राहुल गांधी की री-लॉन्चिंग फ्लॉप, छात्र संवाद कार्यक्रम भय और भ्रम उत्पन्न करने तक सीमित रहा — अरविन्द सिसोदिया

राहुल गांधी की री-लॉन्चिंग फ्लॉप, छात्र संवाद कार्यक्रम भय और भ्रम उत्पन्न करने तक सीमित रहा — अरविन्द सिसोदिया

एक बहुत पुरानी लोकप्रिय फिल्म "मेरा नाम जोकर" अब बहुत कम लोगों को ध्यान में होगी, किंतु यह एक असफल व्यक्ति की भावुक कहानी थी। उसका एक गाना “जीना यहां, मरना यहां, इसके सिवाय जाना कहां” आज भी लोगों के जेहन में है। यही स्थिति कांग्रेस के राजकुमार राहुल गांधी की है। भारत के सबसे बड़े और सबसे सफल राजनैतिक परिवार में उनका जन्म हुआ, जन्म के साथ ही उन्हें प्रधानमंत्री पद का अधिकारी मान लिया गया, किंतु अभी तक यह पद उन्हें जनता से नहीं मिला।

अब 2029 का लोकसभा चुनाव सामने है और इसी संदर्भ में उनकी री-लॉन्चिंग पार्टी द्वारा की गई है। भले ही बहाना नीट परीक्षा पेपरलीक और छात्र संवाद का रहा हो, किंतु असली कहानी राहुल गांधी को पुनः सबसे बड़े नेता के रूप में जनता के बीच री-लॉन्च करने की है और इसके पीछे मूल मकसद 2029 का आम चुनाव ही है।

हालांकि राहुल गांधी के जो भी कार्यक्रम, योजनाएं और वक्तव्य होते हैं, उनके पीछे बहुत सारे विदेशी दिमाग , छवि निर्माण करने वाली कंपनियां, विज्ञापन एवं मीडिया मैनेजमेंट वाले और कुछ हद तक विदेशों में डीप स्टेट के रूप में किसी भी देश की व्यवस्था को बाधित करने वाली अराजकतावादी शक्तियां भी काम करती प्रतीत होती हैं। यह कार्यक्रम इनमें से किसी की भी प्रेरणा हो सकती है, किंतु भारत के परिप्रेक्ष्य में राहुल गांधी का छात्र संवाद कार्यक्रम तथाकथित “कॉकरोच पार्टी” के जन्म से उत्पन्न चिंताओं के इर्द-गिर्द अधिक दिखाई देता है।

कांग्रेस के मन में भय है कि कहीं आम आदमी पार्टी का नया प्रतिरुप सोशल मीडिया की “कॉकरोच पार्टी” भारत के युवाओं में अपना अस्तित्व न बना ले और राहुल गांधी हमेशा के लिए भारतीय राजनीति के केंद्र से बाहर न हो जाएं। इसी चिंता और भय से उत्पन्न यह छात्र संवाद कार्यक्रम हैँ , इसके अतिरिक्त कुछ नहीं। सामान्य राजनीतिक शब्दों में इसे " राहुल गांधी का री-लॉन्चिंग कार्यक्रम ' कहा जा सकता है।

कोटा में आयोजित इस कार्यक्रम के लिए पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, पूर्व उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट, कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डोटासरा, नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली सहित एक दर्जन से अधिक बड़े नेता सक्रिय रहे। आसपास के लगभग एक दर्जन जिलों में भी कांग्रेस संगठन पूरी तरह जुटा रहा। किन्तु छात्र इससे नहीं जुड़े। 

राहुल गांधी का यह छात्र संवाद कार्यक्रम युवाओं के लिए कोई विशेष आकर्षक कार्यक्रम नहीं रहा। न तो युवाओं को कोई प्रेरणा, कोई मार्गदर्शन या कोई स्पष्ट दिशा देने वाली बात सामने आई और न ही पूरे कार्यक्रम में गंभीरता तथा भरोसा स्थापित करने वाली अभिव्यक्ति दिखाई दी। वहीं वे छात्र और अविभावकों में अनावश्यक भय और भ्रम उत्पन्न करते रहे। अर्थात मौलिक दृष्टि से यह कार्यक्रम सफल नहीं कहा जा सकता और आगे होने वाले ऐसे छात्र संवाद कार्यक्रम भी फ्लॉप हो सकते हैं।

कोटा के छात्र संवाद कार्यक्रम का सबसे बुरा और राजनीतिक दृष्टि से सबसे गलत पहलू यह था कि कांग्रेस के समर्पित कार्यकर्ताओं को, जिन्होंने अपना पूरा जीवन पार्टी के लिए समर्पित कर दिया और हर परिस्थिति में संगठन का साथ निभाया, उन्हें एक तरफ दर्शक दीर्घा में बैठा दिया गया। मानो उन्हें डस्टबिन में डाल दिया गया हो। जैसे ये सारे कांग्रेसजन केवल चाकरी करने तक ही सीमित हों।

कार्यकर्ताओं को केवल चाकरी तक सीमित रखने की यह प्रवृत्ति परिवारवादी पार्टियों की विशेषता रही है। इसी कारण ऐसी परिवारवादी पार्टियां टूटती हैं, बिखरती हैं और इनके भीतर से नई पार्टियां जन्म लेती हैं। राहुल गांधी के छात्र संवाद कार्यक्रम में पार्टी कार्यकर्ताओं के प्रति जो नजरिया सार्वजनिक रूप से देखने को मिला, वह भविष्य में कांग्रेस में किसी नई टूट और नए बिखराव का संकेत भी देता है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कांग्रेस में अधिकांश मुद्दे किसी सुधार के लिए नहीं उठाए जाते, बल्कि घेराव, अराजकता, अवरोध और राजनीतिक दबाव बनाने के लिए उठाए जाते हैं। फिर उन्हें छोड़कर दूसरा मुद्दा पकड़ लिया जाता है। पहले मुद्दे का क्या हुआ, इससे किसी को कोई लेना-देना नहीं रहता। कांग्रेस द्वारा पिछले 10–12 वर्षों में उठाए गए मुद्दों का विश्लेषण किया जाए तो यही निष्कर्ष निकलता है कि मुद्दा उठाया गया, उसके माध्यम से स्वयं को स्थापित करने का प्रयास किया गया और फिर उसे छोड़कर आगे बढ़ गए। राहुल गाँधी की मीडिया मैनेजमेंट टीम का लक्ष्य अख़बारों की फ्रंट लाईन में बने रहने की है। भले ही वे देश की जनता को स्वीकार्य नहीं हों। इसी कारण इन मुद्दों का राजनीतिक लाभ कांग्रेस को नहीं मिल पाता, बल्कि कई बार हानि ही उठानी पड़ती है।

ताजा उदाहरण के रूप में कांग्रेस द्वारा उठाया वोट चोरी का मुद्दा और एसआईआर का विरोध देखा जा सकता है। किंतु जनता के बीच इन मामलों से कांग्रेस की छवि बिगड़ी और जनता ने उन्हें नकार दिया।

अर्थात जब तक कोई भी मुद्दा स्पष्ट विकल्प और सुधार के एजेंडे के साथ न हो, तब तक केवल व्यवस्था परिवर्तन की बात करना पर्याप्त नहीं होता। व्यवस्था परिवर्तन के बाद क्या लाया जाएगा, यदि यह स्पष्ट न हो, तो ऐसे मुद्दे आत्मघाती सिद्ध होते हैं। यही स्थिति छात्र संवाद कार्यक्रम की भी दिखाई देती है।

आज का समाज और विशेषकर युवा वर्ग बहुत तेजी से सोचता और समझता है। किसी भी कार्यक्रम के प्रारंभ होने से पहले ही उसके उद्देश्यों और संभावित राजनीतिक लाभों का आकलन कर लिया जाता है। लोगों को यह समझ में आ जाता है कि इसके पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या है और इससे किस प्रकार का लाभ उठाने का प्रयास किया जा रहा है।

कांग्रेस नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी का छात्र संवाद कार्यक्रम किसी टूलकिट का हिस्सा भी हो सकता है, किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा हो सकता है, युवाओं को भड़काने और उन्हें सड़कों पर उतारने का लक्ष्य भी इसके पीछे हो सकता है। किंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत का युवा अपना आदर्श बजरंगबली, हनुमानजी, पवनपुत्र को मानता है तथा वह अधर्म और राष्ट्रविरोधी प्रवृत्तियों की लंका जलाने का भी सामर्थ्य रखता है।

हलांकि राहुल गाँधी का अभी अगला निशाना अखिलेश यादव हैँ, बांकी सभी साथियों को तो उन्होंने छोटा कर दिया अब आख़री तौर और यूपी में अखिलेश और पंजाब में केजरीवाल का बर्चस्व खत्म करना है। ताकी कांग्रेस ऊपर उठ सके और लोकसभा 2029 में उसे कम से साथी दलों पर डिपेंड होना पड़े। हालांकि राहुल को सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण 2029 ही प्रतीत हो रहा है क्योंकि साथी दलों में घोर अविश्वास उत्पन्न हो गया है।

राहुल गांधी के छात्र संवाद कार्यक्रम के उल्टे परिणाम भी निकल सकते हैं, क्योंकि राहुल गांधी की छवि राष्ट्रीय विरोधी, अराजकतावादी, तुष्टिकरणवादी तथा विशेष रूप से हिंदुत्व विरोधी नेता की रही है। इतनी सारी खराब छवियों और आरोपों के साथ वे भारत के राष्ट्रीय नायक नहीं बन सकते, क्योंकि भारत का जनमानस अपनी समझ और अनुभव के आधार पर सब कुछ देखता और परखता है।

भवदीय 

अरविन्द सिसोदिया 
9414180151

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