्व को प्राथमिकता दे रही है। यही कारण है कि अनेक जनप्रतिनिधि भी अपने राजनीतिक भविष्य को जनता की इसी बदलती मानसिकता के अनुरूप ढालने का प्रयास स्वयं को बदल कर, कर रहे हैं।
इसलिए अनेक दलों में हो रही टूट-फूट को केवल सत्ता की राजनीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। यह भारतीय समाज में चल रहे वैचारिक परिवर्तन का भी परिणाम है।
लोकतंत्र में अंतिम निर्णय जनता का होता है
भारत का लोकतंत्र बार-बार यह सिद्ध कर चुका है कि अंतिम शक्ति मतदाता के हाथ में होती है। आपातकाल के बाद प्रधानमंत्री पद पर रहते हुये श्रीमती इंदिरा गाँधी की पराजय सर्वविदित है। मुख्यमंत्री पद पर रहते हुये पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी और तमिलनाडु में स्टालीन को हारते हुये देखा है। जनता जिसे उचित समझती है, उसे समर्थन देती है और जिसे राष्ट्र तथा समाज की अपेक्षाओं से दूर पाती है, उसे अस्वीकार कर देती है।
कोई भी दल केवल सत्ता के बल पर लंबे समय तक टिक नहीं सकता। उसकी वास्तविक शक्ति जनता के विश्वास में निहित होती है।
राष्ट्र प्रथम : भारत की राजनीति का नया युग
आज का भारत उस दिशा में आगे बढ़ता दिखाई देता है जहाँ राष्ट्र प्रथम, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद, हिंदुत्व और सभ्यतागत आत्मगौरव की भावना समाज के बड़े वर्ग को प्रभावित कर रही है। इसी कारण राष्ट्रवादी राजनीति के प्रति आकर्षण बढ़ रहा है और अनेक जनप्रतिनिधि भी स्वयं को उसी धारा के निकट पाते हैं।
जो दल और नेता इस राष्ट्रीय चेतना के साथ स्वयं को जोड़ पाएंगे, वे भविष्य की राजनीति को दिशा देंगे। वहीं जो दल परिवारवाद, तुष्टिकरण और जनता की बदलती आकांक्षाओं की उपेक्षा करेंगे, वे धीरे-धीरे राजनीतिक रूप से अप्रासंगिक होते जाएंगे।
भारतीय राजनीति का वर्तमान दौर केवल दलों के पुनर्गठन का नहीं, बल्कि राष्ट्रवादी चेतना के उदय और परिवारवादी राजनीति के क्षरण का दौर है। आने वाले वर्षों में यही परिवर्तन भारत की राजनीतिक दिशा और दशा दोनों को निर्धारित करेगा।
आलेख -
अरविन्द सिसोदिया
शिक्षा प्रोत्साहन प्रन्याशी
राजस्थान राज्य पाठ्यपुस्तक मंडल, जयपुर।
9414180151
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें