कविता - भूमिगत स्वयंसेवक थे, मातृभूमि का भाल

आपातकाल को पराजित करने वाले लाल
कविता 
भूमिगत स्वयंसेवक थे, मातृभूमि का भाल
-अरविन्द सिसोदिया 

न जेलों में थे, न बेलों में थे, कर रहे थे कमाल,
भूमिगत स्वयंसेवक थे, मातृभूमि का भाल।
जब आपातकाल ने हर लिया था, जन-गण-मन का अधिकार,
तब विश्वास के दीपक बन जलते थे , ये भारत के लाल।
=====1=====
सत्ता के मद में चूर हुई जब, वाणी पर पहरे थे,
अखबारों के मुख पर ताले, न्याय के पंख बिखरे थे।
संविधान की आत्मा रोई, अधिकार हुए कंगाल,
तब चुपचाप संघर्ष रचते, वे भारत के लाल।
=====2=====
न रातों का भय रोक सका, न कारागार का साया,
हर गली, नगर, हर गाँव में, संदेशों का दीप जलाया।
गुप्त पत्र, पर्चे, संवादों से, जगाते जन जन-विशाल,
लोकतंत्र की रक्षा में थे, अडिग भारत के लाल।
=====3=====
कंधों पर था राष्ट्रधर्म, हृदय में स्वतंत्रता की ज्वाला,
अपने सुख का त्याग किया, जन-जन को दिया उजाला।
किसी ने घर छोड़ा, किसी ने सहा विपदाओं का जाल,
फिर भी डिगे नहीं पथ से, वे साहस के लाल।
=====4=====
तब भय का शासन चलता था और अन्याय का बोलबाला,
तब सत्याग्रह की अग्नि लेकर निकला जनमत मतवाला।
भूमिगत रहकर भी उन्होंने किया संघर्ष विशाल,
जनशक्ति के जागरण का बने अमर मशाल।
=====5=====
माताओं ने आँसू रोके, बहनों ने हिम्मत बंधाई,
युवकों ने निज जीवन अर्पित कर, कर्तव्य-रेखा निभाई।
परिवारों ने कष्ट सहे, पर रखा ऊँचा भाल,
इस तप, त्याग और बलिदान से जिया भारत का लाल ।
=====6=====
फिर आया वह शुभ प्रभात, टूटा दमन का जंजाल,
जनता ने अपने मत से लिख डाला नया मिसाल।
लोकतंत्र का सूर्य पुनः चमका लेकर स्वर्णिम ज्वाल,
विजयी होकर लौटे तब वे संघर्षों के लाल।
=====7=====
इतिहास सदा यह गाएगा, वह अद्भुत गौरवगान,
जब संकट में भी झुका नहीं भारत का स्वाभिमान।
न जेलों में थे, न बेलों में थे, कर रहे थे कमाल,
भूमिगत स्वयंसेवक थे, मातृभूमि का भाल।
=====8=====
आपातकाल को पराजित करने वाले वे लाल महान,
लोकतंत्र की रक्षा में जिनका अमिट रहा योगदान।
इनके तप, त्याग, साहस को शत-शत नमन हर काल,
भारत माँ के मस्तक पर वे हैँ भी उज्ज्वल भाल।

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